विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 378, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३५६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
समझता हो, वह राजा है। बुद्धिमान् विकद्रुने तत्त्व और हित-की बात बतायी है ॥ २ ॥
भाषिता राजधर्माश्च सत्याश्च जगतो हिताः।
विकद्रुणा यदुश्रेष्ठ यद्धितं तद् विधीयताम् ॥ ३ ॥
'यदुश्रेष्ठ ! विकद्रुने उन राजधर्मोंका प्रतिपादन किया है, जो सत्य होनेके साथ ही जगत्के लिये हितकर हैं। अब तुम्हें जो हितकर जान पड़े, वह करो' ॥ ३ ॥
एतच्छ्रुत्वा पितुर्वाक्यं विकद्रोश्च महात्मनः।
वाक्यमुत्तममेकाग्रो बभाषे पुरुषोत्तमः ॥ ४ ॥
अपने पिता वसुदेव तथा महात्मा विकद्रुका यह कथन सुनकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने एकाग्रचित्त होकर यह उत्तम बात कही—॥ ४ ॥
ब्रुवतां वः श्रुतं वाक्यं हेतुतः क्रमतस्तथा।
न्यायतः शास्त्रतश्चैव दैवं चैवानुपश्यताम् ॥ ५ ॥
'आपलोगोंने वैरके मूल-कारण, शत्रुके पराक्रम, न्यायोचित बर्ताव, शास्त्रकी आज्ञा तथा दैववश भविष्यमें होनेवाले कार्यपर दृष्टि रखते हुए जो कुछ कहा है, वह सब मैंने सुन लिया ॥ ५ ॥
श्रूयतामुत्तरं वाक्यं श्रुत्वा च परिगृह्यताम्।
नयेन व्यवहर्त्तव्यं पार्थिवेन यथाक्रमम् ॥ ६ ॥
संधिं च विग्रहं चैव यानमासनमेव च।
द्वैधीभावं संश्रयं च षाड्गुण्यं चिन्तयेत् सदा ॥ ७ ॥
'अब उसका उत्तर सुनिये और सुनकर यदि ठीक जँचे तो उसे ग्रहण कीजिये। इसमें संदेह नहीं कि राजाको राजनीतिके अनुसार व्यवहार करना चाहिये। उसके लिये यह उचित है कि संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—इन छः गुणोंका क्रमशः सदा चिन्तन करता रहे* ॥ ६-७ ॥
बलिनः संनिकृष्टे तु न स्थेयं पण्डितेन वै।
अपक्रमेद्धि कालज्ञः समर्थो युद्धमुद्वहेत् ॥ ८ ॥
'विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह बलवान् शत्रुके समीप न ठहरे। समयका ज्ञान रखनेवाला पुरुष बलवान् शत्रुसे अपनी रक्षा करनेके लिये स्थान छोड़कर हट जाय। यदि वह शत्रु-सेनाका सामना करनेके लिये समर्थ हो तो युद्धका बोझ उठाये ॥ ८ ॥
* संधि, विग्रह आदि छः गुणोंका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है—शत्रुसे मेल रखना संधि, उससे लड़ाई छेड़ना विग्रह, आक्रमण करना यान, अवसरकी प्रतीक्षामें बैठे रहना आसन, दुरंगी नीति बरतना द्वैधीभाव और अपनेसे बलवान् राजाकी शरण लेना समाश्रय कहलाता है।
अहं तावत् सहायेण मुहूर्तेऽस्मिन् प्रकाशिते।
जीवितार्थं गमिष्यामि शक्तिमानप्यशक्तवत् ॥ ९ ॥
'मैं शक्तिशाली होकर भी असमर्थकी भाँति इस वर्तमान मुहूर्तमें भैया बलरामजीके साथ जीवनकी रक्षाके लिये यहाँसे पलायन करूँगा ॥ ९ ॥
ततः सह्याचलयुतं सहार्थेणाहमक्षयम्।
आत्मद्वितीयः श्रीमन्तं प्रवेक्ष्ये दक्षिणापथम् ॥ १० ॥
'यहाँसे प्रस्थान करनेके बाद मैं आर्य बलरामके साथ अपने आपको ही उनका दूसरा साथी बनाकर उस अक्षय शोभासम्पन्न दक्षिणापथमें प्रवेश करूँगा, जो सह्य पर्वतसे मिला-जुला है ॥ १० ॥
करवीरपुरं चैव रम्यं क्रौञ्चपुरं तथा।
द्रक्ष्यावस्तत्र सहितौ गोमन्तं च नगोत्तमम् ॥ ११ ॥
'वहाँ हम दोनों भाई एक साथ रहकर करवीरपुर, रमणीय क्रौञ्चपुर तथा पर्वतश्रेष्ठ गोमन्तका दर्शन करेंगे ॥
आवयोर्गमनं श्रुत्वा जितकाशी स पार्थिवः।
अप्रविश्य पुरीं दर्पादनुसारं करिष्यति ॥ १२ ॥
'हमलोगोंका दक्षिण-गमन सुनकर विजयसे सुशोभित होनेवाला राजा जरासंध बलके घमण्डमें आकर मथुरापुरीमें प्रवेश न करके हमारा पीछा ही करेगा ॥ १२ ॥
ततः सह्यवनेष्वेव राजा याति स सानुगः।
आवयोर्ग्रहणे चैव नृपतिः प्रयतिष्यति ॥ १३ ॥
'तत्पश्चात् हमारा अनुसरण करता हुआ वह राजा सेवकों-सहित सह्याचलके वनोंमें ही जा पहुँचेगा और हम दोनोंको पकड़ लेनेके लिये पूरा प्रयत्न करेगा ॥ १३ ॥
एषा नः श्रेयसी यात्रा भविष्यति कुलस्य वै।
पौराणामथ पुर्याश्च देशस्य च सुखावहा ॥ १४ ॥
'हमारी यह यात्रा इस यादवकुलके लिये कल्याणकारिणी होगी तथा पुरवासियोंके, मथुरापुरीके एवं इस शूरसेन देशके लिये भी सुखदायिनी होगी ॥ १४ ॥
न च शत्रोः परिभ्रष्टा राजानो विजिगीषवः।
परराष्ट्रेषु मृष्यन्ति मृधे शत्रोः क्षयं विना ॥ १५ ॥
'विजयकी इच्छा रखनेवाले राजालोग जब शत्रु हाथमें आकर निकल जाता है, तब वे उस शत्रुके राज्योंमें पहुँचकर युद्धमें उसका वध किये बिना शान्त नहीं होते हैं' ॥ १५ ॥
एवमुक्त्वा तु तौ वीरौ कृष्णसंकर्षणावुभौ।
प्रपेदतुरसम्भ्रान्तौ दक्षिणौ दक्षिणापथम् ॥ १६ ॥
ऐसा कहकर वे दोनों नीतिनिपुण वीर श्रीकृष्ण और संकर्षण बिना किसी घबराहटके दक्षिणापथकी ओर चल दिये ॥ १६ ॥