विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
| ३३२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
| उसी प्रकार श्रीकृष्णसहित यादवोंने उसके भाई महाबाहु सुनामाका भी दाह-संस्कार किया ॥ ६० ॥<br><br>ताभ्यां ते सलिलं चक्रुर्वृष्ण्यन्धकपुरोगमाः ।<br>अक्षयं चास्तु प्रेतेभ्यो भाषमाणाः पुनः पुनः ॥ ६१ ॥<br>वृष्णि और अन्धक आदि कुलोंके लोगोंने उन दोनोंके लिये जलदान किया और बारंबार यह कहा कि 'यह जल प्रेतोंके लिये अक्षय हो' ॥ ६१ ॥<br><br>हिरण्यस्य सुवर्णस्य दश कोटीस्तथा हरिः ।<br>गावो रत्नानि वासांसि ग्रामान् नगरसम्मतान् ॥ ६२ ॥<br>ददौ कंसं समुद्दिश्य ब्राह्मणेभ्यो नृपोत्तमः ।<br>अक्षयं चापि विप्रेभ्यो भाषमाणाः पुनः पुनः ॥ ६३ ॥ | श्रीहरि तथा नृपश्रेष्ठ उग्रसेनने श्राद्धमें कंसके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको दस करोड़ स्वर्णमुद्राएँ, बहुत-सी गौएँ, रत्न, वस्त्र तथा नगरों-जैसे सम्मानित ग्राम दिये और बारंबार विप्रोंसे यह कहा—हमारा दिया हुआ यह दान उस दिवंगंत आत्माके लिये अक्षय हो ॥ ६२-६३ ॥<br><br>तयोस्ते सलिलं दत्त्वा यादवा दीनमानसाः ।<br>पुरस्कृत्योग्रसेनं वै विविशुर्मथुरां पुरीम् ॥ ६४ ॥<br>इस प्रकार कंस और सुनामाके लिये जलदान करके दीनचित्त यादव राजा उग्रसेनको आगे किये मथुरापुरीमें प्रविष्ट हुए ॥ ६४ ॥ |
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि उग्रसेनाभिषेककंससंस्कारकथने द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें उग्रसेनका अभिषेक तथा कंसके अन्त्येष्टि-संस्कारकथनविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
बलराम और श्रीकृष्णका गुरु सान्दीपतिके यहाँ जाकर विद्या पढ़ना और गुरुदक्षिणामें उनके मरे हुए पुत्रको उन्हें देकर मथुरापुरीको लौट आना
| वैशम्पायन उवाच<br>स कृष्णस्तत्र बलवान् रौहिणेयेन संगतः ।<br>मथुरां यादवाकीर्णां पुरीं तां सुखमावसत् ॥ १ ॥<br>वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बलवान् श्रीकृष्ण वहाँ रोहिणीकुमार बलरामजीके साथ यादवोंसे भरी हुई उस मथुरापुरीमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ १ ॥<br><br>प्राप्तयौवनदेहस्तु युक्तो राजश्रिया ज्वलन् ।<br>चचार मथुरां वीरः स रत्नाकरभूषणम् ॥ २ ॥<br>उनके शरीरको युवावस्था प्राप्त हुई। वे वीर श्रीकृष्ण राजश्रीसे प्रकाशित होते हुए रत्नराशिरूप आभूषणोंसे विभूषित मथुरापुरीमें विचरण करने लगे ॥ २ ॥<br><br>कस्यचित् त्वथ कालस्य सहितौ रामकेशवौ ।<br>गुरुं सान्दीपनिं काश्यमवन्तिपुरवासिनम् ॥ ३ ॥<br>कुछ कालके अनन्तर बलराम और श्रीकृष्ण एक साथ अवन्तिपुर (उज्जयिनी) के निवासी गुरु सान्दीपतिके यहाँ गये, जो काशिदेशमें उत्पन्न हुए थे ॥ ३ ॥<br><br>धनुर्वेदचिकीर्षार्थमुभौ तावभिजग्मतुः ।<br>निवेद्य गोत्रं स्वाध्यायामाचारेणाभ्यलंकृतौ ॥ ४ ॥<br>वे दोनों भाई वहाँ धनुर्वेदकी शिक्षा ग्रहण करनेके लिये गये थे। अपना गोत्र बताकर गुरुकुलके आचारसे अपनेको अलंकृत करके दोनों ही स्वाध्याय करने लगे ॥ ४ ॥ | शुश्रूषू निरहंकारावुभौ रामजनार्दनौ ।<br>प्रतिजग्राह तौ काश्यो विद्याः प्रादाच्च केवलाः ॥ ५ ॥<br>बलराम और श्रीकृष्ण दोनों गुरुकी सेवामें तत्पर रहते थे। अहंकार तो उन्हें छू भी नहीं सका था। काशिदेशीय गुरुने उन दोनोंको शिष्यरूपसे ग्रहण किया और उन्हें विशुद्ध विद्याएँ प्रदान कीं ॥ ५ ॥<br><br>तौ च श्रुतिधरौ वीरौ यथावत् प्रतिपद्यताम् ।<br>अहोरात्रैश्चतुःषष्ट्या साङ्गवेदमधीयताम् ॥ ६ ॥<br>वे दोनों वीर श्रुतिधर थे—किसी भी बातको एक बार सुन लेनेमात्रसे ही ग्रहण कर लेते थे, अतः उन्होंने यथावत् रूपसे विद्याओंको प्राप्त किया। चौंसठ दिन-रातमें ही छहों अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदका अध्ययन कर लिया ॥ ६ ॥<br><br>चतुष्पादं धनुर्वेदं शस्त्राग्रामं ससंग्रहम् ।<br>अचिरेणैव कालेन गुरुस्तावभ्यशिक्षयत् ॥ ७ ॥<br>गुरुजीने उन्हें थोड़े ही समयमें दीक्षा, संग्रह, सिद्धि और प्रयोग—इन चार पादोंसे युक्त धनुर्वेदकी तथा रहस्यसहित शस्त्रसमूहोंकी शिक्षा दे दी ॥ ७ ॥<br><br>अतीवामानुषीं मेधां चिन्तयित्वा तयोर्गुरुः ।<br>मेने तावागतौ वीरौ देवौ चन्द्रदिवाकरौ ॥ ८ ॥<br>उनकी अत्यन्त अलौकिक बुद्धिका विचार करके गुरुने यही माना कि इन दोनों वीरोंके रूपमें मेरे यहाँ साक्षात् चन्द्रदेव और सूर्यदेव पधारे हैं ॥ ८ ॥ |
विष्णुगोपर्व ] त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ३३३
ददर्श च महात्मानौ तावपि पर्वसु।
पूजयन्तौ महादेवं साक्षाद् विष्णुं व्यवस्थितम् ॥ ९ ॥
उन्होंने पर्वके अवसरोंपर उन दोनों महात्माओंको अर्चाविग्रहमें प्रतिष्ठित महान् देवता साक्षात् भगवान् विष्णु-की आराधना करते हुए भी देखा था ॥ ९ ॥
गुरुं सान्दीपनिं कृष्णः कृतकृत्योऽभ्यभाषत।
गुर्वर्थं किं ददानीति रामेण सह भारत ॥ १० ॥
भारत! विद्या पढ़कर कृतकृत्य हो बलरामसहित श्रीकृष्ण-ने अपने गुरु सान्दीपनिसे पूछा—'भगवन्! आपको गुरु-दक्षिणाके रूपमें मैं क्या दूँ ?' ॥ १० ॥
तयोः प्रभावं स ज्ञात्वा गुरुः प्रोवाच हृष्टवान्।
पुत्रमिच्छाम्यहं दत्तं यो मृतो लवणाम्भसि ॥ ११ ॥
उन दोनोंका प्रभाव जानकर हर्षमें भरे हुए गुरुने कहा—'मेरा जो पुत्र खारे पानीके समुद्रमें डूबकर मर गया था, उसे ही तुम ले आकर दे दो, यही मेरी इच्छा है ॥ ११ ॥
पुत्र एकोऽपि मे जातः स चापि तिमिना हतः।
प्रभासे तीर्थयात्रायां तं मे त्वं पुनरानय ॥ १२ ॥
'मेरे एक ही पुत्र हुआ था। वह भी तीर्थयात्राके अवसर-पर प्रभासक्षेत्रमें तिमि नामक मत्स्यद्वारा मार डाला गया, उसीको तुम फिर ले आओ' ॥ १२ ॥
तथेत्येवाब्रवीत् कृष्णो रामस्यानुमते स्थितः।
गत्वा समुद्रं तेजस्वी विवेशान्तर्जलं हरिः ॥ १३ ॥
तब बलरामजीकी अनुमति लेकर श्रीकृष्णने उनसे कहा, 'बहुत अच्छा'; फिर वे तेजस्वी श्रीहरि समुद्रतटपर जाकर उसके जलके भीतर घुस गये ॥ १३ ॥
समुद्रः प्राञ्जलिर्भूत्वा दर्शयामास स्वं तदा।
तमाह कृष्णः क्वासौ भोः पुत्रः सान्दीपनेरिति ॥ १४ ॥
उस समय समुद्रने हाथ जोड़कर उन्हें दर्शन दिया। श्रीकृष्णने उससे पूछा—'अजी, सान्दीपनि मुनिका पुत्र कहाँ है ?' ॥ १४ ॥
समुद्रः प्रत्युवाचेदं दैत्यः पञ्चजनो महान्।
तिमिरूपेण तं बालं ग्रस्तवानिति माधव ॥ १५ ॥
समुद्रने उत्तर दिया—'माधव ! पञ्चजन नामक महान् दैत्यने तिमिरूपसे उस बालकको अपना ग्रास बना लिया था' ॥ १५ ॥
स पञ्चजनमासाद्य जघान पुरुषोत्तमः।
न चाससाद तं बालं गुरुपुत्रं तदाच्युतः ॥ १६ ॥
तब अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले भगवान् पुरुषोत्तमने पञ्चजनके पास जाकर उसे मार डाला, परंतु उन्हें वहाँ उनके गुरुका पुत्र नहीं प्राप्त हुआ ॥ १६ ॥
स तु पञ्चजनं हत्वा शङ्खं लेभे जनार्दनः।
यस्तु देवमनुष्येषु पाञ्चजन्य इति श्रुतः ॥ १७ ॥
पञ्चजनको मारकर भगवान् जनार्दनने एक शङ्ख हस्त-गत किया, जो देवताओं और मनुष्योंमें पाञ्चजन्य नामसे विख्यात है ॥ १७ ॥
ततो वैवस्वतपुरं जगाम पुरुषोत्तमः।
ततो यमोऽभ्युपागम्य ववन्दे तं गदाधरम् ॥ १८ ॥
तदनन्तर भगवान् पुरुषोत्तम वैवस्वत यमकी पुरीमें गये। यमने आकर उन भगवान् गदाधरको प्रणाम किया ॥
तमुवाचाथ वै कृष्णो गुरुपुत्रः प्रदीयताम्।
तयोस्तत्र तदा युद्धमासीद् घोरतरं महत् ॥ १९ ॥
तब श्रीकृष्णने उनसे कहा—'मुझे मेरे गुरुका पुत्र दे दो (परंतु यमने उसे देनेसे इनकार किया)। तब उन दोनोंमें वहाँ महान् घोरतर युद्ध हुआ ॥ १९ ॥
ततो वैवस्वतं घोरं निर्जित्य पुरुषोत्तमः।
आससाद च तं बालं गुरुपुत्रं तदाच्युतः ॥ २० ॥
भयानक यमराजको जीतकर पुरुषोत्तम अच्युतने अपने बालक गुरुपुत्रको प्राप्त कर लिया ॥ २० ॥
आनिनाय गुरोः पुत्रं चिरं नष्टं यमक्षयात्।
ततः सान्दीपनेः पुत्रः प्रभावदमितौजसः ॥ २१ ॥
दीर्घकालगतः प्रेतः पुनरासीच्छरीरवान्।
जो दीर्घकालसे नष्ट हो चुका था, उस गुरुपुत्रको भगवान् यमलोकसे यहाँ उठा ले आये। उन अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णके प्रभावसे दीर्घकालका मरा हुआ सान्दी-पनिका पुत्र पुनः पूर्ववत् शरीर धारण करके जी उठा २१३
तदशक्यमचिन्त्यं च दृष्ट्वा सुमहदद्भुतम् ॥ २२ ॥
सर्वेषामेव भूतानां विस्मयः समजायत।
वह अशक्य, अचिन्त्य और अत्यन्त अद्भुत कार्य देखकर सभी प्राणियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ २२३ ॥
स गुरोः पुत्रमादाय पाञ्चजन्यं च माधवः।
रत्नानि च महार्हाणि पुनरायाज्जगत्प्रभुः ॥ २३ ॥
जगत्के स्वामी लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण गुरुपुत्रको साथ ले पाञ्चजन्य शङ्ख तथा बहुत-से बहुमूल्य रत्न लेकर पुनः लौट आये ॥ २३ ॥
राक्षसैस्तस्य रत्नानि महार्हाणि बहूनि च।
आनाय्यावेदयामास गुरवे वासवानुजः ॥ २४ ॥
इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णने उन बहुसंख्यक एवं बहु-मूल्य रत्नोंको राक्षसोंद्वारा (जो यमके किंकर थे) मँगवाकर गुरुको निवेदन किया ॥ २४ ॥
गदापरिघयुद्धेषु सर्वस्त्रेषु च तावुभौ।
अचिराम्मुख्यतं प्राप्तौ सर्वलोके धनुर्धृताम् ॥ २५ ॥
३३४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णने गदा और परिवके युद्धोंमें तथा सम्पूर्ण अस्त्रोंमें शीघ्र ही प्रमुखता प्राप्त कर ली। वे समस्त संसारके धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ माने जाने लगे ॥ २५ ॥
ततः सान्दीपनेः पुत्रं तद्रूपवयसं तदा । प्रादात् कृष्णः प्रतीतात्मा सह रत्नैरुदारधीः ॥ २६ ॥
उदारबुद्धिवाले श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्त होकर सान्दीपानिके पुत्रको उसी रूप और अवस्थामें रत्नोंके साथ उन्हें लौटा दिया॥ २६ ॥
चिरनष्टेन पुत्रेण काश्यः सान्दीपनिस्तदा । समेत्य मुमुदे राजन् पूजयन् रामकेशवौ ॥ २७ ॥
राजन् ! काशिदेशमें उत्पन्न हुए सान्दीपनिने चिरकालसे नष्ट हुए अपने पुत्रसे मिलकर बलराम और श्रीकृष्णकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए बड़े प्रसन्न हुए ॥ २७ ॥
कृतार्थौ तावुभौ वीरौ गुरुमामन्त्र्य सुव्रतौ । आयातौ मथुरां भूयो वसुदेवसुतावुभौ ॥ २८ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे दोनों वीर वसुदेवपुत्र अस्त्र-विद्याकी शिक्षा पाकर गुरुकी आज्ञा ले पुनः मथुरापुरीको लौट आये ॥ २८ ॥
ततः प्रत्युद्ययुः सर्वे यादवा यदुनन्दनौ । सबला हृष्टमनस उग्रसेनपुरोगमाः ॥ २९ ॥
उस समय उग्रसेन आदि समस्त यादवोंने प्रसन्नचित्त होकर सेनासहित आगे जा उन दोनों यदुनन्दन वीरोंकी अगवानी की ॥ २९ ॥
श्रेण्यः प्रकृतयश्चैव मन्त्रिणः सपुरोहिताः । सबालवृद्धा सा चैव पुरी समभिवर्तत ॥ ३० ॥
व्यवसायीवर्ग, प्रजावर्ग अथवा प्रकृतिमण्डल, मन्त्री, पुरोहित तथा बालकों और वृद्धोंसहित वह सारी पुरी (श्रीकृष्ण-बलरामके दर्शनके लिये) उमड़ पड़ी ॥ ३० ॥
नन्दितूर्याण्यवाद्यन्त तुष्टुवुश्च जनार्दनम् । रथ्याः पताकामालिन्यो भ्राजन्ते स्म समन्ततः ॥ ३१ ॥
आनन्दसूचक बाजे बजने लगे। सब लोग श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे। मथुरापुरीकी गलियाँ और सड़कें ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत हो सब ओरसे सुशोभित होने लगीं ॥ ३१ ॥
प्रहृष्टमुदितं सर्वमन्तःपुरमशोभत । गोविन्दागमनेऽत्यर्थं यथैवेन्द्रमहे तथा ॥ ३२ ॥
