भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

विष्णुपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ३३७

ततो हृष्टमनाः कृष्णो रामं वचनमब्रवीत् ।
त्वरते खलु कार्यार्थो देवतानां न संशयः ॥ २ ॥
तब श्रीकृष्णने मन-ही-मन प्रसन्न होकर बलरामजीसे कहा—'आर्य ! देवताओंका कार्य एवं प्रयोजन शीघ्र ही सिद्ध होना चाहता है—इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥

यथायं संनिकृष्टो हि जरासंधो नराधिपः ।
लक्ष्यन्ते हि ध्वजाग्राणि रथानां वातरंहसाम् ॥ ३ ॥
'तभी तो यह राजा जरासंध स्वयं ही हमारे निकट आ पहुँचा । यह वायुके समान वेगशाली रथोंकी ध्वजाओंके अग्रभाग दिखायी दे रहे हैं ॥ ३ ॥

एतानि शशिकल्पानि नृपाणां विजिगीषताम् ।
छत्राण्यार्य विराजन्ते प्रोच्छ्रितानि सितानि च ॥ ४ ॥
'भैया ! विजयकी इच्छासे आये हुए राजाओंके ये चन्द्रमा-जैसे श्वेत एवं ऊँचे-ऊँचे छत्र शोभा पा रहे हैं ॥४॥

अहो नृपरथोदग्रा विमलाश्छत्रपङ्क्तयः ।
अभिवर्तन्ति नः शुभ्रा यथा खे हंसपङ्क्तयः ॥ ५ ॥
'अहो ! राजाओके रथोंपर ऊँची-ऊँची निर्मल एवं शुभ्र छत्र-पंक्तियाँ आकाशमे हंसकी पाँतोके समान शोभा पाती हुई हमारे निकट आ रही है ॥ ५ ॥

काले खलु नृपः प्राप्तो जरासंधो महीपतिः ।
आवयोर्युद्धनिकषः प्रथमः समरातिथिः ॥ ६ ॥
'पृथ्वीपति जरासंध ठीक समयपर आ पहुँचा है। यह हम दोनोंके युद्धकी कसौटी तथा समराङ्गणका पहला अतिथि है ॥ ६ ॥

आर्य तिष्ठाव सहितावनुप्राप्ते महीपतौ ।
युद्धारम्भः प्रयोक्तव्यो बलं तावद्विमृश्यताम् ॥ ७ ॥
'आर्य ! उस राजाके आ जानेपर हम दोनो साथ ही रहे। युद्धका आरम्भ पीछे होगा । पहले उसकी सेना कितनी है, इसका विचार कर ले' ॥ ७ ॥

एवमुक्त्वा ततः कृष्णः स्वस्थः संग्रामलालसः ।
जरासंधबलं प्रेप्सुश्चकार बलदर्शनम् ॥ ८ ॥
ऐसा कहकर श्रीकृष्ण स्वस्थ-चित्तसे संग्रामकी लालसा रखकर जरासंधकी शक्तिका पता लगानेके लिये उसकी सेनाका निरीक्षण करने लगे ॥ ८ ॥

वीक्षमाणश्च तान् सर्वान् नृपान् यदुवरोऽव्ययः ।
आत्मनैवात्मनो वाक्यमुवाच हृदि मन्त्रवित् ॥ ९ ॥
अविनाशी यदुकुलतिलक मन्त्रवेत्ता श्रीकृष्ण उन सब राजाओंको देखकर अपने-आप ही मनमें इस प्रकार कहने लगे—॥ ९ ॥

इमे ते पृथिवीपालाः पार्थिवे वर्त्मनि स्थिताः ।
ये विनाशं गमिष्यन्ति शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ १० ॥
'ये हैं वे भूपाल, जो राजोचित मार्गपर स्थित हैं और शास्त्रोक्त विधिमे विनाशको प्राप्त होनेवाले हैं ॥ १० ॥

प्रोक्षितान् खल्विमान् मन्ये मृत्युना नृपपुङ्गवान् ।
स्वर्गगामीनि चाप्येषां वपूंषि प्रचकाशिरे ॥ ११॥
'मैं समझता हूँ कि मृत्युने रण-यज्ञकी आहुति बनानेके लिये इन श्रेष्ठ नरेशोंका प्रोक्षण किया है। इनके स्वर्गगामी शरीर भी प्रकाशित हो उठे हैं ॥ ११ ॥

स्थाने भारपरिश्रान्ता वसुधेयं दिवं गता ।
एषां नृपाणां मुख्यानां बलौघैरभिपीडिता ॥ १२ ॥
'यह पृथ्वी इन मुख्य-मुख्य नरेशोंके सैन्य-समुदायसे पीड़ित हो महान् भारसे थककर जो देवलोकमे गयी थी, वह इसका जाना उचित ही था ॥ १२ ॥

मही निरन्तरा चेयं बलराश्राभिसंवृता ।
स्वल्पेन खलु कालेन विविक्तं पृथिवीतलम् ॥ १३ ॥
भविष्यति नरेन्द्रौघैः शतशो विनिपातितैः ।
'इन राजाओके सैन्य-समुदायसे आवृत होकर यहाँकी भूमि ठसाठस भर गयी है। कहीं थोड़ा सा भी अवकाश नहीं रह गया है; परंतु थोड़े ही समयमें जब ये सैकड़ो नरेश सैन्यसहित मार गिराये जायेंगे, तब यह भूतल निर्जन-सा हो जायगा' ॥

वैशम्पायन उवाच

जरासंधस्ततः क्रुद्धः प्रभुः सर्वमहीक्षिताम् ॥ १४ ॥
नरधिपसहस्रौघैरनुयातो महाद्युतिः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर समस्त राजाओंका स्वामी महातेजस्वी जरासंध कुपित हो सहस्रों नरेश-समुदायोके साथ आगे बढ़ा ॥ १४ ½ ॥

व्यायतोद्रथतुरगैः सुयानैः सुसमाहितैः ॥ १५ ॥
रथैः सांग्रामिकैर्युक्तैरसङ्गतिभिः क्वचित् ।
कहीं सुन्दर ढंगसे सुसज्जित सुन्दर वाहन, रथ युद्धोपयोगी सामग्रियोंसे सम्पन्न थे। उनमें विशाल एवं प्रचण्ड वेगवाले अश्व जुते हुए थे। उन रथोंकी गति कहीं भी अवरुद्ध नहीं होती थी ( ऐसे रथोंद्वारा रथी योद्धा युद्धके लिये आगे बढ़ रहे थे ) ॥ १५ ½ ॥

हेमकक्षैर्महाघण्टैर्वारणैर्वारिदोपमैः ॥ १६ ॥
महामात्रोत्तमारूढैः कल्पितै रणकोविदैः ।
कहीं बहुसंख्यक हाथी चल रहे थे, जिन्हें सोनेकी जंजीरों-से कसा गया था। उनके दोनो ओर बड़े-बड़े घण्टे लटक रहे थे। वे हाथी काले मेघोंके समान प्रतीत होते थे। उनके ऊपर अच्छे महावत बैठे थे तथा रणकुशल योद्धाओंद्वारा उन्हे सुसज्जित किया गया था ( उन हाथियोंद्वारा गजारोही योद्धा आगे बढ़ रहे थे ) ॥ १६ ½ ॥

स्वारूढैः सादिभिर्युक्तैः प्रेङ्खमाणैः प्रवलिगतैः ॥ १७ ॥

३३८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


वाजिभिर्वायुसंकाशैः प्लवद्भिरिव पत्रिभिः।
कुछ घुड़सवार योद्धा घोड़ोंपर अच्छी तरहसे सवार थे। उनके वे घोड़े वायुके समान वेगशाली थे और उछलते-कूदते हुए आगे बढ़ते समय आकाशमें उड़ते हुए पक्षियोंके समान प्रतीत होते थे॥ १७३ ॥

खड्गचर्मधरोदग्रैः पत्तिभिर्बलिनां वरैः ॥ १८॥
सहस्रसंख्यासंयुक्तैरुत्पतद्भिरिवोरगैः ।
बलवानोंमें श्रेष्ठ पैदल सैनिक भी ढाल और तलवार लिये प्रचण्ड रूप धारण करके आगे बढ़ते थे। वे हजार-हजारकी टोलियोंमें एक साथ चलते थे और उछलते हुए सर्पोंके समान दिखायी देते थे ॥ १८३ ॥

एवं चतुर्विधैः सैन्यैः कम्पमानैरिवाम्बुदैः ॥ १९ ॥
नृपः प्रयातो बलवाञ्जरासंधो धृतव्रतः ।
इस प्रकार मँडराते हुए बादलोंके समान चतुरङ्गिणी सेनाएँ साथ लेकर वीरव्रतको धारण करनेवाला बलवान् राजा जरासंध युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था ॥ १९३ ॥

स रथैर्मेघनिर्घोषैर्गजैश्च मदसंयुतैः ॥ २० ॥
हेषमाणैश्च तुरगैः क्ष्वेडमानैश्च पत्तिभिः ।
नादयन्तो दिशः सर्वास्तस्याः पुर्या वनानि च ॥ २१ ॥
वह मेघके समान गम्भीर घर्घर घोष करनेवाले रथों, चिग्घाड़ते हुए मतवाले हाथियों, हिनहिनाते हुए घोड़ों तथा गर्जते हुए पैदल सैनिकोंद्वारा उस पुरीकी सम्पूर्ण दिशाओं तथा वनोंको कोलाहलपूर्ण बनाता हुआ आ रहा था ॥२०-२१॥

स राजा सागराकारः ससैन्यः प्रत्यदृश्यत ।
तद्वलं पृथिवीशानां हृष्टयोधजनाकुलम् ॥ २२ ॥
सेनाके साथ आता हुआ राजा जरासंध विशाल समुद्रके समान दिखायी देता था। भूमिपालोंकी वह सेना हृष्ट-पुष्ट योद्धाओंसे परिपूर्ण थी ॥ २२ ॥

क्ष्वेडितास्फोटितरवं मेघसैन्यमिवावभौ ।
रथैः पवनसम्पातैर्गजैश्च जलदोपमैः ।
तुरगैश्च जवोपेतैः पत्तिभिः खगमोपमैः ॥ २३ ॥
विमिश्रं सर्वतो भाति मत्तद्विपसमाकुलम् ।
घर्मान्ते सागरगतं यथाभ्रपटलं तथा ॥ २४ ॥
गर्जने और ताल ठोंकनेकी गम्भीर ध्वनिसे वह मेघोंकी गर्जती हुई घटाके समान प्रतीत होती थी। वायुके समान शीघ्रगामी रथों, मेघोंके सदृश दिखायी देनेवाले हाथियों, वेगशाली घोड़ों तथा आकाशचारी पक्षियोंके समान जान पड़नेवाले पैदल सैनिकोंसे मिश्रित हुई उस सेनाकी सब ओरसे बड़ी शोभा हो रही थी। मतवाले हाथियोंसे व्याप्त हुई वह विशाल वाहिनी वर्षा-ऋतुमे समुद्रके भीतर लक्षित होनेवाले मेघोंके समूहकी शोभा धारण करती थी ॥ २३-२४ ॥


सबलास्ते महीपाला जरासंधपुरोगमाः ।
परिवार्य पुरीं सर्वे निवेशायोपचक्रिरे ॥ २५ ॥
वे जरासंध आदि समस्त भूपाल अपनी सेनाके साथ मथुरापुरीको चारों ओरसे घेरकर छावनी डालनेकी तैयारी करने लगे ॥ २५ ॥

वभौ तस्य निविष्टस्य बलश्रीः शिविरस्य वै ।
शुक्लपर्यन्तपूर्णस्य यथा रूपं महोदधेः ॥ २६ ॥
वहाँ डेरा डाले हुए जरासंधके सैनिक-शिविरोंकी शोभा वैसी ही प्रतीत होती थी, जैसा कि शुक्लपक्षकी पूर्णिमाको अपनी उत्ताल तरङ्गोंसे परिपूर्ण हुए महासागरका रूप देखनेमें आता है ॥ २६ ॥

वीतरात्रे ततः काले समुत्तस्थुर्महीक्षितः ।
आरोहणार्थं पुर्यास्ते समीयुर्युद्धलालसाः ॥ २७ ॥
तदनन्तर रात बीतनेपर प्रातःकाल सब राजा उठे और युद्धकी लालसासे मथुरापुरीपर चढ़ाई करनेके लिये एकत्र होने लगे ॥ २७ ॥

समवायीकृताः सर्वे यमुनामनु ते नृपाः ।
निविष्टा मन्त्रयामासुर्युद्धकालकुतूहलाः ॥ २८ ॥
यमुनाके किनारे एकत्र होकर वे सभी नरेश बैठे और युद्धके शुभ अवसरके लिये उत्सुक हो आपसमें मन्त्रणा करने लगे ॥ २८ ॥

तेषां सुतुमुलः शब्दः शुश्रुवे पृथिवीक्षिताम् ।
युगान्ते भिद्यमानानां सागराणामिव स्वनः ॥ २९ ॥
सेनासहित उन नरेशोंकी तुमुल ध्वनि प्रलयकालमें मर्यादाको तोड़कर बहनेवाले समुद्रोंकी भयंकर गर्जनाके समान सुनायी देती थी ॥ २९ ॥

तेषां सकञ्चुकोष्णीषाः स्थविरा वेत्रपाणयः ।
चेरुर्मा शब्द इत्येवं वदन्तो राजशासनात् ॥ ३० ॥
उन राजाओंके छड़ीदार बूढ़े सिपाही चोगा और पगड़ी धारण किये तथा हाथमें बेंत लिये राजाज्ञासे यह कहते हुए विचरने लगे कि 'सब लोग मौन रहें। कोई एक शब्द भी न बोले' ॥ ३० ॥

तस्य रूपं बलस्यासीन्निःशब्दस्तिमितस्य वै ।
लीनमीनग्रहस्येव निःशब्दस्य यथोदधेः ॥ ३१ ॥
उस समय नीरव और निश्चल हुए उस सैन्यसमूहका रूप जिसके मत्स्य और ग्राह विलीन हो गये हों उस शब्दहीन शान्त महासागरके समान प्रतीत होता था ॥ ३१ ॥

निःशब्दस्तिमिते तस्मिन् योगादिव महार्णवे ।
जरासंधो वृहद् वाक्यं वृहस्पतिरिवाददे ॥ ३२ ॥
उस सैन्य-समुद्रके मानो योगबलसे सहसा नीरव तथा

विष्णुपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः [ ३३९

निश्चल हो जानेपर बृहस्पतिके समान नीतिमान् जरासंधने यह महत्त्वपूर्ण बात कही—॥ ३२ ॥

शीघ्रं समभिवर्तन्तां बलानि पृथिवीक्षिताम्।
सर्वतो नगरी चेयं जनौघैः परिवार्यताम् ॥ ३३ ॥

‘राजाओंकी सेनाएँ शीघ्र आक्रमण करें और इस मथुरानागरीको सब ओरसे सैनिक-समूहोंद्वारा घेर लें ॥ ३३॥

अश्मयन्त्राणि युज्यन्तां क्षेपणीयाश्च मुद्गराः।
कार्या भूमिः समा सर्वा जलौघैश्च परिप्लुता।
ऊर्ध्वं चापा निवाह्यन्तां प्रासा वै तोमरास्तथा ॥ ३४ ॥

‘पत्थरोंके गोले बरसानेवाले यन्त्र लगा दिये जायें। क्षेपणीय (गोफना या ढेलवाँस) तथा मुद्गर सँभाल लिये जायें। सारी भूमि समतल कर दी जाय और उसे जल-राशियोंसे आप्लावित किया जाय। धनुषोंको ऊपर उठा लेना चाहिये; प्रासों और तोमरोंको भी हाथमें ले लिया जाय ॥ ३४ ॥

दार्यतां चैव टङ्काद्यैः खनित्रैश्च पुरी द्रुतम्।
नृपाश्च युद्धमार्गज्ञा विन्यस्यन्तामदूरतः ॥ ३५ ॥

‘टंक आदिके द्वारा तथा खनित्रोंसे इस पुरीको तुरंत ही विदीर्ण कर दिया जाय। युद्धकी प्रणालीको जाननेवाले नरेशोंको उसके समीप ही यथास्थान खड़ा किया जाय ॥ ३५॥

अद्यप्रभृति सैन्यैर्मे पुरीरोधः प्रवर्त्यताम्।
यावदेतौ रणे गोपौ वसुदेवसुतावुभौ ॥ ३६ ॥
संकर्षणं च कृष्णं च घातयामि शितैः शरैः।
आकाशमपि बाणौघैर्निःसम्पातं यथा भवेत् ॥ ३७ ॥

‘आजसे मेरे सैनिकोंद्वारा मथुरापुरीपर घेरा डाल दिया जाय और उसे तबतक चालू रखा जाय, जबतक कि मैं युद्धमें इन दोनों ग्वालों वसुदेवपुत्र संकर्षण और कृष्णको अपने तीखे बाणोंद्वारा मार न डालूँ। उस समयतक आकाशको भी बाणसमूहोंसे इस तरह रूँध दिया जाय, जिससे पक्षी भी उड़कर बाहर न जा सके ॥ ३६-३७ ॥

मयानुशिष्टास्तिष्ठन्तु पुरीभूमिषु भूमिपाः।
तेषु तेष्ववकाशेषु शीघ्रमारुह्यतां पुरी ॥ ३८ ॥

‘मेरा अनुशासन मानकर समस्त भूपाल मथुरापुरीके निकटवर्ती भूभागोंमें खड़े रहें और जब जहाँ अवकाश मिल जाय, तब तहाँ शीघ्र ही पुरीपर चढ़ाई कर दें ॥ ३८ ॥

