विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 350, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३३८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
द्वात्रिंशोऽध्यायः
श्रीकृष्णका कंसवधके लिये पश्चात्तापपूर्वक उसके औचित्यका समर्थन, उग्रसेनका श्रीकृष्णको सर्वस्व-समर्पणके पश्चात् कंसका अन्त्येष्टि-संस्कार करनेके लिये अनुरोध, श्रीकृष्णका उन्हें समझा-बुझाकर राज्यपर अभिषिक्त करना और समस्त यादवोंके साथ जाकर कंस आदिका अन्त्येष्टि-संस्कार कराना
वैशम्पायन उवाच
उग्रसेनस्तु कृष्णस्य समीपं दुःखितो ययौ।
पुत्रशोकाभिसंतप्तो विषपीत इव श्वसन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! राजा उग्रसेन पुत्रशोकसे संतप्त एवं दुखी होकर श्रीकृष्णके समीप गये। उस समय वे इस प्रकार लंबी साँस खींच रहे थे, मानो उन्होंने विष पी लिया हो ॥ १ ॥
स ददर्श गृहे कृष्णं यादवैः परिवारितम्।
पश्चात्तापाद् ध्यायन्तं कंसस्य निधनाविलम् ॥ २ ॥
उन्होंने देखा, पिताके घरमें श्रीकृष्ण यादवोंसे घिरे हुए बैठे हैं और कंसके निधनसे मलिन-मुख हो पश्चात्ताप करते हुए चिन्तामग्न हो रहे हैं ॥ २ ॥
कंसनारीविलापांश्च श्रुत्वा स करुणान् बहून् ।
गर्हमाणस्तथाऽऽत्मानं तस्मिन् यादवसंसदि ॥ ३ ॥
वे कंसकी पत्नियोंके बहुतेरे करुण विलाप सुनकर उस यादव-समाजमें अपनी निन्दा करते हुए बोले—॥ ३ ॥
अहो मयातिबाल्येन रोषाद् दोषानुवर्तिना।
वैधव्यं स्त्रीसहस्राणां कंसस्यास्य वधे कृतम् ॥ ४ ॥
'अहो ! मैंने अत्यन्त अविवेकके कारण रोषवश दोषका ही अनुसरण किया और इस कंसका वध करके हजारों स्त्रियोंको विधवा बना दिया है ॥ ४ ॥
कारुण्यं खलु नारीषु प्राकृतस्यापि जायते।
एवमार्तं रुदन्तीषु मया भर्तरि पातिते ॥ ५ ॥
परिदेवितमात्रेण शोकः खलु विधीयते।
'साधारण मनुष्योंको भी स्त्रियोंपर दया हो आती है; परंतु मेरे द्वारा अपने पतिके मारे जानेपर जो इस प्रकार आर्त होकर रो रही हैं, उन रानियोंके प्रति केवल पश्चात्ताप प्रकट करके मैं अपना शोक प्रकाशित कर रहा हूँ ॥ ५½ ॥
कृतान्तस्यानभिज्ञानां स्त्रीणां कारुण्यसम्भवः ॥ ६ ॥
'इन भोली-भाली स्त्रियोंके विलापको सुनकर तो यमराजके हृदयमें भी करुणाका संचार हो सकता है ॥ ६ ॥
कंसस्य हि वधः श्रेयान् प्रागेवाभिमतो मम।
सतामुद्वेजनीयस्य पापेष्वभिरतस्य च ॥ ७ ॥
लोके पतितवृत्तस्य परुषस्याल्पमेधसः।
अक्लिष्टं मरणं श्रेयो न विद्दिष्टस्य जीवितम् ॥ ८ ॥
'मैंने तो पहले ही यह निश्चय कर लिया था कि कंसका वध ही श्रेष्ठ है। जो सदा पापोंमें तत्पर रहनेके कारण साधु पुरुषोंकी दृष्टिमें भी उद्वेजनीय (उद्वेगमें डालने योग्य ) हो गया हो, संसारमें सदाचारसे गिर गया हो तथा सब लोग जिससे विद्वेष रखने लगे हों, ऐसे मन्दबुद्धि पुरुषका मर जाना ही श्रेयस्कर है। वही उसे क्लेशसे छुटकारा दिलानेवाला है, जीवित रहना नहीं ॥ ७-८ ॥
कंसः पापपरश्चैव साधूनामप्यसम्मतः।
धिक्छब्दपतितश्चैव जीविते चास्य का दया ॥ ९ ॥
'कंस सदा पापोंमें ही लगा रहता था, साधु पुरुष भी (उसे दुष्ट समझकर) उसका आदर नहीं करते थे तथा वह सबका धिक्कार पाकर पतित हो गया था, अतः उसके जीवनपर क्या दया हो सकती है ? ॥ ९ ॥
स्वर्गे तपोभृतां वासः फलं पुण्यस्य कर्मणः।
इहापि यशसा युक्तः स्वर्गस्थैरवधार्यते ॥ १० ॥
'तपस्वी पुरुषोंको जो स्वर्गलोकमें निवास प्राप्त होता है, वह उनके पुण्यकर्मका ही फल है। पुण्यात्मा पुरुष इस जगत्में भी यशस्वी होता है और स्वर्गवासी देवता भी उसे सादर ग्रहण करते हैं ॥ १० ॥
यदि स्युर्निर्वृता लोकाः स्युश्च धर्मपराः प्रजाः।
नरा धर्मप्रवृत्ताश्च न राजानमयः स्पृशेत् ॥ ११ ॥
'यदि सब लोग संतुष्ट हों, सारी प्रजा धर्ममें तत्पर रहे और मनुष्योंकी केवल धर्ममें ही प्रवृत्ति हो तो राजाओंको अन्याय छू भी नहीं सकता ॥ ११ ॥
निग्रहे दुष्टवृत्तीनां कृतान्तः कुरुते फलम्।
इष्टधर्मेषु लोकेषु कर्तव्यं पारलौकिकम् ॥ १२ ॥
'यदि राजा इस लोकमें दुष्ट वृत्तिवाले पुरुषोंका दमन करे तो परलोकमें धर्मराज उसे उसका फल देते हैं। सम्पूर्ण लोकोंको धर्म (उसके फलस्वरूप सुखकी प्राप्ति ) ही अभीष्ट है, इसलिये उनमें रहनेवाले पुरुषोंको परलोकमें सुख देनेवाले पुण्यकर्मोंका ही अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १२ ॥
अतीव देवा रक्षन्ति नरं धर्मपरायणम्।
कर्तारः सुलभा लोके दुष्कृतस्य हि कर्मणः ॥ १३ ॥
'देवता धर्मपरायण मनुष्यकी विशेषरूपसे रक्षा करते हैं, क्योंकि लोकमें अधिकतर पाप कर्म करनेवाले ही सुलभ होते हैं ॥ १३ ॥