भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 354
३३२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे
उसी प्रकार श्रीकृष्णसहित यादवोंने उसके भाई महाबाहु सुनामाका भी दाह-संस्कार किया ॥ ६० ॥<br><br>ताभ्यां ते सलिलं चक्रुर्वृष्ण्यन्धकपुरोगमाः ।<br>अक्षयं चास्तु प्रेतेभ्यो भाषमाणाः पुनः पुनः ॥ ६१ ॥<br>वृष्णि और अन्धक आदि कुलोंके लोगोंने उन दोनोंके लिये जलदान किया और बारंबार यह कहा कि 'यह जल प्रेतोंके लिये अक्षय हो' ॥ ६१ ॥<br><br>हिरण्यस्य सुवर्णस्य दश कोटीस्तथा हरिः ।<br>गावो रत्नानि वासांसि ग्रामान् नगरसम्मतान् ॥ ६२ ॥<br>ददौ कंसं समुद्दिश्य ब्राह्मणेभ्यो नृपोत्तमः ।<br>अक्षयं चापि विप्रेभ्यो भाषमाणाः पुनः पुनः ॥ ६३ ॥श्रीहरि तथा नृपश्रेष्ठ उग्रसेनने श्राद्धमें कंसके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको दस करोड़ स्वर्णमुद्राएँ, बहुत-सी गौएँ, रत्न, वस्त्र तथा नगरों-जैसे सम्मानित ग्राम दिये और बारंबार विप्रोंसे यह कहा—हमारा दिया हुआ यह दान उस दिवंगंत आत्माके लिये अक्षय हो ॥ ६२-६३ ॥<br><br>तयोस्ते सलिलं दत्त्वा यादवा दीनमानसाः ।<br>पुरस्कृत्योग्रसेनं वै विविशुर्मथुरां पुरीम् ॥ ६४ ॥<br>इस प्रकार कंस और सुनामाके लिये जलदान करके दीनचित्त यादव राजा उग्रसेनको आगे किये मथुरापुरीमें प्रविष्ट हुए ॥ ६४ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि उग्रसेनाभिषेककंससंस्कारकथने द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें उग्रसेनका अभिषेक तथा कंसके अन्त्येष्टि-संस्कारकथनविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥


त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

बलराम और श्रीकृष्णका गुरु सान्दीपतिके यहाँ जाकर विद्या पढ़ना और गुरुदक्षिणामें उनके मरे हुए पुत्रको उन्हें देकर मथुरापुरीको लौट आना

वैशम्पायन उवाच<br>स कृष्णस्तत्र बलवान् रौहिणेयेन संगतः ।<br>मथुरां यादवाकीर्णां पुरीं तां सुखमावसत् ॥ १ ॥<br>वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बलवान् श्रीकृष्ण वहाँ रोहिणीकुमार बलरामजीके साथ यादवोंसे भरी हुई उस मथुरापुरीमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ १ ॥<br><br>प्राप्तयौवनदेहस्तु युक्तो राजश्रिया ज्वलन् ।<br>चचार मथुरां वीरः स रत्नाकरभूषणम् ॥ २ ॥<br>उनके शरीरको युवावस्था प्राप्त हुई। वे वीर श्रीकृष्ण राजश्रीसे प्रकाशित होते हुए रत्नराशिरूप आभूषणोंसे विभूषित मथुरापुरीमें विचरण करने लगे ॥ २ ॥<br><br>कस्यचित् त्वथ कालस्य सहितौ रामकेशवौ ।<br>गुरुं सान्दीपनिं काश्यमवन्तिपुरवासिनम् ॥ ३ ॥<br>कुछ कालके अनन्तर बलराम और श्रीकृष्ण एक साथ अवन्तिपुर (उज्जयिनी) के निवासी गुरु सान्दीपतिके यहाँ गये, जो काशिदेशमें उत्पन्न हुए थे ॥ ३ ॥<br><br>धनुर्वेदचिकीर्षार्थमुभौ तावभिजग्मतुः ।<br>निवेद्य गोत्रं स्वाध्यायामाचारेणाभ्यलंकृतौ ॥ ४ ॥<br>वे दोनों भाई वहाँ धनुर्वेदकी शिक्षा ग्रहण करनेके लिये गये थे। अपना गोत्र बताकर गुरुकुलके आचारसे अपनेको अलंकृत करके दोनों ही स्वाध्याय करने लगे ॥ ४ ॥शुश्रूषू निरहंकारावुभौ रामजनार्दनौ ।<br>प्रतिजग्राह तौ काश्यो विद्याः प्रादाच्च केवलाः ॥ ५ ॥<br>बलराम और श्रीकृष्ण दोनों गुरुकी सेवामें तत्पर रहते थे। अहंकार तो उन्हें छू भी नहीं सका था। काशिदेशीय गुरुने उन दोनोंको शिष्यरूपसे ग्रहण किया और उन्हें विशुद्ध विद्याएँ प्रदान कीं ॥ ५ ॥<br><br>तौ च श्रुतिधरौ वीरौ यथावत् प्रतिपद्यताम् ।<br>अहोरात्रैश्चतुःषष्ट्या साङ्गवेदमधीयताम् ॥ ६ ॥<br>वे दोनों वीर श्रुतिधर थे—किसी भी बातको एक बार सुन लेनेमात्रसे ही ग्रहण कर लेते थे, अतः उन्होंने यथावत् रूपसे विद्याओंको प्राप्त किया। चौंसठ दिन-रातमें ही छहों अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदका अध्ययन कर लिया ॥ ६ ॥<br><br>चतुष्पादं धनुर्वेदं शस्त्राग्रामं ससंग्रहम् ।<br>अचिरेणैव कालेन गुरुस्तावभ्यशिक्षयत् ॥ ७ ॥<br>गुरुजीने उन्हें थोड़े ही समयमें दीक्षा, संग्रह, सिद्धि और प्रयोग—इन चार पादोंसे युक्त धनुर्वेदकी तथा रहस्यसहित शस्त्रसमूहोंकी शिक्षा दे दी ॥ ७ ॥<br><br>अतीवामानुषीं मेधां चिन्तयित्वा तयोर्गुरुः ।<br>मेने तावागतौ वीरौ देवौ चन्द्रदिवाकरौ ॥ ८ ॥<br>उनकी अत्यन्त अलौकिक बुद्धिका विचार करके गुरुने यही माना कि इन दोनों वीरोंके रूपमें मेरे यहाँ साक्षात् चन्द्रदेव और सूर्यदेव पधारे हैं ॥ ८ ॥