गोविन्दके आगमनसे इन्द्रोत्सवके समान सारे नगर और अन्तःपुरमें अत्यन्त हर्ष एवं आनन्द छा गया। उसकी शोभा बढ़ गयी ॥ ३२ ॥
मुदिताश्चाथ गायन्ति राजमार्गेषु गायकाः । तत्रासीत् प्रथिता गाथा यादवानां प्रियङ्करा ॥ ३३ ॥
गोविन्दरामौ सम्प्राप्तौ भ्रातरौ लोकविश्रुतौ । स्वे पुरे निर्भयाः सर्वे क्रीडध्वं सह बान्धवैः ॥ ३४ ॥
राजमार्गोंपर बहुतेरे गायक आनन्दित होकर गीत गाने लगे। उस समय यादवोंको प्रिय लगनेवाली यह गाथा वहाँ सब ओर कही-सुनी जाने लगी—'नागरिको ! विश्वविख्यात वीर श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाई मथुरामें आ पहुँचे हैं। अब तुम सब लोग निर्भय हो अपने नगरमें बन्धु-बान्धवोंके साथ क्रीड़ा करो' ॥ ३३-३४ ॥
न तत्र कश्चिद् दीनो वा मलिनो वा विचेतनः । मथुरायामभूद् राजन् गोविन्दे समुपस्थिते ॥ ३५ ॥
राजन् ! गोविन्दके मथुरामे उपस्थित होनेपर वहाँ न तो कोई दीन था, न मलिन था और न चेतनासे शून्य ही था ॥ ३५ ॥
वयांसि साधुवाक्यानि प्रहृष्टा गोहयद्विपाः । नरनारीगणाः सर्वे भेजिरे मनसः सुखम् ॥ ३६ ॥
पक्षी मीठी-मीठी बोली बोलते थे। गाय, बैल, घोड़े, हाथी हृष्ट-पुष्ट रहते थे और पुरुषों तथा स्त्रियोंके सभी समुदाय मनमें सुखका अनुभव करते थे ॥ ३६ ॥
शिवाश्च वाताः प्रववुरिवरजस्का दिशो दश । दैवतानि च हृष्टानि सर्वेष्वायतनेषु च ॥ ३७ ॥
शीतल सुखद हवा चलती थी। दसों दिशाओंमें धूल नहीं उड़ती थी और सभी मन्दिरोंमे हर्षपूर्वक देवता निवास करते थे ॥ ३७ ॥
यानि लिङ्गानि लोकस्य चासन् कृतयुगे पुरा । तानि सर्वाण्यदृश्यन्त पुरीं प्राप्ते जनार्दने ॥ ३८ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके मथुरापुरीको लौट आनेपर वहाँ सारे चिह्न वैसे ही दिखायी देने लगे, जो सत्ययुगके समय पहले जगत्में प्रकट होते थे ॥ ३८ ॥
ततः काले शिवे पुण्ये स्यन्दनेनारिमर्दनः । हरियुक्तेन गोविन्दो विवेश मथुरां पुरीम् ॥ ३९ ॥
तदनन्तर मङ्गलमयी पुण्यवेलामें शत्रुमर्दैन भगवान् गोविन्दने घोड़े जुते हुए रथपर बैठकर मथुरापुरीमें प्रवेश किया ॥ ३९ ॥
विशन्तं मथुरां रम्यां तमुपेन्द्रमरिंदमम् । अनुजग्मुर्यदुगणाः शक्रं देवगणा इव ॥ ४० ॥
रमणीय मथुरापुरीमे प्रवेश करते समय समस्त यादव उन शत्रुदमन उपेन्द्र श्रीकृष्णके पीछे-पीछे उसी प्रकार चले, जैसे देवता देवेन्द्रका अनुसरण करते हैं ॥ ४० ॥
वसुदेवस्य भवनं ततस्तौ यदुनन्दनौ । प्रविष्टौ हृष्टवदनौ चन्द्रादित्याविवाचलम् ॥ ४१ ॥ परेण तेजसोपेतौ सुरेन्द्राविव रूपिणौ । तावायुधानि विन्यस्य गृहे स्वे स्वैरचारिणौ ॥ ४२ ॥
तदनन्तर यदुकुलको आनन्दित करनेवाले वे दोनों बन्धु वसुदेवके भवनमें प्रविष्ट हुए। उस समय उनके मुखपर हर्षो-
विष्णुपर्व ] चतुस्त्रिंशोऽध्यायः [ ३३५
ल्लास छा रहा था और वे मेरु पर्वतपर जानेवाले चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रतीत होते थे। वे महान् तेजसे सम्पन्न तथा देवेश्वरोंके समान मनोहर रूपधारी श्रीकृष्ण बलराम आयुधोंको अपने घरमें रखकर उस पुरीमे स्वेच्छानुसार विचरने लगे ॥४१-४२॥
मुमुदाते यदुवरौ वसुदेवसुतावुभौ।
उद्यानेषु विचित्रेषु फलपुष्पावनामिषु ॥ ४३ ॥
वसुदेवके वे दोनों पुत्र यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण-बलराम फल और फूलोंके भारसे झुके हुए वृक्षोंवाले विचित्र उद्यानोंमें सानन्द विचरते थे ॥ ४३ ॥
चेरतुः सुमहात्मानौ यादवैः परिवारितौ।
रैवतस्य समीपेपु सरित्सु विमलासु च ॥ ४४ ॥
पद्मपत्रविवृद्धासु कारण्डवयुतासु च।
यादवोंसे घिरे हुए वे दोनों महात्मा रैवतक पर्वतके समीपवर्ती प्रदेशोंमें तथा बढ़े हुए पद्म-पत्रोंसे युक्त एवं कारण्डव पक्षियोंके कलरवोंसे मुखरित निर्मल सरिताओंके तटोंपर भ्रमण करते थे ॥ ४४॥
एवं तावेकनिर्माणौ मथुरायां शुभाननौ।
उग्रसेनानुगौ भूत्वा कंचित् कालं मुमोदतुः ॥ ४५ ॥
वे दोनों भाई एक तत्त्वके बने हुए थे (एक ही सच्चिदानन्दघन परमात्मा इन दोनोंके रूपोंमे प्रकट हुए थे)। उन दोनोंके मुख बड़े ही सुन्दर एवं मङ्गलकारी थे। वे कुछ कालतक उग्रसेनका अनुसरण करते हुए मथुरामें बड़े सुखसे रहे ॥ ४५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रामकृष्णप्रत्यागमने त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीबलराम और कृष्णका मथुरामें प्रत्यागमनविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
जरासंधका अपनी विशाल सेनाके द्वारा आकर मथुरापुरीपर घेरा डालना
वैशम्पायन उवाच
स कृष्णस्तत्र सहितो रौहिणेयेन संगतः।
मथुरां यादवाकीर्णां पुरीं तां सुखमावसत् ॥ १ ॥
प्राप्तयौवनदेहस्तु युक्तो राजश्रिया विभुः।
चचार मथुरां प्रीतः स वनाकरभूषनाम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बलरामसहित श्रीकृष्ण यादवोंसे भरी हुई मथुरापुरीमें सुखपूर्वक रहने लगे। उनके श्रीअङ्गोंको युवावस्था प्राप्त हुई थी। वे भगवान् राजोचित शोभासे सुशोभित हो वन-प्रान्तोंसे विभूषित मथुरापुरीमे प्रसन्नतापूर्वक विचरते थे ॥ १-२ ॥
कस्यचित्त्वथ कालस्य राजा राजगृहेश्वरः।
शुश्राव निहतं कंसं दुहितृभ्यां महीपतिः ॥ ३ ॥
कुछ कालके अनन्तर राजगृहके स्वामी पृथ्वीपति राजा जरासंधने अपनी दोनों पुत्रियोंसे सुना कि 'कंस मारा गया'।
ततो नातिचिरात् कालाज्जरासंधः प्रतापवान्।
आजगाम षडङ्गेन बलेन महता वृतः ॥ ४ ॥
जिघांसुर्हि यदून् क्रुद्धः कंसस्यापचितिं स्मरन्।
यह दुःखद समाचार सुनकर प्रतापी जरासंध थोड़े ही दिनोंमे छः अङ्गोंसे युक्त अपनी विशाल सेनासे घिरा हुआ मथुरापुरीपर चढ़ आया। वह कंससे उऋण होनेकी बातका ध्यान रखकर कुपित हो समस्त यादवोंका विनाश कर डालना चाहता था ॥ ४॥
अस्तिः प्राप्तिश्च नाम्ना ते मागधस्य सुते नृप ॥ ५ ॥
जरासंधस्य कल्याण्यौ पीनश्रोणिपयोधरे।
उभे कंसस्य ते भार्ये प्रादाद् बार्हद्रथो नृपः ॥ ६ ॥
नरेश्वर ! मगधराज जरासंधके दो कल्याणमयी कन्याएँ थीं, जिनके नाम थे अस्ति और प्राप्ति। इन दोनोंके कटिप्रदेशके पिछले भाग स्थूल तथा उरोज पीन थे। बृहद्रथपुत्र जरासंधने अपनी वे दोनों कन्याएँ कंसको दे दी थीं। वे दोनों कंसकी पत्नियाँ थीं ॥ ५-६ ॥
स ताभ्यां मुमुदे राजा बद्ध्वा पितरमाहुकम्।
समाश्रित्य जरासंधमनादृत्य च यादवान्।
शूरसेनेश्वरो राजा यथा ते बहुशः श्रुतः ॥ ७ ॥
शूरसेनदेशका स्वामी कंस जरासंधका आश्रय ले यादवोंका अनादर करके अपने पिता उग्रसेनको कैद कर स्वयं ही राजा बन बैठा था और अपनी उन दोनों पत्नियोंके साथ आनन्द भोगने लगा था; जैसा कि तुमने बहुत बार सुना होगा ॥ ७॥
ज्ञातिकार्यार्थसिद्धयर्थमुग्रसेनहिते रतः।
वसुदेवोऽभवन्नित्यं कंसो न ममृषे च तम् ॥ ८ ॥
भाई-बन्धुओंके कार्य और प्रयोजनकी सिद्धिके लिये
- १. रथ, हाथी, घोडे, पैदल, पण्य धान्य (बिकाऊ अन्न) तथा आपणिक (विक्रेता व्यापारी)—ये सेनाके छः अङ्ग हैं।
३३६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे वसुदेवजी सदा उग्रसेनके हितमें तत्पर रहते थे; किंतु कंस सांकृति, केशिक, राजा भीष्मक तथा धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ उनके इस बर्तावको सहन नहीं कर पाता था ॥ ८ ॥ भीष्मकपुत्र रुक्मी, जो महासमरमें श्रीकृष्ण और अर्जुनके साथ रामकृष्णौ समाश्रित्य हते कंसे दुरात्मनि । लड़नेका हौसला रखता था ॥ १३-१५ ॥ उग्रसेनोऽभवद् राजा भोजवृष्ण्यन्धकैर्वृतः ॥ ९ ॥ वेणुदारिः श्रुतर्वा च क्रथश्चैवांशुमानपि । बलराम और श्रीकृष्णसे भिड़कर जब दुरात्मा कंस मारा अङ्गराजश्च बलवान् वङ्गानामधिपस्तथा ॥ १६ ॥ गया, तब भोज, वृष्णि और अन्धकवंशी यादवोंसे घिरे हुए कौसल्यः काशिराजश्च दशार्णाधिपतिस्तथा । उग्रसेन स्वयं राजा हुए ॥ ९ ॥ सुखेश्वरश्च विक्रान्तो विदेहाधिपतिस्तथा ॥ १७ ॥ दुहितृभ्यां जरासंधः प्रियाभ्यां बलवान् नृपः । मद्रराजश्च बलवांस्त्रिगर्तानामथेश्वरः । नोदितो वीरपत्नीभ्यामुपायान्मथुरां ततः ॥ १० ॥ शाल्वराजश्च विक्रान्तो दरदश्च महाबलः ॥ १८ ॥ तदनन्तर अपनी दोनों प्रिय पुत्रियोंसे, जो वीर कंसकी यवनाधिपतिश्चैव भगदत्तश्च वीर्यवान् । पत्नियां थीं, प्रेरित होकर बलवान् राजा जरासंधने मथुरापर सौवीरराजः शैव्यश्च पाण्ड्यश्च वलिनां वरः ॥ १९ ॥ आक्रमण किया ॥ १० ॥ गान्धारराजः सुबलो नग्नजिच्च महाबलः । कृत्वा सर्वं समुद्योगं क्रोधादग्निसमो ज्वलन् । काश्मीरराजो गोनर्दो दरदाधिपतिर्नृपः । प्रतापावन्तो ये च जरासंधस्य पार्थिवाः ॥ ११ ॥ दुर्योधनादयश्चैव धार्तराष्ट्रा महाबलाः ॥ २० ॥ मित्राणि ज्ञातयश्चैव संयुक्ताः सुहृदस्तथा । एते चान्ये च राजानो बलवन्तो महारथाः । तमेवानुययुः सर्वैः सैन्यैः समुदितैर्वृताः ॥ १२ ॥ तमन्वयुर्जरासंधं विद्धिषन्तो जनार्दनम् ॥ २१ ॥ वह क्रोधसे अग्निके समान जल रहा था। उसने सब वेणुदारि, श्रुतर्वा, क्रथ, अंशुमान्, बलवान् अङ्गराज, प्रकारसे पूरा उद्योग करके चढ़ाई की थी। जरासंधके प्रतापसे वङ्गनरेश, कोसलनरेश, काशिराज, दशार्णदेशके अधिपति, नतमस्तक हुए जो-जो राजा थे तथा जो उसके मित्र, भाई- पराक्रमी सुखेश्वर, विदेहराज, बलवान् मद्रराज (शल्य), बन्धु, मिलने-जुलनेवाले और सुहृद् थे, उन सबने अपनी त्रिगर्तदेशका शासक सुशर्मा, पराक्रमी शाल्वराज, महाबली सारी सेनाओंके साथ जरासंधका ही अनुसरण किया ॥११-१२॥ दरद, यवनोंका राजा पराक्रमी भगदत्त, सौवीरदेशका राजा, महेष्वासा महावीर्या जरासंधप्रियैषिणः । शैव्य, बलवानोंमें श्रेष्ठ पाण्ड्य, गान्धारराज सुबल, महाबली कारूषो दन्तवक्त्रश्च चेदिराजश्च वीर्यवान् ॥ १३ ॥ नग्नजित्, काश्मीरराज गोनर्द, दरददेशके अधिपति, कलिङ्गाधिपतिश्चैव पौण्ड्रश्च बलिनां वरः । धृतराष्ट्रके महाबली पुत्र दुर्योधन आदि—ये तथा और भी सांकृतिः कैशिकश्चैव भीष्मकश्च नराधिपः ॥ १४ ॥ बलवान् महारथी राजा श्रीकृष्णसे द्वेष रखते हुए जरासंधके पुत्रश्च भीष्मकस्यापि रुक्मी मुख्यो धनुर्भृताम् । साथ आये थे ॥ १६–२१ ॥ वासुदेवार्जुनाभ्यां यः स्पर्धते स महाहवे ॥ १५ ॥ ते शूरसेनानाविश्य प्रभूतयवसेन्धनान् । वे महाधनुर्धर तथा महापराक्रमी नरेशगण जरासंधका ऊषुः संरुध्य मथुरां पुरस्कृत्य बलं तदा ॥ २२ ॥ ही प्रिय चाहनेवाले थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—करूष वे शूरसेनदेशमें, जहाँ दाना-घास और लकड़ीकी देशका राजा दन्तवक्त्र, पराक्रमी चेदिराज शिशुपाल, कलिङ्ग- बहुतायत थी, आकर अपनी-अपनी सेनाओंको आगे करके देशका राजा श्रुतायु, बलवानोंमें श्रेष्ठ पौण्ड्रक (वासुदेव), मथुरापर घेरा डालकर रहने लगे ॥ २२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि मथुरोपरोधे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥ इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें जरासंधकी सेनाद्वारा मथुरापर घेराविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः जरासंधकी सेनाका वर्णन, उसकी चारों दिशाओंसे मथुरापुरीपर आक्रमणकी योजना, यादवोंके साथ जरासंधकी सेनाका युद्ध, श्रीकृष्ण और बलरामके पराक्रमसे उसकी सेनाका पलायन, जरासंधद्वारा अपने सैनिकोंको प्रोत्साहन तथा उभय-पक्षके वीरोंमें घमासान युद्ध वैशम्पायन उवाच वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वे सब नरेश मथुरोपवने गत्वा निविष्टांस्तान् नराधिपान् । मथुराके उपवनमे पहुँचकर छावनी डाले हुए थे। वहाँ समस्त अपश्यन् वृष्णयः सर्वे पुरस्कृत्य जनार्दनम् ॥ १ ॥ वृष्णिवंशियोंने श्रीकृष्णको आगे करके उन्हें देखा ॥ १ ॥
विष्णुपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ३३७
