विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
३६० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
तमदृष्ट्वैव राजानं निवासाय गतेऽहनि।
तीर्थमानडुहं नाम तत्रस्थाः स्याम संगताः ॥ ६३ ॥
'उस राजासे मिले बिना ही हमलोग निवासके लिये संध्या होते-होते आनडुह नामक तीर्थमें जा पहुँचेंगे और वहाँ एक साथ मिलकर रहेंगे ॥ ६३ ॥
ततश्च्युता गमिष्यामः सह्यस्य विवरे गिरिम् ।
गोमन्तमिति विख्यातं नैकशृङ्गविभूषितम् ॥ ६४ ॥
'वहाँसे उतरकर हमलोग सह्यपर्वतकी गुफामें होते हुए उस गोमन्त नामसे विख्यात शैलपर जा पहुँचेंगे, जो अनेकानेक शिखरोंसे विभूषित है ॥ ६४ ॥
स्वर्गतैकमहाशृङ्गं दुरारोहं खगैरपि ।
विश्रामभूतं देवानां ज्योतिर्भरिभिसंवृतम् ॥ ६५ ॥
'इसका एक विशाल शिखर इतना ऊँचा है कि वह स्वर्गलोकतक पहुँचा हुआ जान पड़ता है । आकाशचारी पक्षियोंके लिये भी उसपर चढ़ना कठिन है। वह देवताओंका विश्राम-स्थल है और ज्योतियोंसे घिरा हुआ है ॥ ६५ ॥
सोपानभूतं स्वर्गस्य गगनाद्रिमिवोच्छ्रितम् ।
तं विमानावतरणं गिरिं मेरुमिवापरम् ॥ ६६ ॥
'उसे स्वर्गका सोपान समझा जाता है। वह उच्चतम पर्वत (भूतलका नहीं) आकाशका-सा पर्वत जान पड़ता है। उसपर देवताओंके विमान उतरते हैं तथा वह दूसरे मेरु-गिरिके समान प्रतीत होता है ॥ ६६ ॥
तस्योत्तमे महाशृङ्गे भास्वन्तौ देवरूपिणौ ।
उदयास्तमये सूर्य सोमं च ज्योतिषां पतिम् ॥ ६७ ॥
ऊर्मिमन्तं समुद्रं च अपारद्वीपभूषणम् ।
प्रेक्षमाणौ सुखं तत्र नगाग्रे विचरिष्यथः ॥ ६८ ॥
'तुम दोनों भाई देवताओंके समान दिव्य रूपधारी तथा तेजस्वी हो । उस गोमन्त गिरिके महान् शिखरपर आरूढ़ होकर उदय और अस्तके समय सूर्य एवं नक्षत्रोंके स्वामी चन्द्रमाका तथा अपार द्वीपोंसे विभूषित और तरङ्गमालाओंस अलंकृत समुद्रका दर्शन करते हुए तुम दोनों बन्धु वहाँ पर्वतीय शिखरके अग्रभागमें सुखपूर्वक विचरोगे ॥ ६७-६८ ॥
शृङ्गस्थौ तस्य शैलस्य गोमन्तस्य वनेचरौ ।
दुर्गयुद्धेन धावन्तौ जरासंधं विजेष्यथः ॥ ६९ ॥
'उस गोमन्त नामक शैलके शिखरपर रहकर वहाँके वनमे विचरते हुए तुम दोनों वीर दुर्ग-युद्धद्वारा धावा करके जरासंधको जीत लोगे ॥ ६९ ॥
तत्र शैलगतौ दृष्ट्वा भवन्तौ युद्धदुर्मदौ ।
आसक्तः शैलयुद्धे वै जरासंधो भविष्यति ॥ ७० ॥
'तुम दोनो रण-दुर्मद वीरोंको उस पर्वतपर आरूढ़ हुआ देख जरासंध पर्वत-युद्धमे ही आसक्त हो जायगा ॥ ७० ॥
भवतोरपि युद्धे तु प्रवृत्ते तत्र दारुणे ।
आयुधैः सह संयोगं पश्यामि नचिरादिव ॥ ७१ ॥
'वहाँ भयंकर युद्ध आरम्भ हो जानेपर तुम दोनोंके हाथमे भी शीघ्र ही दिव्य आयुधोंका संयोग हुआ देखूँगा ॥ ७१ ॥
संग्रामश्च महान् कृष्ण निर्दिष्टस्तत्र दैवतैः ।
यदूनां पार्थिवानां च मांसशोणितकर्दमः ॥ ७२ ॥
'श्रीकृष्ण ! वहाँ देवताओंने यादवों तथा अन्य राजाओंके महान् युद्धका निर्देश किया है, जिसमें रक्त और मांसकी कीच जम जानेवाली है ॥ ७२ ॥
तत्र चक्रं हलं चैव गदां कौमोदकीं तथा ।
सौनन्दं मुसलं चैव वैष्णवान्यायुधानि च ॥ ७३ ॥
दर्शयिष्यन्ति संग्रामे पास्यन्ति च महीक्षिताम् ।
रुधिरं कालयुक्तानां वपुर्भिः कालसंनिभैः ॥ ७४ ॥
'वहाँ सुदर्शन चक्र, संवर्तक हल, कौमोदकी गदा तथा सौनन्द नामक मुसल-ये विष्णुसम्बन्धी आयुध संग्राममें तुम्हें दर्शन देंगे और अपने कालके समान स्वरूपोंसे कालके अधीन हुए राजाओंका रक्त पीयेंगे ॥ ७३-७४ ॥
स चक्रमुसलो नाम संग्रामः कृष्ण विश्रुतः ।
दैवतैरिह निर्दिष्टः कालस्यादेशसंज्ञितः ॥ ७५ ॥
'श्रीकृष्ण ! वह संग्राम चक्र-मुसलके नामसे विख्यात होगा। देवताओंने इसी स्थानपर उसके होनेका संकेत किया है। वह युद्ध साक्षात् कालका आज्ञापत्र है ॥ ७५ ॥
तत्र ते कृष्ण संग्रामे सुव्यक्तं वैष्णवं वपुः ।
द्रक्ष्यन्ति रिपवः सर्वे सुराश्च सुरभावन ॥ ७६ ॥
'देवताओंकी उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाले श्रीकृष्ण ! उस संग्राममें समस्त शत्रु और देवता भी तुम्हारे भलीभाँति व्यक्त हुए वैष्णव रूपका दर्शन करेंगे ॥ ७६ ॥
तां भजस्व गदां कृष्ण चक्रं च चिरविस्मृतम् ।
भजस्व स्वेन रूपेण सुराणां विजयाय वै ॥ ७७ ॥
'श्रीकृष्ण ! तुम अपने उसी वैष्णव रूपसे स्थित हो देवताओंकी विजयके लिये चिरकालसे भूले हुए अपने उस चक्र और गदाको ग्रहण करना ॥ ७७ ॥
बलश्चायं हलं घोरं मुसलं चारिमर्दनम् ।
वधाय सुरशत्रूणां भजताल्लोकभावनः ॥ ७८ ॥
'तथा ये लोकभावन बलराम भी देवद्रोहियोंका वध करने-के लिये अपने शत्रुविदारण घोर हल और मुसलको हाथमे ले लें ॥ ७८ ॥
एष ते प्रथमः कृष्ण संग्रामो भुवि पार्थिवैः ।
पृथिव्यर्थे समाख्यातो भारावतरणे सुरैः ॥ ७९ ॥
विष्णुपर्व ] चत्वारिंशोऽध्यायः [ ३६१
'श्रीकृष्ण! पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भूमण्डलके राजाओंके साथ तुम्हारा यह पहला संग्राम देवताओंद्वारा बताया गया है ॥ ७९ ॥
आयुधावाप्तिरत्रैव वपुषो वैष्णवस्य च ।
लक्ष्म्याश्च तेजसश्चैव व्यूहानां च विदारणम् ॥ ८० ॥
'यहीं तुम्हें अपने दिव्य आयुधोंकी, वैष्णव स्वरूपकी, लक्ष्मीकी तथा शत्रुव्यूहोंका विदारण करनेवाले तेजकी प्राप्ति होगी ॥ ८० ॥'
