भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 380
३५८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

'आपने समुद्रवेलाका उल्लङ्घन करके अपरान्तदेशमें (जो पश्चिम समुद्रके तटपर है) उस महान् जनपदको बसाया है। आपने ही अपने पिताकी मृत्युको याद करके एक ही फरसेसे कार्तवीर्यकी सहस्र भुजाओंका वह जंगल काट डाला था ॥ ३१½ ॥

इयमद्यापि रुधिरैः क्षत्रियाणां हतद्विपाम् ॥ ३२ ॥
स्निग्धैस्त्वत्परशुत्सृष्टै रक्तपङ्का वसुंधरा ।
रैणुकेयं विजाने त्वां क्षितौ क्षितिपरोपणम् ॥ ३३ ॥

'आपके द्वारा मारे गये जो शत्रुभूत क्षत्रिय थे, आपके फरसेसे प्रवाहित हुए उनके स्निग्ध रुधिरसे आज भी यह वसुन्धरा भीगकर रक्तकी कीचसे युक्त दिखायी देती है। मैं जानता हूँ कि आप भूमण्डलके क्षत्रियोंपर रोष प्रकट करने-वाले रेणुकानन्दन परशुराम हैं ॥ ३२-३३ ॥

परशुप्रग्रहे युक्तं यथैवेह रणे तथा ।
तदिच्छावस्त्वया विप्र कांचिदर्थमुपश्रुतम् ॥ ३४ ॥
उत्तरं च श्रुतार्थेन प्रत्युक्तमविशङ्कया ।

'क्योंकि आप रणभूमिकी ही भाँति यहाँ भी फरसा लिये हुए हैं, अतः विप्रवर! हम दोनों आपसे एक बात पूछना चाहते हैं तथा आप हमारी बात सुनकर निर्भीक हो हमें जो उत्तर देंगे, उसे सुननेकी भी हमारी इच्छा है ॥ ३४½ ॥

आवयोर्मथुरा राम यमुनातीरशोभिनी ॥ ३५ ॥
यादवौ स्वो मुनिश्रेष्ठ यदि ते श्रुतिमागतौ ।
वसुदेवो यदुश्रेष्ठः पिता नौ हि धृतव्रतः ॥ ३६ ॥

'मुनिश्रेष्ठ परशुराम ! हमारी निवासभूमि मथुरापुरी है, जो यमुना तटपर शोभा पाती है। हम दोनों यादव हैं। यदि हमारे नाम भी कभी आपके कानोंमें पड़े हों तो आप हमें जानते भी होंगे। यदुकुलके श्रेष्ठ पुरुष तथा उत्तम व्रत-धारण करनेवाले वसुदेवजी हम दोनोंके पिता हैं ॥ ३५-३६ ॥

जन्मप्रभृति चैवावां व्रजेष्वेव नियोजितौ ।
तौ स्वः कंसभयात् तत्र शङ्कितौ परिवर्धितौ ॥ ३७ ॥

'हम दोनों भाई जन्मसे ही कंसके भयसे ब्रजमें ही रक्खे गये और वहीं उससे शङ्कित रहकर बड़े हुए हैं ॥ ३७ ॥

वयश्च प्रथमं प्राप्तौ मथुरायां प्रवेशितौ ।
तावावां व्युत्थितं हत्वा समाजे कंसमोजसा ॥ ३८ ॥
पितरं तस्य तत्रैव स्थापयित्वा जनेश्वरम् ।
स्वमेव कर्म चारब्धौ गवां व्यापारकारकौ ॥ ३९ ॥

'प्रथम किशोरावस्थाको प्राप्त होनेपर हम दोनों भाइयों-का मथुरामें प्रवेश हुआ। वहाँ हमने धर्म-मर्यादासे विचलित हुए कंसको रंगशालामें बलपूर्वक मार डाला और उसके राज्य-पर उसीके पिताको राजा बनाकर बिठा दिया। तत्पश्चात् सदासे गोपालन-सम्बन्धी कार्य करनेवाले हम दोनों भाइयोंनें फिर वही अपना काम-धंधा आरम्भ कर दिया ॥ ३८-३९ ॥

