भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 382

३६० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


तमदृष्ट्वैव राजानं निवासाय गतेऽहनि।
तीर्थमानडुहं नाम तत्रस्थाः स्याम संगताः ॥ ६३ ॥
'उस राजासे मिले बिना ही हमलोग निवासके लिये संध्या होते-होते आनडुह नामक तीर्थमें जा पहुँचेंगे और वहाँ एक साथ मिलकर रहेंगे ॥ ६३ ॥

ततश्च्युता गमिष्यामः सह्यस्य विवरे गिरिम् ।
गोमन्तमिति विख्यातं नैकशृङ्गविभूषितम् ॥ ६४ ॥
'वहाँसे उतरकर हमलोग सह्यपर्वतकी गुफामें होते हुए उस गोमन्त नामसे विख्यात शैलपर जा पहुँचेंगे, जो अनेकानेक शिखरोंसे विभूषित है ॥ ६४ ॥

स्वर्गतैकमहाशृङ्गं दुरारोहं खगैरपि ।
विश्रामभूतं देवानां ज्योतिर्भरिभिसंवृतम् ॥ ६५ ॥
'इसका एक विशाल शिखर इतना ऊँचा है कि वह स्वर्गलोकतक पहुँचा हुआ जान पड़ता है । आकाशचारी पक्षियोंके लिये भी उसपर चढ़ना कठिन है। वह देवताओंका विश्राम-स्थल है और ज्योतियोंसे घिरा हुआ है ॥ ६५ ॥

सोपानभूतं स्वर्गस्य गगनाद्रिमिवोच्छ्रितम् ।
तं विमानावतरणं गिरिं मेरुमिवापरम् ॥ ६६ ॥
'उसे स्वर्गका सोपान समझा जाता है। वह उच्चतम पर्वत (भूतलका नहीं) आकाशका-सा पर्वत जान पड़ता है। उसपर देवताओंके विमान उतरते हैं तथा वह दूसरे मेरु-गिरिके समान प्रतीत होता है ॥ ६६ ॥

तस्योत्तमे महाशृङ्गे भास्वन्तौ देवरूपिणौ ।
उदयास्तमये सूर्य सोमं च ज्योतिषां पतिम् ॥ ६७ ॥
ऊर्मिमन्तं समुद्रं च अपारद्वीपभूषणम् ।
प्रेक्षमाणौ सुखं तत्र नगाग्रे विचरिष्यथः ॥ ६८ ॥
'तुम दोनों भाई देवताओंके समान दिव्य रूपधारी तथा तेजस्वी हो । उस गोमन्त गिरिके महान् शिखरपर आरूढ़ होकर उदय और अस्तके समय सूर्य एवं नक्षत्रोंके स्वामी चन्द्रमाका तथा अपार द्वीपोंसे विभूषित और तरङ्गमालाओंस अलंकृत समुद्रका दर्शन करते हुए तुम दोनों बन्धु वहाँ पर्वतीय शिखरके अग्रभागमें सुखपूर्वक विचरोगे ॥ ६७-६८ ॥

शृङ्गस्थौ तस्य शैलस्य गोमन्तस्य वनेचरौ ।
दुर्गयुद्धेन धावन्तौ जरासंधं विजेष्यथः ॥ ६९ ॥
'उस गोमन्त नामक शैलके शिखरपर रहकर वहाँके वनमे विचरते हुए तुम दोनों वीर दुर्ग-युद्धद्वारा धावा करके जरासंधको जीत लोगे ॥ ६९ ॥

तत्र शैलगतौ दृष्ट्वा भवन्तौ युद्धदुर्मदौ ।
आसक्तः शैलयुद्धे वै जरासंधो भविष्यति ॥ ७० ॥
'तुम दोनो रण-दुर्मद वीरोंको उस पर्वतपर आरूढ़ हुआ देख जरासंध पर्वत-युद्धमे ही आसक्त हो जायगा ॥ ७० ॥

भवतोरपि युद्धे तु प्रवृत्ते तत्र दारुणे ।
आयुधैः सह संयोगं पश्यामि नचिरादिव ॥ ७१ ॥
'वहाँ भयंकर युद्ध आरम्भ हो जानेपर तुम दोनोंके हाथमे भी शीघ्र ही दिव्य आयुधोंका संयोग हुआ देखूँगा ॥ ७१ ॥

संग्रामश्च महान् कृष्ण निर्दिष्टस्तत्र दैवतैः ।
यदूनां पार्थिवानां च मांसशोणितकर्दमः ॥ ७२ ॥
'श्रीकृष्ण ! वहाँ देवताओंने यादवों तथा अन्य राजाओंके महान् युद्धका निर्देश किया है, जिसमें रक्त और मांसकी कीच जम जानेवाली है ॥ ७२ ॥

तत्र चक्रं हलं चैव गदां कौमोदकीं तथा ।
सौनन्दं मुसलं चैव वैष्णवान्यायुधानि च ॥ ७३ ॥
दर्शयिष्यन्ति संग्रामे पास्यन्ति च महीक्षिताम् ।
रुधिरं कालयुक्तानां वपुर्भिः कालसंनिभैः ॥ ७४ ॥
'वहाँ सुदर्शन चक्र, संवर्तक हल, कौमोदकी गदा तथा सौनन्द नामक मुसल-ये विष्णुसम्बन्धी आयुध संग्राममें तुम्हें दर्शन देंगे और अपने कालके समान स्वरूपोंसे कालके अधीन हुए राजाओंका रक्त पीयेंगे ॥ ७३-७४ ॥

स चक्रमुसलो नाम संग्रामः कृष्ण विश्रुतः ।
दैवतैरिह निर्दिष्टः कालस्यादेशसंज्ञितः ॥ ७५ ॥
'श्रीकृष्ण ! वह संग्राम चक्र-मुसलके नामसे विख्यात होगा। देवताओंने इसी स्थानपर उसके होनेका संकेत किया है। वह युद्ध साक्षात् कालका आज्ञापत्र है ॥ ७५ ॥

तत्र ते कृष्ण संग्रामे सुव्यक्तं वैष्णवं वपुः ।
द्रक्ष्यन्ति रिपवः सर्वे सुराश्च सुरभावन ॥ ७६ ॥
'देवताओंकी उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाले श्रीकृष्ण ! उस संग्राममें समस्त शत्रु और देवता भी तुम्हारे भलीभाँति व्यक्त हुए वैष्णव रूपका दर्शन करेंगे ॥ ७६ ॥

तां भजस्व गदां कृष्ण चक्रं च चिरविस्मृतम् ।
भजस्व स्वेन रूपेण सुराणां विजयाय वै ॥ ७७ ॥
'श्रीकृष्ण ! तुम अपने उसी वैष्णव रूपसे स्थित हो देवताओंकी विजयके लिये चिरकालसे भूले हुए अपने उस चक्र और गदाको ग्रहण करना ॥ ७७ ॥

बलश्चायं हलं घोरं मुसलं चारिमर्दनम् ।
वधाय सुरशत्रूणां भजताल्लोकभावनः ॥ ७८ ॥
'तथा ये लोकभावन बलराम भी देवद्रोहियोंका वध करने-के लिये अपने शत्रुविदारण घोर हल और मुसलको हाथमे ले लें ॥ ७८ ॥

एष ते प्रथमः कृष्ण संग्रामो भुवि पार्थिवैः ।
पृथिव्यर्थे समाख्यातो भारावतरणे सुरैः ॥ ७९ ॥