ततो हृष्टमनाः कृष्णो रामं वचनमब्रवीत् ।
त्वरते खलु कार्यार्थो देवतानां न संशयः ॥ २ ॥
तब श्रीकृष्णने मन-ही-मन प्रसन्न होकर बलरामजीसे कहा—'आर्य ! देवताओंका कार्य एवं प्रयोजन शीघ्र ही सिद्ध होना चाहता है—इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥
यथायं संनिकृष्टो हि जरासंधो नराधिपः ।
लक्ष्यन्ते हि ध्वजाग्राणि रथानां वातरंहसाम् ॥ ३ ॥
'तभी तो यह राजा जरासंध स्वयं ही हमारे निकट आ पहुँचा । यह वायुके समान वेगशाली रथोंकी ध्वजाओंके अग्रभाग दिखायी दे रहे हैं ॥ ३ ॥
एतानि शशिकल्पानि नृपाणां विजिगीषताम् ।
छत्राण्यार्य विराजन्ते प्रोच्छ्रितानि सितानि च ॥ ४ ॥
'भैया ! विजयकी इच्छासे आये हुए राजाओंके ये चन्द्रमा-जैसे श्वेत एवं ऊँचे-ऊँचे छत्र शोभा पा रहे हैं ॥४॥
अहो नृपरथोदग्रा विमलाश्छत्रपङ्क्तयः ।
अभिवर्तन्ति नः शुभ्रा यथा खे हंसपङ्क्तयः ॥ ५ ॥
'अहो ! राजाओके रथोंपर ऊँची-ऊँची निर्मल एवं शुभ्र छत्र-पंक्तियाँ आकाशमे हंसकी पाँतोके समान शोभा पाती हुई हमारे निकट आ रही है ॥ ५ ॥
काले खलु नृपः प्राप्तो जरासंधो महीपतिः ।
आवयोर्युद्धनिकषः प्रथमः समरातिथिः ॥ ६ ॥
'पृथ्वीपति जरासंध ठीक समयपर आ पहुँचा है। यह हम दोनोंके युद्धकी कसौटी तथा समराङ्गणका पहला अतिथि है ॥ ६ ॥
आर्य तिष्ठाव सहितावनुप्राप्ते महीपतौ ।
युद्धारम्भः प्रयोक्तव्यो बलं तावद्विमृश्यताम् ॥ ७ ॥
'आर्य ! उस राजाके आ जानेपर हम दोनो साथ ही रहे। युद्धका आरम्भ पीछे होगा । पहले उसकी सेना कितनी है, इसका विचार कर ले' ॥ ७ ॥
एवमुक्त्वा ततः कृष्णः स्वस्थः संग्रामलालसः ।
जरासंधबलं प्रेप्सुश्चकार बलदर्शनम् ॥ ८ ॥
ऐसा कहकर श्रीकृष्ण स्वस्थ-चित्तसे संग्रामकी लालसा रखकर जरासंधकी शक्तिका पता लगानेके लिये उसकी सेनाका निरीक्षण करने लगे ॥ ८ ॥
वीक्षमाणश्च तान् सर्वान् नृपान् यदुवरोऽव्ययः ।
आत्मनैवात्मनो वाक्यमुवाच हृदि मन्त्रवित् ॥ ९ ॥
अविनाशी यदुकुलतिलक मन्त्रवेत्ता श्रीकृष्ण उन सब राजाओंको देखकर अपने-आप ही मनमें इस प्रकार कहने लगे—॥ ९ ॥
इमे ते पृथिवीपालाः पार्थिवे वर्त्मनि स्थिताः ।
ये विनाशं गमिष्यन्ति शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ १० ॥
'ये हैं वे भूपाल, जो राजोचित मार्गपर स्थित हैं और शास्त्रोक्त विधिमे विनाशको प्राप्त होनेवाले हैं ॥ १० ॥
प्रोक्षितान् खल्विमान् मन्ये मृत्युना नृपपुङ्गवान् ।
स्वर्गगामीनि चाप्येषां वपूंषि प्रचकाशिरे ॥ ११॥
'मैं समझता हूँ कि मृत्युने रण-यज्ञकी आहुति बनानेके लिये इन श्रेष्ठ नरेशोंका प्रोक्षण किया है। इनके स्वर्गगामी शरीर भी प्रकाशित हो उठे हैं ॥ ११ ॥
स्थाने भारपरिश्रान्ता वसुधेयं दिवं गता ।
एषां नृपाणां मुख्यानां बलौघैरभिपीडिता ॥ १२ ॥
'यह पृथ्वी इन मुख्य-मुख्य नरेशोंके सैन्य-समुदायसे पीड़ित हो महान् भारसे थककर जो देवलोकमे गयी थी, वह इसका जाना उचित ही था ॥ १२ ॥
मही निरन्तरा चेयं बलराश्राभिसंवृता ।
स्वल्पेन खलु कालेन विविक्तं पृथिवीतलम् ॥ १३ ॥
भविष्यति नरेन्द्रौघैः शतशो विनिपातितैः ।
'इन राजाओके सैन्य-समुदायसे आवृत होकर यहाँकी भूमि ठसाठस भर गयी है। कहीं थोड़ा सा भी अवकाश नहीं रह गया है; परंतु थोड़े ही समयमें जब ये सैकड़ो नरेश सैन्यसहित मार गिराये जायेंगे, तब यह भूतल निर्जन-सा हो जायगा' ॥
वैशम्पायन उवाच
जरासंधस्ततः क्रुद्धः प्रभुः सर्वमहीक्षिताम् ॥ १४ ॥
नरधिपसहस्रौघैरनुयातो महाद्युतिः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर समस्त राजाओंका स्वामी महातेजस्वी जरासंध कुपित हो सहस्रों नरेश-समुदायोके साथ आगे बढ़ा ॥ १४ ½ ॥
व्यायतोद्रथतुरगैः सुयानैः सुसमाहितैः ॥ १५ ॥
रथैः सांग्रामिकैर्युक्तैरसङ्गतिभिः क्वचित् ।
कहीं सुन्दर ढंगसे सुसज्जित सुन्दर वाहन, रथ युद्धोपयोगी सामग्रियोंसे सम्पन्न थे। उनमें विशाल एवं प्रचण्ड वेगवाले अश्व जुते हुए थे। उन रथोंकी गति कहीं भी अवरुद्ध नहीं होती थी ( ऐसे रथोंद्वारा रथी योद्धा युद्धके लिये आगे बढ़ रहे थे ) ॥ १५ ½ ॥
हेमकक्षैर्महाघण्टैर्वारणैर्वारिदोपमैः ॥ १६ ॥
महामात्रोत्तमारूढैः कल्पितै रणकोविदैः ।
कहीं बहुसंख्यक हाथी चल रहे थे, जिन्हें सोनेकी जंजीरों-से कसा गया था। उनके दोनो ओर बड़े-बड़े घण्टे लटक रहे थे। वे हाथी काले मेघोंके समान प्रतीत होते थे। उनके ऊपर अच्छे महावत बैठे थे तथा रणकुशल योद्धाओंद्वारा उन्हे सुसज्जित किया गया था ( उन हाथियोंद्वारा गजारोही योद्धा आगे बढ़ रहे थे ) ॥ १६ ½ ॥
स्वारूढैः सादिभिर्युक्तैः प्रेङ्खमाणैः प्रवलिगतैः ॥ १७ ॥
३३८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
वाजिभिर्वायुसंकाशैः प्लवद्भिरिव पत्रिभिः।
कुछ घुड़सवार योद्धा घोड़ोंपर अच्छी तरहसे सवार थे। उनके वे घोड़े वायुके समान वेगशाली थे और उछलते-कूदते हुए आगे बढ़ते समय आकाशमें उड़ते हुए पक्षियोंके समान प्रतीत होते थे॥ १७३ ॥
खड्गचर्मधरोदग्रैः पत्तिभिर्बलिनां वरैः ॥ १८॥
सहस्रसंख्यासंयुक्तैरुत्पतद्भिरिवोरगैः ।
बलवानोंमें श्रेष्ठ पैदल सैनिक भी ढाल और तलवार लिये प्रचण्ड रूप धारण करके आगे बढ़ते थे। वे हजार-हजारकी टोलियोंमें एक साथ चलते थे और उछलते हुए सर्पोंके समान दिखायी देते थे ॥ १८३ ॥
एवं चतुर्विधैः सैन्यैः कम्पमानैरिवाम्बुदैः ॥ १९ ॥
नृपः प्रयातो बलवाञ्जरासंधो धृतव्रतः ।
इस प्रकार मँडराते हुए बादलोंके समान चतुरङ्गिणी सेनाएँ साथ लेकर वीरव्रतको धारण करनेवाला बलवान् राजा जरासंध युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था ॥ १९३ ॥
स रथैर्मेघनिर्घोषैर्गजैश्च मदसंयुतैः ॥ २० ॥
हेषमाणैश्च तुरगैः क्ष्वेडमानैश्च पत्तिभिः ।
नादयन्तो दिशः सर्वास्तस्याः पुर्या वनानि च ॥ २१ ॥
वह मेघके समान गम्भीर घर्घर घोष करनेवाले रथों, चिग्घाड़ते हुए मतवाले हाथियों, हिनहिनाते हुए घोड़ों तथा गर्जते हुए पैदल सैनिकोंद्वारा उस पुरीकी सम्पूर्ण दिशाओं तथा वनोंको कोलाहलपूर्ण बनाता हुआ आ रहा था ॥२०-२१॥
स राजा सागराकारः ससैन्यः प्रत्यदृश्यत ।
तद्वलं पृथिवीशानां हृष्टयोधजनाकुलम् ॥ २२ ॥
सेनाके साथ आता हुआ राजा जरासंध विशाल समुद्रके समान दिखायी देता था। भूमिपालोंकी वह सेना हृष्ट-पुष्ट योद्धाओंसे परिपूर्ण थी ॥ २२ ॥
क्ष्वेडितास्फोटितरवं मेघसैन्यमिवावभौ ।
रथैः पवनसम्पातैर्गजैश्च जलदोपमैः ।
तुरगैश्च जवोपेतैः पत्तिभिः खगमोपमैः ॥ २३ ॥
विमिश्रं सर्वतो भाति मत्तद्विपसमाकुलम् ।
घर्मान्ते सागरगतं यथाभ्रपटलं तथा ॥ २४ ॥
गर्जने और ताल ठोंकनेकी गम्भीर ध्वनिसे वह मेघोंकी गर्जती हुई घटाके समान प्रतीत होती थी। वायुके समान शीघ्रगामी रथों, मेघोंके सदृश दिखायी देनेवाले हाथियों, वेगशाली घोड़ों तथा आकाशचारी पक्षियोंके समान जान पड़नेवाले पैदल सैनिकोंसे मिश्रित हुई उस सेनाकी सब ओरसे बड़ी शोभा हो रही थी। मतवाले हाथियोंसे व्याप्त हुई वह विशाल वाहिनी वर्षा-ऋतुमे समुद्रके भीतर लक्षित होनेवाले मेघोंके समूहकी शोभा धारण करती थी ॥ २३-२४ ॥
सबलास्ते महीपाला जरासंधपुरोगमाः ।
परिवार्य पुरीं सर्वे निवेशायोपचक्रिरे ॥ २५ ॥
वे जरासंध आदि समस्त भूपाल अपनी सेनाके साथ मथुरापुरीको चारों ओरसे घेरकर छावनी डालनेकी तैयारी करने लगे ॥ २५ ॥
वभौ तस्य निविष्टस्य बलश्रीः शिविरस्य वै ।
शुक्लपर्यन्तपूर्णस्य यथा रूपं महोदधेः ॥ २६ ॥
वहाँ डेरा डाले हुए जरासंधके सैनिक-शिविरोंकी शोभा वैसी ही प्रतीत होती थी, जैसा कि शुक्लपक्षकी पूर्णिमाको अपनी उत्ताल तरङ्गोंसे परिपूर्ण हुए महासागरका रूप देखनेमें आता है ॥ २६ ॥
वीतरात्रे ततः काले समुत्तस्थुर्महीक्षितः ।
आरोहणार्थं पुर्यास्ते समीयुर्युद्धलालसाः ॥ २७ ॥
तदनन्तर रात बीतनेपर प्रातःकाल सब राजा उठे और युद्धकी लालसासे मथुरापुरीपर चढ़ाई करनेके लिये एकत्र होने लगे ॥ २७ ॥
समवायीकृताः सर्वे यमुनामनु ते नृपाः ।
निविष्टा मन्त्रयामासुर्युद्धकालकुतूहलाः ॥ २८ ॥
यमुनाके किनारे एकत्र होकर वे सभी नरेश बैठे और युद्धके शुभ अवसरके लिये उत्सुक हो आपसमें मन्त्रणा करने लगे ॥ २८ ॥
तेषां सुतुमुलः शब्दः शुश्रुवे पृथिवीक्षिताम् ।
युगान्ते भिद्यमानानां सागराणामिव स्वनः ॥ २९ ॥
सेनासहित उन नरेशोंकी तुमुल ध्वनि प्रलयकालमें मर्यादाको तोड़कर बहनेवाले समुद्रोंकी भयंकर गर्जनाके समान सुनायी देती थी ॥ २९ ॥
तेषां सकञ्चुकोष्णीषाः स्थविरा वेत्रपाणयः ।
चेरुर्मा शब्द इत्येवं वदन्तो राजशासनात् ॥ ३० ॥
उन राजाओंके छड़ीदार बूढ़े सिपाही चोगा और पगड़ी धारण किये तथा हाथमें बेंत लिये राजाज्ञासे यह कहते हुए विचरने लगे कि 'सब लोग मौन रहें। कोई एक शब्द भी न बोले' ॥ ३० ॥
तस्य रूपं बलस्यासीन्निःशब्दस्तिमितस्य वै ।
लीनमीनग्रहस्येव निःशब्दस्य यथोदधेः ॥ ३१ ॥
उस समय नीरव और निश्चल हुए उस सैन्यसमूहका रूप जिसके मत्स्य और ग्राह विलीन हो गये हों उस शब्दहीन शान्त महासागरके समान प्रतीत होता था ॥ ३१ ॥
निःशब्दस्तिमिते तस्मिन् योगादिव महार्णवे ।
जरासंधो वृहद् वाक्यं वृहस्पतिरिवाददे ॥ ३२ ॥
उस सैन्य-समुद्रके मानो योगबलसे सहसा नीरव तथा
विष्णुपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः [ ३३९
निश्चल हो जानेपर बृहस्पतिके समान नीतिमान् जरासंधने यह महत्त्वपूर्ण बात कही—॥ ३२ ॥
शीघ्रं समभिवर्तन्तां बलानि पृथिवीक्षिताम्।
सर्वतो नगरी चेयं जनौघैः परिवार्यताम् ॥ ३३ ॥
‘राजाओंकी सेनाएँ शीघ्र आक्रमण करें और इस मथुरानागरीको सब ओरसे सैनिक-समूहोंद्वारा घेर लें ॥ ३३॥
अश्मयन्त्राणि युज्यन्तां क्षेपणीयाश्च मुद्गराः।
कार्या भूमिः समा सर्वा जलौघैश्च परिप्लुता।
ऊर्ध्वं चापा निवाह्यन्तां प्रासा वै तोमरास्तथा ॥ ३४ ॥
‘पत्थरोंके गोले बरसानेवाले यन्त्र लगा दिये जायें। क्षेपणीय (गोफना या ढेलवाँस) तथा मुद्गर सँभाल लिये जायें। सारी भूमि समतल कर दी जाय और उसे जल-राशियोंसे आप्लावित किया जाय। धनुषोंको ऊपर उठा लेना चाहिये; प्रासों और तोमरोंको भी हाथमें ले लिया जाय ॥ ३४ ॥
दार्यतां चैव टङ्काद्यैः खनित्रैश्च पुरी द्रुतम्।
नृपाश्च युद्धमार्गज्ञा विन्यस्यन्तामदूरतः ॥ ३५ ॥
‘टंक आदिके द्वारा तथा खनित्रोंसे इस पुरीको तुरंत ही विदीर्ण कर दिया जाय। युद्धकी प्रणालीको जाननेवाले नरेशोंको उसके समीप ही यथास्थान खड़ा किया जाय ॥ ३५॥
अद्यप्रभृति सैन्यैर्मे पुरीरोधः प्रवर्त्यताम्।
यावदेतौ रणे गोपौ वसुदेवसुतावुभौ ॥ ३६ ॥
संकर्षणं च कृष्णं च घातयामि शितैः शरैः।
आकाशमपि बाणौघैर्निःसम्पातं यथा भवेत् ॥ ३७ ॥
‘आजसे मेरे सैनिकोंद्वारा मथुरापुरीपर घेरा डाल दिया जाय और उसे तबतक चालू रखा जाय, जबतक कि मैं युद्धमें इन दोनों ग्वालों वसुदेवपुत्र संकर्षण और कृष्णको अपने तीखे बाणोंद्वारा मार न डालूँ। उस समयतक आकाशको भी बाणसमूहोंसे इस तरह रूँध दिया जाय, जिससे पक्षी भी उड़कर बाहर न जा सके ॥ ३६-३७ ॥
मयानुशिष्टास्तिष्ठन्तु पुरीभूमिषु भूमिपाः।
तेषु तेष्ववकाशेषु शीघ्रमारुह्यतां पुरी ॥ ३८ ॥
‘मेरा अनुशासन मानकर समस्त भूपाल मथुरापुरीके निकटवर्ती भूभागोंमें खड़े रहें और जब जहाँ अवकाश मिल जाय, तब तहाँ शीघ्र ही पुरीपर चढ़ाई कर दें ॥ ३८ ॥
मद्रः कलिङ्गाधिपतिश्चेकितानः सबाह्लिकः।
काश्मीरराजो गोनर्दः करूषाधिपतिस्तथा ॥ ३९ ॥
द्रुमः किम्पुरुषश्चैव पर्वतीयो ह्यनामयः।
नगर्याः पश्चिमं द्वारं शीघ्रमारोधयन्त्विति ॥ ४० ॥
