विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 352, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३३० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'अतः मैं चिता-स्थानपर विधिपूर्वक कंसका अन्तिम अग्नि-संस्कार करके उसको जलाञ्जलिमात्र देकर उसके ऋणसे उऋण हो जाऊँ; यही मेरी इच्छा है ॥ २९ ॥
एतत्ते कृष्ण विज्ञाप्यं स्नेहोऽत्र मयि युज्यताम् ।
प्राप्नोति सुगतिं तत्र कृपणः पश्चिमां क्रियाम् ॥ ३० ॥
'श्रीकृष्ण ! यही तुमसे मेरा निवेदन है, इस विषयमें मुझपर अपना स्नेहभाव प्रकट करो। सुना है, चितापर अन्तिम संस्कार कर देनेसे बेचारा मृतक प्राणी उत्तम गति प्राप्त कर लेता है' ॥ ३० ॥
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य कृष्णः परमविस्मितः ।
प्रत्युवाचोग्रसेनं वै सान्त्वपूर्वमिदं वचः ॥ ३१ ॥
उग्रसेनका यह वचन सुनकर श्रीकृष्णको बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने सान्त्वनापूर्वक उग्रसेनको समझाते हुए उनकी बातका इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ३१ ॥
कालयुक्तमिदं तात तथैतत् यत् प्रभाषितम् ।
सदृशं राजशार्दूल वृत्तस्य च कुलस्य च ॥ ३२ ॥
'तात ! आपने यह जो कुछ कहा है, यह सब इस समय-के अनुरूप है। राजसिंह ! आपकी बात आपके उत्तम आचार-विचार और श्रेष्ठ कुलके अनुरूप है ॥ ३२ ॥
यत् त्वमेवंविधं ब्रूषे गतेऽर्थे दुरतिक्रमे ।
प्राप्स्यते नृपसत्कारं कंसः प्रेतगतोऽपि सन् ॥ ३३ ॥
'जो बात बीत गयी, वह वैसी ही होनेवाली थी। दैवके उस विधानको लाँघना किसीके लिये भी दुष्कर था; फिर भी उससे प्रभावित होकर जो आप ऐसी बातें कह रहे हैं (इससे मुझे दुःख हुआ), कंस मर जानेपर भी मेरे द्वारा राजोचित सत्कार प्राप्त करेगा (इस बातके लिये मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ) ॥ ३३ ॥
कुले महति ते जन्म वेदान् विदितवानसि ।
कथं न ज्ञायते तात नियतिर्दुरतिक्रमा ॥ ३४ ॥
'तात ! आपका महान् कुलमें जन्म हुआ है। आपने वेदोंका ज्ञान प्राप्त किया है, फिर आप कैसे नहीं समझ पा रहे हैं कि नियति (दैवके विधान) का उल्लङ्घन करना बहुत ही कठिन है ॥ ३४ ॥
स्थावराणां च भूतानां जङ्गमानां च पार्थिव ।
पूर्वजन्मकृतं कर्म कालेन परिपच्यते ॥ ३५ ॥
'पृथ्वीनाथ ! स्थावर और जङ्गम सभी प्राणियोंके पूर्व-जन्मोंमें किये हुए कर्म समयपर परिपक्व होते (और उन्हें शुभाशुभ फलकी प्राप्ति कराते) हैं ॥ ३५ ॥
श्रुतवन्तोऽर्थवन्तश्च दातारः प्रियदर्शनाः ।
ब्राह्मण्या नयसम्पन्ना दीनानुग्रहकारिणः ॥ ३६ ॥
लोकपालसमास्तात महेन्द्रसमविक्रमाः ।
क्षितिपालाः कृतान्तेन नीयन्ते नृपसत्तम ॥ ३७ ॥
'तात ! नृपश्रेष्ठ ! जो वेद-शास्त्रोंके विद्वान्, धनवान्, दाता, प्रियदर्शन (सुन्दर), ब्राह्मणभक्त, नीतिसम्पन्न, दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले, लोकपालोंके समान यशस्वी और महेन्द्र-तुल्य पराक्रमी राजा हैं, उन्हें भी काल उठा ले जाता है ॥ ३६-३७ ॥
धार्मिकाः सर्वभावज्ञाः प्रजापालनतत्पराः ।
क्षत्रधर्मपरा दान्ताः कालेन निधनं गताः ॥ ३८ ॥
'जो धर्मात्मा, सम्पूर्ण भावोंके ज्ञाता, प्रजापालनमें तत्पर, क्षत्रियधर्मपरायण तथा जितेन्द्रिय थे, वे भी कालके गालमें चले गये ॥ ३८ ॥
स्वयमात्मकृतं कर्म शुभं वा यदि वाशुभम् ।
प्राप्ते काले तु तत्कर्म दृश्यते सर्वदेहिनाम् ॥ ३९ ॥
'स्वयं अपना किया हुआ जो शुभ या अशुभ कर्म है, वही समय आनेपर समस्त देहधारियोंके समक्ष सुख-दुःखके रूपमें दिखायी देता है ॥ ३९ ॥
एषा ह्यन्तर्हिता माया दुर्विज्ञेया सुरैरपि ।
यथायं मुह्यते लोको ह्यत्र कर्मैव कारणम् ॥ ४० ॥
'यह भगवान्की अदृश्यरूपसे रहनेवाली माया ही है, जिससे यह जगत् मोहित हो जाता है, उसके स्वरूपको जानना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन है। वास्तवमें सुख और दुःखकी प्राप्तिमें कर्म ही कारण है (मनुष्य जो चिन्तित एवं व्यथित होता है, यह मायाजनित मोह ही है) ॥ ४० ॥
कालेनाभिहतः कंसः पूर्वकर्मप्रचोदितः ।
न ह्यहं कारणं तत्र कालः कर्म च कारणम् ॥ ४१ ॥
'कंस अपने पूर्व कर्मोंसे प्रेरित होकर ही कालके द्वारा मारा गया है। मैं उसमें कारण नहीं हूँ, काल और कर्म ही कारण हैं ॥ ४१ ॥
सूर्यसोममयं तात कृत्स्नं स्थावरजङ्गमम् ।
कालेन निधनं गत्वा कालेनैव च जायते ॥ ४२ ॥
'तात ! सारा चराचर जगत् सूर्य और सोममय (अग्नी-षोमात्मक) है। वह कालसे मृत्युको प्राप्त होकर फिर कालसे ही जन्म ग्रहण करता है ॥ ४२ ॥
स कालः सर्वभूतानां निग्रहानुग्रहे रतः ।
तस्मात् सर्वाणि भूतानि कालस्य वशगानि वै ॥ ४३ ॥
'काल ही समस्त प्राणियोंके निग्रह और अनुग्रहमें तत्पर है, इसलिये सम्पूर्ण भूत कालके ही अधीन हैं ॥ ४३ ॥
खद्योपेनैव दग्धस्य सूनोस्त्व नराधिप ।
नाहं वै कारणं तत्र कालस्तत्र च कारणम् ॥ ४४ ॥