अतःप्रभृति संग्रामो धरण्यां शस्त्रमूर्च्छितः ।
भविष्यति महान् कृष्ण भारतं नाम वैशसम् ॥ ८१ ॥
'श्रीकृष्ण! इसके बाद पृथ्वीपर अस्त्र-शस्त्रोंसे व्याप्त एक महान् संग्राम होगा, जो लोगोंमें महाभारतके नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ ८१ ॥
तद् गच्छ कृष्ण शैलेन्द्रं गोमन्तं च नगोत्तमम् ।
जरासंधमृधे चापि विजयस्त्वामुपस्थितः ॥ ८२ ॥
'अतः श्रीकृष्ण! तुम पर्वतोंमें श्रेष्ठ गिरिराज गोमन्तपर चलो। जरासंधके युद्धमें भी विजयश्री तुम्हारा ही वरण करनेके लिये प्रस्तुत है ॥ ८२ ॥
इदं चैवामृतप्रख्यं होमधेनोः पयोऽमृतम् ।
पीत्वा गच्छत भद्रं वो मयाऽऽदिष्टेन वर्त्मना ॥ ८३ ॥
'तुम्हारा कल्याण हो। मेरी इस होमधेनुका यह अमृतोपम सुमधुर दुग्ध पीकर मेरे बताये हुए मार्गसे चलो' ॥ ८३ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रामवाक्ये एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत परशुरामवाक्यविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥
चत्वारिंशोऽध्यायः
श्रीकृष्ण, बलराम और परशुरामजीका गोमन्तपर्वतपर आरोहण, गोमन्तकी शोभाका वर्णन तथा परशुरामजीका श्रीकृष्णको युद्धके लिये प्रोत्साहन देकर वहाँसे प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
तत्त धेन्वाः पयः पीत्वा बलदर्पसमन्वितौ ।
ततस्तौ रामसहितौ प्रस्थितौ यदुपुङ्गवौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस होमधेनुका दूध पीकर बल और दर्पसे भरे हुए वे दोनों यदुपुङ्गव वीर परशुरामजीके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ १ ॥
गोमन्तं पर्वतं द्रष्टुं मत्तनागेन्द्रगामिनौ ।
जामदग्न्यप्रदिष्टेन मार्गेण वदतां वरौ ॥ २ ॥
मतवाले गजराजकी भाँति मस्तीके साथ चलनेवाले वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण और बलराम परशुरामजीके बताये हुए मार्गसे गोमन्तपर्वतका दर्शन करनेके लिये चले ॥ २ ॥
जामदग्न्यतृतीयास्ते त्रयस्त्रय इवाग्नयः ।
शोभयन्ति स्म पन्थानं त्रिदिवं त्रिदशा इव ॥ ३ ॥
उन दोनोंके साथ तीसरे परशुरामजी थे। वे तीनों तीन अग्नियोंके समान उसी तरह उस मार्गकी शोभा बढ़ाते थे, जैसे देवता स्वर्गकी ॥ ३ ॥
ते चाध्वविधिना सर्वे ततो वै दिवसक्रमात् ।
गोमन्तमचलं प्राप्ता मन्दरं त्रिदशा इव ॥ ४ ॥
मनुष्य जिस तरह किसी मार्गपर चलते हैं, उसी विधिसे वे सब लोग यात्रा करते हुए क्रमशः कई दिनोंके बाद गोमन्त गिरिपर् जा पहुँचे, मानो देवता मन्दराचलके शिखरपर गये हों ॥ ४ ॥
लताचारुविचित्रं च नानाद्रुमविभूषितम् ।
नानागुरुपिनद्धाङ्गं चित्रं चित्रैर्मनोज्ञरैः ॥ ५ ॥
नाना प्रकारकी लताओंके विस्तारसे उस पर्वतकी सुन्दर एवं विचित्र शोभा हो रही थी। भाँति-भाँतिके वृक्ष उसके लिये भूषणका काम दे रहे थे। उस पर्वतका सारा अङ्ग अनेक प्रकारके अगुरु आदि सुगन्धित धूपोंसे व्याप्त था। मनोहर मयूर उसे और भी विचित्र शोभासे सम्पन्न किये देते थे ॥ ५ ॥
द्विरेफगणसंकीर्णं शिलासंकटपादपम् ।
मत्तबर्हिणनिर्घोषैर्नादितं मेघनादिभिः ॥ ६ ॥
भ्रमरोंसे व्याप्त और शिला तथा वृक्षोंसे भरा हुआ वह पर्वत मेघोंके समान गम्भीर स्वरोंमें बोलनेवाले मतवाले मयूरोंकी मधुर ध्वनिसे निनादित हो रहा था ॥ ६ ॥
गगनालग्नशिखरं जलदासक्तपादपम् ।
मत्तद्विपविषाणाग्रैः परिवृष्टोपलाङ्कितम् ॥ ७ ॥
उसके शिखर आकाशके ऊर्ध्वभागसे लगे हुए थे। बादल उसके वृक्षोंका आलिङ्गन करते थे तथा उसके प्रस्तरखण्ड मतवाले हाथियोंके दाँतोंके अग्रभागकी रगड़से घिसे हुए दिखायी देते थे। उन प्रस्तरोंसे अङ्कित हुआ वह पर्वत बड़ी शोभा पाता था ॥ ७ ॥
कूजद्भिश्वाण्डजगणैः समन्तात् प्रतिनादितम् ।
दरीप्रपाताम्बुरवैश्छन्नं शार्दूलतल्लजैः ॥ ८ ॥
वहाँ चारों ओर पक्षी कलरव करते थे, जिनकी प्रतिध्वनि
३६२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
सब ओर छायी रहती थी । गुफाओंमें झरनेका जल गिरनेसे जो शब्द होता था तथा बड़े-बड़े व्याघ्रोंके दहाड़नेसे जो ध्वनि होती थी, उससे भी वह पर्वत व्याप्त हो रहा था ॥ ८ ॥
नीलाश्मचयसंघातैर्बहुवर्णं यथा घनम् ।
धातुविस्त्रावदिग्धाङ्गं सानुप्रस्रवभूषितम् ॥ ९ ॥
यहाँ नीले पत्थरोंके ढेर-के-ढेर पड़े थे, जिनमें वह अनेक वर्णके मेघकी भाँति सुशोभित होता था। पानीके साथ गेरू आदि धातुओंके बहानेसे उसका अङ्ग चन्दनसे चर्चित-सा जान पड़ता था । शिखरोंसे जो झरने गिर रहे थे, वे आभूषण-के समान उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ९ ॥
कीर्णं सुरगणैः कान्तैर्मैनाकमिव कामगम् ।
उच्छ्रितं सुविशालाग्रं समूलाम्वुपरिस्रवम् ॥ १० ॥
कान्तिमान् देवता वहाँ सब ओर फैले हुए थे। वह इच्छानुसार विचरनेवाले मैनाक-सा प्रतीत होता था। अत्यन्त विशाल शिखरसे सुशोभित वह उच्चतम पर्वत अपने मूलभागसे निर्झरोंके जलकी धारा बहा रहा था ॥ १० ॥
सकाननदरीप्रस्थं श्वेताभ्रगणभूषितम् ।
पनसाम्रातकाम्रौघैर्वैत्रस्यन्दनचन्दनैः ॥ ११ ॥
तमालैलावनयुतं मरीचक्षुपसंकुलम् ।