‘मद्रराज (शल्य), कलिङ्गराज श्रुतायु, चेकितान, बाह्लिक, काश्मीरराज गोनर्द, करूषराज दन्तवक्त्र तथा पर्वतीय प्रदेशके रोगरहित किन्नरराज द्रुम—ये शीघ्र ही मथुरापुरीके पश्चिम द्वारको रोक लें ॥ ३९-४० ॥
पौरवो वेणुदारिश्च वैदर्भः सोमदस्तथा।
रुक्मी च भोजाधिपतिः सूर्याक्षश्चैव मालवः ॥ ४१ ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ दन्तवक्त्रश्च वीर्यवान्।
छागलिः पुरमित्रश्च विराटश्च महीपतिः ॥ ४२ ॥
कौरव्यो मालवश्चैव शतधन्वा विदूरथः।
भूरिश्रवास्त्रिगर्तश्च वाणः पञ्चनदस्तथा ॥ ४३ ॥
उत्तरं नगरद्वारमेते दुर्गसहा नृपाः।
आरुह्य चाभिमर्दन्तां वज्रप्रतिमगौरवाः ॥ ४४ ॥
‘पूरुवंशी वेणुदारि, विदर्भदेशीय सोमक, भोजोंके अधिपति रुक्मी, मालवाके राजा सूर्याक्ष, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द, पराक्रमी दन्तवक्त्र, छागलि, पुरमित्र, राजा विराट, कुरुवंशी मालव, शतधन्वा, विदूरथ, भूरिश्रवा, त्रिगर्त, बाण और पञ्चनद—ये दुर्गका आक्रमण सह सकने-वाले नरेश मथुरा नगरके उत्तर द्वारपर चढ़ाई करके शत्रुओंको कुचल डालें। इनका गौरव वज्रके तुल्य है ॥ ४१-४४ ॥
उलूकः कैतवश्चैव वीरश्चांशुमतः सुतः।
एकलव्यो बृहत्क्षत्रः क्षत्रधर्मा जयद्रथः ॥ ४५ ॥
उत्तमौजाश्च शल्यश्च कौरवाः कैकयास्तथा।
वैदिशो वामदेवश्च सांकृतिश्च सिनीपतिः ॥ ४६ ॥
पूर्वं नगरनिर्व्यूहमेतेष्वायत्तमस्तु नः।
दारयन्तो विधावन्तु वाता इव वलाहकान् ॥ ४७ ॥
‘शकुनिपुत्र उलूक, अंशुमान्के पुत्र वीर एकलव्य, बृहत्क्षत्र, क्षत्रधर्मा, जयद्रथ, उत्तमौजा, शल्य, कुरुवंशी, केकयराजकुमार, विदिशाके राजा वामदेव तथा सिनीपति सांकृति—इन सबके अधीन मथुरापुरीका पूर्व द्वार कर दिया जाय। ये लोग जैसे वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार शत्रुओंको विदीर्ण करनेके लिये उनपर धावा बोल दें ॥ ४५-४७ ॥
अहं च दरदश्चैव चेदिराजश्च वीर्यवान्।
दक्षिणं नगरद्वारं पाल्यामः सुदंशिताः ॥ ४८ ॥
‘मैं, दरद तथा पराक्रमी चेदिराज शिशुपाल कवच धारण करके नगरके दक्षिण द्वारका मोरचा सँभालेंगे ॥ ४८ ॥
एवमेषा पुरी क्षिप्रं समन्ताद् वेष्टिता बलैः।
वज्रावपातविभ्रमं प्राप्नोतु तुमुलं भयम् ॥ ४९ ॥
‘इस प्रकार हमारी सेनाओं द्वारा चारों ओरसे घिरी हुई यह नगरी मानो इसपर वज्रपात हो गया हो’ इस प्रकार विभ्रम एवं घोर भय प्राप्त करे ॥ ४९ ॥
गदिनो ये गदाभिस्ते परिघैः परिघायुधाः।
अपरे विविधैः शस्त्रैर्दारयन्तु पुरीमिमाम् ॥ ५० ॥
‘गदाधारी वीर गदाओंसे, परिघ चलानेवाले परिघोंसे
| ३४० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
तथा अन्य वीर नाना प्रकारके दूसरे शस्त्रोंसे इस पुरीको विदीर्ण कर डालें ॥ ५० ॥
अद्यैव नगरी ह्येषा विषमोच्छ्रायसंकटा ।
कार्या भूमिसमा सर्वा भवद्भिर्वसुधाधिपैः ॥ ५१ ॥
'आज ही आप सब भूपाल मिलकर ऊँचे-नीचे महलोंके समूहोंसे भरी हुई इस सारी नगरीको गर्दमें मिलाकर समतल भूमिके समान कर दें' ॥ ५१ ॥
चतुरङ्गबलैर्व्यूह्य जरासंधो व्यवस्थितः ।
अथाभ्ययाद् यदून् क्रुद्धैः सह सर्वैर्नराधिपैः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार आदेश दे चतुरङ्गिणी सेनाओंका व्यूह बनाकर जरासंध युद्धके लिये डट गया और क्रोधमें भरे हुए समस्त नरेशोंके साथ यादवोंपर चढ़ आया ॥ ५२ ॥
प्रतिजग्मुर्दशार्हास्तं व्यूढानीकाः प्रहारिणः ।
तद् युद्धमभवद् घोरं तेषां देवासुरोपमम् ।
अल्पानां बहुभिः सार्धं व्यतिषक्तरथद्विपम् ॥ ५३ ॥
उस समय अपनी सेनाका व्यूह बनाकर प्रहारकुशल यादवोंने जरासंधका सामना किया। उनका वह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर प्रतीत होता था। यह थोड़ेसे योद्धाओंका बहुसंख्यक शत्रुओंके साथ युद्ध हुआ, जिसमें उभय पक्षके रथ और हाथी एक दूसरेसे सटकर जूझ रहे थे ॥ ५३ ॥
नगरान्निस्सृतौ दृष्ट्वा वसुदेवसुतावुभौ ।
क्षुभितं नृवरानीकं त्रस्तसम्मूढवाहनम् ॥ ५४ ॥
इसी समय वसुदेवके दोनों पुत्र श्रीकृष्ण और बलराम नगरसे बाहर निकले। उन्हें देखते ही उन श्रेष्ठ राजाओंकी विशाल वाहिनी क्षुब्ध हो उठी। उसके वाहन भयभीत और मोहाच्छन्न-से हो गये ॥ ५४ ॥
रथस्थौ दंशितौ चैव चेरतुस्तत्र यादवौ ।
मकराविव संरब्धौ समुद्रक्षोभणावुभौ ॥ ५५ ॥
कवच धारण करके रथपर बैठे हुए वे दोनों यादव-वीर वहाँ विचरने लगे, मानो क्रोधमें भरे हुए दो मगर समुद्रमें हलचल मचा रहे हों ॥ ५५ ॥
तयोः प्रयुध्यतोः संख्ये मतिरासीन्महात्मनोः ।
आयुधानां पुराणानामादानकृतलक्षणा ॥ ५६ ॥
उस संग्राममें जूझते हुए उन दोनों महात्मा वीरोंके मनमें यह संकल्प उठा, यदि हमारे पुरातन अस्त्र आ जाते तो हम उन्हें ही लेकर युद्ध करते ॥ ५६ ॥
ततः खान्निपतन्ति स्म दिव्यान्याहवसंप्लवे ।
लेलिहानानि दीप्तानि महान्ति सुदृढानि च ॥ ५७ ॥
उनके इतना सोचते ही उस युद्धमें आकाशसे वे दिव्य आयुध नीचे आने लगे। वे सब-के-सब सुदृढ़, महान् और देदीप्यमान थे तथा शत्रुओंको चाट जानेके लिये उद्यत दिखायी देते थे ॥ ५७ ॥
क्रव्यादाैरनुयातानि मूर्तिमन्ति बृहन्ति च ।
तृपितान्याहवे भोक्तुं नृपमांसानि वै भृशम् ॥ ५८ ॥
उनके पीछे मांसभक्षी भूत-प्रेत आदि भी आ रहे थे। वे दिव्य अस्त्र मूर्तिमान् एवं विशाल थे तथा युद्धमें आये हुए राजाओंके रक्त-मांसका उपभोग करनेके लिये मानो अत्यन्त भूखे-प्यासे थे ॥ ५८ ॥
दिव्यस्रग्दामधारीणि त्रासयन्ति च खेचरान् ।
प्रभया भासमानानि पतमानानि चाम्बरात् ॥ ५९ ॥
उन्होंने दिव्य फूलोंके हार धारण किये थे। अपनी प्रभासे प्रकाशित हो आकाशसे गिरते हुए ये दिव्यास्त्र आकाशचारी प्राणियोंके मनमें भय उत्पन्न करते थे ॥ ५९ ॥
हलं संवर्तकं नाम सौनन्दं मुसलं तथा ।
धनुषां प्रवरं शार्ङ्गं गदा कौमोदकी तथा ॥ ६० ॥
चत्वार्येतानि तेजांसि विष्णुप्रहरणानि च ।
ताभ्यां समवतीर्णानि यादवाभ्यां महामृधे ॥ ६१ ॥
संवर्तक नामक हल, सौनन्द नामक मूसल, धनुषोंमें श्रेष्ठ शार्ङ्ग तथा कौमोदकी गदा—भगवान् विष्णुके ये चार तेजस्वी आयुध उन दोनों भाइयोंके लिये यादवोंके उस महासमरमें उतर आये ॥ ६०-६१ ॥
जग्राह प्रथमं रामो ललामप्रतिमं हलम् ।
सर्पन्तमिव सर्पेन्द्रं दिव्यमालाकुलं मृधे ॥ ६२ ॥
बलरामजीने उस युद्धस्थलमें पहले सर्पराजके समान सर्पणशील (गतिमान्) तथा दिव्य मालाओंसे अलंकृत सुन्दर आकृतिवाले हलको (दाहिने हाथमें) ग्रहण किया ॥
सौनन्दं च ततः श्रीमान् निरानन्दकरं द्विषाम् ।
सव्येन सात्वतां श्रेष्ठो जग्राह मुसलोत्तमम् ॥ ६३ ॥
तदनन्तर यादवोंमें श्रेष्ठ श्रीमान् संकर्षणने शत्रुओंके आनन्दको हर लेनेवाले सौनन्द नामक श्रेष्ठ मूसलको बायें हाथसे ग्रहण किया ॥ ६३ ॥
दर्शनीयं च लोकेषु धनुर्जलदनिःस्वनम् ।
नाम्ना शार्ङ्गमिति ख्यातं कृष्णो जग्राह वीर्यवान् ॥ ६४ ॥
इसके बाद पराक्रमी श्रीकृष्णने मेघोंके समान गम्भीर घोष करनेवाले शार्ङ्ग नामक धनुषको ग्रहण किया, जो समस्त लोकोंमें दर्शनीय है ॥ ६४ ॥
देवैर्निगदितार्थस्य गदा तस्यापरे करे ।
निशिसा कुमुदाक्षस्य नाम्ना कौमोदकीति सा ॥ ६५ ॥
देवताओंग्रहने जिन्हें अपना प्रयोजन बताया था और जिनके नेत्र खिले हुए कुमुदके समान शोभा पाते हैं, उन भगवान्
विष्णुपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ३४१
श्रीकृष्णके दूसरे हाथमे वह सुप्रसिद्ध कौमोदकी गदा स्वतः आ गयी ॥ ६५ ॥
तौ सप्रहरणौ वीरौ साक्षाद् विष्णुतनुपमौ ।
समरे रामगोविन्दौ रिपूंस्तान् प्रत्ययुध्यताम् ॥ ६६ ॥
उन आयुधोंसे युक्त हो साक्षात् विष्णु-विग्रहके समान शरीरवाले दोनों वीर बलराम और श्रीकृष्ण समराङ्गणमें उन शत्रुओंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ६६ ॥
सायुधप्रग्रहौ वीरौ तावन्योन्याश्रयावुभौ ।
पूर्वजानुजसंज्ञौ तौ रामगोविन्दलक्षणौ ॥ ६७ ॥
द्विषत्सु प्रतिकुर्वाणौ पराक्रान्तौ यथेश्वरौ ।
विचेरतुर्यथा देवौ वसुदेवसुतावुभौ ॥ ६८ ॥
उन दिव्य आयुधोंको ग्रहण करके एक दूसरेको सहारा देनेवाले वे अग्रज और अनुजरूप दोनों वीर बन्धु श्रीबलराम और श्रीकृष्ण शत्रुओंका सामना करते हुए ईश्वरकोटिक महापुरुषोंके समान पराक्रम दिखाने लगे। वसुदेवके वे दोनों पुत्र रणभूमिमें देवताओंके समान विचरते थे ॥ ६७-६८ ॥
हलमुद्यम्य रामस्तु सर्पेन्द्रमिव कोपितः।
चचार समरे वीरो द्विषियामन्तको यथा ॥ ६९ ॥
वीर बलराम क्रोधमें भरकर सर्पराजके समान हल उठाये शत्रुओंके लिये कालरूप होकर समरभूमिमे विचर रहे थे ॥ ६९ ॥
विक्षिपन् रथवृन्दानि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।
चकार रोषं सफलं नागेषु च हयेषु च ॥ ७० ॥
वे महामनस्वी क्षत्रियोंके रथसमूहोंको पीछे ढकेलते हुए हाथियों और घोड़ोंपर अपना रोष सफल करने लगे ॥ ७० ॥
कुञ्जराल्लाङ्गलक्षितान् मुसलाक्षेपताडितान् ।
रामो विराजन् समरे निर्ममन्थ यथाचलान् ॥ ७१ ॥
बलरामजी गजराजोंको हलसे खींचकर उन्हें मूसलकी मारसे घायल करते हुए समराङ्गणमे अद्भुत शोभा पा रहे थे। उन्होंने पर्वतोंके समान हाथियोंको मथ डाला ॥ ७१ ॥
ते वध्यमाना रामेण रणे क्षत्रियपुङ्गवाः ।
जरासंधान्तिकं भीताः समरोत् प्रतिजग्मिरे ॥ ७२ ॥
रणभूमिमे बलरामजीके द्वारा मारे जाते हुए वे क्षत्रियशिरोमणि भयभीत हो समरसे पीछे हटकर जरासंधके पास भाग गये ॥ ७२ ॥
तानुवाच जरासंधः क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः ।
धिगेतां क्षत्रवृत्तिं वः समरे कातरात्मनाम् ॥ ७३ ॥
उस समय क्षत्रिय-धर्ममे स्थिर रहनेवाले जरासंधने उन क्षत्रियोंसे कहा—'अरे समराङ्गणमे कातर-हृदय होकर पीछे भागनेवाले तुम सब लोगोंकी इस क्षत्रिय-वृत्तिको धिक्कार है! ॥
परावृत्तस्य समरे विरथस्य पलायतः ।
भ्रूणहत्यामिवासह्यां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ७४ ॥
'जो क्षत्रिय संग्रामभूमिमें रथहीन होनेपर पीठ दिखाकर भागने लगता है, उसकी इस भीरुताको मनीषी पुरुष भ्रूण-हत्याके समान असह्य बताते हैं ॥ ७४ ॥'
भीताः कस्मान्निवर्तध्वं धिगेतां क्षत्रवृत्तित्ताम् ।
क्षिप्रं सर्वे निवर्तध्वं मम वाक्येन चोदिताः ॥ ७५ ॥
'योद्धाओ ! तुम भयभीत होकर युद्धसे पीछे क्यों हटते हो? तुम्हारी ऐसी क्षत्रियवृत्तिको धिक्कार है! मेरी वाणीसे प्रेरित हो तुम सब लोग शीघ्र ही युद्धभूमिको लौट जाओ ॥
अथवा तिष्ठत रथैः प्रेक्षकाः समवस्थिताः ।
यावदेतौ रणे गोपौ प्रेषयामि यमक्षयम् ॥ ७६ ॥
'अथवा रथोंके द्वारा दर्शक बनकर तटस्थ खड़े रहो, जबतक कि मैं रणभूमिमें इन ग्वालोंको मारकर यमलोक नहीं भेज देता हूँ' ॥ ७६ ॥
ततस्ते क्षत्रियाः सर्वे जरासंधेन नोदिताः ।
सृजन्तः शरजालानि हृष्टा योद्धुं व्यवस्थिताः ॥ ७७ ॥
तत्र जरासंधसे प्रेरित हो वे समस्त क्षत्रिय बाण-समूहोंकी वृष्टि करते हुए बड़े हर्षके साथ युद्धके लिये डट गये ॥७७॥
ते हयैः काञ्चनापीडै रथैश्चाम्बुदनादिभिः ।
नागैश्चाम्बुदसङ्काशैर्महामात्रप्रचोदितैः ॥ ७८ ॥
वे सोनेके आभूषणोंसे विभूषित हुए घोड़ों, मेघकी गर्जनाके समान घरघर ध्वनि फैलानेवाले रथों और महावतोंद्वारा हाँके गये मेघोंके समान काले गजराजोंद्वारा आगे बढ़कर युद्ध करने लगे ॥ ७८ ॥
सतनुत्राः सनिस्त्रिंशाः सपताकायुधध्वजाः ।
त्वारोपितधनुष्मन्तः सतूणीराः सतोमराः ॥ ७९ ॥
उन सबके शरीरमे कवच बँधे थे, सबने तलवारें ले रखी थीं, सभी ध्वजा-पताका और आयुधोंसे सम्पन्न थे, सभीके धनुष चढ़े हुए थे तथा सबने तरकस और तोमर ले रखे थे ॥ ७९ ॥
सच्छत्राः सादिनश्चैव चारुचामरवीजिताः ।
रणे तेऽधिगता रेजुः स्यन्दनस्था महीक्षितः ॥ ८० ॥