मद्रः कलिङ्गाधिपतिश्चेकितानः सबाह्लिकः।
काश्मीरराजो गोनर्दः करूषाधिपतिस्तथा ॥ ३९ ॥
द्रुमः किम्पुरुषश्चैव पर्वतीयो ह्यनामयः।
नगर्याः पश्चिमं द्वारं शीघ्रमारोधयन्त्विति ॥ ४० ॥

‘मद्रराज (शल्य), कलिङ्गराज श्रुतायु, चेकितान, बाह्लिक, काश्मीरराज गोनर्द, करूषराज दन्तवक्त्र तथा पर्वतीय प्रदेशके रोगरहित किन्नरराज द्रुम—ये शीघ्र ही मथुरापुरीके पश्चिम द्वारको रोक लें ॥ ३९-४० ॥

पौरवो वेणुदारिश्च वैदर्भः सोमदस्तथा।
रुक्मी च भोजाधिपतिः सूर्याक्षश्चैव मालवः ॥ ४१ ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ दन्तवक्त्रश्च वीर्यवान्।
छागलिः पुरमित्रश्च विराटश्च महीपतिः ॥ ४२ ॥
कौरव्यो मालवश्चैव शतधन्वा विदूरथः।
भूरिश्रवास्त्रिगर्तश्च वाणः पञ्चनदस्तथा ॥ ४३ ॥
उत्तरं नगरद्वारमेते दुर्गसहा नृपाः।
आरुह्य चाभिमर्दन्तां वज्रप्रतिमगौरवाः ॥ ४४ ॥

‘पूरुवंशी वेणुदारि, विदर्भदेशीय सोमक, भोजोंके अधिपति रुक्मी, मालवाके राजा सूर्याक्ष, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द, पराक्रमी दन्तवक्त्र, छागलि, पुरमित्र, राजा विराट, कुरुवंशी मालव, शतधन्वा, विदूरथ, भूरिश्रवा, त्रिगर्त, बाण और पञ्चनद—ये दुर्गका आक्रमण सह सकने-वाले नरेश मथुरा नगरके उत्तर द्वारपर चढ़ाई करके शत्रुओंको कुचल डालें। इनका गौरव वज्रके तुल्य है ॥ ४१-४४ ॥

उलूकः कैतवश्चैव वीरश्चांशुमतः सुतः।
एकलव्यो बृहत्क्षत्रः क्षत्रधर्मा जयद्रथः ॥ ४५ ॥
उत्तमौजाश्च शल्यश्च कौरवाः कैकयास्तथा।
वैदिशो वामदेवश्च सांकृतिश्च सिनीपतिः ॥ ४६ ॥
पूर्वं नगरनिर्व्यूहमेतेष्वायत्तमस्तु नः।
दारयन्तो विधावन्तु वाता इव वलाहकान् ॥ ४७ ॥

‘शकुनिपुत्र उलूक, अंशुमान्‌के पुत्र वीर एकलव्य, बृहत्क्षत्र, क्षत्रधर्मा, जयद्रथ, उत्तमौजा, शल्य, कुरुवंशी, केकयराजकुमार, विदिशाके राजा वामदेव तथा सिनीपति सांकृति—इन सबके अधीन मथुरापुरीका पूर्व द्वार कर दिया जाय। ये लोग जैसे वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार शत्रुओंको विदीर्ण करनेके लिये उनपर धावा बोल दें ॥ ४५-४७ ॥

अहं च दरदश्चैव चेदिराजश्च वीर्यवान्।
दक्षिणं नगरद्वारं पाल्यामः सुदंशिताः ॥ ४८ ॥

‘मैं, दरद तथा पराक्रमी चेदिराज शिशुपाल कवच धारण करके नगरके दक्षिण द्वारका मोरचा सँभालेंगे ॥ ४८ ॥

एवमेषा पुरी क्षिप्रं समन्ताद् वेष्टिता बलैः।
वज्रावपातविभ्रमं प्राप्नोतु तुमुलं भयम् ॥ ४९ ॥

‘इस प्रकार हमारी सेनाओं द्वारा चारों ओरसे घिरी हुई यह नगरी मानो इसपर वज्रपात हो गया हो’ इस प्रकार विभ्रम एवं घोर भय प्राप्त करे ॥ ४९ ॥

गदिनो ये गदाभिस्ते परिघैः परिघायुधाः।
अपरे विविधैः शस्त्रैर्दारयन्तु पुरीमिमाम् ॥ ५० ॥

‘गदाधारी वीर गदाओंसे, परिघ चलानेवाले परिघोंसे

३४०श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तथा अन्य वीर नाना प्रकारके दूसरे शस्त्रोंसे इस पुरीको विदीर्ण कर डालें ॥ ५० ॥

अद्यैव नगरी ह्येषा विषमोच्छ्रायसंकटा ।
कार्या भूमिसमा सर्वा भवद्भिर्वसुधाधिपैः ॥ ५१ ॥
'आज ही आप सब भूपाल मिलकर ऊँचे-नीचे महलोंके समूहोंसे भरी हुई इस सारी नगरीको गर्दमें मिलाकर समतल भूमिके समान कर दें' ॥ ५१ ॥

चतुरङ्गबलैर्व्यूह्य जरासंधो व्यवस्थितः ।
अथाभ्ययाद् यदून् क्रुद्धैः सह सर्वैर्नराधिपैः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार आदेश दे चतुरङ्गिणी सेनाओंका व्यूह बनाकर जरासंध युद्धके लिये डट गया और क्रोधमें भरे हुए समस्त नरेशोंके साथ यादवोंपर चढ़ आया ॥ ५२ ॥

प्रतिजग्मुर्दशार्हास्तं व्यूढानीकाः प्रहारिणः ।
तद् युद्धमभवद् घोरं तेषां देवासुरोपमम् ।
अल्पानां बहुभिः सार्धं व्यतिषक्तरथद्विपम् ॥ ५३ ॥
उस समय अपनी सेनाका व्यूह बनाकर प्रहारकुशल यादवोंने जरासंधका सामना किया। उनका वह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर प्रतीत होता था। यह थोड़ेसे योद्धाओंका बहुसंख्यक शत्रुओंके साथ युद्ध हुआ, जिसमें उभय पक्षके रथ और हाथी एक दूसरेसे सटकर जूझ रहे थे ॥ ५३ ॥

नगरान्निस्सृतौ दृष्ट्वा वसुदेवसुतावुभौ ।
क्षुभितं नृवरानीकं त्रस्तसम्मूढवाहनम् ॥ ५४ ॥
इसी समय वसुदेवके दोनों पुत्र श्रीकृष्ण और बलराम नगरसे बाहर निकले। उन्हें देखते ही उन श्रेष्ठ राजाओंकी विशाल वाहिनी क्षुब्ध हो उठी। उसके वाहन भयभीत और मोहाच्छन्न-से हो गये ॥ ५४ ॥

रथस्थौ दंशितौ चैव चेरतुस्तत्र यादवौ ।
मकराविव संरब्धौ समुद्रक्षोभणावुभौ ॥ ५५ ॥
कवच धारण करके रथपर बैठे हुए वे दोनों यादव-वीर वहाँ विचरने लगे, मानो क्रोधमें भरे हुए दो मगर समुद्रमें हलचल मचा रहे हों ॥ ५५ ॥

तयोः प्रयुध्यतोः संख्ये मतिरासीन्महात्मनोः ।
आयुधानां पुराणानामादानकृतलक्षणा ॥ ५६ ॥
उस संग्राममें जूझते हुए उन दोनों महात्मा वीरोंके मनमें यह संकल्प उठा, यदि हमारे पुरातन अस्त्र आ जाते तो हम उन्हें ही लेकर युद्ध करते ॥ ५६ ॥

ततः खान्निपतन्ति स्म दिव्यान्‍याहवसंप्लवे ।
लेलिहानानि दीप्तानि महान्ति सुदृढानि च ॥ ५७ ॥
उनके इतना सोचते ही उस युद्धमें आकाशसे वे दिव्य आयुध नीचे आने लगे। वे सब-के-सब सुदृढ़, महान् और देदीप्यमान थे तथा शत्रुओंको चाट जानेके लिये उद्यत दिखायी देते थे ॥ ५७ ॥

क्रव्यादाैरनुयातानि मूर्तिमन्ति बृहन्ति च ।
तृपितान्याहवे भोक्तुं नृपमांसानि वै भृशम् ॥ ५८ ॥
उनके पीछे मांसभक्षी भूत-प्रेत आदि भी आ रहे थे। वे दिव्य अस्त्र मूर्तिमान् एवं विशाल थे तथा युद्धमें आये हुए राजाओंके रक्त-मांसका उपभोग करनेके लिये मानो अत्यन्त भूखे-प्यासे थे ॥ ५८ ॥

दिव्यस्रग्दामधारीणि त्रासयन्ति च खेचरान् ।
प्रभया भासमानानि पतमानानि चाम्बरात् ॥ ५९ ॥
उन्होंने दिव्य फूलोंके हार धारण किये थे। अपनी प्रभासे प्रकाशित हो आकाशसे गिरते हुए ये दिव्यास्त्र आकाशचारी प्राणियोंके मनमें भय उत्पन्न करते थे ॥ ५९ ॥

हलं संवर्तकं नाम सौनन्दं मुसलं तथा ।
धनुषां प्रवरं शार्ङ्गं गदा कौमोदकी तथा ॥ ६० ॥
चत्वार्येतानि तेजांसि विष्णुप्रहरणानि च ।
ताभ्यां समवतीर्णानि यादवाभ्यां महामृधे ॥ ६१ ॥
संवर्तक नामक हल, सौनन्द नामक मूसल, धनुषोंमें श्रेष्ठ शार्ङ्ग तथा कौमोदकी गदा—भगवान् विष्णुके ये चार तेजस्वी आयुध उन दोनों भाइयोंके लिये यादवोंके उस महासमरमें उतर आये ॥ ६०-६१ ॥

जग्राह प्रथमं रामो ललामप्रतिमं हलम् ।
सर्पन्तमिव सर्पेन्द्रं दिव्यमालाकुलं मृधे ॥ ६२ ॥
बलरामजीने उस युद्धस्थलमें पहले सर्पराजके समान सर्पणशील (गतिमान्) तथा दिव्य मालाओंसे अलंकृत सुन्दर आकृतिवाले हलको (दाहिने हाथमें) ग्रहण किया ॥

सौनन्दं च ततः श्रीमान् निरानन्दकरं द्विषाम् ।
सव्येन सात्वतां श्रेष्ठो जग्राह मुसलोत्तमम् ॥ ६३ ॥
तदनन्तर यादवोंमें श्रेष्ठ श्रीमान् संकर्षणने शत्रुओंके आनन्दको हर लेनेवाले सौनन्द नामक श्रेष्ठ मूसलको बायें हाथसे ग्रहण किया ॥ ६३ ॥

दर्शनीयं च लोकेषु धनुर्जलदनिःस्वनम् ।
नाम्ना शार्ङ्गमिति ख्यातं कृष्णो जग्राह वीर्यवान् ॥ ६४ ॥
इसके बाद पराक्रमी श्रीकृष्णने मेघोंके समान गम्भीर घोष करनेवाले शार्ङ्ग नामक धनुषको ग्रहण किया, जो समस्त लोकोंमें दर्शनीय है ॥ ६४ ॥

देवैर्निगदितार्थस्य गदा तस्यापरे करे ।
निशिसा कुमुदाक्षस्य नाम्ना कौमोदकीति सा ॥ ६५ ॥
देवताओंग्रहने जिन्हें अपना प्रयोजन बताया था और जिनके नेत्र खिले हुए कुमुदके समान शोभा पाते हैं, उन भगवान्

विष्णुपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ३४१


श्रीकृष्णके दूसरे हाथमे वह सुप्रसिद्ध कौमोदकी गदा स्वतः आ गयी ॥ ६५ ॥

तौ सप्रहरणौ वीरौ साक्षाद् विष्णुतनुपमौ ।
समरे रामगोविन्दौ रिपूंस्तान् प्रत्ययुध्यताम् ॥ ६६ ॥

उन आयुधोंसे युक्त हो साक्षात् विष्णु-विग्रहके समान शरीरवाले दोनों वीर बलराम और श्रीकृष्ण समराङ्गणमें उन शत्रुओंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ६६ ॥

सायुधप्रग्रहौ वीरौ तावन्योन्याश्रयावुभौ ।
पूर्वजानुजसंज्ञौ तौ रामगोविन्दलक्षणौ ॥ ६७ ॥
द्विषत्सु प्रतिकुर्वाणौ पराक्रान्तौ यथेश्वरौ ।
विचेरतुर्यथा देवौ वसुदेवसुतावुभौ ॥ ६८ ॥

उन दिव्य आयुधोंको ग्रहण करके एक दूसरेको सहारा देनेवाले वे अग्रज और अनुजरूप दोनों वीर बन्धु श्रीबलराम और श्रीकृष्ण शत्रुओंका सामना करते हुए ईश्वरकोटिक महापुरुषोंके समान पराक्रम दिखाने लगे। वसुदेवके वे दोनों पुत्र रणभूमिमें देवताओंके समान विचरते थे ॥ ६७-६८ ॥

हलमुद्यम्य रामस्तु सर्पेन्द्रमिव कोपितः।
चचार समरे वीरो द्विषियामन्तको यथा ॥ ६९ ॥

वीर बलराम क्रोधमें भरकर सर्पराजके समान हल उठाये शत्रुओंके लिये कालरूप होकर समरभूमिमे विचर रहे थे ॥ ६९ ॥

विक्षिपन् रथवृन्दानि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।
चकार रोषं सफलं नागेषु च हयेषु च ॥ ७० ॥

वे महामनस्वी क्षत्रियोंके रथसमूहोंको पीछे ढकेलते हुए हाथियों और घोड़ोंपर अपना रोष सफल करने लगे ॥ ७० ॥

कुञ्जराल्लाङ्गलक्षितान् मुसलाक्षेपताडितान् ।
रामो विराजन् समरे निर्ममन्थ यथाचलान् ॥ ७१ ॥

बलरामजी गजराजोंको हलसे खींचकर उन्हें मूसलकी मारसे घायल करते हुए समराङ्गणमे अद्भुत शोभा पा रहे थे। उन्होंने पर्वतोंके समान हाथियोंको मथ डाला ॥ ७१ ॥

ते वध्यमाना रामेण रणे क्षत्रियपुङ्गवाः ।
जरासंधान्तिकं भीताः समरोत् प्रतिजग्मिरे ॥ ७२ ॥

रणभूमिमे बलरामजीके द्वारा मारे जाते हुए वे क्षत्रियशिरोमणि भयभीत हो समरसे पीछे हटकर जरासंधके पास भाग गये ॥ ७२ ॥

तानुवाच जरासंधः क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः ।
धिगेतां क्षत्रवृत्तिं वः समरे कातरात्मनाम् ॥ ७३ ॥

उस समय क्षत्रिय-धर्ममे स्थिर रहनेवाले जरासंधने उन क्षत्रियोंसे कहा—'अरे समराङ्गणमे कातर-हृदय होकर पीछे भागनेवाले तुम सब लोगोंकी इस क्षत्रिय-वृत्तिको धिक्कार है! ॥

परावृत्तस्य समरे विरथस्य पलायतः ।
भ्रूणहत्यामिवासह्यां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ७४ ॥

'जो क्षत्रिय संग्रामभूमिमें रथहीन होनेपर पीठ दिखाकर भागने लगता है, उसकी इस भीरुताको मनीषी पुरुष भ्रूण-हत्याके समान असह्य बताते हैं ॥ ७४ ॥'

भीताः कस्मान्निवर्तध्वं धिगेतां क्षत्रवृत्तित्ताम् ।
क्षिप्रं सर्वे निवर्तध्वं मम वाक्येन चोदिताः ॥ ७५ ॥

'योद्धाओ ! तुम भयभीत होकर युद्धसे पीछे क्यों हटते हो? तुम्हारी ऐसी क्षत्रियवृत्तिको धिक्कार है! मेरी वाणीसे प्रेरित हो तुम सब लोग शीघ्र ही युद्धभूमिको लौट जाओ ॥

अथवा तिष्ठत रथैः प्रेक्षकाः समवस्थिताः ।
यावदेतौ रणे गोपौ प्रेषयामि यमक्षयम् ॥ ७६ ॥

'अथवा रथोंके द्वारा दर्शक बनकर तटस्थ खड़े रहो, जबतक कि मैं रणभूमिमें इन ग्वालोंको मारकर यमलोक नहीं भेज देता हूँ' ॥ ७६ ॥

ततस्ते क्षत्रियाः सर्वे जरासंधेन नोदिताः ।
सृजन्तः शरजालानि हृष्टा योद्धुं व्यवस्थिताः ॥ ७७ ॥

तत्र जरासंधसे प्रेरित हो वे समस्त क्षत्रिय बाण-समूहोंकी वृष्टि करते हुए बड़े हर्षके साथ युद्धके लिये डट गये ॥७७॥

ते हयैः काञ्चनापीडै रथैश्चाम्बुदनादिभिः ।
नागैश्चाम्बुदसङ्काशैर्महामात्रप्रचोदितैः ॥ ७८ ॥

वे सोनेके आभूषणोंसे विभूषित हुए घोड़ों, मेघकी गर्जनाके समान घरघर ध्वनि फैलानेवाले रथों और महावतोंद्वारा हाँके गये मेघोंके समान काले गजराजोंद्वारा आगे बढ़कर युद्ध करने लगे ॥ ७८ ॥