वन, गुफा और शिखरोंसे सम्पन्न वह शैलराज श्वेत बादलोंसे विभूषित था । वहाँ कटहल, आम्रातक ( अमड़ा ), आम्रोंके समूह, बेंत, स्यन्दन ( तिनिश ), चन्दन, तमाल, इलायचीके वन तथा मिर्चकी झाड़ियों शोभा पाती थीं ॥११॥
पिप्पलीवल्लिकलिलं चित्रमिङ्गुदिपादपैः ॥ १२ ॥
द्रुमैः सर्जरसानां च सर्वतः परिशोभितम् ।
प्रांशुशालवनैर्युक्तं बहुचित्रवनैर्युतम् ॥ १३ ॥
वहाँ सब ओर पिप्पलीकी बेलें फैली थीं । इङ्गुदीके वृक्ष विचित्र शोभा दे रहे थे तथा सर्जरस ( राल ) के वृक्ष सब ओरसे उस पर्वतको सुशोभित किये हुए थे। ऊँचे-ऊँचे शाल वृक्षोंके वन तथा अन्य बहुत-से विचित्र वन उस पर्वतकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १२-१३ ॥
सर्जनिम्बार्जुनवनं पाटलीकुलसंकुलम् ।
हिन्तालैश्च तमालैश्च पुन्नागैश्चोपशोभितम् ॥ १४ ॥
राल, नीम और अर्जुन वृक्षोंका वन शोभा दे रहा था। पाड़र वृक्षोंके समूह वहाँ सब ओर छा रहे थे । हिंताल, तमाल और पुन्नाग ( जायफल ) उस शैलाग्रशिखरकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १४ ॥
जलेषु जलजैश्छन्नं स्थलेषु स्थलजैरपि ।
पङ्कजैर्द्रुमखण्डैश्च सर्वतः प्रतिभूषितम् ॥ १५ ॥
वहाँ जलोंमें जलज कमल, स्थलोंमें स्थलज कमल तथा अन्यान्य वृक्षसमूह सब ओरसे उस पर्वतके आभूषण बने हुए थे ॥ १५ ॥
जम्बूजम्बूलवृक्षाढ्यं कद्रुकन्दलभूषितम् ।
चम्पकाशोकवकुलं बिल्वतिन्दुकशोभितम् ॥ १६ ॥
जामुन, केवड़े, कद्रु, केले, चम्पा, अशोक, बकुल, बिल्व और तिन्दुक आदि वृक्षोंसे वह शैल सुशोभित था ॥
कुब्जैश्च नागपुष्पैश्च समन्तादुपशोभितम् ।
नागयूथसमाकीर्णं मृगसंघातशोभितम् ॥ १७ ॥
बहुत-से कुब्ज और नागकेसरके फूल सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ाते थे । झुंड-के-झुंड हाथी वहाँ सब ओर फैले हुए थे । मृगोंके समुदायसे वह शोभायमान था ॥ १७ ॥
सिद्धचारणरक्षोभिः सेवितप्रस्तरान्तरम् ।
गन्धर्वैश्च समायुक्तं गुह्यकैः पक्षिभिस्तथा ॥ १८ ॥
उसके प्रस्तरखण्डोंके मध्यभागोंमें सिद्ध, चारण तथा राक्षस बैठे हुए थे। गन्धर्व, गुह्यक तथा पक्षी भी उस पर्वत-का सेवन करते थे ॥ १८ ॥
विद्याधरगणैर्नित्यमनुकीर्णशिलातलम् ।
सिंहशार्दूलसंनादैः सततं प्रतिनादितम् ।
सेवितं वारिधाराभिश्चन्द्रपादैश्च शोभितम् ॥ १९ ॥
उसकी शिलाएँ सदा ही विद्याधरगणोंसे सेवित होती थीं। सिंहों और व्याघ्रोंके दहाड़नेकी ध्वनिसे यह पर्वत निरन्तर गूँजता रहता था । जलकी धाराएँ और चन्द्रमाकी किरणें उसका सेवन एवं शोभा-संवर्धन करती थीं ॥ १९ ॥
स्तुतं त्रिदशगन्धर्वरप्सरोभिरलंकृतम् ।
वनस्पतीनां दिव्यानां पुष्पैरुच्चावचैः श्रितम् ॥ २० ॥
देवता और गन्धर्व उसकी प्रशंसा करते थे । वह पर्वत अप्सराओंसे अलंकृत था। दिव्य वनस्पतियोंके नाना प्रकारके फूल वहाँ सब ओर बिखरे पड़े थे ॥ २० ॥
शक्रवज्रप्रहाराणामनभिज्ञं कदाचन ।
दावाग्निभयनिर्मुक्तं महावातभयोज्झितम् ॥ २१ ॥
उस पर्वतको कभी भी इन्द्रके वज्रप्रहारकी व्यथाका अनुभव नहीं हुआ था । वहाँ न तो दावानलका भय था और न प्रचण्ड आँधीका ॥ २१ ॥
प्रपातप्रभवाभिश्च सरिद्भिरुपशोभितम् ।
काननैरानाकारैर्विशेषपद्भिरिव श्रियम् ॥ २२ ॥
निर्झरोंसे प्रकट हुई सरिताएँ उस पर्वतको सुशोभित करती थीं । वह अपनी शोभा बढ़ाते हुए-से मुखाकार काननोंसे उपलक्षित होता था ॥ २२ ॥
जलशैवलशृङ्गाग्रैरन्मिपन्तमिव श्रिया ।
स्थलीभिर्मृगजुष्टाभिः कान्ताभिरुपशोभितम् ॥ २३ ॥
जल और सिवारसे युक्त शिखरोंके अग्रभागद्वारा मानों वह लक्ष्मीसे आँख मिला रहा था । पशुओंसे सेवित कमनीय वनस्थलियाँ उसकी शोभा बढ़ाती थीं ॥ २३ ॥
पादपच्छन्नभूमिभिः सपुष्पाभिः समन्ततः ॥ २४ ॥
विष्णुपर्व ] चत्वारिंशोऽध्यायः ३६३
पार्श्वैरुपलकल्माषैर्मेघैरिव विभूषितम् ।
पादपच्छन्नभूमिभिः सपुष्पाभिः समन्ततः ॥ २४ ॥
मण्डितं वनराजीभिः प्रमदाभिः पतिर्यथा ।
पार्श्वभागमें स्थित चितकबरे प्रस्तरखण्डोंसे वह ऐसी शोभा पा रहा था, मानो बहुरंगे बादलोंसे विभूषित हो रहा हो। अपने वृक्षसमूहोंसे भूमिको ढक देनेवाली पुष्पशोभित वनश्रेणियाँ उस पर्वतको सब ओरसे घेरकर उसी प्रकार शोभा-सम्पन्न किए हुए थीं, जैसे पुष्पवती (रजस्वला होनेके पश्चात् स्नान एवं पुष्पहारसे अलंकृत) युवती स्त्रियाँ पतिको घेरकर खड़ी हों ॥ २४३॥
सुन्दरीभिर्धरीभिश्च कन्दराभिस्तथैव च ॥ २५ ॥
तेषु तेष्ववकाशेषु सदारमिव शोभितम् ।
जगह-जगह सुन्दर गुफाओं और मनोहर कन्दराओंसे अलंकृत हुआ गोमन्तगिरि विभिन्न स्थानोंमें सपत्नीक पुरुष-की भाँति शोभा पाता था ॥ २५३॥
ओषधीदीप्तशिखरं वानप्रस्थनिषेवितम् ।
जातरूपैर्वनोद्देशैः कृत्रिमैरिव भूषितम् ॥ २६ ॥
विभिन्न प्रकारकी ओषधियाँ उसके शिखरको उद्भासित किये हुए थीं। वानप्रस्थ मुनि उसका सेवन करते थे तथा उसके सहज सुन्दर वनोद्देश कृत्रिम उद्यानोंकी भाँति उसे विभूषित किये हुए थे ॥ २६ ॥
मूलेन सुविशालेन शिरसाप्युच्छ्रितेन च ।
पृथिवीमन्तरिक्षं च ग्राहयन्तमिव स्थितम् ॥ २७ ॥
वह पर्वत अपने अत्यन्त विशाल मूलभाग और उच्चतम शिखरसे पृथ्वी और आकाशमे प्रविष्ट होकर उनकी थाह लगाता हुआ-सा खड़ा था ॥ २७ ॥
ते समासाद्य गोमन्तं रम्यं भूमिधरोत्तमम् ।
रुचिरं रुरुचुः सर्वे वासायामरसंनिभाः ॥ २८ ॥