रथपर बैठे हुए उन राजाओंके ऊपर छत्र तने हुए थे, मनोहर चँवर डुलाये जाते थे। उनके साथ घुड़सवार भी थे। युद्धभूमिमें स्थित हुए वे सभी नरेश बड़ी शोभा पा रहे थे ॥
ते युद्धरागा रथिनो व्यगाहन्त युधां वराः ।
गदाभिश्चैव गुर्वीभिः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः ॥ ८१ ॥
योद्धाओंमे श्रेष्ठ उन रथी वीरोंका युद्धमें अनुराग था, इसलिये वे भारी गदाओं, क्षेपणीयों (गोफनों) तथा मुद्गरों- से विपक्षियोंको घायल करते हुए उनकी सेनाओंमे घुस गये।
३४२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश
एतस्मिन्नन्तरे तत्र देवानां नन्दिवर्धनः ।
सुपर्णध्वजमास्थाय कृष्णस्तु रथमुत्तमम् ॥ ८२ ॥
समभ्ययाज्जरासंधं शरैर्विव्याध चाष्टभिः ।
सारथिं चास्य विव्याध पञ्चभिर्निशितैः शरैः ॥ ८३ ॥
इसी बीचमें देवताओंका आनन्द बढ़ानेवाले भगवान् श्रीकृष्ण उत्तम गरुड़ध्वज रथपर आरूढ़ हो जरासंधपर चढ़ आये। उन्होंने आठ बाणोंसे उसको घायल कर दिया और पाँच पैने बाणोंद्वारा उसके सारथिको भी बींध डाला ॥
जघान तुरगांश्चाजौ यतमानस्य वीर्यवान् ।
तं कृच्छ्रगतमाज्ञाय चित्रसेनो महारथः ॥ ८४ ॥
सेनानीः कैशिकश्चैव कृष्णं विविध्यतुः शरैः ।
जरासंध बचनेका प्रयत्न करता ही रह गया, किंतु पराक्रमी श्रीकृष्णने रणभूमिमें उसके घोड़ोंको भी मार डाला। उसे संकटमें पड़ा जान महारथी चित्रसेन तथा सेनापति कैशिक दोनों आ पहुँचे और श्रीकृष्णको अपने बाणोंद्वारा घायल करने लगे ॥ ८४ ॥
त्रिभिर्विव्याध संसक्तं बलदेवं च कैशिकः ॥ ८५ ॥
बलदेवो धनुश्चास्य भल्लेनाजौ द्विधाकरोत् ।
जवेनाभ्यर्दयच्चापि तानरीञ्छरवृष्टिभिः ॥ ८६ ॥
कैशिकने लगातार तीन बाणोंसे बलरामजीको बींध दिया। तब बलरामने भी एक भल्ल मारकर युद्धमें उसके धनुषके दो टुकड़े कर डाले। साथ ही वेगपूर्वक बाणोंकी वर्षा करके उन तीनों शत्रुओंको पीड़ित कर दिया ॥ ८५-८६ ॥
बहुभिर्बहुधा वीरान् समन्तात् स्वर्णभूषणैः ।
तं चित्रसेनः संरब्धो विव्याध नवभिः शरैः ॥ ८७ ॥
कैशिकः पञ्चभिश्चापि जरासंधश्च सप्तभिः ।
उन्होंने बहुतसे स्वर्णभूषित बाणोंद्वारा उन वीरोंको सब ओरसे बारंबार घायल किया। तब क्रोधमें भरे हुए चित्रसेनने नौ, कैशिकने पाँच तथा जरासंधने सात बाणोंसे उनको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ८७ ॥
त्रिभिस्त्रिभिश्च नाराचैस्तान् विभेद जनार्दनः ॥ ८८ ॥
पञ्चभिः पञ्चभिश्चैव बलदेवः शितैः शरैः ।
यह देख श्रीकृष्णने तीन-तीन नाराचोंसे उन तीनोंको वेध डाला। फिर बलदेवने भी पाँच-पाँच पैने बाणोंसे उन सबको घायल कर दिया ॥ ८८ ॥
रथं चैवास्य चिच्छेद चित्रसेनस्य वीर्यवान् ॥ ८९ ॥
बलदेवो धनुश्चास्य भल्लेनाजौ द्विधाकरोत् ।
इसके बाद पराक्रमी बलरामने चित्रसेनके रथके टुकड़े-टुकड़े कर दिये तथा एक भल्ल मारकर युद्धस्थलमें उसके धनुषके भी दो खण्ड कर डाले ॥ ८९ ॥
स च्छिन्नधन्वा विरथो गदामादाय वीर्यवान् ॥ ९० ॥
अभ्यधावत् सुसंरब्धो जिघांसुर्मुसलायुधम् ।
धनुष और रथके नष्ट हो जानेपर रोषमें भरा हुआ पराक्रमी चित्रसेन मूसलधारी बलरामको मार डालनेकी इच्छा से हाथमें गदा लेकर उनकी ओर दौड़ा ॥ ९० ॥
सिखृक्षतस्तु नाराचांश्चित्रसेनवधैषिणः ।
धनुश्चिच्छेद रामस्य जरासंधो महाबलः ॥ ९१ ॥
यह देख बलराम चित्रसेनके वधकी इच्छासे उसपर नाराचोंकी वृष्टि करने लगे। इतनेहीमें महाबली जरासंधने बलरामजीके धनुषको काट दिया ॥ ९१ ॥
गदया च जघानाश्वान् क्रोधात् स मगधेश्वरः ।
रामं चाभ्यद्रवद् वीरो जरासंधो महाबलः ॥ ९२ ॥
साथ ही क्रोधपूर्वक गदाका प्रहार करके महाबली वीर मगधराज जरासंधने उनके घोड़ोंको कालके गालमें भेज दिया, फिर बलरामपर भी धावा किया ॥ ९२ ॥
आदाय मुसलं रामो जरासंधमुपाद्रवत् ।
तयोस्तद् युद्धमभवत् परस्परवधैषिणोः ॥ ९३ ॥
बलरामजी भी मूसल लेकर जरासंधपर टूट पड़े। एक दूसरेके वधकी इच्छावाले उन दोनों वीरोंमें घोर युद्ध होने लगा ॥ ९३ ॥
चित्रसेनस्तु संसक्तं दृष्ट्वा रामेण मागधम् ।
रथमन्यं समारुह्य जरासंधमवारयत् ॥ ९४ ॥
उधर चित्रसेन मगधराजको बलरामजीके साथ उलझा हुआ देख दूसरे रथपर चढ़कर आ गया और जरासंधको लड़नेसे रोकने लगा ॥ ९४ ॥
ततो बलेन महता गजानीकेन चाप्यथ ।
उभयोरन्तरे ताभ्यां संकुलं समपद्यत ॥ ९५ ॥
तदनन्तर वह विशाल गजसेनाके साथ जरासंध और बलरामके बीचमें आ गया और उन दोनों भाइयोंके साथ घोर युद्ध करने लगा ॥ ९५ ॥
ततः सैन्येन महता जरासंधोऽभिसंवृतः ।
रामकृष्णाग्रगान् भोजानाससाद महाबलः ॥ ९६ ॥
तब विशाल सेनासे घिरा हुआ महाबली जरासंध बलराम और श्रीकृष्णके अग्रगामी भोजोंपर जा चढ़ा ॥ ९६ ॥
तत्र प्रक्षुभितस्येव सागरस्य महास्वनः ।
प्रादुर्बभूव तुमुलः सेनयोरुभयोरपि ॥ ९७ ॥
फिर तो वहाँ उभय पक्षकी सेनाओंमें विक्षुब्ध महासागरके समान बड़ी भयंकर एवं भारी गर्जना सुनायी देने लगी ॥ ९७ ॥
वेणुभेरीमृदङ्गानां शङ्खानां च सहस्रशः ।
उभयोः सेनयो राजन् प्रादुरासीन्महास्वनः ॥ ९८ ॥
| विष्णुपर्व ] | षट्त्रिंशोऽध्यायः | ३४३ |
|---|
राजन् ! दोनों सेनाओंमें वेणु, भेरी, मृदङ्ग और शङ्ख आदि सहस्रों वाद्योंका महान् घोष होने लगा ॥ ९८ ॥
क्ष्वेडितास्फोटितोत्कृष्टैस्तुमुलः सर्वतोऽभवत् ।
उत्पपात रजश्चापि खुरनेमिसमुद्धतम् ॥ ९९ ॥
योद्धाओंके गर्जने, ताल ठोंकने और उच्च स्वरसे पुकारने आदिके कारण वहाँ सब ओर तुमुल ध्वनि छा गयी। घोड़ोंकी टापों और रथके पहियोंके प्रान्तभागसे उठी हुई धूल सब ओर उड़ने लगी ॥ ९९ ॥
समुद्यतमहाशस्त्राः प्रगृहीतशरासनाः ।
अन्योन्यमभिगर्जन्तः शूरास्तत्रावतस्थिरे ॥ १००॥
उभयपक्षके शूर-वीर सैनिक बड़े-बड़े शस्त्र उठाये, धनुष लिये एक दूसरेके सम्मुख गर्जना करते हुए युद्धस्थलमे डटे हुए थे ॥ १०० ॥
रथिनः सादिनश्चैव पत्तयश्च सहस्रशः ।
गजाश्चातिबलास्तत्र समुत्पेतुः समन्ततः ॥ १०१॥
उस युद्धमें सब ओर रथी, घुड़सवार, सहस्रों पैदल तथा अत्यन्त बलशाली गजराज एक दूसरेपर टूटे पड़ते थे ॥ १०१ ॥
स संनिपातस्तुमुलस्त्यक्त्वा प्राणानवर्तत ।
वृष्णिभिः सह योधानां जरासंधस्य दारुणः ॥१०२॥
वृष्णियोंके साथ जरासंधके योद्धाओंका वह घमासान युद्ध प्राणोंका मोह छोड़कर हो रहा था और भयानक रूप धारण करता जा रहा था ॥ १०२ ॥
ततः शिनिरनाधृष्टिर्बभ्रुुर्विपृथुराहुकः ।
बलदेवं पुरस्कृत्य सैन्यस्यार्द्धेन दंशिताः ॥ १०३॥
दक्षिणं पक्षमासेदुः शत्रुसैन्यस्य भारत ।
भरतनन्दन ! तदनन्तर शिनि, अनाधृष्टि, बभ्रु (अक्रूर), विपृथु और आहुक (उग्रसेन)—इन सबने बलदेवजीको आगे रखकर अपनी आधी सेनासे घिरे रहकर शत्रुओंकी सेनाके दक्षिण भागपर आक्रमण किया ॥ १०३ १/२ ॥
पालितं चेदिराजेन जरासंधेन वा विभो ॥ १०४॥
उदीच्यैश्च महावीर्यैः शल्यशाल्वादिभिर्नृपैः ।
सृजन्तः शरवर्षाणि समभित्यक्तजीविताः ॥१०५॥
प्रभो ! उस भागकी रक्षा चेदिराज शिशुपाल, जरासंध तथा उत्तर दिशाके महापराक्रमी योद्धा शल्य और शाल्व आदि नरेश कर रहे थे। यादवोंने जीवनका मोह छोड़कर शत्रुओंपर बाणवर्षा आरम्भ कर दी ॥ १०४-१०५ ॥
अवगाहः पृथुः कङ्कः शतद्युम्नो विदूरथः ।
हृषीकेशं पुरस्कृत्य सैन्यस्यार्द्धेन दंशिताः ॥ १०६ ॥
शेष सेनाके आधे भागसे घिरे हुए अवगाह, पृथु, कङ्क, शतद्युम्न और विदूरथ आदि वीरोंने भगवान् श्रीकृष्णको आगे रखकर शत्रुसेनाके वामभागपर आक्रमण किया ॥ १०६ ॥
भीष्मकेणाभिगुप्तश्च रुक्मिणा च महात्मना ।
देवकेनापि राजेन्द्र तथा मद्रेreview: मद्रेश्वरेण च ॥ १०७॥
प्राच्यैश्च दाक्षिणात्यैश्च गुप्तवीर्यबलान्वितैः ।
तेषां च युद्धमभवत् समभित्यक्तजीवितम् ॥१०८॥
शक्त्यृष्टिप्रासबाणौघान् सृजतामशनिस्वनान् ।
राजेन्द्र ! वह भाग भीष्मक, महामना रुक्मी, देवक, मद्रराज शल्य तथा गुप्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न पूर्व और दक्षिण दिशाके वीरोंसे सुरक्षित था। इन्हीं सब लोगोंमें जीवनका मोह छोड़कर युद्ध होने लगा। ये लोग बिजलीके समान गड़गड़ाहट पैदा करनेवाले शक्ति, ऋष्टि, प्रास तथा बाणसमूहोंकी वर्षा करते थे ॥ १०७-१०८ १/२ ॥
सात्यकिश्चित्रकः श्यामो युयुधानश्च वीर्यवान् ।
राजाधिदेवो मृदुरः श्वफल्कश्च महारथः ॥१०९॥
सत्राजिच्च प्रसेनश्च बलेन महता वृताः ।
व्यूहस्य पुच्छं ते सर्वे प्रतियुयुर्दिपंतां मृधे ॥ ११०॥
व्यूहस्यार्द्धं समासेदुर्मुद्गरेणाभिरक्षिताः ।
राजभिश्चापि बहुभिर्वेणुदारिमुखैः सह ॥ १११॥
सात्यकि, चित्रक, श्याम, पराक्रमी युयुधान, राजाधिदेव, मृदुर, महारथी श्वफल्क, सत्राजित् और प्रसेन—इन सबने विशाल सेनासे घिरकर युद्धस्थलमे शत्रुओंके व्यूहके पुच्छभागपर आक्रमण किया। मुद्गरसे सुरक्षित रहकर इन्होंने व्यूहके आधे भागपर धावा बोल दिया था, उस समय इनका वेणुधारि आदि बहुत-से राजाओके साथ युद्ध हुआ ॥ १०९-१११ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि मथुरोपरोधे युद्धवर्णने पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें जरासंधका मथुरापर घेरा और दोनों पक्षके योद्धाओंके युद्धका वर्णनविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
षट्त्रिंशोऽध्यायः
वृष्णिवंशियों तथा जरासंधके सैनिकोंका युद्ध, बलराम और जरासंधका गदायुद्ध तथा जरासंधका पराजित होकर पलायन करना
| वैशम्पायन उवाच | वैशम्पायनजी कहते हैं— |
|---|---|
| ततो युद्धानि वृष्णीनां बभूवुः सुमहान्त्यथ ।<br>मागधस्य महामात्रैर्नृपैश्चैवानुयायिभिः ॥ १ ॥ | जनमेजय ! तदनन्तर जरासंधके महावतों और अनुगामी नरेशोंके साथ वृष्णिवंशियोंके कई बड़े-बड़े युद्ध हुए ॥ १ ॥ |
३४४ : श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे रुक्मिणा वासुदेवस्य भीष्मकेणाहुकस्य च । रथी रामो जरासंधं शरैराशीविषोपमैः ॥ १० ॥ क्रथेन वसुदेवस्य कैशिकस्य तु बभ्रुना ॥ २ ॥ आवृण्वन्नभ्ययाद् वीरस्तं च राजा स मागधः ।' गदेन चेदिराजस्य दन्तवक्त्रस्य शङ्कुना । अभ्यवर्तत वेगेन स्यन्दनेनाशुगामिना ॥ ११ ॥ तथान्यैर्वृष्णिवीराणां नृपाणां च महात्मनाम् ॥ ३ ॥ रथारूढ वीर बलरामने विषधर सर्पोंके समान भयंकर युद्धमासीद्धि सैन्यानां सैनिकैर्भरतर्षभ । बाणोंद्वारा जरासंधको आच्छादित करते हुए उसपर आक्रमण अहानि पञ्च चैकं च षट् सप्ताष्टौ च दारुणम् ॥ ४ ॥ किया तथा मगधराज भी अपने शीघ्रगामी रथद्वारा बड़े वेगसे भरतश्रेष्ठ ! रुक्मीके साथ वासुदेव श्रीकृष्णका, भीष्मक- उनका सामना करनेके लिये आ पहुँचा ॥ १०-११ ॥ के साथ आहुक ( उग्रसेन ) का, क्रथके साथ वसुदेवका, अन्योन्यं विविधैरस्त्रैर्विद्ध्वा विद्ध्वा विनेदतुः । बभ्रु ( अक्रूर ) के साथ कैशिकका, गदके साथ चेदिराज तौ क्षीणशस्त्रौ विरथौ हताश्वौ हतसारथी ॥१२॥ शिशुपालका, शंकुके साथ दन्तवक्त्रका तथा अन्य सैनिकोंके गदे गृहीत्वा विक्रान्तावन्योऽन्यमभिधावताम् । साथ वृष्णिकुलके महामना वीर नरेशोंका, सारांश यह कि चे दोनों नाना प्रकारके अस्त्रोंद्वारा एक दूसरेको घायल उभय पक्षके सैनिकोंका प्रतिद्वन्द्वी सैनिकोंके साथ दारुण करके जोर-जोरसे गरजते थे । दोनोंके अस्त्र-शस्त्र क्षीण हो द्वन्द्व युद्ध होने लगा, जो सत्ताईस दिनोंतक चलता गये, दोनों ही रथहीन हो गये तथा दोनोंके ही घोड़े और रहा ॥ २-४ ॥ सारथि मारे गये । उस दशामे वे दोनों पराक्रमी योद्धा गदा गजैर्गजा हयैरश्वाः पदाताश्च पदातिभिः । हाथमें लेकर एक-दूसरेपर टूट पड़े ॥ १२३ ॥ रथै रथा विमिश्राश्च योधा युयुधिरे नृप ॥ ५ ॥ कम्पयन्तौ भुवं वीरौ तावुद्यतगदावुभौ ॥ १३ ॥ नरेश्वर ! हाथियोंसे हाथी, घोड़ोंसे घोड़े, पैदलोंसे पैदल ददृशाते महात्मानौ गिरी सशिखराविव । और रथोंसे रथ मिश्रित हो गये और इस प्रकार घोल-मेल हाथमें गदा उठाये वे दोनों महामनस्वी वीर पृथिवीको कर सभी योद्धा विपक्षियोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ५ ॥ कम्पित करते हुए वहाँ एक-एक शिखरवाले दो पर्वतोंके समान जरासंधस्य नृपते रामेणासीत् समागमः । दिखायी देते थे ॥ १३३ ॥ महेन्द्रस्येव वृत्रेण दारुणो रोमहर्षणः ॥ ६ ॥ व्युपरमन्त युद्धानि पश्यता तौ महाभुजौ । राजा जरासंधका बलरामजीके साथ उसी प्रकार दारुण संरम्भावभिधावन्तौ गदायुद्धेषु विश्रुतौ ॥ १४ ॥ एवं रोमाञ्चकारी संघर्ष हुआ, जैसा वृत्रासुरके साथ देवराज उन दोनों महाबाहु वीरोंको युद्धके लिये उद्यत देख इन्द्रका हुआ था ॥ ६ ॥ दूसरे योद्धाओंके युद्ध बंद हो गये । उन दोनोंकी गदायुद्धमे अवेक्ष्य रुक्मिणीं कृष्णो रुक्मिणं न व्यपोथयत् । ख्याति थी । वे दोनों बड़े रोषमे भरकर एक-दूसरेपर धावा ज्वलनाकींशुसंकाशान्नानाशीविषविषोपमान् ॥ ७ ॥ करते थे ॥ १४ ॥ वारयामास कृष्णो वै शरांस्तस्य तु शिक्षया । उभौ तौ परमाचार्यौ लोके ख्यातौ महाबलौ । रुक्मिणीके साथ भविष्यमे होनेवाले सम्बन्धको दृष्टिमें मत्ताविव गजौ युद्धे तावन्योन्यमयुध्यताम् ॥ १५ ॥ रखकर श्रीकृष्णने रुक्मीको नहीं मारा, उसकी ओरसे वे दोनों महाबली वीर संसारमें गदायुद्धके उत्तम आनेवाले अग्नि और सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी तथा आचार्यके रूपमे विख्यात थे तथा जैसे दो मतवाले हाथी विषधर सर्पोंके समान विषैले बाणोंका उन्होंने अपनी शिक्षाके लड़ते हैं, उसी प्रकार रणभूमिमें वे एक-दूसरेके साथ जूझ बलसे निवारण कर दिया ॥ ७३ ॥ रहे थे ॥ १५ ॥ इत्येषां सुमहानासीद् बलौघानां परिक्षयः ॥ ८ ॥ ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च समहर्षयः । उभयोः सेनयो राजन् मांसशोणितकर्दमः । समन्ततश्चाप्सरसः समाजग्मुः सहस्रशः ॥ १६ ॥ राजन् ! इस प्रकार दोनों सेनाओके सैनिकसमूहोंका उस समय गन्धर्वोंसहित देवता, सिद्ध, महर्षि तथा महान् विनाश हुआ । वहाँ रक्त और मांसकी कीच सहस्रों अप्सराएँ सब ओरसे उस युद्धको देखनेके लिये आ जम गयी ॥ ८३ ॥ पहुँचीं ॥ १६ ॥ कबन्धानि समुत्तस्थुः सुवहूनि समन्ततः ॥ ९ ॥ तद् देवयक्षगन्धर्वमहर्षिभिरलंकृतम् । तस्मिन् विमर्दे योधानां संख्यावृत्तिकराणि च । शुशुभेऽभ्यधिकं राजन् दिवं ज्योतिर्गणैरिव ॥ १७ ॥ योद्धाओंके उस महान् संहारमे चारो ओरसे बहुत-से अभिदुद्राव रामं तु जरासंधो महाबलः । कबन्ध उठने लगे, जिनकी गणना नहीं की जा सकती सव्यं मण्डलममाश्रित्य बलदेवस्तु दक्षिणम् ॥ १८ ॥ थी ॥ ९३ ॥
विष्णुपर्व ] षट्त्रिंशोऽध्यायः ३४५
राजन् ! देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों और महर्षियोंसे अलंकृत हुआ आकाशका वह भाग नक्षत्रसमूहोंसे विभूषित हुआ-सा अधिक शोभा पाने लगा। महाबली जरासंध बायेंसे पैंतरा देकर बलरामजीकी ओर दौड़ा और बलरामजीने दाहिनेसे उसपर आक्रमण किया ॥ १७-१८ ॥
प्रहरन्तौ ततोऽन्योन्यं गदायुद्धविशारदौ ।
दन्ताभ्यामिव मातङ्गौ नादयन्तौ दिशो दश ॥ १९ ॥
गदानिपातो रामस्य शुश्रुवेऽशनिनिःस्वनः ।
जरासंधस्य च रणे पर्वतस्येव दीर्यतः ॥ २० ॥
गदायुद्धमें कुशल वे दोनों वीर दसों दिशाओंको निनादित करते हुए एक दूसरेपर उसी प्रकार प्रहार करने लगे, जैसे दो मतवाले हाथी परस्पर दाँतोंसे आघात करते हों। बलरामजी जब गदाका आघात करते, तब वज्रपातके समान भयानक शब्द सुनायी पड़ता था तथा रणभूमिमें जरासंधके गदाघातसे ऐसी आवाज होती थी, मानो कोई पर्वत फट पड़ा हो ॥ १९-२० ॥
न स्म कम्पयते रामं जरासंधकरच्युता ।
गदा गदाभृतां श्रेष्ठं विन्ध्यं गिरिमिवानिलः ॥ २१ ॥
रामस्य तु गदावेगं वीर्यात् स मगधेश्वरः ।
सेहे धैर्येण महता शिक्षया च व्यपोहयत् ॥ २२ ॥
जैसे प्रचण्ड वायु विन्ध्यपर्वतको नहीं हिला सकती, उसी प्रकार जरासंधके हाथसे छूटी हुई गदा गदाधारियोंमें श्रेष्ठ बलरामजीको कम्पित नहीं कर पाती थी। बलरामजीकी गदाके वेगको मगधराज जरासंध अपने बलकी अधिकताके कारण महान् धैर्यके साथ सह लेता था तथा अपनी शिक्षाके द्वारा उनके प्रहारको व्यर्थ कर देता था ॥ २१-२२ ॥
एवं तौ तत्र संग्रामे विचरन्तौ महाबलौ ।
मण्डलानि विचित्राणि विचेतुररिंदमौ ॥ २३ ॥
इस प्रकार शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों महाबली योद्धा उस संग्राममें विचित्र पैंतरे दिखाते हुए विचर रहे थे ॥
व्यायच्छन्तौ चिरं कालं परिश्रान्तौ च तस्थतुः ।
समाश्र्वस्य मुहूर्त्तं तु पुनरन्योन्यमाहताम् ॥ २४ ॥
देरतक परिश्रम करके थक जानेपर दोनों खड़े हो जाते थे; फिर दो घड़ीतक सुस्ताकर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगते थे ॥ २४ ॥
एवं तौ योधमुख्यौ तु समं युयुधतुश्चिरम् ।
न च तौ युद्धवैमुख्यमुभावेव प्रजग्मतुः ॥ २५ ॥
इस प्रकार वे दोनों प्रमुख योद्धा समानभावसे देरतक लड़ते रहे। वे दोनों ही युद्धसे विमुख नहीं हुए ॥ २५ ॥
अथापश्यद् गदायुद्धे विशेषं तस्य वीर्यवान् ।
रामः क्रुद्धो गदां त्यक्त्वा जग्राह मुसलोत्तमम् ॥ २६ ॥
तदनन्तर पराक्रमी बलरामजीने जब गदायुद्धमें जरासंधकी विशेषता देखी, तब उन्होंने कुपित हो गदा त्यागकर उत्तम मूसल हाथमें लिया ॥ २६ ॥
तमुद्यन्तं तदा दृष्ट्वा मुसलं घोरदर्शनम् ।
अमोघं बलदेवेन क्रुद्धेन तु महारणे ॥ २७ ॥
ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् सुस्वरा लोकसाक्षिणी ।
उवाच बलदेवं तं समुद्यतहलायुधम् ॥ २८ ॥
उस महासमरमें कुपित हुए बलदेवजीके द्वारा उस भयानक तथा अमोघ मूसलको उठाया जाता देख आकाशमें सब लोगोंके सामने स्पष्ट शब्दोंमें देववाणी सुनायी दी। उसने हल-मूसल उठाये हुए बलदेवजीसे कहा— ॥ २७-२८ ॥
न त्वया राम वध्योऽयमलं खेदेन मानद ।
विदितोऽस्य मया मृत्युस्तस्मात् साधु व्युपरम ।
अचिरेणैव कालेन प्राणांस्त्यक्ष्यति मागधः ॥ २९ ॥
'दूसरोंको मान देनेवाले बलरामजी ! जरासंधका वध आपके हाथसे होनेवाला नहीं है; अतः खेद करनेकी आवश्यकता नहीं है। इसकी मृत्युका हेतु मुझे विदित हो गया है; अतः आप इसे मारनेकी चेष्टासे निवृत्त हो जाइये। मगधराज जरासंध थोड़े ही समयमें अपने प्राणोंका परित्याग करेगा' ॥ २९ !
जरासंधस्तु तच्छ्रुत्वा विमनाः समपद्यत ।
न प्रजह्रे ततस्तस्मै पुनरेव हलायुधः ॥ ३० ॥
यह सुनकर जरासंधका मन उदास हो गया और बलरामजीने फिर उसपर प्रहार नहीं किया ॥ ३० ॥
तौ व्युपारमतां युद्धे वृष्णयस्ते च पार्थिवाः ।
असक्तमभवद् युद्धं तेषामेवं सुदारुणम् ॥ ३१ ॥
दीर्घकालं महाराज निघ्नतामितरेतरम् ।
अब वे दोनों युद्धसे विरत हो गये; फिर तो वृष्णिवंशी योद्धा तथा दूसरे राजाओंने भी युद्ध बंद कर दिया। महाराज ! इस प्रकार दीर्घकालतक एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए उन योद्धाओंका जो अत्यन्त भयंकर युद्ध अविराम गतिसे चलता आ रहा था, वह शान्त हो गया ॥ ३१ १/२ ॥
पराजिते त्वपक्रान्ते जरासंधे महीपतौ ॥ ३२ ॥
अस्तं याते दिनकरे नानुसस्रुरुस्तदा निशि ।
राजा जरासंध जब परास्त होकर युद्धसे हट गया और सूर्यदेव अस्त हो गये, तब रातके समय यादवोंने फिर उसका पीछा नहीं किया ॥ ३२ १/२ ॥
समानीय स्वकं सैन्यं लब्धलक्ष्या महाबलाः ॥ ३३ ॥
पुरीं प्रविशिशुर्हृष्टाः केशवेनाभिपारिताः ।
भगवान् श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित महाबली यादव अपने लक्ष्यमें सफल हो चुके थे, अतः वे अपनी सेना साथ लेकर बड़ी प्रसन्नताके साथ मथुरापुरीमें लौट आये ॥ ३३ १/२ ॥
| ३४६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
खाच्छ्रुतान्यायुधान्येवं तान्येवान्तर्दधुस्तदा ॥ ३४ ॥ जरासंधोऽपि नृपतिर्विमनाः स्वपुरीं ययौ । राजानश्चानुगा येऽस्य स्वराष्ट्राण्येव ते ययुः ॥ ३५ ॥
इसी तरह आकाश या दिव्य लोकसे जो आयुध आये थे, वे भी तत्काल अन्तर्धान हो गये। इधर राजा जरासंध भी उदास होकर अपनी पुरीको लौट गया। उसके साथ जो राजा लोग आये थे, वे भी अपने-अपने राष्ट्रोंको ही लौट गये॥
जरासंधं तु ते जित्वा मेनिरे नैव निर्जितम् । वृष्णयः कुरुशार्दूल राजा ह्यतिबलः स वै ॥ ३६ ॥
कुरुश्रेष्ठ ! वृष्णिवंशी वीर जरासंधको जीतकर भी उसे हारा हुआ नहीं मानते थे; क्योंकि उस राजाके पास बहुत बड़ी सेना थी तथा वह स्वयं भी अत्यन्त बलशाली था॥
दश चाष्टौ च संग्रामाञ्जरासन्धस्य यादवाः । ददुर्न चैनं समरे हन्तुं शेकुर्महाबलाः ॥ ३७ ॥
महाबली यादवोंने जरासंधको अठारह बार युद्धका अवसर प्रदान किया; किंतु वे किसी भी समरमें उसे मार न सके ॥
अक्षौहिण्यश्च तस्यासन् विंशतिश्च महामते । जरासन्धस्य नृपतेस्तदर्थं याः समांगताः ॥ ३८ ॥
महामते ! राजन्! जरासंधके पास बीस अक्षौहिणी सेनाएँ थीं, जो उसके लिये लड़नेको आयी थीं ॥ ३८ ॥
अल्पत्वादभिभूतास्तु वृष्णयो भरतर्षभ । वार्हद्रथेन राजेन्द्र राजभिः सहितेन वै ॥ ३९ ॥
भरतश्रेष्ठ ! राजेन्द्र ! वृष्णिवंशी वीर संख्यामें बहुत कम थे, इसलिये वे राजाओंसहित जरासंधसे अभिभूत हो जाते थे ॥ ३९ ॥
जित्वा तु मागधं संख्ये जरासन्धं महीपतिम् । विहरन्ति स्म सुखिनो वृष्णिसिंहा महारथाः ॥ ४० ॥
मगधके राजा पृथ्वीपति जरासंधको इस प्रकार युद्धमें जीतकर वृष्णिवंशके सिंह-जैसे पराक्रमी महारथी सुखपूर्वक वहाँ विहार करने लगे ॥ ४० ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि जरासंधापयानं नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें जरासंधका पलायनविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥
सप्तत्रिंशोऽध्यायः
जरासंधके पुनः आक्रमणसे शङ्कित यादवोंकी सभामें विकद्रुका भाषण—राजा हर्यश्वका चरित्र तथा उनसे यदु एवं यादवोंकी उत्पत्तिका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
स कृष्णस्तत्र बलवान् रौहिणेयेन संगतः ।
मथुरां यादवाकीर्णां पुरीं तां सुखमावसत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! महाबली भगवान् श्रीकृष्ण रोहिणीकुमार बलदेवजीके साथ मिलकर यादवोंसे भरी हुई उस मथुरापुरीमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ १ ॥
प्राप्तयौवनदेहस्तु युक्तो राजश्रिया विभुः ।
चचार मथुरां प्रीतः सवनाकरभूषनाम् ॥ २ ॥
उनके श्रीअङ्गोंमें यौवनावस्थाका प्रवेश हुआ था। वे भगवान् राजोचित शोभासे सम्पन्न हो वन-प्रान्तसे विभूषित मथुरामें प्रसन्नतापूर्वक विचरते थे ॥ २ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य राजा राजगृेश्वरः ।
सस्मार निहतं कंसं जरासंधः प्रतापवान् ॥ ३ ॥
कुछ कालके अनन्तर राजगृहके स्वामी प्रतापी राजा जरासंधने कंसके मारे जानेकी घटनाको फिरसे स्मरण किया ॥
युद्धाय योजितो भूयो दुहितृभ्यां महीपतिः ।
दश सप्त च संग्रामाञ्जरासंधस्य यादवाः ।
ददुर्न चैनं समरे हन्तुं शेकुर्महारथाः ॥ ४ ॥
उसकी दोनों कन्याओंने पुनः उसे युद्धके लिये उत्साहित किया। यादवोंने जरासंधको क्रमशः सत्रह बार युद्धका अवसर दिया; परंतु वे महारथी यादव समरभूमिमे उसे मार न सके ॥
ततो मागधराट् श्रीमांश्चतुरङ्गबलान्वितः ।
भूयोऽप्यष्टादशं कर्तुं संग्रामं स समारभत् ॥ ५ ॥
तदनन्तर श्रीमान् मगधराजने चतुरङ्गिणी सेनाको साथ लेकर फिर अठारहवीं बार यादवोंके साथ युद्ध करनेका आयोजन किया ॥ ५ ॥
वैलक्ष्यात् पुनरेवासौ राजा राजगृेश्वरः ।
जरासंधो वली श्रीमान् पाकशासनविक्रमः ॥ ६ ॥
राजगृहका स्वामी बलवान् राजा श्रीमान् जरासंध इन्द्रके समान पराक्रमी था। उसने पहलेकी पराजयसे लज्जाका अनुभव करनेके कारण पुनः युद्धकी तैयारी की ॥ ६ ॥
