विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 379, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्र्व ] एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ३५७
तौ तु राष्ट्राणि शतशश्चरन्तौ कामरूपिणौ ।
दक्षिणां दिशमास्थाय चेरतुर्मार्गगौ सुखम् ॥ १७ ॥
इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वे दोनों वीर सैकड़ों राष्ट्रोंपर विचरते हुए दक्षिण दिशामें पहुँचकर उत्तम मार्गका आश्रय ले सुखपूर्वक आगे बढ़ने लगे ॥ १७ ॥
सह्यपृष्ठेषु रम्येषु मोदमानावुभौ तथा ।
दक्षिणापथगौ वीरावध्वानं सम्प्रपेदतुः ॥ १८ ॥
सह्यपर्वतके रमणीय शिखरोंपर सानन्द विचरते हुए वे दोनों दक्षिणापथके वीर यात्री अपने मार्गपर बढ़ते ही चले गये ॥ १८ ॥
तौ च स्वल्पेन कालेन सह्याचलविभूषितम् ।
करवीरपुरं प्राप्तौ स्ववंशेन विभूषितम् ॥ १९ ॥
थोड़े ही समयमें वे दोनों भाई सह्यकी पर्वत-मालाओंसे अलंकृत करवीरपुरमें जा पहुँचे, जो उन्हींके वंशके लोगोंसे विभूषित था ॥ १९ ॥
तौ तत्र गत्वा वेणाया नद्यास्तीरान्तमाश्रितम् ।
आसेदतुः प्ररोहाढ्यं न्यग्रोधं तरुपुङ्गवम् ॥ २० ॥
वहाँ पहुँचकर वे दोनों वीर वेणा नदीके तटपर ही बढ़े हुए, वरोहोंसे युक्त एक श्रेष्ठ वृक्ष वरगदके समीप गये ॥
अधस्तात् तस्य वृक्षस्य मुनिं दीप्ततपोधनम् ।
अंसावसक्तपरशुं जटावल्कलधारिणम् ॥ २१ ॥
गौरमग्निशिखाकारं तेजसा भास्करोपमम् ।
क्षत्रान्तकरमक्षोभ्यं वपुष्मन्तमिवार्णवम् ॥ २२ ॥
न्यस्तसंकुचिताधानं काले हुतहुताशनम् ।
क्लिन्नं त्रिपवणाम्भोभिराद्यं देवगुरुं यथा ॥ २३ ॥
सवत्सां धेनुकां श्वेतां होमधुक्कामदोहनाम् ।
क्षीरारणिं कर्षमाणं महेन्द्रगिरिगोचरम् ॥ २४ ॥
ददृशतुस्तौ सहितावपरिश्रान्तमव्ययम् ।
भार्गवं राममासीनं मन्दरस्थं यथा रविम् ॥ २५ ॥
उस वृक्षके नीचे उद्दीप्त तपस्वी भृगुनन्दन परशुरामजी विराजमान थे, जिनके एक कंधेपर फरसा सटा हुआ था और जो जटा और वल्कल धारण किये हुए थे । उनके शरीरका वर्ण गौर तथा अग्निशिखाके समान प्रकाशमान था। वे सूर्यके समान तेजस्वी दिखायी देते थे । क्षत्रियोंका अन्त करनेवाले परशुराम किसीसे क्षुब्ध होनेवाले नहीं थे । वे मूर्त्तिमान् समुद्रके समान गम्भीर प्रतीत होते थे। उनका अग्न्याधान-सम्बन्धी कार्य समाप्त एवं संकुचित हो चुका था, फिर भी वे समय-समयपर प्रज्वलित अग्निमें आहुति दिया करते थे । तीनों समय स्नान करनेके कारण उनका शरीर एवं वस्त्र जलसे भीगे हुए थे । वे देवताओंके आदि-गुरु बृहस्पति के समान जान पड़ते थे । उनके पास जो श्वेत रंगकी सवत्सा (बछड़ेवाली) धेनु थी, वह केवल होमके लिये दुही जाती थी, इसलिये होमधेनु कहलाती थी। इसके सिवा वह मुनिकी इच्छाके अनुसार समस्त वस्तुओंको देनेमें समर्थ थी, इसलिये कामदोहना या कामधेनु कहलाती थी । दुग्धरूपी अग्निको प्रकट करनेके लिये अरणीके समान शोभित होनेवाली उस होमधेनुको परशुरामजी कहीं खींच-कर ले जा रहे थे । वे कभी परिश्रमसे थकते नहीं हैं और अविनाशी हैं । श्रीकृष्ण और बलरामने महेन्द्र गिरिपर विचरनेवाले परशुरामजीको वहाँ मन्दराचलके शिखरपर प्रकाशित होनेवाले सूर्यके समान देखा ॥ २१–२५ ॥
न्यायतस्तौ तु तं दृष्ट्वा पादमूले कृताञ्जली ।
वसुदेवसुतौ वीरौ सधिष्ण्ण्याविव पावकौ ॥ २६ ॥
उनका दर्शन करके वसुदेवके उन दोनों वीर पुत्रोंने न्यायानुसार उनके चरणोंमें हाथ जोड़कर प्रणाम किया । वे उस समय वेदीपर प्रज्वलित अग्नियोंके समान जान पड़ते थे ॥ २६ ॥
कृष्णस्तमृषिशार्दूलमुवाच वदतां वरः ।
श्लक्ष्णं मधुरया वाचा लोकवृत्तान्तकोविदः ॥ २७ ॥
इसके बाद वक्ताओंमें श्रेष्ठ एवं लोकवृत्तान्तके ज्ञानमें कुशल श्रीकृष्णने मुनिश्रेष्ठ परशुरामजीसे स्नेहयुक्त मधुर-वाणीमें कहा—॥ २७ ॥
भगवन् जामदग्न्यं त्वामवगच्छामि भार्गवम् ।
रामं मुनीनामृषभं क्षत्रियाणां कुलान्तकम् ॥ २८ ॥
‘भगवन् ! मैं समझता हूँ कि आप भृगुकुलभूषण क्षत्रिय-कुलविनाशक मुनिश्रेष्ठ जमदग्निनन्दन परशुरामजी हैं ॥ २८॥
त्वया सायकवेगेन क्षिप्तो भार्गव सागरः ।
इषुपातेन नगरं कृतं शूर्पारिकं त्वया ॥ २९ ॥
'भृगुनन्दन ! आपने अपने बाणके वेगसे समुद्रको पीछे ढकेल दिया और जितनी दूरीमें बाण गिरा समुद्रसे उतनी ही भूमि लेकर वहाँ शूर्पारक नगरका निर्माण किया ॥ २९ ॥
धनुःपञ्चशतायाममिषुपञ्चशतोच्छ्रयम् ।
सह्यस्य च निकुञ्जेषु स्फीतो जनपदो महान् ॥ ३० ॥
'उस नगरकी लंबाई पाँच सौ धनुर और चौड़ाई पाँच सौ बाण है* । सह्यपर्वतके निकुञ्जोंमें वह समृद्धिशाली महान् जनपद बसा हुआ है ॥ ३० ॥
अतिक्रम्योदधेर्वेलामपरान्ते निवेशितः ।
त्वया तत् कार्त्तवीर्यस्य सहस्रभुजकाननम् ॥ ३१ ॥
छिन्नं परशुनैकेन स्मरता निधनं पितुः ।
* धनुष चार हाथ लंबा और बाण दो हाथ लंबा माना गया है।