पर्वतोंमें श्रेष्ठ सुन्दर एवं मनोहर गोमन्तपर्वतपर पहुँच-कर उन सभी देवोपम पुरुषोंने वहाँ निवास करनेकी इच्छा की ॥ २८ ॥
रुरुहुस्ते गिरिवरं खमूर्ध्वमिव पक्षिणः ।
असज्जमाना वेगेन वैनतेयपराक्रमाः ॥ २९ ॥
गरुड़के समान पराक्रमी वे तीनों महापुरुष उस श्रेष्ठ पर्वतपर उसी तरह वेगसे चढ़ने लगे, जैसे पक्षी ऊपर आकाश-में उड़ते हैं। उस समय उनमेंसे किसीकी भी गति अवरुद्ध नहीं होती थी ॥ २९ ॥
ते तु तस्योत्तरं शृङ्गमारूढास्त्रिदशा इव ।
अगारं सहसा चक्रुर्मनसा निर्मितोपमम् ॥ ३० ॥
वे देवताओंकी भाँति उसके सर्वोच्च शिखरपर आरूढ़ हो गये । वहाँ उन्होंने सहसा अपने रहनेके लिये घर बना लिया, मानो मानसिक संकल्पसे ही उसका निर्माण कर लिया हो ॥ ३० ॥
निविष्टौ यादवौ दृष्ट्वा जामदग्न्यो महामतिः ।
रामोऽभिमतमक्लिष्टमाप्रष्टुमुपचक्रमे ॥ ३१ ॥
उन दोनों यदुकुमारोंको वहाँ विराजमान हुआ देख परम बुद्धिमान् परशुरामजीने प्रसन्नतापूर्वक अपने अभीष्ट स्थानपर जानेके लिये उनसे पूछना आरम्भ किया—॥३१॥
कृष्ण यास्याम्यहं तात पुरं शूर्पारकं विभो ।
युवयोर्नास्ति चमूख्यं संग्रामे दैवतैरपि ॥ ३२ ॥
'तात ! प्रभावशाली श्रीकृष्ण ! अब मैं शूर्पारक नगरको जाऊँगा । आप दोनोंको तो युद्धमें देवता भी नहीं हरा सकते (फिर मनुष्यकी तो बात ही क्या है ?) ॥ ३२ ॥
प्राप्तवानस्मि यां प्रीतिं मार्गानुगमनादपि ।
सा मे कृष्णानुगृह्णाति शरीरमिदमव्ययम् ॥ ३३ ॥
'श्रीकृष्ण ! तुम दोनोंके साथ मार्गका अनुसरण करनेसे मुझे जो प्रसन्नता प्राप्त हुई है, वह मेरे इस अविनाशी शरीर-को अनुगृहीत कर रही है ॥ ३३ ॥
इदं तत् स्थानमुद्दिष्टं यत्रायुधसमागमः ।
युवयोर्विहितो देवैः समयः साम्परायिकः ॥ ३४ ॥
'मैंने जिसे बताया था और जहाँ तुम्हें अपने दिव्य आयुध प्राप्त होनेवाले हैं, वह स्थान यही है । देवताओंने तुम्हारे लिये उनकी प्राप्तिका यही समय निर्धारित किया है, जो परलोकके लिये हितकर है ॥ ३४ ॥
देवानां मुख्य वैकुण्ठ विष्णो देवैरभीष्टुत ।
कृष्ण सर्वस्य लोकस्य शृणु मे नैष्ठिकं वचः ॥ ३५ ॥
'देवताओंमे श्रेष्ठ वैकुण्ठ ! तुम सर्वव्यापी विष्णु हो । देवताओंने सदा तुम्हारी स्तुति की है । श्रीकृष्ण ! तुम मेरी यह तात्त्विक बात सुनो, जो सम्पूर्ण जगत्के लिये हितकर है ॥ ३५ ॥
यदिदं प्रस्तुतं कर्म त्वया गोविन्द लौकिकम् ।
मानुषाणां हितार्थाय लोके मानुषदेहिना ॥ ३६ ॥
तस्यायं प्रथमः कल्पः कालेन तु नियोजितः ।
'गोविन्द ! तुमने मनुष्योंके हितके लिये संसारमें मानव-शरीर धारण करके जो यह लौकिक कर्म प्रारम्भ किया है, उसका यह पहला प्रयोग यहीं होने जा रहा है। कालने उसका आयोजन यहीं किया है ॥ ३६३॥
जरासंधेन चै सार्धं संग्रामे समुपस्थिते ॥ ३७॥
तत्रायुधबलं चैव रूपं च रणकर्कशम् ।
स्वयमेवात्मना कृष्ण त्वमात्मानं विधत्स्व ह ॥ ३८ ॥
'श्रीकृष्ण ! जरासंधके साथ संग्राम उपस्थित होनेपर तुम स्वयं ही अपने-आपके द्वारा अपनेको आयुध-बलसे सम्पन्न कर लेना और अपना रण-कर्कश रूप बना लेना ॥३७-३८॥
| ३६४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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चक्रोद्यतकरं दृष्ट्वा त्वां गदापाणिमाहवे।
चतुर्द्विगुणपीनांसं विभ्येद्रपि शतक्रतुः॥ ३९॥
‘जिस समय तुम आठ मांसल कंधोंसे युक्त हो हाथोंमें चक्र और गदा उठाये युद्धके लिये उपस्थित होओगे, उस समय तुम्हें देखकर देवराज इन्द्र भी भयभीत हो उठेंगे ॥ ३९ ॥
अद्यप्रभृति ते यात्रा स्वर्गीका समुपस्थिता।
पृथिव्यां पार्थिवेन्द्राणां कृतास्त्रे त्वयि मानद॥ ४०॥
‘मानद ! जब तुम हाथमें हथियार लेकर युद्धके लिये उद्यत हो गये हो, तब आजसे ही भूमण्डलके राजाओंकी स्वर्गार्थ यात्रा आरम्भ हो जायगी ॥ ४० ॥
वैनतेयस्य चाह्वानं वाहनं ध्वजकर्मणि।
कुरु शीघ्रं महाबाहो गोविन्द वदतां वर॥ ४१॥
‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाबाहु गोविन्द ! तुम अपने ध्वजारोपणरूप कार्यकी सिद्धिके लिये शीघ्र ही वाहनरूप विनतानन्दन गरुड़का आवाहन करो ॥ ४१ ॥
युद्धकामा नृपतयस्त्रिदिवाभिमुखोद्यताः।
धार्तराष्ट्रस्य वशगास्तिष्ठन्ति रणवृत्तयः ॥ ४२ ॥
‘युद्धकी इच्छा करनेवाले नरेशगण स्वर्गके लिये अभिमुख एवं उद्यत होकर युद्धवृत्तिका आश्रय ले धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन-के अधीन होकर खड़े हैं ॥ ४२ ॥
राज्ञां निधनदृष्टार्था वैधव्येनाधिवासिता।
एकवेणीधरा चेयं वसुधा त्वां प्रतीक्षते ॥ ४३ ॥
‘राजाओंका निधन होनेवाला है, यह बात प्रत्यक्ष देखकर वैधव्यसूचक वेष-भूषा धारण किये एक वेणीधारिणी ( केश-संस्कारसे रहित ) यह वसुन्धरा तुम्हारी राह देखती है ॥४३॥
सग्रहं कृष्ण नक्षत्रं संक्षिप्यारिविमर्दन।
त्वयि मानुष्यमापन्ने युद्धे च समुपस्थिते ॥ ४४॥
‘शत्रुमर्दन श्रीकृष्ण ! आप मानवरूप धारण करके इस धरातलपर आ गये हैं और युद्धका अवसर भी उपस्थित है, इसलिये क्षत्रियसमाज मृत्युसे संकुचित न होकर रणभूमिमे आनेके लिये उतावला हो उठा है। किसी समयविशेषकी प्रतीक्षा नहीं कर रहा है, क्योंकि उसका जन्मनक्षत्र क्रूरग्रहमे आक्रान्त हो गया है ॥ ४४ ॥