स साधनेन महता वृहद्रथसुतो वली ।
कृष्णस्य वधमन्विच्छन् भूयो वै संन्यवर्तत ॥ ७ ॥
विष्णुपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः ३४७
बृहद्रथका वह बलवान् पुत्र महान् साधनसे सम्पन्न हो श्रीकृष्णका वध चाहता हुआ फिर मथुरापुरीकी ओर लौटा ॥
तं श्रुत्वा सहिताः सर्वे निवृत्तं मगधेश्वरम्।
यादवा मन्त्रयामासुर्जरासंधभयार्दिताः ॥ ८ ॥
मगधराजको पुनः लौटा हुआ सुनकर जरासंधके भयसे पीड़ित हुए सब यादव एक साथ बैठकर मन्त्रणा करने लगे ॥
ततः प्राह महातेजा विकद्रुर्नयकोविदः ।
कृष्णं कमलपत्राक्षमग्रसेनस्य शृण्वतः ॥ ९ ॥
उस समय नीतिकुशल महातेजस्वी विकद्रुने उग्रसेनके सुनते हुए कमलनयन श्रीकृष्णसे कहा—॥ ९ ॥
श्रूयतां तात गोविन्द कुलस्यास्य समुद्भवः ।
श्रूयतामभिधास्यामि प्राप्तकालमहं ततः ।
युक्तं चेन्मन्यसे साधो करिष्यसि वचो मम ॥ १० ॥
'तात ! गोविन्द ! इस कुलकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनो। इसके लिये उपयुक्त अवसर आया है, इसलिये बता रहा हूँ; ध्यान देकर श्रवण करो। साधो ! इसे सुनकर यदि उचित समझो तो मेरे कथनानुसार कार्य करना ॥ १० ॥
यादवस्यास्य वंशस्य समुद्भवमशेषतः ।
यथा मे कथितः पूर्वं व्यासेन विदितात्मना ॥ ११ ॥
'यादववंशकी इस उत्पत्तिका सारा प्रसंग आत्मज्ञानी व्यासजीने पूर्वकालमें मुझे जैसा बताया था, वैसा ही सुना रहा हूँ ॥ ११ ॥
आसीद् राजा मनोर्वंशे श्रीमानिक्ष्वाकुसम्भवः ।
हर्यश्व इति विख्यातो महेन्द्रसमविक्रमः ॥ १२ ॥
'वैवस्वत मनुके वंशमें इक्ष्वाकुके पुत्र हर्यश्व नामसे विख्यात एक श्रीसम्पन्न राजा हो गये हैं, जो महेन्द्रके तुल्य पराक्रमी थे ॥ १२ ॥
तस्यासीद् दयिता भार्या मधोर्दैत्यस्य वै सुता ।
देवी मधुमती नाम यथेन्द्रस्य शची तथा ॥ १३ ॥
'मधु नामक दैत्यकी पुत्री मधुमती देवी उनकी प्राण-प्यारी भार्या थी। जैसे इन्द्रको शची प्रिय है, उसी प्रकार हर्यश्वको मधुमती प्रिय थी ॥ १३ ॥
सा यौवनगुणोपेता रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
मनोरथकरी राज्ञः प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ १४ ॥
'वह यौवनके गुणोंसे सम्पन्न थी। इस पृथ्वीपर उसके रूप सौन्दर्यकी कहीं तुलना नहीं थी। वह राजा हर्यश्वके मनोरथको सिद्ध करनेवाली होनेके कारण उन्हें प्राणोंसे भी अधिक माननीया थी ॥ १४ ॥
दानवेन्द्रकुले जाता सुश्रोणी कामरूपिणी ।
एकपत्नीव्रतधरा खेचरा रोहिणी यथा ॥ १५ ॥
'दानवराज मधुके कुलमें उत्पन्न हुई वह सुन्दर कटि-प्रदेशवाली कामरूपिणी देवी रोहिणीके समान एकपत्नीव्रतका पालन करनेवाली तथा आकाशमें विचरनेवाली थी ॥ १५ ॥
सा तमिक्ष्वाकुशार्दूलं कामयामास कामिनी ।
स कदाचिन्नरश्रेष्ठो भ्रात्रा ज्येष्ठेन माधव ॥ १६ ॥
राज्यान्निरस्तो विश्वस्तः सोऽयोध्यां सम्परित्यजत् ।
स तदाल्पपरीवारः प्रियया सहितो वने ॥ १७ ॥
'वह कामिनी होकर इक्ष्वाकुवंशके श्रेष्ठ वीर हर्यश्वको सम्पूर्ण हृदयसे चाहती थी। माधव ! एक दिन बड़े भाईने उनके विश्वासपर रहनेवाले नरश्रेष्ठ हर्यश्वको राज्यसे निकाल दिया, तब उन्होंने अयोध्या छोड़ दी और थोड़े-से परिवारके साथ अपनी प्रिया मधुमतीसहित वे वनमें रहने लगे ॥
रेमे समेत्य कालज्ञः प्रियया कमलेक्षणः ।
भ्रात्रा विनिष्कृतं राज्यात् प्रोवाच कमलेक्षणा ॥ १८ ॥
'कालकी महिमाको जाननेवाले कमलनयन हर्यश्व अपनी प्यारी पत्नीके साथ मिलकर वहाँ बड़े आनन्दसे समय बिताने लगे। एक दिन कमलनयनी मधुमतीने भाईद्वारा राज्यसे निकाले गये पतिसे कहा—॥ १८ ॥
एह्यागच्छ नरश्रेष्ठ त्यज राज्यकृतां स्पृहाम् ।
गच्छावः सहितौ वीर मधोर्मम पितुर्गृहम् ॥ १९ ॥
'नरश्रेष्ठ वीर ! अयोध्याके राज्यकी अभिलाषा छोड़ दो और आओ मेरे साथ चलो। हम दोनों मेरे पिता मधुके घरपर चलें ॥ १९ ॥
रम्यं मधुवनं नाम कामपुष्पफलद्रुमम् ।
सहितौ तत्र रंस्यावो यथा दिवि गतौ तथा ॥ २० ॥
'सुरम्य मधुवन नामक वन ही मेरे पिताका निवासस्थान है। वहाँके वृक्ष इच्छानुसार फूल और फल देनेवाले हैं। वहाँ हम दोनों साथ रहकर स्वर्गवासियोंके समान मौज करेंगे॥
पितुर्मे दयितस्त्वं हि मातुर्मम च पार्थिव ।
मत्प्रियार्थं प्रियतरो भ्रातुश्च लवणस्य वै ॥ २१ ॥
'पृथ्वीनाथ ! मेरे पिता और माता दोनोंको ही तुम बहुत प्रिय हो तथा मेरा प्रिय करनेके लिये मेरा भाई लवणासुर भी तुम्हें अत्यन्त प्रिय मानेगा ॥ २१ ॥
रंस्यावस्तत्र सहितौ राज्यस्थाविव कामगौ ।
तत्र गत्वा नरश्रेष्ठ ह्यमराविव नन्दने ।
भद्रं ते विहरिष्यावो यथा देवपुरे तथा ॥ २२ ॥
'नरश्रेष्ठ ! वहाँ जाकर हम दोनों साथ-साथ रहकर राज्यपर बैठे हुए दम्पतियोंकी भाँति इच्छानुरूप वस्तुओंका उपभोग करते हुए रमण करेंगे। जैसे देवपुरीके नन्दनवनमें देवाङ्गना और देवता विहार करते हैं, उसी प्रकार वहाँ हम दोनों विहार करेंगे। आपका भला हो ॥ २२ ॥
३४८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
तं त्यजाव महाराज भ्रातरं तेऽभिमानिनम्।
आवयोर्द्वेषिणं नित्यं मत्तं राज्यमदेन वै॥ २३॥
‘महाराज! आपका भाई राज्यके मदसे सदा उन्मत्त रहकर अभिमानमें भरा रहता है और हम दोनोंसे द्वेष रखता है; अतः हम दोनों उसे त्याग दें॥ २३॥
धिगिमं गर्हितं वासं भृत्यवच्च पराश्रयम्।
गच्छावः सहितौ वीर पितुर्मे भवनान्तिकम्॥ २४॥
‘दासकी भाँति दूसरेके आश्रित होकर रहना अच्छा नहीं है; अतः इस निन्दित निवासको धिक्कार है। वीर! चलो, हम दोनों मेरे पिताके घरके पास चलें’॥ २४॥
तस्य सम्यक्प्रवृत्तस्य पूर्वजं भ्रातरं प्रति।
कामार्तस्य नरेन्द्रस्य पत्न्यास्तद् रुरुचे वचः॥ २५॥
‘श्रीकृष्ण! यद्यपि हर्यश्वका अपने बड़े भाईके प्रति अच्छा बर्ताव था (वह उनसे कोई प्रतिशोध नहीं लेना चाहता था), तो भी कामसे पीड़ित होनेके कारण उस नरेशको पत्नीकी बात पसंद आ गयी॥ २५॥
ततो मधुपुरं राजा हर्यश्वः स जगाम च।
भार्यया सह कामिन्या कामी पुरुषपुङ्गवः॥ २६॥
‘तब कामी पुरुषप्रवर राजा हर्यश्व अपनी कामवती पत्नीके साथ मधुपुरको चला गया॥ २६॥
मधुना दानवेन्द्रेण स साम्ना समुदाहृतः।
स्वागतं वत्स हर्यश्व प्रीतोऽस्मि तव दर्शनात्॥ २७॥
‘वहाँ दानवराज मधुने उससे सान्त्वनापूर्वक कहा—‘बेटा हर्यश्व! तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम्हारे दर्शनसे (अथवा तुमसे मिलकर) बहुत प्रसन्न हूँ॥ २७॥
यदेतन्मम राज्यं वै सर्वं मधुवनं विना।
ददामि तव राजेन्द्र वासश्च प्रतिगृह्यताम्॥ २८॥
‘राजेन्द्र! यह जो मेरा सारा राज्य है, उसे मैं केवल मधुवनको छोड़कर तुम्हें सौंप रहा हूँ। तुम यहाँ निवास करो॥ २८॥
वनेऽस्मिल्लवणश्चायं सहायस्ते भविष्यति।
अमित्रनिग्रहे चैव कर्णधारत्वमेष्यति॥ २९॥
‘इस वनमें यह मेरा पुत्र लवण भी तुम्हारा सहायक होगा तथा शत्रुओंका निग्रह करनेमें यह तुम्हारे लिये कर्णधारका काम देगा॥ २९॥
पालयैनं शुभं राष्ट्रं समुद्रानूपभूषितम्।
गोसमृद्धं श्रिया जुष्टमाभीरप्रायमानुपम्॥ ३०॥
‘तुम समुद्रके जलप्राय प्रदेशसे विभूषित इस शुभ राष्ट्रका पालन करो। यह गौओंसे समृद्ध और लक्ष्मीसे सेवित है तथा इसमें अधिकतर आभीर जातिके लोगोंका निवास है॥
अत्र ते वसतस्तात दुर्गं गिरिपुरं महत्।
भविता पार्थिवावासः सुराष्ट्रविषयो महान्॥ ३१॥
अनूपविषयश्चैव समुद्रान्ते निरामयः।
‘तात! यहाँ रहनेपर महान् एवं दुर्गम गिरिपुर (गिरिनार या रैवतक पर्वतसे मिला हुआ नगर) तुम्हारी राजधानीके रूपमें प्रतिष्ठित होगा। यह महान् सुराष्ट्र राज्य समुद्रके निकट और जलप्राय प्रदेशसे युक्त है। यहाँ किसी प्रकारका रोग नहीं होता॥ ३१½॥
आनर्तं नाम ते राष्ट्रं भविष्यत्यायतं महत्॥ ३२॥
तद् भविष्यमहं मन्ये कालयोगेन पार्थिव।
अध्यास्यतां यथाकालं पार्थिवं वृत्तमुत्तमम्॥ ३३॥
‘तुम्हारा विशाल एवं विस्तृत राज्य आनर्त नामसे विख्यात होगा। पृथ्वीनाथ! मेरा विश्वास है कि कालयोगसे वह अवश्यम्भावी है। तुम समयानुसार उत्तम राजोचित बर्तावका आश्रय लेकर यहाँ रहो॥ ३२-३३॥
यायातमपि वंशस्ते समेष्यति च यादवम्।
अनु वंशं च वंशस्ते सोमस्य भविता किल॥ ३४॥
‘तुम्हारा यह वंश ययाति एवं यदुके वंशमें मिल जायगा। चन्द्रवंशके भीतर तुम्हारा वंश चलेगा (सूर्यवंशसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं रह जायगा)॥ ३४॥
एष मे विभवस्तात तवेमं विषयोत्तमम्।
दत्त्वा यास्यामि तपसे सागरं लवनालयम्॥ ३५॥
‘तात! यही मेरा विभव है। मैं तुम्हें यह उत्तम राज्य देकर तपस्याके लिये लवणसमुद्रको चला जाऊँगा॥ ३५॥
लवणेन समायुक्तस्त्वमिमं विषयोत्तमम्।
पालयस्वाखिलं तात स्वस्य वंशस्य वृद्धये॥ ३६॥
‘तात! तुम लवणके साथ रहकर अपने वंशकी वृद्धिके लिये इस समस्त उत्तम राज्यका पालन करो॥ ३६॥
बाढमित्येव हर्यश्वः प्रतिजग्राह तत् पुरम्।
स च दैत्यस्तपोवासं जगाम वरुणालयम्॥ ३७॥
‘तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर हर्यश्वने उस पुरको ग्रहण किया; फिर वह दैत्य तपस्याके लिये समुद्रको चला गया॥
हर्यश्वश्च महातेजा दिव्ये गिरिवरोत्तमे।
निवेशयामास पुरं वासार्थममरोपमः॥ ३८॥
‘अमरोंके समान महातेजस्वी हर्यश्वने दिव्य एवं श्रेष्ठ गिरिवर (रैवतक) के समीप अपने रहनेके लिये एक नगर बसाया॥ ३८॥
आनर्तं नाम तद् राष्ट्रं सुराष्ट्रं गोधनायुतम्।
अचिरेणैव कालेन समृद्धं प्रत्यपद्यत॥ ३९॥
‘आनर्त नामसे प्रसिद्ध वह गोधनसम्पन्न राष्ट्र सुराष्ट्र
विष्णुपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः [ ३४९
कहलाया और थोड़े ही समयमें समृद्धिशाली हो गया ॥३९॥
अनूपविषये चैव वेलावनविभूषितम् ।
विचित्रं क्षेत्रसस्याढ्यं प्राकारग्रामसंकुलम् ॥ ४० ॥
शशास नृपतिः स्फीतं तद् राष्ट्रं राष्ट्रवर्द्धनः ।
राजधर्मेण यशसा प्रजानां नन्दिवर्द्धनः ॥ ४१ ॥
'जलप्राय देशमें समुद्रतटवर्ती वनोंसे विभूषित, विचित्र, खेतों और हरी-भरी खेतीसे सुशोभित, परकोटों और गाँवोंसे युक्त तथा धनधान्यसे सम्पन्न उस राष्ट्रपर राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले राजा हर्यश्व शासन करने लगे और राजधर्म एवं यशसे प्रजाका आनन्द बढ़ाने लगे ॥ ४०-४१ ॥
तस्य सम्यक् प्रचारेण हर्यश्वस्य महात्मनः ।
व्यवधंत तदक्षोभ्यं राष्ट्रं राष्ट्रगुणैर्युतम् ॥ ४२ ॥
'महामना हर्यश्वके उत्तम आचार-व्यवहारके कारण वह अक्षोभ्य राष्ट्र उत्तम राष्ट्रके गुणोंसे सम्पन्न हो निरन्तर उन्नति करने लगा ॥ ४२ ॥
स हि राजा स्थितो राज्ये राजवृत्तेन शोभितः ।
प्राप्तः कुलोचितां लक्ष्मीं वृत्तेन च नयेन च ॥ ४३ ॥
'राज्यपर स्थित होकर राजोचित बर्तावसे सुशोभित होनेवाले उन राजा हर्यश्वने सदाचार और उत्तम नीतिसे अपने कुलके लिये उचित लक्ष्मी प्राप्त कर ली ॥ ४३ ॥'
तस्यैव च सुवृत्तस्य पुत्रकामस्य धीमतः ।
मधुमत्यां सुतो जज्ञे यदुर्नाम महायशाः ॥ ४४ ॥
'पुत्रकी इच्छा रखनेवाले उन्हीं सदाचारी एवं बुद्धिमान् हर्यश्वके मधुमतीके गर्भसे महायशस्वी यदुका जन्म हुआ* ॥ ४४ ॥
सोऽवर्धत महातेजा यदुदुन्दुभिनिःस्वनः ।
राजलक्षणसम्पन्नः सपत्नौर्दुरतिक्रमः ॥ ४५ ॥
'महातेजस्वी यदुका स्वर दुन्दुभिनिनादके समान गम्भीर था। वे राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न होकर दिनोंदिन बढ़ने लगे। शत्रुओंके लिये वे सर्वथा दुर्जय थे ॥ ४५ ॥
यदुर्नामाभवत् पुत्रो राजलक्षणपूजितः ।
यथास्य पूर्वजो राजा पूरुः स सुमहायशाः ॥ ४६ ॥
'हर्यश्वका वह पुत्र यदु नामसे ही विख्यात हुआ। यदु राजोचित लक्षणोंसे सम्मानित थे, ठीक उसी तरह जैसे उनके पूर्वज राजा महायशस्वी पूरु सम्मानित होते थे ॥ ४६ ॥