सतनुत्राः सनिस्त्रिंशाः सपताकायुधध्वजाः ।
त्वारोपितधनुष्मन्तः सतूणीराः सतोमराः ॥ ७९ ॥

उन सबके शरीरमे कवच बँधे थे, सबने तलवारें ले रखी थीं, सभी ध्वजा-पताका और आयुधोंसे सम्पन्न थे, सभीके धनुष चढ़े हुए थे तथा सबने तरकस और तोमर ले रखे थे ॥ ७९ ॥

सच्छत्राः सादिनश्चैव चारुचामरवीजिताः ।
रणे तेऽधिगता रेजुः स्यन्दनस्था महीक्षितः ॥ ८० ॥

रथपर बैठे हुए उन राजाओंके ऊपर छत्र तने हुए थे, मनोहर चँवर डुलाये जाते थे। उनके साथ घुड़सवार भी थे। युद्धभूमिमें स्थित हुए वे सभी नरेश बड़ी शोभा पा रहे थे ॥

ते युद्धरागा रथिनो व्यगाहन्त युधां वराः ।
गदाभिश्चैव गुर्वीभिः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः ॥ ८१ ॥

योद्धाओंमे श्रेष्ठ उन रथी वीरोंका युद्धमें अनुराग था, इसलिये वे भारी गदाओं, क्षेपणीयों (गोफनों) तथा मुद्गरों- से विपक्षियोंको घायल करते हुए उनकी सेनाओंमे घुस गये।

३४२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश


एतस्मिन्नन्तरे तत्र देवानां नन्दिवर्धनः ।
सुपर्णध्वजमास्थाय कृष्णस्तु रथमुत्तमम् ॥ ८२ ॥
समभ्ययाज्जरासंधं शरैर्विव्याध चाष्टभिः ।
सारथिं चास्य विव्याध पञ्चभिर्निशितैः शरैः ॥ ८३ ॥

इसी बीचमें देवताओंका आनन्द बढ़ानेवाले भगवान् श्रीकृष्ण उत्तम गरुड़ध्वज रथपर आरूढ़ हो जरासंधपर चढ़ आये। उन्होंने आठ बाणोंसे उसको घायल कर दिया और पाँच पैने बाणोंद्वारा उसके सारथिको भी बींध डाला ॥

जघान तुरगांश्चाजौ यतमानस्य वीर्यवान् ।
तं कृच्छ्रगतमाज्ञाय चित्रसेनो महारथः ॥ ८४ ॥
सेनानीः कैशिकश्चैव कृष्णं विविध्यतुः शरैः ।

जरासंध बचनेका प्रयत्न करता ही रह गया, किंतु पराक्रमी श्रीकृष्णने रणभूमिमें उसके घोड़ोंको भी मार डाला। उसे संकटमें पड़ा जान महारथी चित्रसेन तथा सेनापति कैशिक दोनों आ पहुँचे और श्रीकृष्णको अपने बाणोंद्वारा घायल करने लगे ॥ ८४ ॥

त्रिभिर्विव्याध संसक्तं बलदेवं च कैशिकः ॥ ८५ ॥
बलदेवो धनुश्चास्य भल्लेनाजौ द्विधाकरोत् ।
जवेनाभ्यर्दयच्चापि तानरीञ्छरवृष्टिभिः ॥ ८६ ॥

कैशिकने लगातार तीन बाणोंसे बलरामजीको बींध दिया। तब बलरामने भी एक भल्ल मारकर युद्धमें उसके धनुषके दो टुकड़े कर डाले। साथ ही वेगपूर्वक बाणोंकी वर्षा करके उन तीनों शत्रुओंको पीड़ित कर दिया ॥ ८५-८६ ॥

बहुभिर्बहुधा वीरान् समन्तात् स्वर्णभूषणैः ।
तं चित्रसेनः संरब्धो विव्याध नवभिः शरैः ॥ ८७ ॥
कैशिकः पञ्चभिश्चापि जरासंधश्च सप्तभिः ।

उन्होंने बहुतसे स्वर्णभूषित बाणोंद्वारा उन वीरोंको सब ओरसे बारंबार घायल किया। तब क्रोधमें भरे हुए चित्रसेनने नौ, कैशिकने पाँच तथा जरासंधने सात बाणोंसे उनको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ८७ ॥

त्रिभिस्त्रिभिश्च नाराचैस्तान् विभेद जनार्दनः ॥ ८८ ॥
पञ्चभिः पञ्चभिश्चैव बलदेवः शितैः शरैः ।

यह देख श्रीकृष्णने तीन-तीन नाराचोंसे उन तीनोंको वेध डाला। फिर बलदेवने भी पाँच-पाँच पैने बाणोंसे उन सबको घायल कर दिया ॥ ८८ ॥

रथं चैवास्य चिच्छेद चित्रसेनस्य वीर्यवान् ॥ ८९ ॥
बलदेवो धनुश्चास्य भल्लेनाजौ द्विधाकरोत् ।

इसके बाद पराक्रमी बलरामने चित्रसेनके रथके टुकड़े-टुकड़े कर दिये तथा एक भल्ल मारकर युद्धस्थलमें उसके धनुषके भी दो खण्ड कर डाले ॥ ८९ ॥


स च्छिन्नधन्वा विरथो गदामादाय वीर्यवान् ॥ ९० ॥
अभ्यधावत् सुसंरब्धो जिघांसुर्मुसलायुधम् ।

धनुष और रथके नष्ट हो जानेपर रोषमें भरा हुआ पराक्रमी चित्रसेन मूसलधारी बलरामको मार डालनेकी इच्छा से हाथमें गदा लेकर उनकी ओर दौड़ा ॥ ९० ॥

सिखृक्षतस्तु नाराचांश्चित्रसेनवधैषिणः ।
धनुश्चिच्छेद रामस्य जरासंधो महाबलः ॥ ९१ ॥

यह देख बलराम चित्रसेनके वधकी इच्छासे उसपर नाराचोंकी वृष्टि करने लगे। इतनेहीमें महाबली जरासंधने बलरामजीके धनुषको काट दिया ॥ ९१ ॥

गदया च जघानाश्वान् क्रोधात् स मगधेश्वरः ।
रामं चाभ्यद्रवद् वीरो जरासंधो महाबलः ॥ ९२ ॥

साथ ही क्रोधपूर्वक गदाका प्रहार करके महाबली वीर मगधराज जरासंधने उनके घोड़ोंको कालके गालमें भेज दिया, फिर बलरामपर भी धावा किया ॥ ९२ ॥

आदाय मुसलं रामो जरासंधमुपाद्रवत् ।
तयोस्तद् युद्धमभवत् परस्परवधैषिणोः ॥ ९३ ॥

बलरामजी भी मूसल लेकर जरासंधपर टूट पड़े। एक दूसरेके वधकी इच्छावाले उन दोनों वीरोंमें घोर युद्ध होने लगा ॥ ९३ ॥

चित्रसेनस्तु संसक्तं दृष्ट्वा रामेण मागधम् ।
रथमन्यं समारुह्य जरासंधमवारयत् ॥ ९४ ॥

उधर चित्रसेन मगधराजको बलरामजीके साथ उलझा हुआ देख दूसरे रथपर चढ़कर आ गया और जरासंधको लड़नेसे रोकने लगा ॥ ९४ ॥

ततो बलेन महता गजानीकेन चाप्यथ ।
उभयोरन्तरे ताभ्यां संकुलं समपद्यत ॥ ९५ ॥

तदनन्तर वह विशाल गजसेनाके साथ जरासंध और बलरामके बीचमें आ गया और उन दोनों भाइयोंके साथ घोर युद्ध करने लगा ॥ ९५ ॥

ततः सैन्येन महता जरासंधोऽभिसंवृतः ।
रामकृष्णाग्रगान् भोजानाससाद महाबलः ॥ ९६ ॥

तब विशाल सेनासे घिरा हुआ महाबली जरासंध बलराम और श्रीकृष्णके अग्रगामी भोजोंपर जा चढ़ा ॥ ९६ ॥

तत्र प्रक्षुभितस्येव सागरस्य महास्वनः ।
प्रादुर्बभूव तुमुलः सेनयोरुभयोरपि ॥ ९७ ॥

फिर तो वहाँ उभय पक्षकी सेनाओंमें विक्षुब्ध महासागरके समान बड़ी भयंकर एवं भारी गर्जना सुनायी देने लगी ॥ ९७ ॥

वेणुभेरीमृदङ्गानां शङ्खानां च सहस्रशः ।
उभयोः सेनयो राजन् प्रादुरासीन्महास्वनः ॥ ९८ ॥

विष्णुपर्व ]षट्त्रिंशोऽध्यायः३४३

राजन् ! दोनों सेनाओंमें वेणु, भेरी, मृदङ्ग और शङ्ख आदि सहस्रों वाद्योंका महान् घोष होने लगा ॥ ९८ ॥
क्ष्वेडितास्फोटितोत्कृष्टैस्तुमुलः सर्वतोऽभवत् ।
उत्पपात रजश्चापि खुरनेमिसमुद्धतम् ॥ ९९ ॥
योद्धाओंके गर्जने, ताल ठोंकने और उच्च स्वरसे पुकारने आदिके कारण वहाँ सब ओर तुमुल ध्वनि छा गयी। घोड़ोंकी टापों और रथके पहियोंके प्रान्तभागसे उठी हुई धूल सब ओर उड़ने लगी ॥ ९९ ॥
समुद्यतमहाशस्त्राः प्रगृहीतशरासनाः ।
अन्योन्यमभिगर्जन्तः शूरास्तत्रावतस्थिरे ॥ १००॥
उभयपक्षके शूर-वीर सैनिक बड़े-बड़े शस्त्र उठाये, धनुष लिये एक दूसरेके सम्मुख गर्जना करते हुए युद्धस्थलमे डटे हुए थे ॥ १०० ॥
रथिनः सादिनश्चैव पत्तयश्च सहस्रशः ।
गजाश्चातिबलास्तत्र समुत्पेतुः समन्ततः ॥ १०१॥
उस युद्धमें सब ओर रथी, घुड़सवार, सहस्रों पैदल तथा अत्यन्त बलशाली गजराज एक दूसरेपर टूटे पड़ते थे ॥ १०१ ॥
स संनिपातस्तुमुलस्त्यक्त्वा प्राणानवर्तत ।
वृष्णिभिः सह योधानां जरासंधस्य दारुणः ॥१०२॥
वृष्णियोंके साथ जरासंधके योद्धाओंका वह घमासान युद्ध प्राणोंका मोह छोड़कर हो रहा था और भयानक रूप धारण करता जा रहा था ॥ १०२ ॥
ततः शिनिरनाधृष्टिर्बभ्रुुर्विपृथुराहुकः ।
बलदेवं पुरस्कृत्य सैन्यस्यार्द्धेन दंशिताः ॥ १०३॥
दक्षिणं पक्षमासेदुः शत्रुसैन्यस्य भारत ।
भरतनन्दन ! तदनन्तर शिनि, अनाधृष्टि, बभ्रु (अक्रूर), विपृथु और आहुक (उग्रसेन)—इन सबने बलदेवजीको आगे रखकर अपनी आधी सेनासे घिरे रहकर शत्रुओंकी सेनाके दक्षिण भागपर आक्रमण किया ॥ १०३ १/२ ॥
पालितं चेदिराजेन जरासंधेन वा विभो ॥ १०४॥
उदीच्यैश्च महावीर्यैः शल्यशाल्वादिभिर्नृपैः ।
सृजन्तः शरवर्षाणि समभित्यक्तजीविताः ॥१०५॥
प्रभो ! उस भागकी रक्षा चेदिराज शिशुपाल, जरासंध तथा उत्तर दिशाके महापराक्रमी योद्धा शल्य और शाल्व आदि नरेश कर रहे थे। यादवोंने जीवनका मोह छोड़कर शत्रुओंपर बाणवर्षा आरम्भ कर दी ॥ १०४-१०५ ॥
अवगाहः पृथुः कङ्कः शतद्युम्नो विदूरथः ।
हृषीकेशं पुरस्कृत्य सैन्यस्यार्द्धेन दंशिताः ॥ १०६ ॥
शेष सेनाके आधे भागसे घिरे हुए अवगाह, पृथु, कङ्क, शतद्युम्न और विदूरथ आदि वीरोंने भगवान् श्रीकृष्णको आगे रखकर शत्रुसेनाके वामभागपर आक्रमण किया ॥ १०६ ॥
भीष्मकेणाभिगुप्तश्च रुक्मिणा च महात्मना ।
देवकेनापि राजेन्द्र तथा मद्रेreview: मद्रेश्वरेण च ॥ १०७॥
प्राच्यैश्च दाक्षिणात्यैश्च गुप्तवीर्यबलान्वितैः ।
तेषां च युद्धमभवत् समभित्यक्तजीवितम् ॥१०८॥
शक्त्यृष्टिप्रासबाणौघान् सृजतामशनिस्वनान् ।
राजेन्द्र ! वह भाग भीष्मक, महामना रुक्मी, देवक, मद्रराज शल्य तथा गुप्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न पूर्व और दक्षिण दिशाके वीरोंसे सुरक्षित था। इन्हीं सब लोगोंमें जीवनका मोह छोड़कर युद्ध होने लगा। ये लोग बिजलीके समान गड़गड़ाहट पैदा करनेवाले शक्ति, ऋष्टि, प्रास तथा बाणसमूहोंकी वर्षा करते थे ॥ १०७-१०८ १/२ ॥
सात्यकिश्चित्रकः श्यामो युयुधानश्च वीर्यवान् ।
राजाधिदेवो मृदुरः श्वफल्कश्च महारथः ॥१०९॥
सत्राजिच्च प्रसेनश्च बलेन महता वृताः ।
व्यूहस्य पुच्छं ते सर्वे प्रतियुयुर्दिपंतां मृधे ॥ ११०॥
व्यूहस्यार्द्धं समासेदुर्मुद्गरेणाभिरक्षिताः ।
राजभिश्चापि बहुभिर्वेणुदारिमुखैः सह ॥ १११॥
सात्यकि, चित्रक, श्याम, पराक्रमी युयुधान, राजाधिदेव, मृदुर, महारथी श्वफल्क, सत्राजित् और प्रसेन—इन सबने विशाल सेनासे घिरकर युद्धस्थलमे शत्रुओंके व्यूहके पुच्छभागपर आक्रमण किया। मुद्गरसे सुरक्षित रहकर इन्होंने व्यूहके आधे भागपर धावा बोल दिया था, उस समय इनका वेणुधारि आदि बहुत-से राजाओके साथ युद्ध हुआ ॥ १०९-१११ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि मथुरोपरोधे युद्धवर्णने पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें जरासंधका मथुरापर घेरा और दोनों पक्षके योद्धाओंके युद्धका वर्णनविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥


षट्त्रिंशोऽध्यायः

वृष्णिवंशियों तथा जरासंधके सैनिकोंका युद्ध, बलराम और जरासंधका गदायुद्ध तथा जरासंधका पराजित होकर पलायन करना

वैशम्पायन उवाचवैशम्पायनजी कहते हैं—
ततो युद्धानि वृष्णीनां बभूवुः सुमहान्त्यथ ।<br>मागधस्य महामात्रैर्नृपैश्चैवानुयायिभिः ॥ १ ॥जनमेजय ! तदनन्तर जरासंधके महावतों और अनुगामी नरेशोंके साथ वृष्णिवंशियोंके कई बड़े-बड़े युद्ध हुए ॥ १ ॥