त्वरस्व कृष्ण युद्धाय दानवानां वधाय च।
स्वर्गाय च नरेन्द्राणां देवतानां सुखाय च ॥ ४५ ॥
‘श्रीकृष्ण ! तुम दानवोंका वध करने, नरेशोंको स्वर्ग-लोकमें भेजने और देवताओंको सुख पहुँचानेके उद्देश्यसे युद्धके लिये जल्दी करो ॥ ४५ ॥
सत्कृतोऽहं त्वया कृष्ण लोकैश्च सचराचरैः।
त्वया सत्कृतरूपेण येन सत्कृतवानहम् ॥ ४६ ॥
‘सच्चिदानन्दघन श्रीकृष्ण ! तुम स्वरूपतः सबके द्वारा सत्कृत हो। तुम सर्वात्माने जो मेरा सत्कार किया है, उससे मैं चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण लोकोंद्वारा सत्कृत हो गया और सदाके लिये सत्कारवान् बन गया ॥ ४६ ॥
साधयामि महाबाहो भवतः कार्यसिद्धये ।
स्मर्तव्यश्चास्मि युद्धेषु कान्तारेषु महीक्षिताम् ॥ ४७ ॥
‘महाबाहो ! मैं तुम्हारे कार्यकी सिद्धिके लिये स्वयं भी साधना करूँगा। सभी भूमिपालोंको चाहिये कि वे दुर्गम संकट और युद्धके अवसरोंपर मेरा स्मरण करें’ ॥ ४७ ॥
इत्युक्त्वा जामदग्न्यस्तु कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ।
जयाशिषा वर्द्धयित्वा जगामाभीप्सितां दिशम्॥ ४८ ॥
ऐसा कहकर परशुरामजी अनायास ही महान् कर्म करने-वाले श्रीकृष्णको विजयसूचक आशीर्वादसे बढ़ावा देकर स्वयं अभीष्ट दिशाको चले गये ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गोमन्तारोहणं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णका गोमन्तपर्वतपर आरोहणविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥
एकचत्वारिंशोऽध्यायः
बलरामके पास वारुणी, कान्ति एवं श्री (शोभा )—इन देवाङ्गनाओंका आगमन, गरुड़के द्वारा श्रीकृष्णको वैष्णव मुकुटकी प्राप्ति, श्रीकृष्णका बलरामसे वार्तालाप तथा जरासंधकी सेनाका निरीक्षण करके अपने आपसे ही मानसिक उद्गार प्रकट करना
वैशम्पायन उवाच
जामदग्न्ये गते रामे तौ यादवकुलोद्वहौ।
गोमन्तशिखरे रम्ये चेरतुः कामरूपिणौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! परशुरामजी-के चले जानेपर यादवकुलका भार वहन करनेवाले वे श्री-कृष्ण और बलराम इच्छानुसार रूप धारण करके गोमन्त-
पर्वतके रमणीय शिखरपर विचरने लगे ॥ १ ॥
विष्णुपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः ३६५
पर्वतके रमणीय शिखरपर विचरने लगे ॥ १ ॥
वनमालाकुलोरोस्कौ नीलपीताम्बरादुभौ ।
नीलश्वेतवपुष्मन्तौ गगनस्थाविवाम्बुदौ ॥ २ ॥
उन दोनोंके वक्षःस्थलमें वनमाला शोभा पा रही थी । दोनों क्रमशः नीले-पीले वस्त्र धारण करके अपने गौर-श्याम शरीरसे आकाशमे स्थित हुए दो मेघोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ २ ॥
तौ शैलधातुदिग्धाङ्गौ युवानौ शिखरे स्थितौ ।
चेरतुस्तत्र कान्तेषु वनेषु रतिलालसौ ॥ ३ ॥
पर्वतीय धातुओंसे अपने अङ्गोंका शृङ्गार करके उस पर्वतके शिखरपर खड़े हुए दोनो नवयुवक वीर क्रीड़ाकी लालसा लिये कमनीय वनोंमें विचरण करने लगे ॥ ३ ॥
उदयन्तं निरीक्षन्तौ शशिनं ज्योतिषां वरम् ।
उदयास्तमने चैव ग्रहाणां धरणीधरे ॥ ४ ॥
वे उस पर्वतपर ज्योतिर्मय नक्षत्रोंमें श्रेष्ठ चन्द्रमाके उदयकी शोभा देखते और ग्रहोंके उदय-अस्त देखा करते थे ॥ ४ ॥
अथ संकर्षणः श्रीमान् विना कृष्णेन वीर्यवान् ।
चचार तस्य शिखरे नगस्य नगसंनिभः ॥ ५ ॥
एक दिन परम पराक्रमी श्रीमान् संकर्षण श्रीकृष्णके बिना ही उस पर्वतके शिखरपर विचर रहे थे। वे स्वयं भी पर्वत-के समान ही प्रतीत होते थे ॥ ५ ॥
प्रफुल्लस्य कदम्बस्य सुच्छायाये निषसाद ह ।
वायुना मन्दगन्धेन वीज्यमानः सुखेन वै ॥ ६ ॥
घूमते-घूमते एक खिले हुए कदम्बकी मनोहर छायामें बैठ गये। उस समय कदम्बकी मधुर मन्द गन्धसे वासित वायु उन्हें सुखपूर्वक व्यजन डुलाने लगी ॥ ६ ॥
तस्य तेनानिलौघेन सेव्यमानस्य तत्र वै ।
मद्यसंस्पर्शजो गन्धः संस्पृशन् घ्राणमागतः ॥ ७ ॥
वह मन्द-मन्द वायु बहकर जब बलरामजीकी सेवा कर रही थी, उस समय उनकी घ्राणेन्द्रियमें मद्यका स्पर्श करके आये हुए सुगन्धित समीरने प्रवेश किया ॥ ७ ॥
तृष्णा चैनं विवेशाशु वारुणीप्रभवा तदा ।
शुशोष च मुखं तस्य मत्तस्येवापरेऽहनि ॥ ८ ॥
उस समय उनके भीतर वारुणी (मद्य या अमृत) की तृष्णाका आवेग हुआ। फिर तो दूसरे दिन मतवाले पुरुषकी भाँति उनका मुँह सूखने लगा ॥ ८ ॥
स्मारितः स पुरावृत्तममृतप्राशनं विभुः ।
तृषितो मदिरान्वेषी ततस्तं तरुमैक्षत ॥ ९ ॥
उन्हें पूर्वकालमे किये गये अमृतपानका स्मरण हो आया। वे तृषित होकर उस अमृतकी खोज करने लगे। तब उन्होंने उस वृक्षकी ओर देखा ॥ ९ ॥
तस्य प्रावृषि फुल्लस्य यदम्भो जलजोझितम् ।
तत्कोटरस्थं मदिरा संजायत मनोहरा ॥ १० ॥
वर्षाकालमें उस खिले हुए कदम्बपर जो मेघोंका बरसाया हुआ जल गिरा था, वह उसके कोटरमें मनोहर सुधाके रूपमें प्रकट हो गया ॥ १० ॥
तां तु तृष्णाभिभूतात्मा पिबन्नार्त इवासकृत् ।
मोहाच्च चलिताकारः समजायत स प्रभुः ॥ ११ ॥
बलरामजीका हृदय प्याससे घबरा उठा था। वे पिपासा-पीड़ित पुरुषकी भाँति उस अमृतको बार-बार पीने लगे। उसको अधिक पी लेनेके कारण उनपर मोह (नशा-) सा छा गया, जिससे उन प्रभावशालीका शरीर कुछ लड़खड़ाने-सा लगा ॥ ११ ॥