* कहते हैं, जैसे ब्रह्माजीके मानसपुत्र वसिष्ठ किसी कारणवश मित्रावरुणके अंशसे नूतन शरीर धारण करके प्रकट हुए; फिर भी वसिष्ठ ही बने रहे, उसी प्रकार ययातिपुत्र महाराज यदु ही योग-बलसे हर्यश्वके पुत्ररूपमें प्रकट हुए थे और उसी पूर्व नामसे प्रख्यात हुए।
स एक एव तस्यासीत् पुत्रः परमशोभनः ।
ऊर्जितः पृथिवीभर्त्ता हर्यश्वस्य महात्मनः ॥ ४७ ॥
'महामना हर्यश्वके एक ही पुत्र यदु हुए। वे परम सुन्दर, बलवान् और पृथ्वीका भरण-पोषण करनेमें समर्थ थे ॥ ४७ ॥
दस वर्षसहस्राणि स कृत्वा राज्यमव्ययम् ।
जगाम त्रिदिवं राजा धर्मेणाप्रतिमो भुवि ॥ ४८ ॥
'राजा हर्यश्व दस हजार वर्षोंतक अक्षय राज्यका उपभोग करके स्वर्गलोकमें चले गये । वे भूमण्डलके अनुपम धर्मात्मा थे ॥ ४८ ॥
ततो यदुरदीनात्मा प्रजाभिस्त्वभ्यषिच्यत ।
पितुर्युपरते श्रीमान् क्रमेणार्क इवोदितः ॥ ४९ ॥
'पिताके मर जानेपर प्रजाओंने उदारचेता श्रीमान् यदु-को उनके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वे क्रमशः एक सूर्यके बाद दूसरे सूर्यके समान उदित हो प्रकाशित होने लगे ॥ ४९ ॥
शशास चेमां वसुधां प्रशान्तभयतस्कराम् ।
यदुरिन्द्रप्रतीकाशो नृपो येनास्म यादवाः ॥ ५० ॥
'वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी यदु, जिनके कारण हमलोग यादव कहलाते हैं, जब इस पृथ्वीका शासन करने लगे, तब यहाँका सारा भय शान्त हो गया। चोर-लुटेरे आदि लुप्त हो गये ॥ ५० ॥
स कदाचिन्नृपश्चक्रे जलक्रीडां महोदधौ ।
दारैः सह गुणोदारैः सतार इव चन्द्रमाः ॥ ५१ ॥
'एक समयकी बात है, राजा यदु अपनी उदार गुणवाली पत्नियोंके साथ ताराओंसहित चन्द्रमाके समान महासागरमें जलक्रीडा कर रहे थे ॥ ५१ ॥
स तत्र सहसा क्षिप्तस्तितीर्षुः सागराम्भसि ।
धूम्रवर्णेन नृपतिः सर्पराजेन वीर्यवान् ॥ ५२ ॥
सोऽपाकृष्यत वेगेन जले सर्पपुरं महत् ।
'वे पराक्रमी राजा यदु जलको पार करके निकलना ही चाहते थे कि सहसा किसीने उन्हें समुद्रके गहरे जलमें डाल दिया। बात यह हुई कि सर्पोंके राजा धूम्रवर्णने बड़े वेगसे उनको खींचा और जलके भीतर बसे हुए सर्पोंके एक महान् नगरमें पहुँचा दिया ॥ ५२३ ॥
मणिस्तम्भगृहद्वारं मुक्तादामविभूषितम् ॥ ५३ ॥
कीर्णं शङ्खकुलैः शुभ्रै रत्नरैशिविभूषितम् ।
प्रवालाङ्कूरपत्राढ्यैः पादपैरुपशोभितम् ॥ ५४ ॥
'वहाँके खम्भे, घर और द्वार सभी मणियोंके बने हुए थे। उन सबको मोतीकी लड़ियों एवं झालरोंसे सजाया गया था। वहाँ ढेर-के-ढेर श्वेत शङ्खोंके समूह पड़े हुए थे। रत्न-
| ३५० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
राशियोंसे उस नगरके घर-द्वारको विभूषित किया गया था। नूतन पल्लव, अंकुर और पत्तोंसे युक्त वृक्ष उस नगरकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ५३-५४ ॥
कीर्णं पन्नगनार्योघैः समुद्रोदरवासिभिः ।
स्वर्णवर्णेन भास्वन्तं स्वस्तिकेनेन्दुवर्चसा ॥ ५५ ॥
'वहाँ समुद्रके उदरमें निवास करनेवाली नागदलनाएँ भरी हुई थीं। वह ग्राम कहीं सुवर्णमय और कहीं चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिमान् स्वस्तिकसे प्रकाशित होता था ॥ ५५ ॥
स तं ददर्श राजेन्द्रो विमले सागराम्भसि ।
पन्नगेन्द्रपुरं तोये जगत्यामिव निर्मितम् ॥ ५६ ॥
'राजाधिराज यदुने देखा;— समुद्रके निर्मल जलमें बना हुआ यह नागराजका नगर भूतलपर ही निर्मित हुआ-सा जान पड़ता है ॥ ५६ ॥
स्वच्छं चैव पुरं तत्र प्रविवेश नृपो यदुः ।
अगाधं तोयदाकारं पूर्णं सर्पवधूगणैः ॥ ५७ ॥
'राजा यदुने सर्पवधुओंसे भरे हुए उस अगाध जलदाकार स्वच्छ नगरमें प्रवेश किया ॥ ५७ ॥
तस्य दत्तं मणिमयं जलजं परमासनम् ।
स्वास्तीर्णं पद्मपत्रैश्च पद्मसूत्रोत्तरच्छदम् ॥ ५८ ॥
'वहाँ उन्हें मणिमय कमलका आसन दिया गया, जिसपर पद्मोँके दल बिछे हुए थे और पद्मसूत्रोंकी ही बनी हुई चादर डाली गयी थी ॥ ५८ ॥
तमासीनं नृपं तत्र परमे पन्नगासने ।
द्विजिह्वपतिरव्यग्रो धूम्रवर्णोऽभ्यभाषत ॥ ५९ ॥
'सर्पोंके दिये हुए उस उत्तम आसनपर जब राजा यदु वहाँ विराजमान हुए, तब सर्पराज धूम्रवर्णने उनसे शान्तभाव- से कहा- ॥ ५९ ॥
पिता ते स्वर्गतिं प्राप्तः कृत्वा वंशमिमं महत् ।
भवन्तं तेजसा युक्तमुत्पाद्य वसुधाधिपम् ॥ ६० ॥
'राजन् ! तुम्हारे पिता इस विशाल वंशकी नींव डालकर और तुम-जैसे तेजस्वी भूपालको जन्म देकर स्वर्गलोकको चले गये ॥ ६० ॥
यादवानामयं वंशस्तवनाम्ना यदुपुङ्गव ।
पित्रा ते मङ्गलार्थाय स्थापितः पार्थिवाकरः ॥ ६१ ॥
'यदुपुङ्गव ! तुम्हारे नामसे ही यह वंश यादववंश कहलायेगा। तुम्हारे पिताने तुम्हारे मङ्गलके लिये ही इस कुलकी स्थापना की है, जो राजाओंकी खान है ॥ ६१ ॥
वंशे चास्मिंस्त्व विभो देवानां तनयाव्ययाः ।
ऋषीणामुरगाणां च उत्पत्स्यन्ते नृयोनिजाः ॥ ६२ ॥
'प्रभो ! तुम्हारे इस वंशमें देवताओं और ऋषियों तथा नागोंकी अक्षय संतानें मनुष्य-योनिमें उत्पन्न होंगी ॥ ६२ ॥
तन्ममेमाः सुताः पञ्च कुमार्यो वृत्तसम्मताः ।
उत्पन्ना यौवनाश्वस्य भगिन्यां नृपसत्तम ॥ ६३ ॥
'नृपश्रेष्ठ ! मेरी जो ये पाँच कुमारी कन्याएँ हैं, ये उत्तम आचार-व्यवहारसे सम्मानित हैं। इनका जन्म यौवनाश्वकी बहिनके गर्भसे हुआ है ॥ ६३ ॥
प्रतीच्छेमाः स्वधर्मेण प्राजापत्येन कर्मणा ।
वरं च ते प्रदास्यामि वरार्हस्त्वं मतो मम ॥ ६४ ॥
'तुम अपने धर्मके अनुसार वैवाहिक विधिसे इन कन्याओंको ग्रहण करो। मेरी धारणाके अनुसार तुम वर पानेके योग्य हो, अतः मैं तुम्हें मनोवाञ्छित वर भी दूँगा ॥ ६४ ॥
भैमाश्च कुकुराश्चैव भोजाश्चान्धकयादवाः ।
दाशार्हा वृष्णयश्चेति ख्यातिं यास्यन्ति सप्त ते ॥ ६५ ॥
'तुमसे सात कुल विख्यात होंगे, जो भौम, कुक्कुर, भोज, अन्धक, यादव, दाशार्ह तथा वृष्णिके नामसे प्रसिद्ध होंगे' ॥
स तस्मै धूम्रवर्णो वै कन्याः कन्याव्रते स्थिताः ।
जलपूर्वेन योगेन ददाविन्द्रसमाय वै ॥ ६६ ॥
'ऐसा कहकर धूम्रवर्णने इन्द्रतुल्य तेजस्वी यदुको कन्या- व्रतमें स्थित हुई वे कन्याएँ हाथमें जल लेकर संकल्पपूर्वक दे दीं ॥ ६६ ॥
वरं चास्मै ददौ प्रीतः स वै पन्नगपुङ्गवः ।
श्रावयन् कन्यकाः सर्वा यथाक्रममदीनवत् ॥ ६७ ॥
'फिर उन नागशिरोमणि धूम्रवर्णने प्रसन्न होकर समस्त कन्याओंको सुनाते हुए एक उदार पुरुषकी भाँति राजाको क्रमशः वर प्रदान किये ॥ ६७ ॥
एतासु ते सुताः पञ्च सुतासु मम मानद ।
उत्पत्स्यन्ते पितुस्तेजो मातुश्चैव समाश्रिताः ॥ ६८ ॥
'मानद ! मेरी इन पाँच कन्याओंसे तुम्हारे पाँच पुत्र उत्पन्न होंगे, जो पिता और माता दोनोंके तेजसे सम्पन्न होंगे ॥ ६८ ॥
अस्मत्समयवृद्धाश्च सलिलाभ्यन्तरेचराः ।
तव वंशे भविष्यन्ति पार्थिवाः कामरूपिणः ॥ ६९ ॥
'हमारे वरदानसे अनुगृहीत होकर तुम्हारे वंशके वे सभी राजा जलके भीतर विचरनेवाले तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ होंगे ॥ ६९ ॥
स वरं कन्यकाश्चैव लब्ध्वा यदुवरस्तदा ।
उदतिष्ठत वेगेन सलिलाच्चन्द्रमा इव ॥ ७० ॥
'वे श्रेष्ठ यदु उस समय वर और उन कन्याओंको पाकर चन्द्रमाके समान वेगपूर्वक जलसे ऊपर उठे ॥ ७० ॥
स पञ्चकन्यामध्यस्थो ददृशे तत्र पार्थिवः ।
पञ्चतारेण संयुक्को नक्षत्रेणेव चन्द्रमाः ॥ ७१ ॥
'पाँच कन्याओंके बीचमें स्थित हुए राजा यदु वहाँ पाँच
| विष्णुपर्व ] | सप्तत्रिंशोऽध्यायः | ३५१ |
|---|
ताराओंवाले नक्षत्रसे संयुक्त चन्द्रमाके समान दिखायी देते थे ॥ ७१ ॥
स तदन्तःपुरं सर्वं ददर्श नृपसत्तमः।
वैवाहिकेन वेषेण दिव्यस्रगनुलेपनः ॥ ७२ ॥
'वैवाहिक वेशसे युक्त तथा दिव्य हार एवं चन्दन धारण करनेवाले नृपश्रेष्ठ यदुने जलसे बाहर आकर अपने समस्त अन्तःपुरको वहाँ उपस्थित देखा ॥ ७२ ॥
समाश्वास्य च ताः सर्वाः सपत्नीः पावकोपमाः।
जगाम स्वपुरं राजा प्रीत्या परमया युतः ॥ ७३ ॥
'तदनन्तर अग्निके समान तेजस्विनी उन सारी पत्नियोंको आश्वासन देकर राजा यदु अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक उन सबके साथ अपने नगरको चले गये' ॥ ७३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि विकद्रुवाक्यं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें विकद्रुका वाक्यविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
अष्टात्रिंशोऽध्यायः
विकद्रुद्वारा यदुकी संततिका वर्णन तथा मथुरापुरीको जरासंधका आक्रमण सहनेके अयोग्य बताना
वैशम्पायन उवाच
स तासु नागकन्यासु कालेन महता नृपः।
जनयामास विक्रान्तान् पञ्च पुत्रान् कुलोद्वहान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! यदुने दीर्घकालके पश्चात् उन पाँचों नागकन्याओंके गर्भसे पाँच पराक्रमी एवं कुलका भार वहन करनेमे समर्थ पुत्र उत्पन्न किये ॥ १ ॥
मुचुकुन्दं महाबाहुं पद्मवर्णं तथैव च।
माधवं सारसं चैव हरितं चैव पार्थिवम् ॥ २ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—महाबाहु मुचुकुन्द, पद्मवर्ण, माधव, सारस तथा राजा हरित ॥ २ ॥
एतान् पञ्च सुतान् राजा पञ्चभूतोपमान् भुवि।
ईक्षमाणो नृपः प्रीतिं जगामातुलविक्रमः ॥ ३ ॥
ये पाँचों पुत्र भूतलपर पाँच भूतोंके समान थे । अतुल पराक्रमी राजा यदु इन्हे देखकर बहुत प्रसन्न होते थे ॥ ३ ॥
ते प्राप्तवयसः सर्वे स्थिताः पञ्च यथाद्रयः।
तेजिता बलदर्पाभ्यामूचुः पितरमग्रतः ॥ ४ ॥
जब वे सब वयस्क हुए, तब पाँच पर्वतोंके समान प्रतीत होने लगे। एक दिन अपने बल और दर्पसे प्रोत्साहित होकर वे अपने पिताके सामने खड़े हो इस प्रकार बोले—॥ ४ ॥
तात युक्ताः स्म वयसा बले महति संस्थिताः।
क्षिप्रमाज्ञाप्तुमिच्छामः किं कुर्मस्तव शासनात् ॥ ५ ॥
'तात ! अब हम बड़ी अवस्थाके हो गये, महान् बलमे हमारी स्थिति है (हम महान् बलवान् हैं); अतः शीघ्र आपकी आज्ञा चाहते हैं, बताइये, आपके आदेशसे हम कौन-सा कार्य करें'? ॥ ५ ॥
स तान् नृपतिशार्दूलः शार्दूलानिव वेगितान्।
प्रीत्या परमया प्राह सुतान् वीर्यकुतूहलात् ॥ ६ ॥
नरेशोमे सिंहके समान पराक्रमी यदुने सिंहोंके ही सदृश वेगशाली अपने इन पुत्रोसे उनके बल-पराक्रमको जाननेकी उत्सुकतासे अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक कहा—॥ ६ ॥
विन्ध्यर्क्षवन्तावभितो द्वे पुर्यौ पर्वताश्रये।
निवेशयतु यत्नेन मुंचुकुन्दः सुतो मम ॥ ७ ॥
'मेरा पुत्र मुचुकुन्द विन्ध्य और ऋक्षवान् पर्वतोंके निकट पर्वतीय भूमिका ही आश्रय ले यत्नपूर्वक दो पुरियाँ बसाये ॥ ७ ॥
सह्यस्य चोपरिष्टात्तु दक्षिणां दिशमाश्रितः।
पद्मवर्णोऽपि मे पुत्रो निवेशयतु मा चिरम् ॥ ८ ॥
'मेरा बेटा पद्मवर्ण भी दक्षिण दिशाका आश्रय ले सह्यपर्वतके शिखरपर शीघ्र एक नगर बसाये !॥ ८ ॥
तत्रैव परतः कान्ते देशे चम्पकभूषिते।
सारसो मे पुरं रम्यं निवेशयतु पुत्रकः ॥ ९ ॥
'वहीं पश्चिम दिशाकी ओर चम्पाके वृक्षोंसे सुशोभित मनोरम प्रदेशमे बेटा सारस एक रमणीय राजधानीकी स्थापना करे ॥ ९ ॥
हरितोऽयं महाबाहुः सागरे हरितोदके।
द्वीपं पन्नगराजस्य सुतो मे पालयिष्यति ॥ १० ॥
'मेरा पुत्र यह महाबाहु हरित हरे जलसे भरे हुए समुद्रमें नागराज धूम्रवर्णके द्वीपका पालन करेगा ॥ १० ॥
माधवो मे महाबाहुर्ज्येष्ठपुत्रश्च धर्मवित्।
यौवराज्येन संयुक्तः स्वपुरं पालयिष्यति ॥ ११ ॥
'मेरा पाँचवाँ पुत्र महाबाहु माधव ज्येष्ठ तथा धर्मज्ञ है, यह युवराज होकर अपने इसी नगरका (जो रैवतकके समीप है) पालन करेगा' ॥ ११ ॥
सर्वे नृपश्रियं प्राप्ता अभिषिक्ताः सचामराः।
पित्रानुशिष्टाश्चत्वारो लोकपालोपमा नृपाः ॥ १२॥