विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 381, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ३५९
विग्रहको जानकर ही मैं भाईसहित तुमसे मिलनेके लिये यहाँ आ गया हूँ ॥ ४७ ॥
जाने त्वां कृष्ण गोतारं जगतः प्रभुमव्ययम्।
देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थमबालं बालतां गतम् ॥ ४८ ॥
'श्रीकृष्ण ! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम जगत्के रक्षक अविनाशी भगवान् हो और देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये बालक न होनेपर भी बालक बनकर प्रकट हुए हो ॥ ४८ ॥'
न त्वयाविदितं किंचित् त्रिषु लोकेषु विद्यते।
तथापि भक्तिमात्रेण शृणु वक्ष्यामि ते वचः ॥ ४९ ॥
'(तीनों लोकोंमें जो कुछ भी है, वह तुमसे अविदित नहीं है (अतः तुम्हें सलाह देनेकी कोई आवश्यकता नहीं है), तथापि मैं अपनी भक्तिमात्रसे प्रेरित हो तुमसे जो बात कहता हूँ, उसे सुनो ॥ ४९ ॥'
पूर्वजैस्तव गोविन्द पूर्वं पुरमिदं कृतम्।
करवीरपुरं नाम राष्ट्रं चैव निवेशितम् ॥ ५० ॥
'गोविन्द ! पहले तुम्हारे पूर्वजोंने यहाँ इस करवीरपुर नामक नगरका निर्माण किया और इस राष्ट्रको बसाया है ॥'
पुरेऽस्मिन् नृपतिः कृष्ण वासुदेवो महायशाः।
शृगाल इति विख्यातो नित्यं परंमकोपनः ॥ ५१ ॥
'श्रीकृष्ण ! इस करवीरपुरमें इस समय महायशस्वी वासुदेव रहता है, जो शृगाल नामसे विख्यात है। वह सदा ही अत्यन्त क्रोधमे भरा रहता है ॥ ५१ ॥'
नृपेण तेन गोविन्द तव वंशभवा नृपाः।
दायादा निहताः सर्वे वीर द्वेषानुशायिना ॥ ५२ ॥
'वीर गोविन्द ! सदा द्वेषका ही अनुसरण करनेवाले उस राजा शृगालने तुम्हारे कुलमे उत्पन्न हुए समस्त उत्तराधिकारी क्षत्रिय नरेशोंको मार डाला है ॥ ५२ ॥'
अहंकारपरो नित्यमजितात्मातिमत्सरी।
राज्यैश्वर्यमदाविष्टः पुत्रेष्वपि च दारुणः ॥ ५३ ॥
'वह नित्य घमंडमे भरा रहता है। उसका मन वशमें नहीं है। वह दूसरोंसे अत्यन्त डाह रखता है। राज्य और ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त होकर अपने पुत्रोके प्रति भी निर्दयता-पूर्ण बर्ताव करता है ॥ ५३ ॥'
तन्नेह भवतः स्थानं रोचते मे नरोत्तम।
करवीरपुरे घोरे नित्यं पार्थिवदूषिते ॥ ५४ ॥
'नरश्रेष्ठ ! इसीलिये यहाँ सर्वदा इस राजाद्वारा कलङ्कित घोर करवीरपुरमें तुम्हारा ठहरना मुझे ठीक नहीं जँचता है ॥'
श्रूयतां कथयिष्यामि यत्रोभौ शत्रुबाधनौ।
जरासंधं बलोदग्रं भवन्तौ योधयिष्यतः ॥ ५५ ॥
'जहाँ रहकर तुम दोनों बन्धु शत्रुको बाधा पहुँचाते हुए बलमें बढ़े-चढ़े जरासंधके साथ युद्ध करेंगे, उस स्थानका परिचय देता हूँ; सुनो ॥ ५५ ॥'
तीर्त्वा वेणामिमां पुण्यां नदीमद्यैव बाहुभिः।
विषयान्ते निवासाय गिरि गच्छाम दुर्गमम् ॥ ५६ ॥
'हमलोग आज ही इस पुण्य नदी वेणाको भुजाओंसे ही पार करके इस देशकी सीमापर स्थित एक दुर्गम पर्वतपर चले चलें, वहीं निवास करेंगे ॥ ५६ ॥'
रम्यं यज्ञगिरिं नाम सह्यस्य प्ररुहं गिरिम्।
निवासं मांसभक्षाणां चौराणां घोरकर्मणाम् ॥ ५७ ॥
'उस पर्वतका नाम है यज्ञगिरि, जो सह्यपर्वतकी ही उपशाखा है। वह बड़ा ही रमणीय स्थान है। वहाँ इन दिनों भयानक कर्म करनेवाले मांसाहारी चोर-डाकुओंने अड्डा जमा रखा है ॥ ५७ ॥'
नानाद्रुमलतायुक्तं चित्रं पुष्पितपादपम्।
प्रोष्वे तत्र निशामेकां खट्वाङ्गां नाम निम्नगाम् ॥ ५८ ॥
भद्रं ते संतरिष्यामो निकषोपलभूषणाम्।
गङ्गाप्रपातप्रतिमां शृङ्गं च महतो गिरेः ॥ ५९ ॥
'उस पर्वतपर भाँति-भाँतिके वृक्ष और लताएँ लहलहा रही हैं। वृक्षोंमे फूल लगे हुए हैं। इससे उस पर्वतकी विचित्र शोभा होती है। वहाँ हमलोग एक रात निवास करेंगे। तदनन्तर खट्वाङ्गा नामवाली नदीको पार करेंगे, जो कसौटीके पत्थरोसे विभूषित है। तुम्हारा भला हो। वह नदी उस महान् पर्वतसे गिरी हुई है, जो गङ्गाके प्रपात-सी दिखायी देती है ॥ ५८-५९ ॥'
तस्याः प्रपातं द्रक्ष्यामस्तापसारण्यभूषणम्।
उपभुज्य त्विमान् कामान् गत्वा तान् धरणीधरान् ॥ ६० ॥
द्रक्ष्यामस्तत्र तान् विप्रान्छाम्यतो वै तपोधनान्।
रम्यं क्रौञ्चपुरं नाम गमिष्यामः पुरोत्तमम् ॥ ६१ ॥
'खट्वाङ्गाका प्रपात (झरना) तापसारण्यसे विभूषित है, हमलोग उसे देखेंगे और वहीं कुछ खा-पीकर इन कमनीय एवं प्रसिद्ध पर्वतोंपर विचरते हुए वहाँ उन तपस्वी ब्राह्मणोंका दर्शन करेंगे, जो तपमे संलग्न होकर कष्ट उठा रहे हैं। तत्पश्चात् हम रमणीय एवं श्रेष्ठ नगर क्रौञ्चपुरमें चलेंगे ॥ ६०-६१ ॥'
वंशजस्तत्र ते राजा कृष्ण धर्मरतः सदा।
महाकपिरिति ख्यातो वनवास्यजनाधिपः ॥ ६२ ॥
'श्रीकृष्ण ! वहाँ तुम्हारे ही कुलमें उत्पन्न एक राजा राज्य करते हैं, जो सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं, उनका नाम है महाकपि। वे वनवासी जनपद तथा वहाँकी निवासी प्रजाओंके अधिपति हैं ॥ ६२ ॥'