अथावयोः पुरं रोद्धुं जरासंधो व्यवस्थितः ।
संग्रामान् सुवहून् कृत्वा लब्धलक्ष्यावपि स्वयम् ॥ ४० ॥
ततः स्वपुररक्षार्थं प्रजानां च धृतव्रत ।
अकृतार्थावनुद्योगौ कर्तव्यबलसाधनौ ॥ ४१ ॥

'तदनन्तर राजा जरासंधने हम दोनोंके नगरपर घेरा डालनेके लिये निश्चित विचार कर लिया। यद्यपि हम दोनों उसके साथ बहुत युद्ध कर चुके हैं और उनमें अपना लक्ष्य सिद्ध करनेमें सफल भी हुए हैं तथापि अपने नगर और प्रजाजनों-की रक्षाके लिये हमने जरासंधसे लड़नेके लिये कोई उद्योग नहीं किया। व्रतधारी मुने! अभी हमलोगोंको शक्ति और साधनका संचय करना है, अतः अकृतार्थ होकर ही हमलोग वहाँसे चल पड़े ॥ ४०-४१ ॥

अरथौ पत्तिनौ युद्धे निस्तनूत्रौ निरायुधौ ।
जरासंधोद्यमभयात् पुराद् द्वावेव निःसृतौ ॥ ४२ ॥

'हमारे पास युद्धके लिये रथ नहीं है। हम पैदल ही हैं। हमारे शरीरपर कवच और हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र भी नहीं हैं। हम जरासंधके आक्रमणके भयसे नगरको छोड़कर केवल दो ही जने वहाँसे निकल आये हैं ॥ ४२ ॥

एवमावामनुप्राप्तौ मुनिश्रेष्ठ तवान्तिकम् ।
आवयोर्मन्त्रमात्रेण कर्तुमर्हसि सत्क्रियाम् ॥ ४३ ॥

'मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार हम दोनों आपके निकट आये हैं। आप हमें सलाहमात्र देकर हमारा सत्कार करें' ॥ ४३ ॥

श्रुत्वैतद् भार्गवो रामस्तयोर्वाक्यमनिन्दितम् ।
रैणुकेयः प्रतिवचो धर्मसंहितमब्रवीत् ॥ ४४ ॥

उन दोनोंका यह निर्दोष वचन सुनकर रेणुकानन्दन भृगुवंशी परशुरामने उन्हें यह धर्मयुक्त उत्तर दिया- ॥ ४४ ॥

अपरान्तादहं कृष्ण सम्प्रतीहागतः प्रभो ।
एक एव विना शिष्यैर्युवयोर्मन्त्रकारणात् ॥ ४५ ॥

'प्रभावशाली श्रीकृष्ण ! मैं तुम दोनोंको सलाह देनेके लिये ही इस समय यहाँ अपरान्तसे अकेला ही चला आया हूँ। शिष्योंको भी मैंने साथ नहीं लिया है ॥ ४५ ॥

विदितो मे व्रजे वासस्तव पद्मनिभेक्षण ।
दानवानां वधश्चापि कंसस्यापि दुरात्मनः ॥ ४६ ॥

'कमलनयन ! तुम्हारा जो ब्रजमें निवास हुआ है तथा तुम्हारे हाथसे जो दानवों और दुरात्मा कंसका वध हुआ है, वह सब मुझे विदित है ॥ ४६ ॥

विग्रहं च जरासंधे विदित्वा पुरुषोत्तम ।
तव सभ्रातृकस्येह सम्प्राप्तोऽस्मि वरानन ॥ ४७ ॥

'सुन्दर मुखवाले पुरुषोत्तम ! जरासंधके साथ होनेवाले