विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 351, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः ३२९
हतः सोऽयं मया कंसः साध्वेतदवगम्यताम्।
मूलच्छेदः कृतस्तस्य विपरीतस्य कर्मणः॥ १४॥
'अतः मैंने जो इस कंसका वध किया है, इसे आपलोग ठीक समझें, क्योकि ऐसा करके मैंने उसके पाप-कर्मका मूलोच्छेद कर डाला है ॥ १४ ॥
तदेष सान्त्व्यतां सर्वः शोकार्तः प्रमदाजनः।
पौराश्च पुर्यां श्रेण्यश्च सान्त्व्यन्तां सर्व एव हि॥ १५॥
'इसलिये इन समस्त शोकाकुल नारियोंको आपलोग सान्त्वना प्रदान करें और मथुरापुरीके नागरिकों एवं शिल्पियो- तथा व्यवसायियोंको भी समझा-बुझाकर धीरज बँधायें' ॥१५॥
एवं ब्रुवति गोविन्दे विवेशावनताननः।
उग्रसेनो यदून् गृह्य पुत्रकिल्बिषशङ्कितः ॥ १६ ॥
जब श्रीकृष्ण इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय राजा उग्रसेन अपना मुँह नीचे किये कुछ यादवोंको साथ ले उस घरमें प्रविष्ट हुए। वे मन-ही-मन अपने पुत्र कंसके अपराधसे डरे हुए थे ॥ १६ ॥
स कृष्णं पुण्डरीकाक्षमुवाच यदुसंसदि।
बाष्पसंदिग्धया वाचा दीनया सज्जमानया॥ १७॥
उन्होंने उस यादव-सभामे कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णसे आँसूभरी दीन, गद्गद तथा लड़खड़ाती हुई वाणीमें इस प्रकार कहा-॥ १७ ॥
पुत्रो निर्यातितः क्रोधान्नीतो याम्यां दिशं रिपुः।
स्वधर्माधिगता कीर्तिर्नाम विश्रावितं भुवि ॥१८॥
'श्रीकृष्ण ! तुमने मेरे पुत्रसे उसके अपराधका बदला ले लिया, अपने उस शत्रुको क्रोधपूर्वक यमलोक पहुँचा दिया, धर्मके अनुसार कीर्ति प्राप्त कर ली और भूमण्डलमें अपने नामका डंका पीट दिया ॥ १८ ॥
स्थापितं सत्सु माहात्म्यं शङ्किता रिपवः कृताः।
स्थापितो यादवो वंशो गर्विताः सुहृदः कृताः ॥१९॥
'सत्पुरुषोंके हृदयमें अपनी महत्ता स्थापित कर दी और शत्रुओंको भयभीत कर दिया, यदुवंशकी जड़ जमा दी और सुहृदोंको अपने ऊपर गर्व करनेका अवसर दिया ॥ १९ ॥
सामन्तेषु नरेन्द्रेषु प्रतापस्ते प्रकाशितः।
मित्राणि त्वां भजिष्यन्ति संश्रयिष्यन्ति पार्थिवाः ॥२०॥
'सामन्त राजाओमे तुम्हारा प्रताप प्रकाशित हो गया, मित्रगण तुम्हे अपनायेंगे और भूमण्डलके राजा तुम्हारा आश्रय लेगे ॥ २० ॥
प्रकृतयोऽनुयास्यन्ति स्तोष्यन्ति त्वां द्विजातयः।
संधिविग्रहमुख्यास्त्वां प्रणमिष्यन्ति मन्त्रिणः ॥२१॥
