भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 356

३३४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णने गदा और परिवके युद्धोंमें तथा सम्पूर्ण अस्त्रोंमें शीघ्र ही प्रमुखता प्राप्त कर ली। वे समस्त संसारके धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ माने जाने लगे ॥ २५ ॥

ततः सान्दीपनेः पुत्रं तद्रूपवयसं तदा । प्रादात् कृष्णः प्रतीतात्मा सह रत्नैरुदारधीः ॥ २६ ॥

उदारबुद्धिवाले श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्त होकर सान्दीपानिके पुत्रको उसी रूप और अवस्थामें रत्नोंके साथ उन्हें लौटा दिया॥ २६ ॥

चिरनष्टेन पुत्रेण काश्यः सान्दीपनिस्तदा । समेत्य मुमुदे राजन् पूजयन् रामकेशवौ ॥ २७ ॥

राजन् ! काशिदेशमें उत्पन्न हुए सान्दीपनिने चिरकालसे नष्ट हुए अपने पुत्रसे मिलकर बलराम और श्रीकृष्णकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए बड़े प्रसन्न हुए ॥ २७ ॥

कृतार्थौ तावुभौ वीरौ गुरुमामन्त्र्य सुव्रतौ । आयातौ मथुरां भूयो वसुदेवसुतावुभौ ॥ २८ ॥

उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे दोनों वीर वसुदेवपुत्र अस्त्र-विद्याकी शिक्षा पाकर गुरुकी आज्ञा ले पुनः मथुरापुरीको लौट आये ॥ २८ ॥

ततः प्रत्युद्ययुः सर्वे यादवा यदुनन्दनौ । सबला हृष्टमनस उग्रसेनपुरोगमाः ॥ २९ ॥

उस समय उग्रसेन आदि समस्त यादवोंने प्रसन्नचित्त होकर सेनासहित आगे जा उन दोनों यदुनन्दन वीरोंकी अगवानी की ॥ २९ ॥

श्रेण्यः प्रकृतयश्चैव मन्त्रिणः सपुरोहिताः । सबालवृद्धा सा चैव पुरी समभिवर्तत ॥ ३० ॥

व्यवसायीवर्ग, प्रजावर्ग अथवा प्रकृतिमण्डल, मन्त्री, पुरोहित तथा बालकों और वृद्धोंसहित वह सारी पुरी (श्रीकृष्ण-बलरामके दर्शनके लिये) उमड़ पड़ी ॥ ३० ॥

नन्दितूर्याण्यवाद्यन्त तुष्टुवुश्च जनार्दनम् । रथ्याः पताकामालिन्यो भ्राजन्ते स्म समन्ततः ॥ ३१ ॥

आनन्दसूचक बाजे बजने लगे। सब लोग श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे। मथुरापुरीकी गलियाँ और सड़कें ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत हो सब ओरसे सुशोभित होने लगीं ॥ ३१ ॥

प्रहृष्टमुदितं सर्वमन्तःपुरमशोभत । गोविन्दागमनेऽत्यर्थं यथैवेन्द्रमहे तथा ॥ ३२ ॥

गोविन्दके आगमनसे इन्द्रोत्सवके समान सारे नगर और अन्तःपुरमें अत्यन्त हर्ष एवं आनन्द छा गया। उसकी शोभा बढ़ गयी ॥ ३२ ॥

मुदिताश्चाथ गायन्ति राजमार्गेषु गायकाः । तत्रासीत् प्रथिता गाथा यादवानां प्रियङ्करा ॥ ३३ ॥

गोविन्दरामौ सम्प्राप्तौ भ्रातरौ लोकविश्रुतौ । स्वे पुरे निर्भयाः सर्वे क्रीडध्वं सह बान्धवैः ॥ ३४ ॥

राजमार्गोंपर बहुतेरे गायक आनन्दित होकर गीत गाने लगे। उस समय यादवोंको प्रिय लगनेवाली यह गाथा वहाँ सब ओर कही-सुनी जाने लगी—'नागरिको ! विश्वविख्यात वीर श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाई मथुरामें आ पहुँचे हैं। अब तुम सब लोग निर्भय हो अपने नगरमें बन्धु-बान्धवोंके साथ क्रीड़ा करो' ॥ ३३-३४ ॥

न तत्र कश्चिद् दीनो वा मलिनो वा विचेतनः । मथुरायामभूद् राजन् गोविन्दे समुपस्थिते ॥ ३५ ॥

राजन् ! गोविन्दके मथुरामे उपस्थित होनेपर वहाँ न तो कोई दीन था, न मलिन था और न चेतनासे शून्य ही था ॥ ३५ ॥

वयांसि साधुवाक्यानि प्रहृष्टा गोहयद्विपाः । नरनारीगणाः सर्वे भेजिरे मनसः सुखम् ॥ ३६ ॥

पक्षी मीठी-मीठी बोली बोलते थे। गाय, बैल, घोड़े, हाथी हृष्ट-पुष्ट रहते थे और पुरुषों तथा स्त्रियोंके सभी समुदाय मनमें सुखका अनुभव करते थे ॥ ३६ ॥

शिवाश्च वाताः प्रववुरिवरजस्का दिशो दश । दैवतानि च हृष्टानि सर्वेष्वायतनेषु च ॥ ३७ ॥

शीतल सुखद हवा चलती थी। दसों दिशाओंमें धूल नहीं उड़ती थी और सभी मन्दिरोंमे हर्षपूर्वक देवता निवास करते थे ॥ ३७ ॥

यानि लिङ्गानि लोकस्य चासन् कृतयुगे पुरा । तानि सर्वाण्यदृश्यन्त पुरीं प्राप्ते जनार्दने ॥ ३८ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके मथुरापुरीको लौट आनेपर वहाँ सारे चिह्न वैसे ही दिखायी देने लगे, जो सत्ययुगके समय पहले जगत्में प्रकट होते थे ॥ ३८ ॥

ततः काले शिवे पुण्ये स्यन्दनेनारिमर्दनः । हरियुक्तेन गोविन्दो विवेश मथुरां पुरीम् ॥ ३९ ॥

तदनन्तर मङ्गलमयी पुण्यवेलामें शत्रुमर्दैन भगवान् गोविन्दने घोड़े जुते हुए रथपर बैठकर मथुरापुरीमें प्रवेश किया ॥ ३९ ॥

विशन्तं मथुरां रम्यां तमुपेन्द्रमरिंदमम् । अनुजग्मुर्यदुगणाः शक्रं देवगणा इव ॥ ४० ॥

रमणीय मथुरापुरीमे प्रवेश करते समय समस्त यादव उन शत्रुदमन उपेन्द्र श्रीकृष्णके पीछे-पीछे उसी प्रकार चले, जैसे देवता देवेन्द्रका अनुसरण करते हैं ॥ ४० ॥

वसुदेवस्य भवनं ततस्तौ यदुनन्दनौ । प्रविष्टौ हृष्टवदनौ चन्द्रादित्याविवाचलम् ॥ ४१ ॥ परेण तेजसोपेतौ सुरेन्द्राविव रूपिणौ । तावायुधानि विन्यस्य गृहे स्वे स्वैरचारिणौ ॥ ४२ ॥

तदनन्तर यदुकुलको आनन्दित करनेवाले वे दोनों बन्धु वसुदेवके भवनमें प्रविष्ट हुए। उस समय उनके मुखपर हर्षो-