भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 358

३३६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे वसुदेवजी सदा उग्रसेनके हितमें तत्पर रहते थे; किंतु कंस सांकृति, केशिक, राजा भीष्मक तथा धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ उनके इस बर्तावको सहन नहीं कर पाता था ॥ ८ ॥ भीष्मकपुत्र रुक्मी, जो महासमरमें श्रीकृष्ण और अर्जुनके साथ रामकृष्णौ समाश्रित्य हते कंसे दुरात्मनि । लड़नेका हौसला रखता था ॥ १३-१५ ॥ उग्रसेनोऽभवद् राजा भोजवृष्ण्यन्धकैर्वृतः ॥ ९ ॥ वेणुदारिः श्रुतर्वा च क्रथश्चैवांशुमानपि । बलराम और श्रीकृष्णसे भिड़कर जब दुरात्मा कंस मारा अङ्गराजश्च बलवान् वङ्गानामधिपस्तथा ॥ १६ ॥ गया, तब भोज, वृष्णि और अन्धकवंशी यादवोंसे घिरे हुए कौसल्यः काशिराजश्च दशार्णाधिपतिस्तथा । उग्रसेन स्वयं राजा हुए ॥ ९ ॥ सुखेश्वरश्च विक्रान्तो विदेहाधिपतिस्तथा ॥ १७ ॥ दुहितृभ्यां जरासंधः प्रियाभ्यां बलवान् नृपः । मद्रराजश्च बलवांस्त्रिगर्तानामथेश्वरः । नोदितो वीरपत्नीभ्यामुपायान्मथुरां ततः ॥ १० ॥ शाल्वराजश्च विक्रान्तो दरदश्च महाबलः ॥ १८ ॥ तदनन्तर अपनी दोनों प्रिय पुत्रियोंसे, जो वीर कंसकी यवनाधिपतिश्चैव भगदत्तश्च वीर्यवान् । पत्नियां थीं, प्रेरित होकर बलवान् राजा जरासंधने मथुरापर सौवीरराजः शैव्यश्च पाण्ड्यश्च वलिनां वरः ॥ १९ ॥ आक्रमण किया ॥ १० ॥ गान्धारराजः सुबलो नग्नजिच्च महाबलः । कृत्वा सर्वं समुद्योगं क्रोधादग्निसमो ज्वलन् । काश्मीरराजो गोनर्दो दरदाधिपतिर्नृपः । प्रतापावन्तो ये च जरासंधस्य पार्थिवाः ॥ ११ ॥ दुर्योधनादयश्चैव धार्तराष्ट्रा महाबलाः ॥ २० ॥ मित्राणि ज्ञातयश्चैव संयुक्ताः सुहृदस्तथा । एते चान्ये च राजानो बलवन्तो महारथाः । तमेवानुययुः सर्वैः सैन्यैः समुदितैर्वृताः ॥ १२ ॥ तमन्वयुर्जरासंधं विद्धिषन्तो जनार्दनम् ॥ २१ ॥ वह क्रोधसे अग्निके समान जल रहा था। उसने सब वेणुदारि, श्रुतर्वा, क्रथ, अंशुमान्, बलवान् अङ्गराज, प्रकारसे पूरा उद्योग करके चढ़ाई की थी। जरासंधके प्रतापसे वङ्गनरेश, कोसलनरेश, काशिराज, दशार्णदेशके अधिपति, नतमस्तक हुए जो-जो राजा थे तथा जो उसके मित्र, भाई- पराक्रमी सुखेश्वर, विदेहराज, बलवान् मद्रराज (शल्य), बन्धु, मिलने-जुलनेवाले और सुहृद् थे, उन सबने अपनी त्रिगर्तदेशका शासक सुशर्मा, पराक्रमी शाल्वराज, महाबली सारी सेनाओंके साथ जरासंधका ही अनुसरण किया ॥११-१२॥ दरद, यवनोंका राजा पराक्रमी भगदत्त, सौवीरदेशका राजा, महेष्वासा महावीर्या जरासंधप्रियैषिणः । शैव्य, बलवानोंमें श्रेष्ठ पाण्ड्य, गान्धारराज सुबल, महाबली कारूषो दन्तवक्त्रश्च चेदिराजश्च वीर्यवान् ॥ १३ ॥ नग्नजित्, काश्मीरराज गोनर्द, दरददेशके अधिपति, कलिङ्गाधिपतिश्चैव पौण्ड्रश्च बलिनां वरः । धृतराष्ट्रके महाबली पुत्र दुर्योधन आदि—ये तथा और भी सांकृतिः कैशिकश्चैव भीष्मकश्च नराधिपः ॥ १४ ॥ बलवान् महारथी राजा श्रीकृष्णसे द्वेष रखते हुए जरासंधके पुत्रश्च भीष्मकस्यापि रुक्मी मुख्यो धनुर्भृताम् । साथ आये थे ॥ १६–२१ ॥ वासुदेवार्जुनाभ्यां यः स्पर्धते स महाहवे ॥ १५ ॥ ते शूरसेनानाविश्य प्रभूतयवसेन्धनान् । वे महाधनुर्धर तथा महापराक्रमी नरेशगण जरासंधका ऊषुः संरुध्य मथुरां पुरस्कृत्य बलं तदा ॥ २२ ॥ ही प्रिय चाहनेवाले थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—करूष वे शूरसेनदेशमें, जहाँ दाना-घास और लकड़ीकी देशका राजा दन्तवक्त्र, पराक्रमी चेदिराज शिशुपाल, कलिङ्ग- बहुतायत थी, आकर अपनी-अपनी सेनाओंको आगे करके देशका राजा श्रुतायु, बलवानोंमें श्रेष्ठ पौण्ड्रक (वासुदेव), मथुरापर घेरा डालकर रहने लगे ॥ २२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि मथुरोपरोधे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥ इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें जरासंधकी सेनाद्वारा मथुरापर घेराविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः जरासंधकी सेनाका वर्णन, उसकी चारों दिशाओंसे मथुरापुरीपर आक्रमणकी योजना, यादवोंके साथ जरासंधकी सेनाका युद्ध, श्रीकृष्ण और बलरामके पराक्रमसे उसकी सेनाका पलायन, जरासंधद्वारा अपने सैनिकोंको प्रोत्साहन तथा उभय-पक्षके वीरोंमें घमासान युद्ध वैशम्पायन उवाच वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वे सब नरेश मथुरोपवने गत्वा निविष्टांस्तान् नराधिपान् । मथुराके उपवनमे पहुँचकर छावनी डाले हुए थे। वहाँ समस्त अपश्यन् वृष्णयः सर्वे पुरस्कृत्य जनार्दनम् ॥ १ ॥ वृष्णिवंशियोंने श्रीकृष्णको आगे करके उन्हें देखा ॥ १ ॥