तस्य मत्तस्य वदनं किंचिच्चलितलोचनम् ।
घूर्णिताकारमभवच्छरत्कालेन्दुसप्रभम् ॥ १२ ॥
मधुसे मत्त हुए बलरामका मुख कुछ झूमता-सा प्रतीत हुआ, नेत्र किंचित् चञ्चल हो उठे। उस मुखकी प्रभा शरत्-कालके चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित होने लगी ॥ १२ ॥
कदम्बकोटरे जाता नाम्ना कादम्बरीति सा ।
रूपिणी वारुणी तत्र देवानाममृतारणी ॥ १३ ॥
वह मधुमयी सुधा कदम्बके कोटरमें उत्पन्न हुई थी, इसलिये कादम्बरी नामसे विख्यात हुई। वहाँ मूर्तिमती वारुणी प्रकट हुई थी, जो देवताओंके लिये अमृत पैदा करने-वाली है ॥ १३ ॥
कादम्बरीमदकलं विदित्वा कृष्णपूर्वजम् ।
तिस्रस्त्रिदशनार्यस्तमुपतस्थुः प्रियंवदाः ॥ १४ ॥
श्रीकृष्णके बड़े भाईको कादम्बरी (मधु या अमृत) के नशेसे स्पष्ट बात बोलनेमे असमर्थ जान तीन प्रियवादिनी देवाङ्गनाएँ उनकी सेवामें उपस्थित हुईं ॥ १४ ॥
मदिरा रूपिणी भूत्वा कान्तिश्च शशिनः प्रिया ।
श्रीश्च देवी वरिष्ठा स्त्री स्वयमेवाम्बुजध्वजा ॥ १५ ॥
साञ्जलिप्रग्रहा देवी रौहिणेयमुपस्थिता ।
वारुण्या सहितं वाक्यमुवाच मदविह्वलम् ॥ १६ ॥
एक तो मादक मद्य या अमृतकी अधिष्ठात्री देवी (जिन्हें वारुणी कहते हैं) मूर्तिमती होकर प्रकट हुई। दूसरी चन्द्रमा-की प्रिय कान्ति (की अधिष्ठात्री देवी) थी और तीसरी श्री देवी थीं, जो सर्वश्रेष्ठ स्त्री मानी जाती हैं, उनके ध्वजमे कमलका चिह्न है, वे देवी स्वयं ही हाथ जोड़े हुए रोहिणी-नन्दन बलरामकी सेवामे उपस्थित हुई थीं। वारुणीके साथ उन्होंने मदविह्वल बलरामजीसे इस प्रकार कहा—॥ १५-१६ ॥
बलं जयस्व दैत्यानां बलदेव दिवीश्वर ।
अहं ते दयिता कान्ता वारुणी समुपस्थिता ॥ १७ ॥
३६६ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'पहले वारुणी बोली 'देवलोकेश्वर बलदेव ! आप दैत्योंकी सेनापर विजय प्राप्त करें। मैं आपकी प्राणवल्लभा वारुणी सेवामें उपस्थित हुई हूँ ॥ १७ ॥
त्वामेवान्तर्हितं श्रुत्वा शाश्वतं वडवामुखे।
क्षीणपुण्येव वसुधां पर्यंटिं विमलानन ॥ १८ ॥
'निर्मल मुखवाले देव ! मैं आपको वडवानलके समीप पातालमें शेषरूपसे नित्य विराजमान जानती थी, किंतु इस समय भूतलमें अवतार लेनेके कारण वहाँसे अदृश्य हो गये हैं, ऐसा सुनकर मैं पुण्यहीना नारी-सी आपकी खोजमें सारी पृथ्वीपर भटक रही थी ॥ १८ ॥
पुष्पचक्रानुलेपेषु केसरेषूपषितं मया।
अतिमुक्तेषु चाक्षोभ्य पुष्पस्तवकवत्सु च ॥ १९ ॥
'अजेय वीर ! मैंने पुष्पसमूहोंसे अनुलिप्त हुए केसरोंमें निवास किया है, फूलोंके गुच्छोंसे सुशोभित वासन्ती लताओंमें वास किया है ॥ १९ ॥
अहं कदम्बमालीना मेघकाले मुखप्रिया ।
तृषितं मार्गमाणा त्वां स्वेन रूपेण छादिता ॥ २० ॥
'मेरे लिये प्यासे हुए आपकी खोज करती हुई मैं अपने रूपको छिपाकर वर्षाकालमें कदम्ब वृक्षके भीतर लुक-छिपकर रहती आयी हूँ। मुझे आपके मुखका निवास ही विशेष प्रिय है ॥ २० ॥
सास्मि पूर्णेन योगेन यथैवामृतमन्थने ।
समीपं प्रेषिता पित्रा वरुणेन तवानघ ॥ २१ ॥
सा यथैवार्णवगता तथैव वडवामुखे ।
त्वयोपभोक्तुमिच्छामि सम्मतस्त्वं हि मे गुरुः ॥ २२ ॥
'निष्पाप बलराम ! जैसे पूर्वकालमें अमृतमन्थनके समय पूर्णयोगसे युक्त होनेपर मेरे पिता वरुणने मुझे आपके समीप भेजा था, जैसे समुद्रमें और पातालमें मैं आपके पास रही हूँ, उसी प्रकार इस समय भी आपकी सेवामें उपस्थित हुई हूँ और चाहती हूँ, कि आपके द्वारा मेरा उपभोग हो; क्योंकि मेरे हृदयने आपहीको अपना स्वामी माना है ॥ २१-२२ ॥
न त्वानन्तं परित्यक्ष्ये भर्त्सितापि त्वयानघ ।
नाहं त्वया विना लोकानुत्सहे देव सेवितुम् ॥ २३ ॥
आदिपद्मं च पद्माङ्कं दिव्यं श्रवणभूषणम् ।
कौशेयानि च नीलानि समुद्रार्हाणि विभ्रती ॥ २४ ॥
'अनघ ! आप मुझे डाँट बताये, तो भी मैं आप अनन्त- का परित्याग नहीं करूँगी। देव ! मैं समुद्रमें रहनेवालीके योग्य नीले रंगकी रेशमी साड़ी पहनकर आदिपद्म तथा पद्मचिह्नित दिव्य कर्णभूषण धारण कर आपकी सेवामें आयी हूँ। आपके बिना मैं दूसरे किन्हीं लोकोंका सेवन करना नहीं चाहती' २३-२४
मदिरानन्तरं कान्तिः संकर्षणमुपस्थिता ।
मदेनागलितश्रोणी किंचिदाघूर्णितेक्षणा ॥ २५ ॥
प्रोवाच प्रणयात् कान्तिर्बद्धाञ्जलिपुटा सती।
जयपूर्वेण योगेन सस्मितं वाक्यमर्थवत् ॥ २६॥
वारुणीके बाद कान्तिदेवी संकर्षणकी सेवामें उपस्थित हुई। उसका कटिप्रदेश मदमें कुछ कम्पित हो रहा था। आँखें भी कुछ घूम रही थीं। उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा- 'जय हो बलरामजीकी !' फिर प्रेमसे मुसकराती हुई वह प्रयोजनयुक्त वचन बोली-॥ २५-२६ ॥
अहं चन्द्रादपि गुरुं सहस्रशिरसं प्रभुम् ।
स्वैर्गुणैरनुरक्ता त्वां यथैव मदिरा तथा ॥ २७ ॥
'प्रभो ! आपके सहस्रों मस्तक हैं। आप जगत्के स्वामी हैं। मेरी दृष्टिमें आपका गौरव चन्द्रमासे भी अधिक है। मैं भी वारुणीकी भाँति आपके निजी गुणोंसे आकृष्ट हो आपमें अनुरक्त हो गयी हूँ (इसीलिये आपकी सेवामें उपस्थित हूँ। आप मुझे अङ्गीकार करें ।)' ॥ २७ ॥
श्रीश्च पद्मालया देवी निधेया वैष्णवोरसि ।
रौहिणेयोरसि शुभा मालेवामलतां गता ॥ २८ ॥
