विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 357, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] चतुस्त्रिंशोऽध्यायः [ ३३५
ल्लास छा रहा था और वे मेरु पर्वतपर जानेवाले चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रतीत होते थे। वे महान् तेजसे सम्पन्न तथा देवेश्वरोंके समान मनोहर रूपधारी श्रीकृष्ण बलराम आयुधोंको अपने घरमें रखकर उस पुरीमे स्वेच्छानुसार विचरने लगे ॥४१-४२॥
मुमुदाते यदुवरौ वसुदेवसुतावुभौ।
उद्यानेषु विचित्रेषु फलपुष्पावनामिषु ॥ ४३ ॥
वसुदेवके वे दोनों पुत्र यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण-बलराम फल और फूलोंके भारसे झुके हुए वृक्षोंवाले विचित्र उद्यानोंमें सानन्द विचरते थे ॥ ४३ ॥
चेरतुः सुमहात्मानौ यादवैः परिवारितौ।
रैवतस्य समीपेपु सरित्सु विमलासु च ॥ ४४ ॥
पद्मपत्रविवृद्धासु कारण्डवयुतासु च।
यादवोंसे घिरे हुए वे दोनों महात्मा रैवतक पर्वतके समीपवर्ती प्रदेशोंमें तथा बढ़े हुए पद्म-पत्रोंसे युक्त एवं कारण्डव पक्षियोंके कलरवोंसे मुखरित निर्मल सरिताओंके तटोंपर भ्रमण करते थे ॥ ४४॥
एवं तावेकनिर्माणौ मथुरायां शुभाननौ।
उग्रसेनानुगौ भूत्वा कंचित् कालं मुमोदतुः ॥ ४५ ॥
वे दोनों भाई एक तत्त्वके बने हुए थे (एक ही सच्चिदानन्दघन परमात्मा इन दोनोंके रूपोंमे प्रकट हुए थे)। उन दोनोंके मुख बड़े ही सुन्दर एवं मङ्गलकारी थे। वे कुछ कालतक उग्रसेनका अनुसरण करते हुए मथुरामें बड़े सुखसे रहे ॥ ४५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रामकृष्णप्रत्यागमने त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीबलराम और कृष्णका मथुरामें प्रत्यागमनविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
जरासंधका अपनी विशाल सेनाके द्वारा आकर मथुरापुरीपर घेरा डालना
वैशम्पायन उवाच
स कृष्णस्तत्र सहितो रौहिणेयेन संगतः।
मथुरां यादवाकीर्णां पुरीं तां सुखमावसत् ॥ १ ॥
प्राप्तयौवनदेहस्तु युक्तो राजश्रिया विभुः।
चचार मथुरां प्रीतः स वनाकरभूषनाम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बलरामसहित श्रीकृष्ण यादवोंसे भरी हुई मथुरापुरीमें सुखपूर्वक रहने लगे। उनके श्रीअङ्गोंको युवावस्था प्राप्त हुई थी। वे भगवान् राजोचित शोभासे सुशोभित हो वन-प्रान्तोंसे विभूषित मथुरापुरीमे प्रसन्नतापूर्वक विचरते थे ॥ १-२ ॥
कस्यचित्त्वथ कालस्य राजा राजगृहेश्वरः।
शुश्राव निहतं कंसं दुहितृभ्यां महीपतिः ॥ ३ ॥
कुछ कालके अनन्तर राजगृहके स्वामी पृथ्वीपति राजा जरासंधने अपनी दोनों पुत्रियोंसे सुना कि 'कंस मारा गया'।
ततो नातिचिरात् कालाज्जरासंधः प्रतापवान्।
आजगाम षडङ्गेन बलेन महता वृतः ॥ ४ ॥
जिघांसुर्हि यदून् क्रुद्धः कंसस्यापचितिं स्मरन्।
यह दुःखद समाचार सुनकर प्रतापी जरासंध थोड़े ही दिनोंमे छः अङ्गोंसे युक्त अपनी विशाल सेनासे घिरा हुआ मथुरापुरीपर चढ़ आया। वह कंससे उऋण होनेकी बातका ध्यान रखकर कुपित हो समस्त यादवोंका विनाश कर डालना चाहता था ॥ ४॥
अस्तिः प्राप्तिश्च नाम्ना ते मागधस्य सुते नृप ॥ ५ ॥
जरासंधस्य कल्याण्यौ पीनश्रोणिपयोधरे।
उभे कंसस्य ते भार्ये प्रादाद् बार्हद्रथो नृपः ॥ ६ ॥
नरेश्वर ! मगधराज जरासंधके दो कल्याणमयी कन्याएँ थीं, जिनके नाम थे अस्ति और प्राप्ति। इन दोनोंके कटिप्रदेशके पिछले भाग स्थूल तथा उरोज पीन थे। बृहद्रथपुत्र जरासंधने अपनी वे दोनों कन्याएँ कंसको दे दी थीं। वे दोनों कंसकी पत्नियाँ थीं ॥ ५-६ ॥
स ताभ्यां मुमुदे राजा बद्ध्वा पितरमाहुकम्।
समाश्रित्य जरासंधमनादृत्य च यादवान्।
शूरसेनेश्वरो राजा यथा ते बहुशः श्रुतः ॥ ७ ॥
शूरसेनदेशका स्वामी कंस जरासंधका आश्रय ले यादवोंका अनादर करके अपने पिता उग्रसेनको कैद कर स्वयं ही राजा बन बैठा था और अपनी उन दोनों पत्नियोंके साथ आनन्द भोगने लगा था; जैसा कि तुमने बहुत बार सुना होगा ॥ ७॥
ज्ञातिकार्यार्थसिद्धयर्थमुग्रसेनहिते रतः।
वसुदेवोऽभवन्नित्यं कंसो न ममृषे च तम् ॥ ८ ॥
भाई-बन्धुओंके कार्य और प्रयोजनकी सिद्धिके लिये
- १. रथ, हाथी, घोडे, पैदल, पण्य धान्य (बिकाऊ अन्न) तथा आपणिक (विक्रेता व्यापारी)—ये सेनाके छः अङ्ग हैं।