विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 359, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ३३७
ततो हृष्टमनाः कृष्णो रामं वचनमब्रवीत् ।
त्वरते खलु कार्यार्थो देवतानां न संशयः ॥ २ ॥
तब श्रीकृष्णने मन-ही-मन प्रसन्न होकर बलरामजीसे कहा—'आर्य ! देवताओंका कार्य एवं प्रयोजन शीघ्र ही सिद्ध होना चाहता है—इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥
यथायं संनिकृष्टो हि जरासंधो नराधिपः ।
लक्ष्यन्ते हि ध्वजाग्राणि रथानां वातरंहसाम् ॥ ३ ॥
'तभी तो यह राजा जरासंध स्वयं ही हमारे निकट आ पहुँचा । यह वायुके समान वेगशाली रथोंकी ध्वजाओंके अग्रभाग दिखायी दे रहे हैं ॥ ३ ॥
एतानि शशिकल्पानि नृपाणां विजिगीषताम् ।
छत्राण्यार्य विराजन्ते प्रोच्छ्रितानि सितानि च ॥ ४ ॥
'भैया ! विजयकी इच्छासे आये हुए राजाओंके ये चन्द्रमा-जैसे श्वेत एवं ऊँचे-ऊँचे छत्र शोभा पा रहे हैं ॥४॥
अहो नृपरथोदग्रा विमलाश्छत्रपङ्क्तयः ।
अभिवर्तन्ति नः शुभ्रा यथा खे हंसपङ्क्तयः ॥ ५ ॥
'अहो ! राजाओके रथोंपर ऊँची-ऊँची निर्मल एवं शुभ्र छत्र-पंक्तियाँ आकाशमे हंसकी पाँतोके समान शोभा पाती हुई हमारे निकट आ रही है ॥ ५ ॥
काले खलु नृपः प्राप्तो जरासंधो महीपतिः ।
आवयोर्युद्धनिकषः प्रथमः समरातिथिः ॥ ६ ॥
'पृथ्वीपति जरासंध ठीक समयपर आ पहुँचा है। यह हम दोनोंके युद्धकी कसौटी तथा समराङ्गणका पहला अतिथि है ॥ ६ ॥
आर्य तिष्ठाव सहितावनुप्राप्ते महीपतौ ।
युद्धारम्भः प्रयोक्तव्यो बलं तावद्विमृश्यताम् ॥ ७ ॥
'आर्य ! उस राजाके आ जानेपर हम दोनो साथ ही रहे। युद्धका आरम्भ पीछे होगा । पहले उसकी सेना कितनी है, इसका विचार कर ले' ॥ ७ ॥
एवमुक्त्वा ततः कृष्णः स्वस्थः संग्रामलालसः ।
जरासंधबलं प्रेप्सुश्चकार बलदर्शनम् ॥ ८ ॥
ऐसा कहकर श्रीकृष्ण स्वस्थ-चित्तसे संग्रामकी लालसा रखकर जरासंधकी शक्तिका पता लगानेके लिये उसकी सेनाका निरीक्षण करने लगे ॥ ८ ॥
वीक्षमाणश्च तान् सर्वान् नृपान् यदुवरोऽव्ययः ।
आत्मनैवात्मनो वाक्यमुवाच हृदि मन्त्रवित् ॥ ९ ॥
अविनाशी यदुकुलतिलक मन्त्रवेत्ता श्रीकृष्ण उन सब राजाओंको देखकर अपने-आप ही मनमें इस प्रकार कहने लगे—॥ ९ ॥
इमे ते पृथिवीपालाः पार्थिवे वर्त्मनि स्थिताः ।
ये विनाशं गमिष्यन्ति शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ १० ॥
'ये हैं वे भूपाल, जो राजोचित मार्गपर स्थित हैं और शास्त्रोक्त विधिमे विनाशको प्राप्त होनेवाले हैं ॥ १० ॥
प्रोक्षितान् खल्विमान् मन्ये मृत्युना नृपपुङ्गवान् ।
स्वर्गगामीनि चाप्येषां वपूंषि प्रचकाशिरे ॥ ११॥
'मैं समझता हूँ कि मृत्युने रण-यज्ञकी आहुति बनानेके लिये इन श्रेष्ठ नरेशोंका प्रोक्षण किया है। इनके स्वर्गगामी शरीर भी प्रकाशित हो उठे हैं ॥ ११ ॥
स्थाने भारपरिश्रान्ता वसुधेयं दिवं गता ।
एषां नृपाणां मुख्यानां बलौघैरभिपीडिता ॥ १२ ॥
'यह पृथ्वी इन मुख्य-मुख्य नरेशोंके सैन्य-समुदायसे पीड़ित हो महान् भारसे थककर जो देवलोकमे गयी थी, वह इसका जाना उचित ही था ॥ १२ ॥
मही निरन्तरा चेयं बलराश्राभिसंवृता ।
स्वल्पेन खलु कालेन विविक्तं पृथिवीतलम् ॥ १३ ॥
भविष्यति नरेन्द्रौघैः शतशो विनिपातितैः ।
'इन राजाओके सैन्य-समुदायसे आवृत होकर यहाँकी भूमि ठसाठस भर गयी है। कहीं थोड़ा सा भी अवकाश नहीं रह गया है; परंतु थोड़े ही समयमें जब ये सैकड़ो नरेश सैन्यसहित मार गिराये जायेंगे, तब यह भूतल निर्जन-सा हो जायगा' ॥
वैशम्पायन उवाच
जरासंधस्ततः क्रुद्धः प्रभुः सर्वमहीक्षिताम् ॥ १४ ॥
नरधिपसहस्रौघैरनुयातो महाद्युतिः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर समस्त राजाओंका स्वामी महातेजस्वी जरासंध कुपित हो सहस्रों नरेश-समुदायोके साथ आगे बढ़ा ॥ १४ ½ ॥
व्यायतोद्रथतुरगैः सुयानैः सुसमाहितैः ॥ १५ ॥
रथैः सांग्रामिकैर्युक्तैरसङ्गतिभिः क्वचित् ।
कहीं सुन्दर ढंगसे सुसज्जित सुन्दर वाहन, रथ युद्धोपयोगी सामग्रियोंसे सम्पन्न थे। उनमें विशाल एवं प्रचण्ड वेगवाले अश्व जुते हुए थे। उन रथोंकी गति कहीं भी अवरुद्ध नहीं होती थी ( ऐसे रथोंद्वारा रथी योद्धा युद्धके लिये आगे बढ़ रहे थे ) ॥ १५ ½ ॥
हेमकक्षैर्महाघण्टैर्वारणैर्वारिदोपमैः ॥ १६ ॥
महामात्रोत्तमारूढैः कल्पितै रणकोविदैः ।
कहीं बहुसंख्यक हाथी चल रहे थे, जिन्हें सोनेकी जंजीरों-से कसा गया था। उनके दोनो ओर बड़े-बड़े घण्टे लटक रहे थे। वे हाथी काले मेघोंके समान प्रतीत होते थे। उनके ऊपर अच्छे महावत बैठे थे तथा रणकुशल योद्धाओंद्वारा उन्हे सुसज्जित किया गया था ( उन हाथियोंद्वारा गजारोही योद्धा आगे बढ़ रहे थे ) ॥ १६ ½ ॥
स्वारूढैः सादिभिर्युक्तैः प्रेङ्खमाणैः प्रवलिगतैः ॥ १७ ॥