३४४ : श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे रुक्मिणा वासुदेवस्य भीष्मकेणाहुकस्य च । रथी रामो जरासंधं शरैराशीविषोपमैः ॥ १० ॥ क्रथेन वसुदेवस्य कैशिकस्य तु बभ्रुना ॥ २ ॥ आवृण्वन्नभ्ययाद् वीरस्तं च राजा स मागधः ।' गदेन चेदिराजस्य दन्तवक्त्रस्य शङ्कुना । अभ्यवर्तत वेगेन स्यन्दनेनाशुगामिना ॥ ११ ॥ तथान्यैर्वृष्णिवीराणां नृपाणां च महात्मनाम् ॥ ३ ॥ रथारूढ वीर बलरामने विषधर सर्पोंके समान भयंकर युद्धमासीद्धि सैन्यानां सैनिकैर्भरतर्षभ । बाणोंद्वारा जरासंधको आच्छादित करते हुए उसपर आक्रमण अहानि पञ्च चैकं च षट् सप्ताष्टौ च दारुणम् ॥ ४ ॥ किया तथा मगधराज भी अपने शीघ्रगामी रथद्वारा बड़े वेगसे भरतश्रेष्ठ ! रुक्मीके साथ वासुदेव श्रीकृष्णका, भीष्मक- उनका सामना करनेके लिये आ पहुँचा ॥ १०-११ ॥ के साथ आहुक ( उग्रसेन ) का, क्रथके साथ वसुदेवका, अन्योन्यं विविधैरस्त्रैर्विद्ध्वा विद्ध्वा विनेदतुः । बभ्रु ( अक्रूर ) के साथ कैशिकका, गदके साथ चेदिराज तौ क्षीणशस्त्रौ विरथौ हताश्वौ हतसारथी ॥१२॥ शिशुपालका, शंकुके साथ दन्तवक्त्रका तथा अन्य सैनिकोंके गदे गृहीत्वा विक्रान्तावन्योऽन्यमभिधावताम् । साथ वृष्णिकुलके महामना वीर नरेशोंका, सारांश यह कि चे दोनों नाना प्रकारके अस्त्रोंद्वारा एक दूसरेको घायल उभय पक्षके सैनिकोंका प्रतिद्वन्द्वी सैनिकोंके साथ दारुण करके जोर-जोरसे गरजते थे । दोनोंके अस्त्र-शस्त्र क्षीण हो द्वन्द्व युद्ध होने लगा, जो सत्ताईस दिनोंतक चलता गये, दोनों ही रथहीन हो गये तथा दोनोंके ही घोड़े और रहा ॥ २-४ ॥ सारथि मारे गये । उस दशामे वे दोनों पराक्रमी योद्धा गदा गजैर्गजा हयैरश्वाः पदाताश्च पदातिभिः । हाथमें लेकर एक-दूसरेपर टूट पड़े ॥ १२३ ॥ रथै रथा विमिश्राश्च योधा युयुधिरे नृप ॥ ५ ॥ कम्पयन्तौ भुवं वीरौ तावुद्यतगदावुभौ ॥ १३ ॥ नरेश्वर ! हाथियोंसे हाथी, घोड़ोंसे घोड़े, पैदलोंसे पैदल ददृशाते महात्मानौ गिरी सशिखराविव । और रथोंसे रथ मिश्रित हो गये और इस प्रकार घोल-मेल हाथमें गदा उठाये वे दोनों महामनस्वी वीर पृथिवीको कर सभी योद्धा विपक्षियोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ५ ॥ कम्पित करते हुए वहाँ एक-एक शिखरवाले दो पर्वतोंके समान जरासंधस्य नृपते रामेणासीत् समागमः । दिखायी देते थे ॥ १३३ ॥ महेन्द्रस्येव वृत्रेण दारुणो रोमहर्षणः ॥ ६ ॥ व्युपरमन्त युद्धानि पश्यता तौ महाभुजौ । राजा जरासंधका बलरामजीके साथ उसी प्रकार दारुण संरम्भावभिधावन्तौ गदायुद्धेषु विश्रुतौ ॥ १४ ॥ एवं रोमाञ्चकारी संघर्ष हुआ, जैसा वृत्रासुरके साथ देवराज उन दोनों महाबाहु वीरोंको युद्धके लिये उद्यत देख इन्द्रका हुआ था ॥ ६ ॥ दूसरे योद्धाओंके युद्ध बंद हो गये । उन दोनोंकी गदायुद्धमे अवेक्ष्य रुक्मिणीं कृष्णो रुक्मिणं न व्यपोथयत् । ख्याति थी । वे दोनों बड़े रोषमे भरकर एक-दूसरेपर धावा ज्वलनाकींशुसंकाशान्नानाशीविषविषोपमान् ॥ ७ ॥ करते थे ॥ १४ ॥ वारयामास कृष्णो वै शरांस्तस्य तु शिक्षया । उभौ तौ परमाचार्यौ लोके ख्यातौ महाबलौ । रुक्मिणीके साथ भविष्यमे होनेवाले सम्बन्धको दृष्टिमें मत्ताविव गजौ युद्धे तावन्योन्यमयुध्यताम् ॥ १५ ॥ रखकर श्रीकृष्णने रुक्मीको नहीं मारा, उसकी ओरसे वे दोनों महाबली वीर संसारमें गदायुद्धके उत्तम आनेवाले अग्नि और सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी तथा आचार्यके रूपमे विख्यात थे तथा जैसे दो मतवाले हाथी विषधर सर्पोंके समान विषैले बाणोंका उन्होंने अपनी शिक्षाके लड़ते हैं, उसी प्रकार रणभूमिमें वे एक-दूसरेके साथ जूझ बलसे निवारण कर दिया ॥ ७३ ॥ रहे थे ॥ १५ ॥ इत्येषां सुमहानासीद् बलौघानां परिक्षयः ॥ ८ ॥ ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च समहर्षयः । उभयोः सेनयो राजन् मांसशोणितकर्दमः । समन्ततश्चाप्सरसः समाजग्मुः सहस्रशः ॥ १६ ॥ राजन् ! इस प्रकार दोनों सेनाओके सैनिकसमूहोंका उस समय गन्धर्वोंसहित देवता, सिद्ध, महर्षि तथा महान् विनाश हुआ । वहाँ रक्त और मांसकी कीच सहस्रों अप्सराएँ सब ओरसे उस युद्धको देखनेके लिये आ जम गयी ॥ ८३ ॥ पहुँचीं ॥ १६ ॥ कबन्धानि समुत्तस्थुः सुवहूनि समन्ततः ॥ ९ ॥ तद् देवयक्षगन्धर्वमहर्षिभिरलंकृतम् । तस्मिन् विमर्दे योधानां संख्यावृत्तिकराणि च । शुशुभेऽभ्यधिकं राजन् दिवं ज्योतिर्गणैरिव ॥ १७ ॥ योद्धाओंके उस महान् संहारमे चारो ओरसे बहुत-से अभिदुद्राव रामं तु जरासंधो महाबलः । कबन्ध उठने लगे, जिनकी गणना नहीं की जा सकती सव्यं मण्डलममाश्रित्य बलदेवस्तु दक्षिणम् ॥ १८ ॥ थी ॥ ९३ ॥

विष्णुपर्व ] षट्त्रिंशोऽध्यायः ३४५


राजन् ! देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों और महर्षियोंसे अलंकृत हुआ आकाशका वह भाग नक्षत्रसमूहोंसे विभूषित हुआ-सा अधिक शोभा पाने लगा। महाबली जरासंध बायेंसे पैंतरा देकर बलरामजीकी ओर दौड़ा और बलरामजीने दाहिनेसे उसपर आक्रमण किया ॥ १७-१८ ॥

प्रहरन्तौ ततोऽन्योन्यं गदायुद्धविशारदौ ।
दन्ताभ्यामिव मातङ्गौ नादयन्तौ दिशो दश ॥ १९ ॥
गदानिपातो रामस्य शुश्रुवेऽशनिनिःस्वनः ।
जरासंधस्य च रणे पर्वतस्येव दीर्यतः ॥ २० ॥

गदायुद्धमें कुशल वे दोनों वीर दसों दिशाओंको निनादित करते हुए एक दूसरेपर उसी प्रकार प्रहार करने लगे, जैसे दो मतवाले हाथी परस्पर दाँतोंसे आघात करते हों। बलरामजी जब गदाका आघात करते, तब वज्रपातके समान भयानक शब्द सुनायी पड़ता था तथा रणभूमिमें जरासंधके गदाघातसे ऐसी आवाज होती थी, मानो कोई पर्वत फट पड़ा हो ॥ १९-२० ॥

न स्म कम्पयते रामं जरासंधकरच्युता ।
गदा गदाभृतां श्रेष्ठं विन्ध्यं गिरिमिवानिलः ॥ २१ ॥
रामस्य तु गदावेगं वीर्यात् स मगधेश्वरः ।
सेहे धैर्येण महता शिक्षया च व्यपोहयत् ॥ २२ ॥

जैसे प्रचण्ड वायु विन्ध्यपर्वतको नहीं हिला सकती, उसी प्रकार जरासंधके हाथसे छूटी हुई गदा गदाधारियोंमें श्रेष्ठ बलरामजीको कम्पित नहीं कर पाती थी। बलरामजीकी गदाके वेगको मगधराज जरासंध अपने बलकी अधिकताके कारण महान् धैर्यके साथ सह लेता था तथा अपनी शिक्षाके द्वारा उनके प्रहारको व्यर्थ कर देता था ॥ २१-२२ ॥

एवं तौ तत्र संग्रामे विचरन्तौ महाबलौ ।
मण्डलानि विचित्राणि विचेतुररिंदमौ ॥ २३ ॥

इस प्रकार शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों महाबली योद्धा उस संग्राममें विचित्र पैंतरे दिखाते हुए विचर रहे थे ॥

व्यायच्छन्तौ चिरं कालं परिश्रान्तौ च तस्थतुः ।
समाश्र्वस्य मुहूर्त्तं तु पुनरन्योन्यमाहताम् ॥ २४ ॥

देरतक परिश्रम करके थक जानेपर दोनों खड़े हो जाते थे; फिर दो घड़ीतक सुस्ताकर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगते थे ॥ २४ ॥

एवं तौ योधमुख्यौ तु समं युयुधतुश्चिरम् ।
न च तौ युद्धवैमुख्यमुभावेव प्रजग्मतुः ॥ २५ ॥

इस प्रकार वे दोनों प्रमुख योद्धा समानभावसे देरतक लड़ते रहे। वे दोनों ही युद्धसे विमुख नहीं हुए ॥ २५ ॥

अथापश्यद् गदायुद्धे विशेषं तस्य वीर्यवान् ।
रामः क्रुद्धो गदां त्यक्त्वा जग्राह मुसलोत्तमम् ॥ २६ ॥

तदनन्तर पराक्रमी बलरामजीने जब गदायुद्धमें जरासंधकी विशेषता देखी, तब उन्होंने कुपित हो गदा त्यागकर उत्तम मूसल हाथमें लिया ॥ २६ ॥

तमुद्यन्तं तदा दृष्ट्वा मुसलं घोरदर्शनम् ।
अमोघं बलदेवेन क्रुद्धेन तु महारणे ॥ २७ ॥
ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् सुस्वरा लोकसाक्षिणी ।
उवाच बलदेवं तं समुद्यतहलायुधम् ॥ २८ ॥

उस महासमरमें कुपित हुए बलदेवजीके द्वारा उस भयानक तथा अमोघ मूसलको उठाया जाता देख आकाशमें सब लोगोंके सामने स्पष्ट शब्दोंमें देववाणी सुनायी दी। उसने हल-मूसल उठाये हुए बलदेवजीसे कहा— ॥ २७-२८ ॥

न त्वया राम वध्योऽयमलं खेदेन मानद ।
विदितोऽस्य मया मृत्युस्तस्मात् साधु व्युपरम ।
अचिरेणैव कालेन प्राणांस्त्यक्ष्यति मागधः ॥ २९ ॥

'दूसरोंको मान देनेवाले बलरामजी ! जरासंधका वध आपके हाथसे होनेवाला नहीं है; अतः खेद करनेकी आवश्यकता नहीं है। इसकी मृत्युका हेतु मुझे विदित हो गया है; अतः आप इसे मारनेकी चेष्टासे निवृत्त हो जाइये। मगधराज जरासंध थोड़े ही समयमें अपने प्राणोंका परित्याग करेगा' ॥ २९ !

जरासंधस्तु तच्छ्रुत्वा विमनाः समपद्यत ।
न प्रजह्रे ततस्तस्मै पुनरेव हलायुधः ॥ ३० ॥

यह सुनकर जरासंधका मन उदास हो गया और बलरामजीने फिर उसपर प्रहार नहीं किया ॥ ३० ॥

तौ व्युपारमतां युद्धे वृष्णयस्ते च पार्थिवाः ।
असक्तमभवद् युद्धं तेषामेवं सुदारुणम् ॥ ३१ ॥
दीर्घकालं महाराज निघ्नतामितरेतरम् ।

अब वे दोनों युद्धसे विरत हो गये; फिर तो वृष्णिवंशी योद्धा तथा दूसरे राजाओंने भी युद्ध बंद कर दिया। महाराज ! इस प्रकार दीर्घकालतक एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए उन योद्धाओंका जो अत्यन्त भयंकर युद्ध अविराम गतिसे चलता आ रहा था, वह शान्त हो गया ॥ ३१ १/२ ॥

पराजिते त्वपक्रान्ते जरासंधे महीपतौ ॥ ३२ ॥
अस्तं याते दिनकरे नानुसस्रुरुस्तदा निशि ।

राजा जरासंध जब परास्त होकर युद्धसे हट गया और सूर्यदेव अस्त हो गये, तब रातके समय यादवोंने फिर उसका पीछा नहीं किया ॥ ३२ १/२ ॥

समानीय स्वकं सैन्यं लब्धलक्ष्या महाबलाः ॥ ३३ ॥
पुरीं प्रविशिशुर्हृष्टाः केशवेनाभिपारिताः ।

भगवान् श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित महाबली यादव अपने लक्ष्यमें सफल हो चुके थे, अतः वे अपनी सेना साथ लेकर बड़ी प्रसन्नताके साथ मथुरापुरीमें लौट आये ॥ ३३ १/२ ॥

३४६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

खाच्छ्रुतान्यायुधान्येवं तान्येवान्तर्दधुस्तदा ॥ ३४ ॥ जरासंधोऽपि नृपतिर्विमनाः स्वपुरीं ययौ । राजानश्चानुगा येऽस्य स्वराष्ट्राण्येव ते ययुः ॥ ३५ ॥

इसी तरह आकाश या दिव्य लोकसे जो आयुध आये थे, वे भी तत्काल अन्तर्धान हो गये। इधर राजा जरासंध भी उदास होकर अपनी पुरीको लौट गया। उसके साथ जो राजा लोग आये थे, वे भी अपने-अपने राष्ट्रोंको ही लौट गये॥

जरासंधं तु ते जित्वा मेनिरे नैव निर्जितम् । वृष्णयः कुरुशार्दूल राजा ह्यतिबलः स वै ॥ ३६ ॥

कुरुश्रेष्ठ ! वृष्णिवंशी वीर जरासंधको जीतकर भी उसे हारा हुआ नहीं मानते थे; क्योंकि उस राजाके पास बहुत बड़ी सेना थी तथा वह स्वयं भी अत्यन्त बलशाली था॥

दश चाष्टौ च संग्रामाञ्जरासन्धस्य यादवाः । ददुर्न चैनं समरे हन्तुं शेकुर्महाबलाः ॥ ३७ ॥

महाबली यादवोंने जरासंधको अठारह बार युद्धका अवसर प्रदान किया; किंतु वे किसी भी समरमें उसे मार न सके ॥

अक्षौहिण्यश्च तस्यासन् विंशतिश्च महामते । जरासन्धस्य नृपतेस्तदर्थं याः समांगताः ॥ ३८ ॥

महामते ! राजन्! जरासंधके पास बीस अक्षौहिणी सेनाएँ थीं, जो उसके लिये लड़नेको आयी थीं ॥ ३८ ॥

अल्पत्वादभिभूतास्तु वृष्णयो भरतर्षभ । वार्हद्रथेन राजेन्द्र राजभिः सहितेन वै ॥ ३९ ॥

भरतश्रेष्ठ ! राजेन्द्र ! वृष्णिवंशी वीर संख्यामें बहुत कम थे, इसलिये वे राजाओंसहित जरासंधसे अभिभूत हो जाते थे ॥ ३९ ॥

जित्वा तु मागधं संख्ये जरासन्धं महीपतिम् । विहरन्ति स्म सुखिनो वृष्णिसिंहा महारथाः ॥ ४० ॥

मगधके राजा पृथ्वीपति जरासंधको इस प्रकार युद्धमें जीतकर वृष्णिवंशके सिंह-जैसे पराक्रमी महारथी सुखपूर्वक वहाँ विहार करने लगे ॥ ४० ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि जरासंधापयानं नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें जरासंधका पलायनविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥


सप्तत्रिंशोऽध्यायः

जरासंधके पुनः आक्रमणसे शङ्कित यादवोंकी सभामें विकद्रुका भाषण—राजा हर्यश्वका चरित्र तथा उनसे यदु एवं यादवोंकी उत्पत्तिका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

स कृष्णस्तत्र बलवान् रौहिणेयेन संगतः ।
मथुरां यादवाकीर्णां पुरीं तां सुखमावसत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! महाबली भगवान् श्रीकृष्ण रोहिणीकुमार बलदेवजीके साथ मिलकर यादवोंसे भरी हुई उस मथुरापुरीमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ १ ॥

प्राप्तयौवनदेहस्तु युक्तो राजश्रिया विभुः ।
चचार मथुरां प्रीतः सवनाकरभूषनाम् ॥ २ ॥

उनके श्रीअङ्गोंमें यौवनावस्थाका प्रवेश हुआ था। वे भगवान् राजोचित शोभासे सम्पन्न हो वन-प्रान्तसे विभूषित मथुरामें प्रसन्नतापूर्वक विचरते थे ॥ २ ॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य राजा राजगृेश्वरः ।
सस्मार निहतं कंसं जरासंधः प्रतापवान् ॥ ३ ॥

कुछ कालके अनन्तर राजगृहके स्वामी प्रतापी राजा जरासंधने कंसके मारे जानेकी घटनाको फिरसे स्मरण किया ॥

युद्धाय योजितो भूयो दुहितृभ्यां महीपतिः ।
दश सप्त च संग्रामाञ्जरासंधस्य यादवाः ।
ददुर्न चैनं समरे हन्तुं शेकुर्महारथाः ॥ ४ ॥

उसकी दोनों कन्याओंने पुनः उसे युद्धके लिये उत्साहित किया। यादवोंने जरासंधको क्रमशः सत्रह बार युद्धका अवसर दिया; परंतु वे महारथी यादव समरभूमिमे उसे मार न सके ॥

ततो मागधराट् श्रीमांश्चतुरङ्गबलान्वितः ।
भूयोऽप्यष्टादशं कर्तुं संग्रामं स समारभत् ॥ ५ ॥

तदनन्तर श्रीमान् मगधराजने चतुरङ्गिणी सेनाको साथ लेकर फिर अठारहवीं बार यादवोंके साथ युद्ध करनेका आयोजन किया ॥ ५ ॥

वैलक्ष्यात् पुनरेवासौ राजा राजगृेश्वरः ।
जरासंधो वली श्रीमान् पाकशासनविक्रमः ॥ ६ ॥

