विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 360, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३३८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
वाजिभिर्वायुसंकाशैः प्लवद्भिरिव पत्रिभिः।
कुछ घुड़सवार योद्धा घोड़ोंपर अच्छी तरहसे सवार थे। उनके वे घोड़े वायुके समान वेगशाली थे और उछलते-कूदते हुए आगे बढ़ते समय आकाशमें उड़ते हुए पक्षियोंके समान प्रतीत होते थे॥ १७३ ॥
खड्गचर्मधरोदग्रैः पत्तिभिर्बलिनां वरैः ॥ १८॥
सहस्रसंख्यासंयुक्तैरुत्पतद्भिरिवोरगैः ।
बलवानोंमें श्रेष्ठ पैदल सैनिक भी ढाल और तलवार लिये प्रचण्ड रूप धारण करके आगे बढ़ते थे। वे हजार-हजारकी टोलियोंमें एक साथ चलते थे और उछलते हुए सर्पोंके समान दिखायी देते थे ॥ १८३ ॥
एवं चतुर्विधैः सैन्यैः कम्पमानैरिवाम्बुदैः ॥ १९ ॥
नृपः प्रयातो बलवाञ्जरासंधो धृतव्रतः ।
इस प्रकार मँडराते हुए बादलोंके समान चतुरङ्गिणी सेनाएँ साथ लेकर वीरव्रतको धारण करनेवाला बलवान् राजा जरासंध युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था ॥ १९३ ॥
स रथैर्मेघनिर्घोषैर्गजैश्च मदसंयुतैः ॥ २० ॥
हेषमाणैश्च तुरगैः क्ष्वेडमानैश्च पत्तिभिः ।
नादयन्तो दिशः सर्वास्तस्याः पुर्या वनानि च ॥ २१ ॥
वह मेघके समान गम्भीर घर्घर घोष करनेवाले रथों, चिग्घाड़ते हुए मतवाले हाथियों, हिनहिनाते हुए घोड़ों तथा गर्जते हुए पैदल सैनिकोंद्वारा उस पुरीकी सम्पूर्ण दिशाओं तथा वनोंको कोलाहलपूर्ण बनाता हुआ आ रहा था ॥२०-२१॥
स राजा सागराकारः ससैन्यः प्रत्यदृश्यत ।
तद्वलं पृथिवीशानां हृष्टयोधजनाकुलम् ॥ २२ ॥
सेनाके साथ आता हुआ राजा जरासंध विशाल समुद्रके समान दिखायी देता था। भूमिपालोंकी वह सेना हृष्ट-पुष्ट योद्धाओंसे परिपूर्ण थी ॥ २२ ॥
क्ष्वेडितास्फोटितरवं मेघसैन्यमिवावभौ ।
रथैः पवनसम्पातैर्गजैश्च जलदोपमैः ।
तुरगैश्च जवोपेतैः पत्तिभिः खगमोपमैः ॥ २३ ॥
विमिश्रं सर्वतो भाति मत्तद्विपसमाकुलम् ।
घर्मान्ते सागरगतं यथाभ्रपटलं तथा ॥ २४ ॥
गर्जने और ताल ठोंकनेकी गम्भीर ध्वनिसे वह मेघोंकी गर्जती हुई घटाके समान प्रतीत होती थी। वायुके समान शीघ्रगामी रथों, मेघोंके सदृश दिखायी देनेवाले हाथियों, वेगशाली घोड़ों तथा आकाशचारी पक्षियोंके समान जान पड़नेवाले पैदल सैनिकोंसे मिश्रित हुई उस सेनाकी सब ओरसे बड़ी शोभा हो रही थी। मतवाले हाथियोंसे व्याप्त हुई वह विशाल वाहिनी वर्षा-ऋतुमे समुद्रके भीतर लक्षित होनेवाले मेघोंके समूहकी शोभा धारण करती थी ॥ २३-२४ ॥
सबलास्ते महीपाला जरासंधपुरोगमाः ।
परिवार्य पुरीं सर्वे निवेशायोपचक्रिरे ॥ २५ ॥
वे जरासंध आदि समस्त भूपाल अपनी सेनाके साथ मथुरापुरीको चारों ओरसे घेरकर छावनी डालनेकी तैयारी करने लगे ॥ २५ ॥
वभौ तस्य निविष्टस्य बलश्रीः शिविरस्य वै ।
शुक्लपर्यन्तपूर्णस्य यथा रूपं महोदधेः ॥ २६ ॥
वहाँ डेरा डाले हुए जरासंधके सैनिक-शिविरोंकी शोभा वैसी ही प्रतीत होती थी, जैसा कि शुक्लपक्षकी पूर्णिमाको अपनी उत्ताल तरङ्गोंसे परिपूर्ण हुए महासागरका रूप देखनेमें आता है ॥ २६ ॥
वीतरात्रे ततः काले समुत्तस्थुर्महीक्षितः ।
आरोहणार्थं पुर्यास्ते समीयुर्युद्धलालसाः ॥ २७ ॥
तदनन्तर रात बीतनेपर प्रातःकाल सब राजा उठे और युद्धकी लालसासे मथुरापुरीपर चढ़ाई करनेके लिये एकत्र होने लगे ॥ २७ ॥
समवायीकृताः सर्वे यमुनामनु ते नृपाः ।
निविष्टा मन्त्रयामासुर्युद्धकालकुतूहलाः ॥ २८ ॥
यमुनाके किनारे एकत्र होकर वे सभी नरेश बैठे और युद्धके शुभ अवसरके लिये उत्सुक हो आपसमें मन्त्रणा करने लगे ॥ २८ ॥
तेषां सुतुमुलः शब्दः शुश्रुवे पृथिवीक्षिताम् ।
युगान्ते भिद्यमानानां सागराणामिव स्वनः ॥ २९ ॥
सेनासहित उन नरेशोंकी तुमुल ध्वनि प्रलयकालमें मर्यादाको तोड़कर बहनेवाले समुद्रोंकी भयंकर गर्जनाके समान सुनायी देती थी ॥ २९ ॥
तेषां सकञ्चुकोष्णीषाः स्थविरा वेत्रपाणयः ।
चेरुर्मा शब्द इत्येवं वदन्तो राजशासनात् ॥ ३० ॥
उन राजाओंके छड़ीदार बूढ़े सिपाही चोगा और पगड़ी धारण किये तथा हाथमें बेंत लिये राजाज्ञासे यह कहते हुए विचरने लगे कि 'सब लोग मौन रहें। कोई एक शब्द भी न बोले' ॥ ३० ॥
तस्य रूपं बलस्यासीन्निःशब्दस्तिमितस्य वै ।
लीनमीनग्रहस्येव निःशब्दस्य यथोदधेः ॥ ३१ ॥
उस समय नीरव और निश्चल हुए उस सैन्यसमूहका रूप जिसके मत्स्य और ग्राह विलीन हो गये हों उस शब्दहीन शान्त महासागरके समान प्रतीत होता था ॥ ३१ ॥
निःशब्दस्तिमिते तस्मिन् योगादिव महार्णवे ।
जरासंधो वृहद् वाक्यं वृहस्पतिरिवाददे ॥ ३२ ॥
उस सैन्य-समुद्रके मानो योगबलसे सहसा नीरव तथा