सा मालाममलां गृह्य वलस्योरसि दंशिता।
पद्मास्या पद्महस्ता वै संकर्षणमथाब्रवीत् ॥ २९ ॥
जो भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें नित्य निवास करने योग्य हैं, वे कमलभवनमें वास करनेवाली देवी श्री* (शोभा) रोहिणीनन्दन बलरामके वक्षःस्थलमे सुन्दर मालाकी भाँति प्रतिष्ठित हो निर्मल भावको प्राप्त हुईं। उनका मुख कमलके समान सुशोभित था, उनके हाथमे भी कमल-पुष्प शोभा दे रहा था; वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित हुई वे मूर्तिमती शोभा देवी बलरामके वक्षमें स्थित हो एक निर्मल माला हाथमें लेकर संकर्षणसे बोलीं-॥ २८-२९ ॥
राम रामाभिरामस्त्वं वारुण्या समलंकृतः ।
कान्त्या मया च देवेश संगतश्चन्द्रमा यथा ॥ ३० ॥
'देवेश्वर राम ! बलराम ! आप बड़े ही अभिराम (सुन्दर) हैं। वारुणी (सुधा) से, चन्द्रमाकी-सी कान्तिसे तथा मुझसे (कमलालयाकी-सी शोभासे) सम्पन्न होकर चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहे हैं ॥ ३० ॥
इयं च सा मया मौलिः प्रोद्धता वरुणालयात् ।
मूर्ध्नि शीर्षसहस्रस्य या ते भानुरिवाप्रभौ ॥ ३१ ॥
'आप सहस्र सिरवाले अनन्तदेवके मस्तकपर जो सूर्यके समान उद्भासित होता था, वह मुकुट समुद्रसे निकालकर मैं यहाँ ले आयी हूँ। यही है वह मुकुट ॥ ३१ ॥
* यहाँ श्रीका अर्थ शोभाकी अधिष्ठात्री देवी है। साक्षात् भगवती लक्ष्मी तो भगवान् विष्णुकी अनन्यानुरागिणी पतिव्रता पत्नी हैं। यहाँ मधु, कान्ति और शोभा - इन तीन लोकसामान्य वस्तुओं- की अधिष्ठात्री देवियोंका ही उल्लेख किया गया है- ऐसा समझना चाहिये।
विष्णुपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः ३६७
जातरूपमयं चैकं कुण्डलं वज्रभूषितम् । आदिपद्मं च पद्माक्षं दिव्यश्रवणभूषणम् ॥ ३२ ॥
'इसके सिवा वज्रमणि (हीरे) से विभूषित एक सुवर्णमय कुण्डल भी लेती आयी हूँ, जो आपके एक कानका दिव्य भूषण है। यह आदिपद्म और पद्माक्ष कहलाता है ॥ ३२ ॥
कौशेयानि च नीलानि समुद्रार्हाणि भावतः । हारं च पीनतरलं समुद्राभ्यन्तरोपितम् ॥ ३३ ॥
'जो समुद्रमें ही मिल सकते हैं, ऐसे कितने ही नीले रंगके रेशमी वस्त्र (अथवा आपकी इच्छाके अनुरूप नील कौशेय वस्त्र) तथा यह पीन तरल हार, जो समुद्रमे ही विद्यमान था, मैं आपके लिये लायी हूँ । आप इसे सादर ग्रहण करें ॥ ३३ ॥
देवेमां प्रतिगृह्णीष्व पौराणीं भूषणक्रियाम् । समयस्ते महाबाहो भूषणानामलंकिया ॥ ३४ ॥
'देव ! यह सब आपकी पुरातन भूषण-सामग्री है। इसे ग्रहण कीजिये। महाबाहो ! यह आपके भूषण ग्रहण करनेका समय है। आपसे ही इन भूषणोंकी शोभा है, इनसे आपकी नहीं'॥
संगृह्य तमलंकारं ताश्च तिस्रः सुरस्त्रियः । शुशुभे बलदेवो हि शारदेन्दुसमप्रभः ॥ ३५ ॥
वह अलङ्कार तथा उन तीनों देवाङ्गनाओंको ग्रहण करके बलदेवजी शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाने लगे ॥
स समागम्य कृष्णेन जलजाम्भोदवर्चसा । मुदं परमिकां लेभे ग्रहयुक्तः शशी यथा ॥ ३६ ॥
तदनन्तर वे नीलकमल और मेघके समान श्याम कान्तिवाले श्रीकृष्णके साथ मिलकर ग्रहयुक्त चन्द्रमाके समान सुशोभित होने लगे । उस समय उनको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥ ३६ ॥
ताभ्यामुभाभ्यां संलापे वर्तमाने गृहे यथा । वैनतेयस्ततोऽध्वानमतिचक्राम वेगतः ॥ ३७ ॥
वे दोनों भाई जैसे घरमे बैठे हो, उस प्रकार बातचीत करने लगे । इसी समय विनतानन्दन गरुड बड़े वेगसे विशाल मार्ग तै करके वहाँ आये ॥ ३७ ॥
संग्राममुक्तस्तेजस्वी दैत्यप्रहरणाङ्कितः । देवतानां जयश्लाघी दिव्यस्रगनुलेपनः ॥ ३८ ॥
तेजस्वी गरुड़ उस समय एक संग्रामसे छूटकर आये थे। दैत्योंके प्रहारोंके चिह्न उस समय भी उनके अङ्गोंमें अङ्कित थे। वे देवताओंकी विजय चाहनेवाले तथा दिव्य पुष्पोंकी माला और दिव्य चन्दन धारण करनेवाले थे ॥ ३८ ॥
सुप्तस्य शयने दिव्ये क्षीरोदे वरुणालये । विष्णोः किरीटं दैत्येन हृतं वैरोचनेन वै ॥ ३९ ॥
वरुणके निवासभूत क्षीरसमुद्रमे जब भगवान् विष्णु दिव्य शय्यापर सो रहे थे, उस समय विरोचनके पुत्र एक दैत्यने उनका किरीट चुरा लिया ॥ ३९ ॥
तदर्थस्तेन संग्रामः कृतो गुर्वर्थमोजसा । किरीटार्थे समुद्रस्य मध्ये दैत्यगणैः सह ॥ ४० ॥
अपने गुरुरूप भगवान्के लिये उस किरीटको वापस लानेके उद्देश्यसे गरुड़ने बीच समुद्रमे दैत्योंके साथ बलपूर्वक संग्राम किया ॥ ४० ॥
मोक्षयित्वा किरीतं तु वैष्णवं पततां वरः । व्यत्यक्रमत वेगेन गगनं देवतालयम् ॥ ४१ ॥
भगवान् विष्णुके उस किरीटको दैत्योंके हाथसे छुड़ाकर पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ बड़े वेगसे देवताओंके निवासभूत आकाशमे उड़ चले ॥ ४१ ॥
स ददर्श गुरुं शैले विष्णुं कार्यान्तरमागतम् । तेन क्रीडावलम्बेन किरीटेन विराजता ॥ ४२ ॥
उन्होंने देखा, मेरे स्वामी विष्णु दूसरे कार्यसे इस पर्वतपर पधारे हैं। वे उस समय उस प्रकाशमान किरीटको क्रीडापूर्वक अपनी चोंचमे लटकाये चल रहे थे ॥ ४२ ॥
स दृष्ट्वा मानुषं विष्णुं शैलराजशिरोगतम् । प्रकाशचेष्टानिर्मुक्तं विमौलिमिव मानुषम् ॥ ४३ ॥ अभिज्ञस्तस्य भावानां गरुत्मान् पततां वरः । विक्षेप खं गतो मौलिं विष्णोः शिरसि हृष्टवत् ॥ ४४ ॥