राजगृहका स्वामी बलवान् राजा श्रीमान् जरासंध इन्द्रके समान पराक्रमी था। उसने पहलेकी पराजयसे लज्जाका अनुभव करनेके कारण पुनः युद्धकी तैयारी की ॥ ६ ॥

स साधनेन महता वृहद्रथसुतो वली ।
कृष्णस्य वधमन्विच्छन् भूयो वै संन्यवर्तत ॥ ७ ॥

विष्णुपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः ३४७


बृहद्रथका वह बलवान् पुत्र महान् साधनसे सम्पन्न हो श्रीकृष्णका वध चाहता हुआ फिर मथुरापुरीकी ओर लौटा ॥

तं श्रुत्वा सहिताः सर्वे निवृत्तं मगधेश्वरम्।
यादवा मन्त्रयामासुर्जरासंधभयार्दिताः ॥ ८ ॥

मगधराजको पुनः लौटा हुआ सुनकर जरासंधके भयसे पीड़ित हुए सब यादव एक साथ बैठकर मन्त्रणा करने लगे ॥

ततः प्राह महातेजा विकद्रुर्नयकोविदः ।
कृष्णं कमलपत्राक्षमग्रसेनस्य शृण्वतः ॥ ९ ॥

उस समय नीतिकुशल महातेजस्वी विकद्रुने उग्रसेनके सुनते हुए कमलनयन श्रीकृष्णसे कहा—॥ ९ ॥

श्रूयतां तात गोविन्द कुलस्यास्य समुद्भवः ।
श्रूयतामभिधास्यामि प्राप्तकालमहं ततः ।
युक्तं चेन्मन्यसे साधो करिष्यसि वचो मम ॥ १० ॥

'तात ! गोविन्द ! इस कुलकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनो। इसके लिये उपयुक्त अवसर आया है, इसलिये बता रहा हूँ; ध्यान देकर श्रवण करो। साधो ! इसे सुनकर यदि उचित समझो तो मेरे कथनानुसार कार्य करना ॥ १० ॥

यादवस्यास्य वंशस्य समुद्भवमशेषतः ।
यथा मे कथितः पूर्वं व्यासेन विदितात्मना ॥ ११ ॥

'यादववंशकी इस उत्पत्तिका सारा प्रसंग आत्मज्ञानी व्यासजीने पूर्वकालमें मुझे जैसा बताया था, वैसा ही सुना रहा हूँ ॥ ११ ॥

आसीद् राजा मनोर्वंशे श्रीमानिक्ष्वाकुसम्भवः ।
हर्यश्व इति विख्यातो महेन्द्रसमविक्रमः ॥ १२ ॥

'वैवस्वत मनुके वंशमें इक्ष्वाकुके पुत्र हर्यश्व नामसे विख्यात एक श्रीसम्पन्न राजा हो गये हैं, जो महेन्द्रके तुल्य पराक्रमी थे ॥ १२ ॥

तस्यासीद् दयिता भार्या मधोर्दैत्यस्य वै सुता ।
देवी मधुमती नाम यथेन्द्रस्य शची तथा ॥ १३ ॥

'मधु नामक दैत्यकी पुत्री मधुमती देवी उनकी प्राण-प्यारी भार्या थी। जैसे इन्द्रको शची प्रिय है, उसी प्रकार हर्यश्वको मधुमती प्रिय थी ॥ १३ ॥

सा यौवनगुणोपेता रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
मनोरथकरी राज्ञः प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ १४ ॥

'वह यौवनके गुणोंसे सम्पन्न थी। इस पृथ्वीपर उसके रूप सौन्दर्यकी कहीं तुलना नहीं थी। वह राजा हर्यश्वके मनोरथको सिद्ध करनेवाली होनेके कारण उन्हें प्राणोंसे भी अधिक माननीया थी ॥ १४ ॥

दानवेन्द्रकुले जाता सुश्रोणी कामरूपिणी ।
एकपत्नीव्रतधरा खेचरा रोहिणी यथा ॥ १५ ॥

'दानवराज मधुके कुलमें उत्पन्न हुई वह सुन्दर कटि-प्रदेशवाली कामरूपिणी देवी रोहिणीके समान एकपत्नीव्रतका पालन करनेवाली तथा आकाशमें विचरनेवाली थी ॥ १५ ॥

सा तमिक्ष्वाकुशार्दूलं कामयामास कामिनी ।
स कदाचिन्नरश्रेष्ठो भ्रात्रा ज्येष्ठेन माधव ॥ १६ ॥
राज्यान्निरस्तो विश्वस्तः सोऽयोध्यां सम्परित्यजत् ।
स तदाल्पपरीवारः प्रियया सहितो वने ॥ १७ ॥

'वह कामिनी होकर इक्ष्वाकुवंशके श्रेष्ठ वीर हर्यश्वको सम्पूर्ण हृदयसे चाहती थी। माधव ! एक दिन बड़े भाईने उनके विश्वासपर रहनेवाले नरश्रेष्ठ हर्यश्वको राज्यसे निकाल दिया, तब उन्होंने अयोध्या छोड़ दी और थोड़े-से परिवारके साथ अपनी प्रिया मधुमतीसहित वे वनमें रहने लगे ॥

रेमे समेत्य कालज्ञः प्रियया कमलेक्षणः ।
भ्रात्रा विनिष्कृतं राज्यात् प्रोवाच कमलेक्षणा ॥ १८ ॥

'कालकी महिमाको जाननेवाले कमलनयन हर्यश्व अपनी प्यारी पत्नीके साथ मिलकर वहाँ बड़े आनन्दसे समय बिताने लगे। एक दिन कमलनयनी मधुमतीने भाईद्वारा राज्यसे निकाले गये पतिसे कहा—॥ १८ ॥

एह्यागच्छ नरश्रेष्ठ त्यज राज्यकृतां स्पृहाम् ।
गच्छावः सहितौ वीर मधोर्मम पितुर्गृहम् ॥ १९ ॥

'नरश्रेष्ठ वीर ! अयोध्याके राज्यकी अभिलाषा छोड़ दो और आओ मेरे साथ चलो। हम दोनों मेरे पिता मधुके घरपर चलें ॥ १९ ॥

रम्यं मधुवनं नाम कामपुष्पफलद्रुमम् ।
सहितौ तत्र रंस्यावो यथा दिवि गतौ तथा ॥ २० ॥

'सुरम्य मधुवन नामक वन ही मेरे पिताका निवासस्थान है। वहाँके वृक्ष इच्छानुसार फूल और फल देनेवाले हैं। वहाँ हम दोनों साथ रहकर स्वर्गवासियोंके समान मौज करेंगे॥

पितुर्मे दयितस्त्वं हि मातुर्मम च पार्थिव ।
मत्प्रियार्थं प्रियतरो भ्रातुश्च लवणस्य वै ॥ २१ ॥

'पृथ्वीनाथ ! मेरे पिता और माता दोनोंको ही तुम बहुत प्रिय हो तथा मेरा प्रिय करनेके लिये मेरा भाई लवणासुर भी तुम्हें अत्यन्त प्रिय मानेगा ॥ २१ ॥

रंस्यावस्तत्र सहितौ राज्यस्थाविव कामगौ ।
तत्र गत्वा नरश्रेष्ठ ह्यमराविव नन्दने ।
भद्रं ते विहरिष्यावो यथा देवपुरे तथा ॥ २२ ॥

'नरश्रेष्ठ ! वहाँ जाकर हम दोनों साथ-साथ रहकर राज्यपर बैठे हुए दम्पतियोंकी भाँति इच्छानुरूप वस्तुओंका उपभोग करते हुए रमण करेंगे। जैसे देवपुरीके नन्दनवनमें देवाङ्गना और देवता विहार करते हैं, उसी प्रकार वहाँ हम दोनों विहार करेंगे। आपका भला हो ॥ २२ ॥

३४८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


तं त्यजाव महाराज भ्रातरं तेऽभिमानिनम्।
आवयोर्द्वेषिणं नित्यं मत्तं राज्यमदेन वै॥ २३॥

‘महाराज! आपका भाई राज्यके मदसे सदा उन्मत्त रहकर अभिमानमें भरा रहता है और हम दोनोंसे द्वेष रखता है; अतः हम दोनों उसे त्याग दें॥ २३॥

धिगिमं गर्हितं वासं भृत्यवच्च पराश्रयम्।
गच्छावः सहितौ वीर पितुर्मे भवनान्तिकम्॥ २४॥

‘दासकी भाँति दूसरेके आश्रित होकर रहना अच्छा नहीं है; अतः इस निन्दित निवासको धिक्कार है। वीर! चलो, हम दोनों मेरे पिताके घरके पास चलें’॥ २४॥

तस्य सम्यक्प्रवृत्तस्य पूर्वजं भ्रातरं प्रति।
कामार्तस्य नरेन्द्रस्य पत्न्यास्तद् रुरुचे वचः॥ २५॥

‘श्रीकृष्ण! यद्यपि हर्यश्वका अपने बड़े भाईके प्रति अच्छा बर्ताव था (वह उनसे कोई प्रतिशोध नहीं लेना चाहता था), तो भी कामसे पीड़ित होनेके कारण उस नरेशको पत्नीकी बात पसंद आ गयी॥ २५॥

ततो मधुपुरं राजा हर्यश्वः स जगाम च।
भार्यया सह कामिन्या कामी पुरुषपुङ्गवः॥ २६॥

‘तब कामी पुरुषप्रवर राजा हर्यश्व अपनी कामवती पत्नीके साथ मधुपुरको चला गया॥ २६॥

मधुना दानवेन्द्रेण स साम्ना समुदाहृतः।
स्वागतं वत्स हर्यश्व प्रीतोऽस्मि तव दर्शनात्॥ २७॥

‘वहाँ दानवराज मधुने उससे सान्त्वनापूर्वक कहा—‘बेटा हर्यश्व! तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम्हारे दर्शनसे (अथवा तुमसे मिलकर) बहुत प्रसन्न हूँ॥ २७॥

यदेतन्मम राज्यं वै सर्वं मधुवनं विना।
ददामि तव राजेन्द्र वासश्च प्रतिगृह्यताम्॥ २८॥

‘राजेन्द्र! यह जो मेरा सारा राज्य है, उसे मैं केवल मधुवनको छोड़कर तुम्हें सौंप रहा हूँ। तुम यहाँ निवास करो॥ २८॥

वनेऽस्मिल्लवणश्चायं सहायस्ते भविष्यति।
अमित्रनिग्रहे चैव कर्णधारत्वमेष्यति॥ २९॥

‘इस वनमें यह मेरा पुत्र लवण भी तुम्हारा सहायक होगा तथा शत्रुओंका निग्रह करनेमें यह तुम्हारे लिये कर्णधारका काम देगा॥ २९॥

पालयैनं शुभं राष्ट्रं समुद्रानूपभूषितम्।
गोसमृद्धं श्रिया जुष्टमाभीरप्रायमानुपम्॥ ३०॥

‘तुम समुद्रके जलप्राय प्रदेशसे विभूषित इस शुभ राष्ट्रका पालन करो। यह गौओंसे समृद्ध और लक्ष्मीसे सेवित है तथा इसमें अधिकतर आभीर जातिके लोगोंका निवास है॥

अत्र ते वसतस्तात दुर्गं गिरिपुरं महत्।
भविता पार्थिवावासः सुराष्ट्रविषयो महान्॥ ३१॥
अनूपविषयश्चैव समुद्रान्ते निरामयः।

‘तात! यहाँ रहनेपर महान् एवं दुर्गम गिरिपुर (गिरिनार या रैवतक पर्वतसे मिला हुआ नगर) तुम्हारी राजधानीके रूपमें प्रतिष्ठित होगा। यह महान् सुराष्ट्र राज्य समुद्रके निकट और जलप्राय प्रदेशसे युक्त है। यहाँ किसी प्रकारका रोग नहीं होता॥ ३१½॥

आनर्तं नाम ते राष्ट्रं भविष्यत्यायतं महत्॥ ३२॥
तद् भविष्यमहं मन्ये कालयोगेन पार्थिव।
अध्यास्यतां यथाकालं पार्थिवं वृत्तमुत्तमम्॥ ३३॥

‘तुम्हारा विशाल एवं विस्तृत राज्य आनर्त नामसे विख्यात होगा। पृथ्वीनाथ! मेरा विश्वास है कि कालयोगसे वह अवश्यम्भावी है। तुम समयानुसार उत्तम राजोचित बर्तावका आश्रय लेकर यहाँ रहो॥ ३२-३३॥

यायातमपि वंशस्ते समेष्यति च यादवम्।
अनु वंशं च वंशस्ते सोमस्य भविता किल॥ ३४॥

‘तुम्हारा यह वंश ययाति एवं यदुके वंशमें मिल जायगा। चन्द्रवंशके भीतर तुम्हारा वंश चलेगा (सूर्यवंशसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं रह जायगा)॥ ३४॥

एष मे विभवस्तात तवेमं विषयोत्तमम्।
दत्त्वा यास्यामि तपसे सागरं लवनालयम्॥ ३५॥

‘तात! यही मेरा विभव है। मैं तुम्हें यह उत्तम राज्य देकर तपस्याके लिये लवणसमुद्रको चला जाऊँगा॥ ३५॥

लवणेन समायुक्तस्त्वमिमं विषयोत्तमम्।
पालयस्वाखिलं तात स्वस्य वंशस्य वृद्धये॥ ३६॥

‘तात! तुम लवणके साथ रहकर अपने वंशकी वृद्धिके लिये इस समस्त उत्तम राज्यका पालन करो॥ ३६॥

बाढमित्येव हर्यश्वः प्रतिजग्राह तत् पुरम्।
स च दैत्यस्तपोवासं जगाम वरुणालयम्॥ ३७॥

‘तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर हर्यश्वने उस पुरको ग्रहण किया; फिर वह दैत्य तपस्याके लिये समुद्रको चला गया॥

हर्यश्वश्च महातेजा दिव्ये गिरिवरोत्तमे।
निवेशयामास पुरं वासार्थममरोपमः॥ ३८॥

‘अमरोंके समान महातेजस्वी हर्यश्वने दिव्य एवं श्रेष्ठ गिरिवर (रैवतक) के समीप अपने रहनेके लिये एक नगर बसाया॥ ३८॥

आनर्तं नाम तद् राष्ट्रं सुराष्ट्रं गोधनायुतम्।
अचिरेणैव कालेन समृद्धं प्रत्यपद्यत॥ ३९॥

‘आनर्त नामसे प्रसिद्ध वह गोधनसम्पन्न राष्ट्र सुराष्ट्र

विष्णुपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः [ ३४९


कहलाया और थोड़े ही समयमें समृद्धिशाली हो गया ॥३९॥

अनूपविषये चैव वेलावनविभूषितम् ।
विचित्रं क्षेत्रसस्याढ्यं प्राकारग्रामसंकुलम् ॥ ४० ॥
शशास नृपतिः स्फीतं तद् राष्ट्रं राष्ट्रवर्द्धनः ।
राजधर्मेण यशसा प्रजानां नन्दिवर्द्धनः ॥ ४१ ॥

'जलप्राय देशमें समुद्रतटवर्ती वनोंसे विभूषित, विचित्र, खेतों और हरी-भरी खेतीसे सुशोभित, परकोटों और गाँवोंसे युक्त तथा धनधान्यसे सम्पन्न उस राष्ट्रपर राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले राजा हर्यश्व शासन करने लगे और राजधर्म एवं यशसे प्रजाका आनन्द बढ़ाने लगे ॥ ४०-४१ ॥

तस्य सम्यक् प्रचारेण हर्यश्वस्य महात्मनः ।
व्यवधंत तदक्षोभ्यं राष्ट्रं राष्ट्रगुणैर्युतम् ॥ ४२ ॥

'महामना हर्यश्वके उत्तम आचार-व्यवहारके कारण वह अक्षोभ्य राष्ट्र उत्तम राष्ट्रके गुणोंसे सम्पन्न हो निरन्तर उन्नति करने लगा ॥ ४२ ॥

स हि राजा स्थितो राज्ये राजवृत्तेन शोभितः ।
प्राप्तः कुलोचितां लक्ष्मीं वृत्तेन च नयेन च ॥ ४३ ॥

'राज्यपर स्थित होकर राजोचित बर्तावसे सुशोभित होनेवाले उन राजा हर्यश्वने सदाचार और उत्तम नीतिसे अपने कुलके लिये उचित लक्ष्मी प्राप्त कर ली ॥ ४३ ॥'

तस्यैव च सुवृत्तस्य पुत्रकामस्य धीमतः ।
मधुमत्यां सुतो जज्ञे यदुर्नाम महायशाः ॥ ४४ ॥

'पुत्रकी इच्छा रखनेवाले उन्हीं सदाचारी एवं बुद्धिमान् हर्यश्वके मधुमतीके गर्भसे महायशस्वी यदुका जन्म हुआ* ॥ ४४ ॥

सोऽवर्धत महातेजा यदुदुन्दुभिनिःस्वनः ।
राजलक्षणसम्पन्नः सपत्नौर्दुरतिक्रमः ॥ ४५ ॥

'महातेजस्वी यदुका स्वर दुन्दुभिनिनादके समान गम्भीर था। वे राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न होकर दिनोंदिन बढ़ने लगे। शत्रुओंके लिये वे सर्वथा दुर्जय थे ॥ ४५ ॥

यदुर्नामाभवत् पुत्रो राजलक्षणपूजितः ।
यथास्य पूर्वजो राजा पूरुः स सुमहायशाः ॥ ४६ ॥

'हर्यश्वका वह पुत्र यदु नामसे ही विख्यात हुआ। यदु राजोचित लक्षणोंसे सम्मानित थे, ठीक उसी तरह जैसे उनके पूर्वज राजा महायशस्वी पूरु सम्मानित होते थे ॥ ४६ ॥


