भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 353, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 353

विष्णुपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः ३३१


‘नरेश्वर ! आपका पुत्र अपने ही दोषोंसे दग्ध हुआ है। उसकी मृत्युका कारण मैं नहीं, काल है ॥ ४४ ॥<br><br>अथवाहं भविष्यामि कारणं नात्र संशयः।<br>परायणपरः कालः किं करिष्यत्यकारणः ॥ ४५ ॥<br><br>‘अथवा मैं इसमें निमित्तकारण हो सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि दूसरे निमित्तोंका सहारा लेनेवाला कालअकेला ही क्या करेगा ॥ ४५ ॥<br><br>कालस्तु बलवान् राजन् दुर्विज्ञेया हि सा गतिः।<br>परावरविशेषज्ञा यां यान्ति समदर्शिनः ॥ ४६ ॥<br>गतिः कालस्य सा येन सर्वं कालस्य गोचरम् ।<br><br>‘राजन् ! काल सबसे अधिक बलवान् है। कालसे परे जो मोक्षरूप्रा गति है, वह दुर्विज्ञेय है । उसे पर और अपर ( पुरुष और प्रकृति ) के अन्तरको जाननेवाले समदर्शी पुरुष ही प्राप्त होते हैं। वही कालकी परम गति है, जिससे सब कुछ कालके अधीन प्रतीत होता है ॥ ४६½॥<br><br>ब्रवीमि यदहं तात तदनुष्ठीयतां वचः ॥ ४७ ॥<br>न हि राज्येन मे कार्यं नाप्यहं नृप काङ्क्षितः।<br>न चापि राज्यलुब्धेन मया कंसो निपातितः ॥ ४८ ॥<br><br>‘तात ! अब मैं जो कुछ कहता हूँ, मेरे बताये हुए उस कार्यको आप करें। नरेश्वर ! मुझे राज्यसे कोई प्रयोजन नहीं है। न तो मैं राज्यका अभिलाषी हूँ और न राज्यके लोभसे मैंने कंसको मारा ही है ॥ ४७-४८ ॥<br><br>किं तु लोकहितार्थाय कीर्त्यर्थं च सुतस्तव ।<br>व्यङ्गभूतः कुलस्यास्य सानुजो विनिपातितः ॥ ४९ ॥<br><br>‘मैंने तो केवल लोकहितके लिये और कीर्तिके लिये भाई-सहित तुम्हारे पुत्रको मार गिराया है, जो इस कुलका विकृत ( सड़ा हुआ ) अङ्ग था ॥ ४९ ॥<br><br>अहं स एव गोमध्ये गोपैः सह वनेचरः।<br>प्रीतिमान् विचरिष्यामि कामचारी यथा गजः ॥ ५० ॥<br><br>‘मैं वही वनेचर होकर गोपोंके साथ गौओंके बीच प्रसन्नतापूर्वक विचरूँगा, जैसे इच्छानुसार विचरनेवाला हाथी वनमें स्वच्छन्द घूमता है ॥ ५० ॥<br><br>एतावच्छतशोऽप्येवं सत्येनैतद् ब्रवीमि ते ।<br>न मे कार्यं नृपत्वेन विज्ञाप्यं क्रियतामिदम् ॥ ५१ ॥<br><br>‘मैं सत्यकी शपथ खाकर इन बातोंको सौ-सौ बार दुहराकर आपसे कहता हूँ, मुझे राज्यसे कोई काम नहीं है; आप इसका विज्ञापन कर दीजिये ॥ ५१ ॥<br><br>भवान् राजास्तु मान्यो मे यदूनामग्रणीः प्रभुः।<br>विजयायाभिषिञ्चस्व स्वराज्ये नृपसत्तम ॥ ५२ ॥<br><br>‘आप यदुवंशियोंके अग्रगण्य स्वामी तथा मेरे लिये भीमाननीय हैं, अतः आप ही राजा हों । नृपश्रेष्ठ ! आप अपने राज्यपर अपना अभिषेक कराइये, आपकी विजय हो ॥५२ ॥<br><br>यदि ते मत्प्रियं कार्यं यदि वा नास्ति ते व्यथा।<br>मया निसृष्टं राज्यं स्वं चिराय प्रतिगृह्यताम् ॥ ५३ ॥<br><br>‘यदि आपको मेरा प्रिय कार्य करना हो अथवा यदि आपके मनमे मेरी ओरसे कोई व्यथा न हो तो मेरे द्वारा लौटाये गये इस राज्यको दीर्घकालके लिये ग्रहण करें’ ॥५३॥<br><br>वैशम्पायन उवाच<br><br>एतच्छ्रुत्वा तु वचनं नोत्तरं प्रत्यभाषत ।<br>व्रीडिताधोमुखं तं तु राजानं यदुसंसदि ।<br>अभिषेकेन गोविन्दो योजयामास धर्मवित् ॥ ५४ ॥<br><br>वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर उग्रसेनने कोई उत्तर नहीं दिया। वे लज्जित होकर सिर झुकाये चुपचाप खड़े रह गये । उस समय धर्मके ज्ञाता गोविन्दने राजा उग्रसेनको यादवोंके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ५४ ॥<br><br>स बद्धमुकुटः श्रीमानुग्रसेनो महाद्युतिः ।<br>चकार सह कृष्णेन कंसस्य निधनक्रियाम् ॥ ५५ ॥<br><br>सिरपर मुकुट बाँधे महातेजस्वी श्रीमान् राजा उग्रसेनने श्रीकृष्णके साथ रहकर कंसका अन्त्येष्टि-संस्कार किया था ॥<br><br>तं सर्वे यादवा मुख्या राजानं कृष्णशासनात् ।<br>अनुजग्मुः पुरीमार्गे देवा इव शतक्रतुम् ॥ ५६ ॥<br><br>श्रीकृष्णके आदेशसे समस्त मुख्य-मुख्य यादवोंने मथुरा-पुरीके राजमार्गपर राजा उग्रसेनका उसी प्रकार अनुसरण किया था, जैसे देवता देवराज इन्द्रका अनुगमन करते हैं ५६<br><br>रजन्यां तु निवृत्तायां ततः सूर्ये विराजिते ।<br>पश्चिमं कंससंस्कारं चक्रुस्ते यदुपुङ्गवाः ॥ ५७ ॥<br><br>जब रात बीती और सूर्योदय हुआ, उस समय श्रेष्ठ यादवोंने मिलकर कंसके अन्त्येष्टि-संस्कारकी तैयारी की ॥५७॥<br><br>शिविकायामथारोप्य कंसदेहं यथाक्रमम् ।<br>नैष्टिकेन विधानेन चक्रुस्ते कंससत्क्रियाम् ॥ ५८ ॥<br><br>उन सबने कंसके शरीरको शिविकामें रखकर क्रमशः अन्त्येष्टि-कर्मके विधानसे उसका दाह-संस्कार किया था ॥५८॥<br><br>स नीतो यमुनातीरमुत्तमं नृपतेः सुतः ।<br>सत्कृतश्च यथान्यायं नैधनेन चिताग्निना ॥ ५९ ॥<br><br>राजकुमार कंसका शव पहले यमुनाजीके उत्तम तटपर लाया गया, फिर यथोचित रीतिसे मृत्युकालिक चिताग्निके द्वारा उसका सादर अन्त्येष्टि-संस्कार किया गया ॥ ५९ ॥<br><br>तथैव भ्रातरं चास्य सुनामानं महाभुजम् ।<br>संस्कारं लम्भयामासुः सह कृष्णेन यादवाः ॥ ६० ॥
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