'प्रकृतियाँ (प्रजा, मन्त्री आदि) तुम्हारा अनुसरण करेंगी, ब्राह्मणलोग तुम्हारी स्तुति करेंगे-तुम्हारे गुण गायेंगे और संधि-विग्रहके कार्योंमें प्रमुखरूपसे भाग लेनेवाले मन्त्री तुम्हें प्रणाम करेंगे ॥ २१ ॥
हस्त्यश्वरथसम्पूर्ण पदातिगणसंकुलम्।
प्रतिगृहाण कृष्णेदं कंसस्य बलमव्ययम् ॥ २२ ॥
'श्रीकृष्ण ! हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंसे भरी हुई कंसकी यह अक्षय सेना ग्रहण करो ॥ २२ ॥
धनं धान्यं च यत् किंचिद् रत्नान्यप्याच्छादनानि च।
प्रतीच्छन्तु नियुक्ता वै त्वदीयाः कृष्ण पूरुषाः ॥२३॥
स्त्रियो हिरण्यं यानानि यदन्यद् वसु किंचन।
'श्रीकृष्ण ! जो कुछ भी धन, धान्य, रत्न और वस्त्र आदि कंसके अधिकारमें थे, उन सबको तुम्हारे आदमी सँभाल लें। स्त्रियाँ, सुवर्ण, वाहन तथा अन्य जो कुछ भी धन, रत्न आदि हैं, उनपर भी वे अधिकार कर लें ॥ २३$\frac{१}{२}$ ॥
एवं हि विहिते योगे पर्याप्ते कृष्ण विग्रहे ॥ २४॥
प्रतिष्ठितायां मेदिन्यां यदूनां शत्रुसूदन।
त्वं गतिश्चागतिश्चैव यदूनां यदुनन्दन ॥ २५॥
'यदुवंशियोंके शत्रुओंका संहार करनेवाले यदुनन्दन श्रीकृष्ण ! जब इस प्रकार प्राप्त वस्तुकी प्राप्तिरूप योग सम्पन्न हो गया, विग्रहकी समाप्ति हो गयी और इस पृथ्वीपर तुम्हारा पूर्णरूपसे अधिकार हो गया, तब हम सभी यादवोंकी गति और अगति एकमात्र तुम्ही हो ॥ २४-२५ ॥
शृणुष्व वदतां वीर कृपणानामिदं वचः।
अस्य त्वत्कोपदिग्धस्य कंसस्याशुभकर्मणः ॥ २६ ॥
तव प्रसादाद् गोविन्द प्रेतकार्यं क्रियेत ह।
'वीर ! हम दीनजन तुम्हारे सामने जो कुछ कह रहे हैं-हमारी यह प्रार्थना स्वीकार करो। गोविन्द ! यह पापकमी कंस तुम्हारे कोपसे दग्ध हो गया। हम चाहते हैं कि तुम्हारी ही कृपासे अब इसका प्रेतकार्य सम्पन्न कर दिया जाय ॥२६$\frac{१}{२}$॥
तस्य कृत्वा नरेन्द्रस्य विपन्नस्योर्ध्वदेहिकम् ॥ २७॥
सस्नुषोऽहं सभार्यश्च चरिष्यामि मृगैः सह ।
'उस मरे हुए नरेशका और्ध्वदैहिक सत्कार पूर्ण करके मैं अपनी पत्नी और पुत्रवधुओंको साथ ले वनमें मृगोंके साथ विचरूँगा ॥ २७$\frac{१}{२}$ ॥
प्रेतसत्कारमात्रेण कृते बान्धवकर्मणि।
आनृण्यं लौकिकं कृष्ण गताः किल भवन्ति हि ॥ २८ ॥
'श्रीकृष्ण ! कहते हैं कि मरे हुए मनुष्यका प्रेत-संस्कार मात्र कर देनेसे उसके बान्धवोंका कर्तव्य पूरा हो जाता है और फिर वे उसके लौकिक ऋणसे उऋण हो जाते हैं ॥
तस्याग्निं पश्चिमं कृत्वा चितिस्थाने विधानतः।
तोयप्रदानमात्रेण कंसस्यानृण्यमाप्नुयाम् ॥ २९॥