* कहते हैं, जैसे ब्रह्माजीके मानसपुत्र वसिष्ठ किसी कारणवश मित्रावरुणके अंशसे नूतन शरीर धारण करके प्रकट हुए; फिर भी वसिष्ठ ही बने रहे, उसी प्रकार ययातिपुत्र महाराज यदु ही योग-बलसे हर्यश्वके पुत्ररूपमें प्रकट हुए थे और उसी पूर्व नामसे प्रख्यात हुए।


स एक एव तस्यासीत् पुत्रः परमशोभनः ।
ऊर्जितः पृथिवीभर्त्ता हर्यश्वस्य महात्मनः ॥ ४७ ॥

'महामना हर्यश्वके एक ही पुत्र यदु हुए। वे परम सुन्दर, बलवान् और पृथ्वीका भरण-पोषण करनेमें समर्थ थे ॥ ४७ ॥

दस वर्षसहस्राणि स कृत्वा राज्यमव्ययम् ।
जगाम त्रिदिवं राजा धर्मेणाप्रतिमो भुवि ॥ ४८ ॥

'राजा हर्यश्व दस हजार वर्षोंतक अक्षय राज्यका उपभोग करके स्वर्गलोकमें चले गये । वे भूमण्डलके अनुपम धर्मात्मा थे ॥ ४८ ॥

ततो यदुरदीनात्मा प्रजाभिस्त्वभ्यषिच्यत ।
पितुर्युपरते श्रीमान् क्रमेणार्क इवोदितः ॥ ४९ ॥

'पिताके मर जानेपर प्रजाओंने उदारचेता श्रीमान् यदु-को उनके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वे क्रमशः एक सूर्यके बाद दूसरे सूर्यके समान उदित हो प्रकाशित होने लगे ॥ ४९ ॥

शशास चेमां वसुधां प्रशान्तभयतस्कराम् ।
यदुरिन्द्रप्रतीकाशो नृपो येनास्म यादवाः ॥ ५० ॥

'वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी यदु, जिनके कारण हमलोग यादव कहलाते हैं, जब इस पृथ्वीका शासन करने लगे, तब यहाँका सारा भय शान्त हो गया। चोर-लुटेरे आदि लुप्त हो गये ॥ ५० ॥

स कदाचिन्नृपश्चक्रे जलक्रीडां महोदधौ ।
दारैः सह गुणोदारैः सतार इव चन्द्रमाः ॥ ५१ ॥

'एक समयकी बात है, राजा यदु अपनी उदार गुणवाली पत्नियोंके साथ ताराओंसहित चन्द्रमाके समान महासागरमें जलक्रीडा कर रहे थे ॥ ५१ ॥

स तत्र सहसा क्षिप्तस्तितीर्षुः सागराम्भसि ।
धूम्रवर्णेन नृपतिः सर्पराजेन वीर्यवान् ॥ ५२ ॥
सोऽपाकृष्यत वेगेन जले सर्पपुरं महत् ।

'वे पराक्रमी राजा यदु जलको पार करके निकलना ही चाहते थे कि सहसा किसीने उन्हें समुद्रके गहरे जलमें डाल दिया। बात यह हुई कि सर्पोंके राजा धूम्रवर्णने बड़े वेगसे उनको खींचा और जलके भीतर बसे हुए सर्पोंके एक महान् नगरमें पहुँचा दिया ॥ ५२३ ॥

मणिस्तम्भगृहद्वारं मुक्तादामविभूषितम् ॥ ५३ ॥
कीर्णं शङ्खकुलैः शुभ्रै रत्नरैशिविभूषितम् ।
प्रवालाङ्कूरपत्राढ्यैः पादपैरुपशोभितम् ॥ ५४ ॥

'वहाँके खम्भे, घर और द्वार सभी मणियोंके बने हुए थे। उन सबको मोतीकी लड़ियों एवं झालरोंसे सजाया गया था। वहाँ ढेर-के-ढेर श्वेत शङ्खोंके समूह पड़े हुए थे। रत्न-

३५०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

राशियोंसे उस नगरके घर-द्वारको विभूषित किया गया था। नूतन पल्लव, अंकुर और पत्तोंसे युक्त वृक्ष उस नगरकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ५३-५४ ॥

कीर्णं पन्नगनार्योघैः समुद्रोदरवासिभिः ।
स्वर्णवर्णेन भास्वन्तं स्वस्तिकेनेन्दुवर्चसा ॥ ५५ ॥
'वहाँ समुद्रके उदरमें निवास करनेवाली नागदलनाएँ भरी हुई थीं। वह ग्राम कहीं सुवर्णमय और कहीं चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिमान् स्वस्तिकसे प्रकाशित होता था ॥ ५५ ॥

स तं ददर्श राजेन्द्रो विमले सागराम्भसि ।
पन्नगेन्द्रपुरं तोये जगत्यामिव निर्मितम् ॥ ५६ ॥
'राजाधिराज यदुने देखा;— समुद्रके निर्मल जलमें बना हुआ यह नागराजका नगर भूतलपर ही निर्मित हुआ-सा जान पड़ता है ॥ ५६ ॥

स्वच्छं चैव पुरं तत्र प्रविवेश नृपो यदुः ।
अगाधं तोयदाकारं पूर्णं सर्पवधूगणैः ॥ ५७ ॥
'राजा यदुने सर्पवधुओंसे भरे हुए उस अगाध जलदाकार स्वच्छ नगरमें प्रवेश किया ॥ ५७ ॥

तस्य दत्तं मणिमयं जलजं परमासनम् ।
स्वास्तीर्णं पद्मपत्रैश्च पद्मसूत्रोत्तरच्छदम् ॥ ५८ ॥
'वहाँ उन्हें मणिमय कमलका आसन दिया गया, जिसपर पद्मोँके दल बिछे हुए थे और पद्मसूत्रोंकी ही बनी हुई चादर डाली गयी थी ॥ ५८ ॥

तमासीनं नृपं तत्र परमे पन्नगासने ।
द्विजिह्वपतिरव्यग्रो धूम्रवर्णोऽभ्यभाषत ॥ ५९ ॥
'सर्पोंके दिये हुए उस उत्तम आसनपर जब राजा यदु वहाँ विराजमान हुए, तब सर्पराज धूम्रवर्णने उनसे शान्तभाव- से कहा- ॥ ५९ ॥

पिता ते स्वर्गतिं प्राप्तः कृत्वा वंशमिमं महत् ।
भवन्तं तेजसा युक्तमुत्पाद्य वसुधाधिपम् ॥ ६० ॥
'राजन् ! तुम्हारे पिता इस विशाल वंशकी नींव डालकर और तुम-जैसे तेजस्वी भूपालको जन्म देकर स्वर्गलोकको चले गये ॥ ६० ॥

यादवानामयं वंशस्तवनाम्ना यदुपुङ्गव ।
पित्रा ते मङ्गलार्थाय स्थापितः पार्थिवाकरः ॥ ६१ ॥
'यदुपुङ्गव ! तुम्हारे नामसे ही यह वंश यादववंश कहलायेगा। तुम्हारे पिताने तुम्हारे मङ्गलके लिये ही इस कुलकी स्थापना की है, जो राजाओंकी खान है ॥ ६१ ॥

वंशे चास्मिंस्त्व विभो देवानां तनयाव्ययाः ।
ऋषीणामुरगाणां च उत्पत्स्यन्ते नृयोनिजाः ॥ ६२ ॥
'प्रभो ! तुम्हारे इस वंशमें देवताओं और ऋषियों तथा नागोंकी अक्षय संतानें मनुष्य-योनिमें उत्पन्न होंगी ॥ ६२ ॥

तन्ममेमाः सुताः पञ्च कुमार्यो वृत्तसम्मताः ।
उत्पन्ना यौवनाश्वस्य भगिन्यां नृपसत्तम ॥ ६३ ॥
'नृपश्रेष्ठ ! मेरी जो ये पाँच कुमारी कन्याएँ हैं, ये उत्तम आचार-व्यवहारसे सम्मानित हैं। इनका जन्म यौवनाश्वकी बहिनके गर्भसे हुआ है ॥ ६३ ॥

प्रतीच्छेमाः स्वधर्मेण प्राजापत्येन कर्मणा ।
वरं च ते प्रदास्यामि वरार्हस्त्वं मतो मम ॥ ६४ ॥
'तुम अपने धर्मके अनुसार वैवाहिक विधिसे इन कन्याओंको ग्रहण करो। मेरी धारणाके अनुसार तुम वर पानेके योग्य हो, अतः मैं तुम्हें मनोवाञ्छित वर भी दूँगा ॥ ६४ ॥

भैमाश्च कुकुराश्चैव भोजाश्चान्धकयादवाः ।
दाशार्हा वृष्णयश्चेति ख्यातिं यास्यन्ति सप्त ते ॥ ६५ ॥
'तुमसे सात कुल विख्यात होंगे, जो भौम, कुक्कुर, भोज, अन्धक, यादव, दाशार्ह तथा वृष्णिके नामसे प्रसिद्ध होंगे' ॥

स तस्मै धूम्रवर्णो वै कन्याः कन्याव्रते स्थिताः ।
जलपूर्वेन योगेन ददाविन्द्रसमाय वै ॥ ६६ ॥
'ऐसा कहकर धूम्रवर्णने इन्द्रतुल्य तेजस्वी यदुको कन्या- व्रतमें स्थित हुई वे कन्याएँ हाथमें जल लेकर संकल्पपूर्वक दे दीं ॥ ६६ ॥

वरं चास्मै ददौ प्रीतः स वै पन्नगपुङ्गवः ।
श्रावयन् कन्यकाः सर्वा यथाक्रममदीनवत् ॥ ६७ ॥
'फिर उन नागशिरोमणि धूम्रवर्णने प्रसन्न होकर समस्त कन्याओंको सुनाते हुए एक उदार पुरुषकी भाँति राजाको क्रमशः वर प्रदान किये ॥ ६७ ॥

एतासु ते सुताः पञ्च सुतासु मम मानद ।
उत्पत्स्यन्ते पितुस्तेजो मातुश्चैव समाश्रिताः ॥ ६८ ॥
'मानद ! मेरी इन पाँच कन्याओंसे तुम्हारे पाँच पुत्र उत्पन्न होंगे, जो पिता और माता दोनोंके तेजसे सम्पन्न होंगे ॥ ६८ ॥

अस्मत्समयवृद्धाश्च सलिलाभ्यन्तरेचराः ।
तव वंशे भविष्यन्ति पार्थिवाः कामरूपिणः ॥ ६९ ॥
'हमारे वरदानसे अनुगृहीत होकर तुम्हारे वंशके वे सभी राजा जलके भीतर विचरनेवाले तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ होंगे ॥ ६९ ॥

स वरं कन्यकाश्चैव लब्ध्वा यदुवरस्तदा ।
उदतिष्ठत वेगेन सलिलाच्चन्द्रमा इव ॥ ७० ॥
'वे श्रेष्ठ यदु उस समय वर और उन कन्याओंको पाकर चन्द्रमाके समान वेगपूर्वक जलसे ऊपर उठे ॥ ७० ॥

स पञ्चकन्यामध्यस्थो ददृशे तत्र पार्थिवः ।
पञ्चतारेण संयुक्को नक्षत्रेणेव चन्द्रमाः ॥ ७१ ॥
'पाँच कन्याओंके बीचमें स्थित हुए राजा यदु वहाँ पाँच

विष्णुपर्व ]सप्तत्रिंशोऽध्यायः३५१

ताराओंवाले नक्षत्रसे संयुक्त चन्द्रमाके समान दिखायी देते थे ॥ ७१ ॥

स तदन्तःपुरं सर्वं ददर्श नृपसत्तमः।
वैवाहिकेन वेषेण दिव्यस्रगनुलेपनः ॥ ७२ ॥

'वैवाहिक वेशसे युक्त तथा दिव्य हार एवं चन्दन धारण करनेवाले नृपश्रेष्ठ यदुने जलसे बाहर आकर अपने समस्त अन्तःपुरको वहाँ उपस्थित देखा ॥ ७२ ॥

समाश्वास्य च ताः सर्वाः सपत्नीः पावकोपमाः।
जगाम स्वपुरं राजा प्रीत्या परमया युतः ॥ ७३ ॥

'तदनन्तर अग्निके समान तेजस्विनी उन सारी पत्नियोंको आश्वासन देकर राजा यदु अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक उन सबके साथ अपने नगरको चले गये' ॥ ७३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि विकद्रुवाक्यं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें विकद्रुका वाक्यविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥


अष्टात्रिंशोऽध्यायः

विकद्रुद्वारा यदुकी संततिका वर्णन तथा मथुरापुरीको जरासंधका आक्रमण सहनेके अयोग्य बताना

वैशम्पायन उवाच

स तासु नागकन्यासु कालेन महता नृपः।
जनयामास विक्रान्तान् पञ्च पुत्रान् कुलोद्वहान् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! यदुने दीर्घकालके पश्चात् उन पाँचों नागकन्याओंके गर्भसे पाँच पराक्रमी एवं कुलका भार वहन करनेमे समर्थ पुत्र उत्पन्न किये ॥ १ ॥

मुचुकुन्दं महाबाहुं पद्मवर्णं तथैव च।
माधवं सारसं चैव हरितं चैव पार्थिवम् ॥ २ ॥

उनके नाम इस प्रकार हैं—महाबाहु मुचुकुन्द, पद्मवर्ण, माधव, सारस तथा राजा हरित ॥ २ ॥

एतान् पञ्च सुतान् राजा पञ्चभूतोपमान् भुवि।
ईक्षमाणो नृपः प्रीतिं जगामातुलविक्रमः ॥ ३ ॥

ये पाँचों पुत्र भूतलपर पाँच भूतोंके समान थे । अतुल पराक्रमी राजा यदु इन्हे देखकर बहुत प्रसन्न होते थे ॥ ३ ॥

ते प्राप्तवयसः सर्वे स्थिताः पञ्च यथाद्रयः।
तेजिता बलदर्पाभ्यामूचुः पितरमग्रतः ॥ ४ ॥

जब वे सब वयस्क हुए, तब पाँच पर्वतोंके समान प्रतीत होने लगे। एक दिन अपने बल और दर्पसे प्रोत्साहित होकर वे अपने पिताके सामने खड़े हो इस प्रकार बोले—॥ ४ ॥

तात युक्ताः स्म वयसा बले महति संस्थिताः।
क्षिप्रमाज्ञाप्तुमिच्छामः किं कुर्मस्तव शासनात् ॥ ५ ॥

'तात ! अब हम बड़ी अवस्थाके हो गये, महान् बलमे हमारी स्थिति है (हम महान् बलवान् हैं); अतः शीघ्र आपकी आज्ञा चाहते हैं, बताइये, आपके आदेशसे हम कौन-सा कार्य करें'? ॥ ५ ॥

स तान् नृपतिशार्दूलः शार्दूलानिव वेगितान्।
प्रीत्या परमया प्राह सुतान् वीर्यकुतूहलात् ॥ ६ ॥

नरेशोमे सिंहके समान पराक्रमी यदुने सिंहोंके ही सदृश वेगशाली अपने इन पुत्रोसे उनके बल-पराक्रमको जाननेकी उत्सुकतासे अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक कहा—॥ ६ ॥

विन्ध्यर्क्षवन्तावभितो द्वे पुर्यौ पर्वताश्रये।
निवेशयतु यत्नेन मुंचुकुन्दः सुतो मम ॥ ७ ॥

'मेरा पुत्र मुचुकुन्द विन्ध्य और ऋक्षवान् पर्वतोंके निकट पर्वतीय भूमिका ही आश्रय ले यत्नपूर्वक दो पुरियाँ बसाये ॥ ७ ॥

सह्यस्य चोपरिष्टात्तु दक्षिणां दिशमाश्रितः।
पद्मवर्णोऽपि मे पुत्रो निवेशयतु मा चिरम् ॥ ८ ॥

'मेरा बेटा पद्मवर्ण भी दक्षिण दिशाका आश्रय ले सह्यपर्वतके शिखरपर शीघ्र एक नगर बसाये !॥ ८ ॥

तत्रैव परतः कान्ते देशे चम्पकभूषिते।
सारसो मे पुरं रम्यं निवेशयतु पुत्रकः ॥ ९ ॥

'वहीं पश्चिम दिशाकी ओर चम्पाके वृक्षोंसे सुशोभित मनोरम प्रदेशमे बेटा सारस एक रमणीय राजधानीकी स्थापना करे ॥ ९ ॥

हरितोऽयं महाबाहुः सागरे हरितोदके।
द्वीपं पन्नगराजस्य सुतो मे पालयिष्यति ॥ १० ॥

'मेरा पुत्र यह महाबाहु हरित हरे जलसे भरे हुए समुद्रमें नागराज धूम्रवर्णके द्वीपका पालन करेगा ॥ १० ॥

माधवो मे महाबाहुर्ज्येष्ठपुत्रश्च धर्मवित्।
यौवराज्येन संयुक्तः स्वपुरं पालयिष्यति ॥ ११ ॥

'मेरा पाँचवाँ पुत्र महाबाहु माधव ज्येष्ठ तथा धर्मज्ञ है, यह युवराज होकर अपने इसी नगरका (जो रैवतकके समीप है) पालन करेगा' ॥ ११ ॥

सर्वे नृपश्रियं प्राप्ता अभिषिक्ताः सचामराः।
पित्रानुशिष्टाश्चत्वारो लोकपालोपमा नृपाः ॥ १२॥

३५२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

स्वं स्वं निवेशनं सर्वे भेजिरे नृपसत्तमाः ।
पुरस्थानानि रम्याणि मृगयन्तो यथाक्रमम् ॥ १३ ॥

उन सबको राज्यलक्ष्मी प्राप्त हुई। सबका विभिन्न राज्योंपर अभिषेक हुआ तथा सभी छत्र-चामर आदि राजोचित चिह्नोंसे अलंकृत हुए। तत्पश्चात् पिताकी आज्ञा पाकर लोकपालोंके समान वे चारों नृपश्रेष्ठ राजकुमार अपने-अपने घरमें गये। फिर उन्होंने क्रमशः सुरम्य राजधानी बनानेके लिये स्थानकी खोज प्रारम्भ की ॥ १२-१३ ॥

मुचुकुन्दश्च राजर्षिर्विन्ध्यमध्यमरोचयत् ।
स्वस्थानं नर्मदातीरे दारुणोपलसंकटे ॥ १४ ॥

राजर्षि मुचुकुन्दने विन्ध्यपर्वतके मध्यवर्ती स्थानको पसंद किया। उन्होंने विषम प्रस्तरखण्डोंसे भरे हुए दुर्गम नर्मदा-तटपर अपना स्थान बनाया ॥ १४ ॥

स च तं शोधयामास विविक्तं च चकार ह ।
सेतुं चैव समं चक्रे परिखाश्चामितोदकाः ॥ १५ ॥

उन्होंने उस स्थानका शोधन किया और उसे एकान्त एवं पवित्र बनाया। सम सेतुका निर्माण किया और अथाह जलसे भरी हुई खाइयाँ खुदवायीं ॥ १५ ॥

स्थापयामास भागेषु देवतायतनान्यपि ।
रथ्या वीथीर्नृणां मार्गांश्चत्वराणि वनानि च ॥ १६ ॥

नगरके विभिन्न भागोंमें बहुत-से देवमन्दिर भी स्थापित किये। सड़कें, गलियाँ, जनसाधारणके मार्ग तथा चौराहे बनवाये और वन भी लगवाये ॥ १६ ॥

स तां पुरीं धनवतीं पुरुहूतपुरीप्रभाम् ।
नातिदीर्घेण कालेन चकार नृपसत्तमः ॥ १७ ॥

उन नृपश्रेष्ठ मुचुकुन्दने उस पुरीको थोड़े ही दिनोंमें धन-धान्यसे सम्पन्न करके इन्द्रपुरीके समान प्रकाशित एवं सुशोभित कर दिया ॥ १७ ॥

नाम चास्याः शुभं चक्रे निर्मितं स्वेन तेजसा ।
तस्याः पुर्या नृपश्रेष्ठो देवश्रेष्ठपराक्रमः ॥ १८ ॥

देवताओंके समान श्रेष्ठ पराक्रमी नृपवर मुचुकुन्दने उस पुरीका अपने ही तेजसे निर्मित शुभ सुन्दर नाम रक्खा—॥ १८ ॥

महाश्मसंघातवती यथेयं विन्ध्यसानुगा ।
माहिष्मती नाम पुरी प्रकाशमुपयास्यति ॥ १९ ॥

'विन्ध्य-गिरिके शिखरपर बसी हुई यह नगरी महान् अश्मसंघात (प्रस्तर-समूह) से युक्त है, इसलिये संसारमें 'माहिष्मतीपुरी' के नामसे विख्यात होगी' ॥ १९ ॥

उभयोर्विन्ध्ययोः पादे नगयोस्तां महापुरीम् ।
मध्ये निवेशयामास श्रिया परमया युताम् ॥ २० ॥

राजा मुचुकुन्दने उत्तम शोभा-सम्पत्तिसे सम्पन्न उस महापुरीको दोनों विन्ध्यपर्वतोंके बीचमें बसाया था ॥ २० ॥

पुरिकां नाम धर्मात्मा पुरीं देवपुरीप्रभाम् ।
उद्यानशतसम्बाधां समृद्धआपणचत्वराम् ॥ २१ ॥

तत्पश्चात् उन धर्मात्मा नरेशने एक 'पुरिका' नामवाली पुरी बसायी, जो देवपुरीके समान प्रकाशित होती थी। उसके भीतर सैकड़ों उद्यान बने थे तथा वैभवपूर्ण हाट-बाजार और चौराहे भी उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ २१ ॥

ऋक्षवन्तं समभितस्तीरे तत्र निरामये ।
निर्मिता सा पुरी राज्ञा पुरिका नाम नामतः ॥ २२ ॥

ऋक्षवान् पर्वतके समीप, रोग-शोकसे रहित नर्मदा-तटपर राजाने पुरिका नामक पुरीका निर्माण कराया था ॥ २२॥

स ते द्वे विपुले पुर्यौ देवभोग्योपमे शुभे ।
पालयामास धर्मात्मा राजा धर्मे व्यवस्थितः ॥ २३ ॥

धर्ममें स्थित हुए वे धर्मात्मा नरेश देवताओंके उपभोगमें आनेवाली स्वर्गीय पुरियोंके समान उन दो सुन्दर नगरोंका निर्माण करके उनका पालन करने लगे ॥ २३ ॥

पद्मवर्णोऽपि राजर्षिः सह्यपृष्ठे पुरोत्तमम् ।
चकार नद्या वेणायास्तीरे तरुलताकुले ॥ २४ ॥

राजर्षि पद्मवर्णने भी सह्यपर्वतके पृष्ठभागमें वृक्षों और लताओंसे व्याप्त वेणा नदीके तटपर एक उत्तम नगरका निर्माण कराया ॥ २४ ॥

विषयस्याल्पतां ज्ञात्वा सम्पूर्णं राष्ट्रमेव च ।
निवेशयामास नृपः स वप्रप्रायमुत्तमम् ॥ २५ ॥

अपनी राज्यभूमिका विस्तार दूसरोंकी अपेक्षा छोटा जानकर उन्होंने अपने सम्पूर्ण राष्ट्रको ही एक नगरके रूपमें बसाया और उसे सब ओरसे एक विशाल चहारदीवारीके द्वारा घेर दिया। उस उत्तम राष्ट्रमें परकोटेकी ही प्रधानता थी ॥ २५ ॥

पद्मावतं जनपदं करवीरं च तत्पुरम् ।
निर्मितं पद्मवर्णेन प्राजापत्येन कर्मणा ॥ २६ ॥

उनका राज्य पद्मावत जनपदके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उनकी राजधानीका नाम करवीरपुर हुआ। पद्मवर्णने शिल्पशास्त्रके नियमोंके अनुसार उस नगरका निर्माण कराया था ॥

सारसेनापि विहितं रम्यं क्रौञ्चपुरं महत् ।
चम्पकाशोकबहुलं विपुलं ताम्रमृत्तिकम् ॥ २७ ॥

राजा सारसने भी क्रौञ्चपुर¹ नामक महान् एवं रमणीय नगरका निर्माण कराया, जिसमें चम्पा और अशोक वृक्षोंकी


१. आचार्य नीलकण्ठने 'क्रौञ्चपुर' नगरकी स्थिति वेणाके दक्षिण तटपर बतायी है।

विष्णुपर्व ] अष्टात्रिंशोऽध्यायः ३५३


बहुलता थी। उसका विस्तार बड़ा था और वहाँ ताँबेका कारोबार होता था, जिससे लोगोंकी जीविका चलती थी ॥ २७ ॥

वनवासीति विख्यातः स्फीतो जनपदो महान् ।
पुरस्य तस्य तु श्रीमान् द्रुमैः सार्वर्तुकैर्वृतः ॥ २८ ॥
उस नगरका महान् समृद्धिशाली एवं शोभायमान जनपद 'वनवासी' नामसे विख्यात हुआ। वहाँ सभी ऋतुओंमे फूलने-फलनेवाले वृक्ष सब ओर हरे-भरे दिखायी देते थे ॥२८॥

हरितोऽपि समुद्रस्य द्वीपं समभिपालयत् ।
रत्नसंचयसम्पूर्णं नारीजनमनोहरम् ॥ २९ ॥
हरित भी रत्नराशिसे पूर्ण उस समुद्र-सम्बन्धी द्वीपका पालन करने लगे, जो नारीजनोंके लिये मनोहर था (अथवा नारियोंके कारण मनोहर प्रतीत होता था) ॥ २९ ॥

तस्य दाशा जले मग्ना मधुरा नाम विश्रुताः ।
ये हरन्ति सदा शङ्खान् समुद्रोदरचारिणः ॥ ३० ॥
राजा हरितके द्वारा नियुक्त हुए धीवर, जो वहाँ 'मधुर' नामसे प्रसिद्ध थे, जलमे डूबकर समुद्रके भीतर विचरनेवाले शङ्खोंको पकड़ लाते थे ॥ ३० ॥

तस्यापरे दाशजनाः प्रवालाञ्जलसम्भवान् ।
संचिन्वन्ति सदा युक्ता जातरूपं च मौक्तिकम् ॥ ३१ ॥
उनके दूसरे-दूसरे मल्लाह सदा सावधान रहकर जलके भीतर होनेवाले मूँगो तथा चमकीले मोतियोंका संग्रह करते थे ॥ ३१ ॥

जलजानि च रत्नानि निषादास्तस्य मानवाः ।
प्रचिन्वन्तोऽर्णवे युक्ता नौभिः संयानगामिनः ॥ ३२ ॥
हरितके ही कार्यकर्ता निषाद बड़ी-बड़ी नौकाओंको साथ लिये छोटी नौकाओंद्वारा समुद्रमे जाते और जलमे उत्पन्न होनेवाले रत्नोंकी खोज करते थे (छोटी नावोंसे दूर-दूरतक जाकर वे रत्नोंका संचय करते और एक जगह खड़ी हुई बड़ी नौकामे लाकर रखते थे) ॥ ३२ ॥

मत्स्यमांसेन ते सर्वे वर्तन्ते स्म सदा नराः ।
गृह्णन्तः सर्वरत्नानि रत्नद्वीपनिवासिनः ॥ ३३ ॥
उस रत्नद्वीपमें निवास करनेवाले वे मल्लाह जातिके लोग सब प्रकारके रत्नोंका संग्रह करते और मछलीके मांससे जीवन-निर्वाह करते थे ॥ ३३ ॥

तैः संयानगतैर्द्रव्यैर्वणिजो दूरगामिनः ।
हरितं तर्पयन्त्येकं यथैव धनदं तथा ॥ ३४ ॥
नौकाओंमें समुद्रने निकाले गये जो द्रव्य संचित होते, उनके द्वारा दूर देशोकी यात्रा करनेवाले व्यवसायी वैश्य व्यापार करते और प्राप्त हुए धनसे एकमात्र राजा हरितको ही तृप्त करते थे, जैसे यक्ष केवल कुवेरको ही अपने उपार्जित धनसे संतुष्ट किया करते हैं ॥ ३४ ॥

एवमिक्ष्वाकुवंशात् तु यदुवंशो विनिःसृतः ।
चतुर्धा यदुपूत्रैस्तु चतुर्भिर्भिद्यते पुनः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार यह यदुवंश इक्ष्वाकुवंशसे निकला है। फिर यदुके चार छोटे पुत्रोंद्वारा यह चार अन्य शाखाओमे विभक्त हुआ है ॥ ३५ ॥

स यदुर्माधवे राज्यं विसृज्य यदुपूङ्गवे ।
त्रिविष्टपं गतो राजा देहं त्यक्त्वा महीतले ॥ ३६ ॥
वे राजा यदु अपने बड़े पुत्र यदुकुल-पुङ्गव माधवको अपना राज्य दे इस भूतलपर शरीरका परित्याग करके स्वर्ग-को चले गये ॥ ३६ ॥

बभूव माधवसुतः सत्त्वतो नाम वीर्यवान् ।
सत्त्ववृत्तिर्गुणोपेतो राजा राजगुणे स्थितः ॥ ३७ ॥
माधवका पराक्रमी पुत्र सत्त्वत नामसे विख्यात हुआ। वे गुणवान् राजा सत्त्वत राजोचित गुणोंमें प्रतिष्ठित थे और सदा सात्त्विक वृत्तिसे रहते थे ॥ ३७ ॥

सत्त्वतस्य सुतो राजा भीमो नाम महानभूत् ।
येन भैमाः सुसंवृत्ताः सत्त्वतात् सात्त्वताः स्मृताः॥३८॥
सत्त्वतके पुत्र महान् राजा भीम हुए, जिनसे भावी पीढ़ी-के लोग 'भैम' कहलाये। सत्त्वतसे उत्पन्न होनेके कारण उन सबको 'सात्त्वत' भी माना गया है॥ ३८ ॥

राज्ये स्थिते नृपे तस्मिन् रामे राज्यं प्रशासति ।
शत्रुघ्नो लवणं हत्वा चिच्छेद स मधोर्वनम् ॥ ३९ ॥
जब राजा भीम आनर्त देशके राज्यपर प्रतिष्ठित थे, उन्हीं दिनों अयोध्यामे भगवान् श्रीराम भूमण्डलके राज्यका शासन करते थे। उनके राज्यकालमे शत्रुघ्नने मधुपुत्र लवणको मारकर मधुवनका उच्छेद कर डाला ॥ ३९ ॥

तस्मिन् मधुवने स्थाने पुरीं च मधुरामिमाम् ।
निवेशयामास विभुः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ ४० ॥
उसी मधुवनके स्थानमे सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले प्रभावशाली शत्रुघ्नने इस मधुरापुरीको बसाया था ॥ ४० ॥

पर्यये चैव रामस्य भरतस्य तथैव च ।
सुमित्रासुतयोश्चैव स्थानं प्राप्तं च वैष्णवम् ॥ ४१ ॥
भीमेनेयं पुरी तेन राज्यसम्बन्धकारणात् ।
स्ववशे स्थापिता पूर्वं स्वयमध्यासिता तथा ॥ ४२ ॥
जब श्रीरामके अवतारका उपसंहार हुआ और श्रीराम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न सभी परमधामको पधारे, तब भीमने इस वैष्णव स्थान (मधुरा) को प्राप्त किया; क्योकि (लवणके) मारे जानेपर अब उस राज्यसे उन्हींका लगाव रह गया था। (वे ही उत्तराधिकारी होनेयोग्य थे।)*


* हर्यश्वके पुत्र यदु मधुकी पुत्री मधुमतीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे; अतः वे मधुके दौहित्र थे। नानाके कोई पुत्र न हो तो उसकी

म० ह० १२-

३५४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

भीमने इस पुरीको अपने वशमें किया और वे स्वयं भी यहीं आकर रहने लगे ॥ ४१-४२ ॥

ततः कुश स्थिते राज्ये लवे तु युवराजति ।
अन्धको नाम भीमस्य सुतो राज्यमकारयत् ॥ ४३ ॥

तदनन्तर जब अयोध्याके राज्यपर कुश प्रतिष्ठित हुए और लव युवराज बन गये, तब मथुरामें भीमके पुत्र अन्धक राज्य करने लगे ॥ ४३ ॥

अन्धकस्य सुतो जज्ञे रेवतो नाम पार्थिवः ।
ऋक्षोऽपि रेवताज्जज्ञे रम्ये पर्वतमूर्धनि ॥ ४४ ॥
ततो रैवत उत्पन्नः पर्वतः सागरान्तिके ।
नाम्ना रैवतको नाम भूमौ भूमिधरः स्मृतः ॥ ४५ ॥

अन्धकके पुत्र राजा रेवत हुए । रेवतसे पर्वतके रमणीय शिखरपर ऋक्षका जन्म हुआ । इस प्रकार उनसे रैवत (ऋक्ष) की उत्पत्ति हुई । उस समय समुद्रके तटकी भूमिपर जो विशाल भूधर था, वह उसी रैवतके नामपर रैवतक पर्वतके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ४४-४५ ॥

रैवतस्यात्मजो राजा विश्वगर्भो महायशाः ।
बभूव पृथिवीपालः पृथिव्यां प्रथितः प्रभुः ॥ ४६ ॥

रैवत (ऋक्ष) के पुत्र महायशस्वी राजा विश्वगर्भ हुए, जो इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध एवं प्रभावशाली भूमिपाल थे ॥ ४६ ॥

तस्य तिसृषु भार्यासु दिव्यरूपासु केशव ।
चत्वारो जज्ञिरे पुत्रा लोकपालोपमाः शुभाः ॥ ४७ ॥

केशव ! उनके तीन भार्याएँ थीं । तीनों ही दिव्य रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित होती थीं । उनके गर्भसे राजाके चार सुन्दर पुत्र हुए, जो लोकपालोंके समान पराक्रमी थे ॥ ४७ ॥

वसुर्बभ्रुः सुषेणश्च सभाक्षश्चैव वीर्यवान् ।
यदुप्रवीराः प्रख्याता लोकपाला इवापरे ॥ ४८ ॥

उनके नाम इस प्रकार हैं—वसु, बभ्रु, सुषेण और बलवान् सभाक्ष । ये यदुकुलके प्रख्यात श्रेष्ठ वीर दूसरे लोकपालोंके समान शक्तिशाली थे ॥ ४८ ॥

तैरयं यादवो वंशः पार्थिवैर्बहुलीकृतः ।
यैः सार्धं कृष्ण लोकेऽस्मिन् प्रजावन्तः प्रजेश्वराः ॥ ४९ ॥
वसोस्तु कुन्तिविषये वसुदेवः सुतो विभुः ।
ततः स जनयामास सुप्रभे द्वे च दारिके ॥ ५० ॥
कुन्तीं च पाण्डोर्महिषीं देवतामिव भूचरीम् ।
भार्यां च दमघोषस्य चेदिराजस्य सुप्रभाम् ॥ ५१ ॥

श्रीकृष्ण ! उन राजाओंने इस यादव-वंशको बढ़ाकर बड़ी भारी संख्यासे सम्पन्न कर दिया । जिनके साथ इस संसारमें बहुत-से संतानवान् नरेश हैं । वसुसे (जिनका दूसरा नाम शूर था) वसुदेव उत्पन्न हुए । ये वसुपुत्र वसुदेव बड़े प्रभावशाली हैं । वसुदेवकी उत्पत्तिके अनन्तर वसुने दो कान्तिमती कन्याओंको जन्म दिया (जो पृथा (कुन्ती) और श्रुतश्रवा नामसे विख्यात हुईं) । इनमेंसे पृथा कुन्ति-देशमें (राजा कुन्तिभोजकी दत्तक पुत्रीके रूपमें) रहती थी । कुन्ती जो पृथ्वीपर विचरनेवाली देवाङ्गनाके समान थी, महाराज पाण्डुकी महारानी हुई तथा सुन्दर कान्तिसे प्रकाशित होनेवाली श्रुतश्रवा चेदिराज दमघोषकी पत्नी हुई ॥

एष ते स्वस्य वंशस्य प्रभवः सम्प्रकीर्तितः ।
श्रुतो मया पुरा कृष्ण कृष्णद्वैपायनान्तिकात् ॥ ५२ ॥

श्रीकृष्ण ! यह मैंने तुमसे अपने यादववंशकी उत्पत्ति बतायी है । इसे मैंने पहले श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीसे सुना था ॥ ५२ ॥

त्वं त्विदानीं प्रणष्टेऽस्मिन् वंशे वंशभृतां वर ।
स्वयम्भूरिव सम्प्राप्तो भवायास्माज्जयाय च ॥ ५३ ॥

वंशधारियोंमें श्रेष्ठ गोविन्द ! इस समय यह वंश नष्ट-सा हो चला था । परंतु तुम स्वयम्भू ब्रह्माजीके समान इस वंशके उद्भव तथा हमारी विजयके लिये इसमें अवतीर्ण हुए हो ॥

न तु त्वां पौरमात्रेण शक्ता गूढयितुं वयम् ।
देवगुह्योप्यपि भगवान् सर्वज्ञः सर्वभावनः ॥ ५४ ॥

हमलोग तुम्हें साधारण पुरवासी बताकर छिपानेमें असमर्थ हैं; क्योंकि तुम देवताओंके गुप्त रहस्योंसे भी परिचित, सर्वज्ञ तथा सबको उत्पन्न करनेवाले हो ॥ ५४ ॥

शक्तश्चापि जरासंधं नृपं योधयितुं विभो ।
त्वद्बुद्धिवशगाः सर्वे वयं योधव्रते स्थिताः ॥ ५५ ॥

प्रभो ! तुम राजा जरासंधसे युद्ध करनेमें समर्थ हो । हम सब लोग योद्धाओंके व्रतमें स्थिर रहकर सदा तुम्हारी बुद्धिके वशीभूत रहेंगे ॥ ५५ ॥

जरासंधस्तु बलवान् नृपाणां मूर्ध्नि तिष्ठति ।
अप्रमेयबलश्चैव वयं च कुशसाधनाः ॥ ५६ ॥

परंतु राजा जरासंध बड़ा बलवान् है । वह राजाओंके सिरपर खड़ा है । उसके पास असंख्य सेना है और इधर हम लोगोंके पास युद्धकी साधन-सामग्री बहुत थोड़ी है ॥ ५६ ॥

न चेयमेकाहमपि पुरी रोधं सहिष्यति ।
कृशभक्तेन्धनक्षामा दुर्गैरपरिवेष्टिता ॥ ५७ ॥

यह मथुरापुरी शत्रुओंद्वारा किये गये एक दिनके उपरोध (घेरे) को भी नहीं सह सकेगी; क्योंकि यहाँ खाने-पीनेकी सामग्री बहुत कम है। लकड़ियोंका संचय भी स्वल्प ही है तथा यह पुरी विभिन्न प्रकारके दुर्गोंसे घिरी हुई नहीं है ॥ ५७ ॥


पादटिप्पणी:
सम्पत्ति दौहित्रको ही प्राप्त होनी चाहिये—यह शास्त्रका नियम है, अतः लवणासुरके मारे जानेपर यदु-पौत्र भीम ही उस समय उस राज्यके अधिकारी हुए ।

विष्णुपर्व ] एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ३५५


असंस्कृताम्बुपरिखा द्वारयन्त्रविवर्जिता।
वप्रप्राकारनिचया कर्तव्या बहुविस्तरा ॥ ५८ ॥

इसके चारों ओर जो जल भरनेके लिये खाइयाँ बनी हुई हैं, उनकी बहुत दिनोंसे मरम्मत और सफाई नहीं हुई है तथा नगरके द्वारपर रक्षाके लिये यन्त्र (तोप आदि) भी नहीं लगे हुए हैं। पुरीकी रक्षाके लिये चारों ओरसे मिट्टीकी मोटी दीवारें तथा कई पक्के परकोटे बनवानेकी आवश्यकता है, जिनका विस्तार बहुत बड़ा हो ॥ ५८ ॥

संस्कर्तव्यायुधागारा योकव्या चेट्रिकाचयैः।
कंसस्य वलभोग्यत्वान्नातिगुप्ता पुरा जनैः ॥ ५९ ॥

नगरके जितने आयुधागार हैं, उन सबका संस्कार (मरम्मत और सफाई) होना चाहिये। जगह-जगह ईंटोंके ढेर जुटा लेनेकी आवश्यकता है। कंसकी सेनाके उपयोगमें आनेके कारण इस नगरकी रक्षाके लिये लोगोंने पहलेसे कोई व्यवस्था नहीं कर रखी है ॥ ५९ ॥

सद्यो निपतिते कंसे राज्येऽस्माकं नवोदये।
पुरी प्रत्यग्ररोधेष्व न रोधं विसहिष्यति ॥ ६० ॥

अभी हालमें ही कंस मारा गया है, अतः हमारे राज्यका अभी नवोदय (प्रभात) काल है। जैसे राजाके सिपाही कर वसूल करनेके लिये गाँवको घेर लेते हैं, उसी तरह यदि इस पुरीका भी अवरोध हुआ तो यह उसे सहन न कर सकेगी ॥

बलं सम्मर्दभग्नं च कृष्यमाणं परेण ह।
असंशयमिदं राष्ट्रं जनैः सह विनङ्क्ष्यति ॥ ६१ ॥

हमारी सेना अनेको युद्धोंका सामना करनेके कारण हताश हो गयी है। शत्रु इसे बार-बार पीड़ा देकर क्षीण कर रहा है, अतः यह राष्ट्र यहाँके निवासियोंके साथ ही नष्ट हो जायगा। इसमें संदेह नहीं है ॥ ६१ ॥

यादवानां विरोधेन ये जिता राज्यकामुकैः।
ते सर्वे द्वैधमिच्छन्ति यत् क्षमं तद् विधीयताम् ॥ ६२ ॥

हमलोगोंने राज्यप्राप्तिकी इच्छा रखकर यादवोंका विरोध करनेके कारण जिन-जिन लोगोंको पराजित किया है, वे सब लोग हममें फूट डालना चाहते हैं। ऐसी परिस्थितिमें जो उचित हो सो करो ॥ ६२ ॥

वञ्चनीया भविष्यामो नृपाणां नृपकारणात्।
जरासंधभयार्तानां द्रवतां राज्यसम्भ्रमे ॥ ६३ ॥

राजा जरासंधके कारण दूसरे-दूसरे राजा भी हमें धोखा देंगे; क्योंकि ये जरासंधके भयसे पीड़ित हैं और अपने राज्यमें कोई विप्लव न मच जाय, इसके डरसे सब-के-सब उसके पीछे दौड़ते हैं ॥ ६३ ॥

आर्ता वक्ष्यन्ति नः सर्वे रुध्यमानाः पुरे जनाः।
यादवानां विरोधेन विनष्टाः स्मेति केशव ॥ ६४ ॥

केशव ! यदि इस नगरके सब लोग शत्रुओंके घेरा डालनेसे अवरुद्ध हो जायेंगे तो ये पीड़ित होकर हमारे लिये यही कहेगे कि हम यादवोंके विरोधसे नष्ट हो गये ॥ ६४ ॥

एतन्मम मतं कृष्ण विस्रम्भात् समुदाहृतम्।
त्वं तु विज्ञापितः पूर्वं न पुनः सम्प्रवोधितः ॥ ६५ ॥

श्रीकृष्ण ! यह मेरा मत है, जिसे तुमपर विश्वास होनेके कारण मैंने प्रकट किया है। तुम्हें इस बातकी पहले-पहल सूचना दी गयी है। तुम्हे समझानेका प्रयत्न नहीं किया गया है ॥ ६५ ॥

यदत्र वः क्षमं कृष्ण तच्च वै संविधीयताम्।
त्वमस्य नेता सैन्यस्य वयं त्वच्छासने स्थिताः।
त्वन्मूलश्च विरोधोऽयं रक्षाम्रानात्मना सह ॥ ६६ ॥

श्रीकृष्ण ! इस परिस्थितिमें जो उचित हो, वह करो। तुम इस यादव-सेनाके नेता हो और हम तुम्हारे शासनमें स्थित हैं। इस विरोधके मूल कारण तुम्हीं हो, इसलिये तुम अपने साथ ही हमलोगोंकी रक्षा करो ॥ ६६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि विकद्रुवाक्यं नामाष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें विकद्रुका वाक्यविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥


एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

बलराम और श्रीकृष्णका पुरी और पुरवासियोंकी रक्षाके लिये मथुरासे दक्षिण भारतकी ओर प्रस्थान, परशुरामजीसे उनकी भेंट तथा उन दोनोंको गोमन्तपर्वतपर चलनेके लिये उनकी सलाह

वैशम्पायन उवाच
विकद्रोस्तु वचः श्रुत्वा वसुदेवो महायशाः।
परितुष्टेन मनसा वचनं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥
राजा षाड्गुण्यवक्ता वै राजा मन्त्रार्थतत्त्ववित्।
सतत्त्वं च हितं चैव कृष्णोक्तं किल धीमता ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! विकद्रुकी बात सुनकर महायशस्वी वसुदेव संतुष्टचित्तसे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥

'श्रीकृष्ण ! जो राजनीतिके छः गुणोंसे युक्त बात बोले अथवा उन छहों गुणोंके उपयोगका अवसर बताये, वह राजा है। जो मन्त्रार्थ-तत्त्व (गुप्त मन्त्रणाका प्रयोजन एवं महत्त्व)

३५६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे


समझता हो, वह राजा है। बुद्धिमान् विकद्रुने तत्त्व और हित-की बात बतायी है ॥ २ ॥

भाषिता राजधर्माश्च सत्याश्च जगतो हिताः।
विकद्रुणा यदुश्रेष्ठ यद्धितं तद् विधीयताम् ॥ ३ ॥

'यदुश्रेष्ठ ! विकद्रुने उन राजधर्मोंका प्रतिपादन किया है, जो सत्य होनेके साथ ही जगत्‌के लिये हितकर हैं। अब तुम्हें जो हितकर जान पड़े, वह करो' ॥ ३ ॥

एतच्छ्रुत्वा पितुर्वाक्यं विकद्रोश्च महात्मनः।
वाक्यमुत्तममेकाग्रो बभाषे पुरुषोत्तमः ॥ ४ ॥

अपने पिता वसुदेव तथा महात्मा विकद्रुका यह कथन सुनकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने एकाग्रचित्त होकर यह उत्तम बात कही—॥ ४ ॥

ब्रुवतां वः श्रुतं वाक्यं हेतुतः क्रमतस्तथा।
न्यायतः शास्त्रतश्चैव दैवं चैवानुपश्यताम् ॥ ५ ॥

'आपलोगोंने वैरके मूल-कारण, शत्रुके पराक्रम, न्यायोचित बर्ताव, शास्त्रकी आज्ञा तथा दैववश भविष्यमें होनेवाले कार्यपर दृष्टि रखते हुए जो कुछ कहा है, वह सब मैंने सुन लिया ॥ ५ ॥

श्रूयतामुत्तरं वाक्यं श्रुत्वा च परिगृह्यताम्।
नयेन व्यवहर्त्तव्यं पार्थिवेन यथाक्रमम् ॥ ६ ॥
संधिं च विग्रहं चैव यानमासनमेव च।
द्वैधीभावं संश्रयं च षाड्गुण्यं चिन्तयेत् सदा ॥ ७ ॥

'अब उसका उत्तर सुनिये और सुनकर यदि ठीक जँचे तो उसे ग्रहण कीजिये। इसमें संदेह नहीं कि राजाको राजनीतिके अनुसार व्यवहार करना चाहिये। उसके लिये यह उचित है कि संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—इन छः गुणोंका क्रमशः सदा चिन्तन करता रहे* ॥ ६-७ ॥

बलिनः संनिकृष्टे तु न स्थेयं पण्डितेन वै।
अपक्रमेद्धि कालज्ञः समर्थो युद्धमुद्वहेत् ॥ ८ ॥

'विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह बलवान् शत्रुके समीप न ठहरे। समयका ज्ञान रखनेवाला पुरुष बलवान् शत्रुसे अपनी रक्षा करनेके लिये स्थान छोड़कर हट जाय। यदि वह शत्रु-सेनाका सामना करनेके लिये समर्थ हो तो युद्धका बोझ उठाये ॥ ८ ॥


* संधि, विग्रह आदि छः गुणोंका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है—शत्रुसे मेल रखना संधि, उससे लड़ाई छेड़ना विग्रह, आक्रमण करना यान, अवसरकी प्रतीक्षामें बैठे रहना आसन, दुरंगी नीति बरतना द्वैधीभाव और अपनेसे बलवान् राजाकी शरण लेना समाश्रय कहलाता है।


अहं तावत् सहायेण मुहूर्तेऽस्मिन् प्रकाशिते।
जीवितार्थं गमिष्यामि शक्तिमानप्यशक्तवत् ॥ ९ ॥

'मैं शक्तिशाली होकर भी असमर्थकी भाँति इस वर्तमान मुहूर्तमें भैया बलरामजीके साथ जीवनकी रक्षाके लिये यहाँसे पलायन करूँगा ॥ ९ ॥

ततः सह्याचलयुतं सहार्थेणाहमक्षयम्।
आत्मद्वितीयः श्रीमन्तं प्रवेक्ष्ये दक्षिणापथम् ॥ १० ॥

'यहाँसे प्रस्थान करनेके बाद मैं आर्य बलरामके साथ अपने आपको ही उनका दूसरा साथी बनाकर उस अक्षय शोभासम्पन्न दक्षिणापथमें प्रवेश करूँगा, जो सह्य पर्वतसे मिला-जुला है ॥ १० ॥

करवीरपुरं चैव रम्यं क्रौञ्चपुरं तथा।
द्रक्ष्यावस्तत्र सहितौ गोमन्तं च नगोत्तमम् ॥ ११ ॥

'वहाँ हम दोनों भाई एक साथ रहकर करवीरपुर, रमणीय क्रौञ्चपुर तथा पर्वतश्रेष्ठ गोमन्तका दर्शन करेंगे ॥

आवयोर्गमनं श्रुत्वा जितकाशी स पार्थिवः।
अप्रविश्य पुरीं दर्पादनुसारं करिष्यति ॥ १२ ॥

'हमलोगोंका दक्षिण-गमन सुनकर विजयसे सुशोभित होनेवाला राजा जरासंध बलके घमण्डमें आकर मथुरापुरीमें प्रवेश न करके हमारा पीछा ही करेगा ॥ १२ ॥

ततः सह्यवनेष्वेव राजा याति स सानुगः।
आवयोर्ग्रहणे चैव नृपतिः प्रयतिष्यति ॥ १३ ॥

'तत्पश्चात् हमारा अनुसरण करता हुआ वह राजा सेवकों-सहित सह्याचलके वनोंमें ही जा पहुँचेगा और हम दोनोंको पकड़ लेनेके लिये पूरा प्रयत्न करेगा ॥ १३ ॥

एषा नः श्रेयसी यात्रा भविष्यति कुलस्य वै।
पौराणामथ पुर्याश्च देशस्य च सुखावहा ॥ १४ ॥

'हमारी यह यात्रा इस यादवकुलके लिये कल्याणकारिणी होगी तथा पुरवासियोंके, मथुरापुरीके एवं इस शूरसेन देशके लिये भी सुखदायिनी होगी ॥ १४ ॥

न च शत्रोः परिभ्रष्टा राजानो विजिगीषवः।
परराष्ट्रेषु मृष्यन्ति मृधे शत्रोः क्षयं विना ॥ १५ ॥

'विजयकी इच्छा रखनेवाले राजालोग जब शत्रु हाथमें आकर निकल जाता है, तब वे उस शत्रुके राज्योंमें पहुँचकर युद्धमें उसका वध किये बिना शान्त नहीं होते हैं' ॥ १५ ॥

एवमुक्त्वा तु तौ वीरौ कृष्णसंकर्षणावुभौ।
प्रपेदतुरसम्भ्रान्तौ दक्षिणौ दक्षिणापथम् ॥ १६ ॥

ऐसा कहकर वे दोनों नीतिनिपुण वीर श्रीकृष्ण और संकर्षण बिना किसी घबराहटके दक्षिणापथकी ओर चल दिये ॥ १६ ॥