गिरिराज गोमन्तके शिखरपर विराजमान मानवरूपधारी विष्णुको प्रकाश और चेष्टाओसे रहित तथा मुकुटहीन देख उनके मानसिक भावोंको समझनेवाले पक्षियोमे श्रेष्ठ गरुड़ने आकाशमे स्थित होकर बड़े हर्षके साथ उन श्रीविष्णुके सिरपर वह मुकुट डाल दिया ॥ ४३-४४ ॥
उपेन्द्रमूर्ध्नि सा मौलिरपिनद्धा इवापतत् । शिरसः स्थाननियुक्ता कृष्णं चैवान्वशोभयत् । यथैव मेरुशिखरे भानुर्मध्यंदिने यथा ॥ ४५ ॥
वह मुकुट श्रीकृष्णके मस्तकपर गिरा और इस प्रकार बैठ गया मानो किसीने पहना दिया हो। मस्तकके स्थानपर निश्चित रूपसे आबद्ध होकर उस मुकुटने भगवान् श्रीकृष्णकी शोभा बढ़ा दी। जैसे दोपहरके समय मेरुके शिखरपर सूर्यदेव प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार वह मुकुट भी देदीप्यमान हो रहा था ॥ ४५ ॥
वैनतेयप्रयोगेण विदित्वा मौलिमागताम् । कृष्णः प्रहृष्टवदनो रामं वचनमब्रवीत् ॥ ४६ ॥
गरुड़के प्रयोगसे मुकुटको मस्तकपर आया हुआ जान श्रीकृष्णका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और वे बलरामजीसे इस प्रकार बोले—॥ ४६ ॥
त्वरते खलु कार्यार्थी देवतानां न संशयः । यथेयमावयोः शैले संग्रामरचना कृता ॥ ४७ ॥
३६८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
‘भैया ! इस पर्वतपर हम दोनोंके लिये जिस प्रकार युद्धोपयोगी वेष-भूषाकी रचना कर दी गयी है, इससे यही अनुमान होता है कि देवताओंका कार्य एवं प्रयोजन शीघ्र ही सिद्ध होना चाहता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४७ ॥
वैरोचनेन सुप्तस्य मम मौलिर्महोदधौ ।
शक्रस्य सदृशं रूपं दिव्यमास्थाय सागरात् ॥ ४८ ॥
ग्राहरूपेण यो नीत आनीतोऽसौ गरुत्मता ।
ममादिशयनान्मौलिर्हृत्वा क्षिप्तो गरुत्मता ॥ ४९ ॥
‘जब मैं महासागरमें सो रहा था, उस समय विरोचनका पुत्र इन्द्रका-सा रूप धारण करके वहाँ चला गया और जब मैं शेष-शय्यासे उठकर यहाँ आ गया, तब वह ग्राहरूप धारण करके वहाँसे मेरा मुकुट उठा लाया। वही मुकुट गरुड़ उससे छीन लाये हैं और उन्होंने इसे मेरे मस्तकपर रख दिया है॥
सुव्यक्तं संनिकृष्टः स जरासंधो नराधिपः ।
लक्ष्यन्ते हि ध्वजाग्राणि रथानां वातरंहसाम् ॥ ५० ॥
‘निश्चय ही राजा जरासंध अब बहुत निकट आ गया है; क्योंकि वायुके समान वेगवाले रथोंकी ध्वजाओंके अग्रभाग दिखायी दे रहे हैं ॥ ५० ॥
एतानि विजिगीषूणां शशिकल्पानि भूपृताम् ।
छत्राण्यार्य विराजन्ते दंशितानि मितानि च ॥ ५१ ॥
‘आर्य ! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले राजाओंके ये चन्द्रमा-जैसे श्वेत कान्तिवाले सुसज्जित छत्र प्रकाशित हो रहे हैं; इनकी संख्या परिमित ही है ॥ ५१ ॥
अहो नृपरथोद्गता विमलाश्छत्रपङ्क्तयः ।
अभिवर्तन्ति नः शुभ्रा यथा खे हंसपङ्क्तयः ॥ ५२ ॥
‘अहो ! राजाओंके रथोंपर विराजमान जो ये श्वेत वर्णवाली ऊँची छत्र-पङ्क्तियाँ हमलोगोंकी ओर बढ़ी आ रही हैं, ये आकाशमें उज्ज्वल हंसपङ्क्तियोंके समान सुशोभित होती हैं ॥ ५२ ॥
अहो द्यौर्विमलाभानां शस्त्राणां विमलानना ।
प्रभा भास्करभामिश्रा चरन्तीव दिशो दश ॥ ५३ ॥
‘अहो ! इन निर्मल प्रभाववाले शस्त्रोंकी चमकसे आकाशका मुख भी उज्ज्वल एवं प्रकाशित हो उठा है । शस्त्रोंकी ये दीप्तियाँ सूर्यदेवकी किरणोंसे मिलकर दसों दिशाओंमें विचरती-सी प्रतीत होती हैं ॥ ५३ ॥
एतानि नूनं समरे पार्थिवैरायुधानि च ।
क्षिप्तानि विनशिष्यन्ति मयि सर्वाणि संयुगे ॥ ५४ ॥
‘निश्चय ही, समराङ्गणमें भूमिपालोंद्वारा मुझपर चलाये गये ये समस्त अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो जायेंगे ॥ ५४ ॥
काले खलु नृपः प्राप्तो जरासंधो महीपतिः ।
आवयोर्युद्धनिकषः प्रथमः समरातिथिः ॥ ५५ ॥
‘राजा जरासंध ठीक समयपर आया है। यह हमलोगोंके युद्ध-कौशलकी कसौटी है तथा समराङ्गणका पहला अतिथि है॥
आर्य तिष्ठाव सहितौ न खल्वानागते नृपे ।
युद्धारम्भः प्रयोक्तव्यो बलं तावद् विमृश्यताम् ॥ ५६ ॥
‘आर्य ! हम दोनों साथ रहें। राजा जरासंधके आनेसे पहले अभी हमें युद्ध आरम्भ नहीं करना चाहिये। जबतक वह नहीं आता है, तबतक हम उसके बलका विचार कर लें'॥
एवमुक्त्वा ततः कृष्णः स्वस्थः संग्रामलालसः ।
जरासंधवधं प्रेप्सुश्चकार बलदर्शनम् ॥ ५७ ॥
ऐसा कहकर श्रीकृष्ण स्वस्थभावसे संग्रामकी इच्छा रख-कर जरासंधका वध चाहते हुए उसके सैनिक-बलका निरीक्षण करने लगे ॥ ५७ ॥
वीक्षमाणश्च तान् सर्वान् नृपान् यदुवरोऽव्ययः ।
आत्मानमात्मनोवाच यत्पूर्वं दिवि मन्त्रितम् ॥ ५८ ॥
इमे ते पृथिवीपालाः पार्थिवे वर्त्मनि स्थिताः ।
ये विनाशं गमिष्यन्ति शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ ५९ ॥
उन सब राजाओंका निरीक्षण करते हुए अविनाशी यदुकुलतिलक भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही अपने-आपसे कहने लगे—‘अहो ! दिव्यलोकमें देवताओंके साथ बैठकर जो गुप्त मन्त्रणा की गयी थी, उसके अनुसार ये भूमिपाल राजोचित मार्गपर स्थित हैं। ये शास्त्रोक्त विधिसे संग्राममे विनाशको प्राप्त होंगे ॥ ५८-५९ ॥
प्रोक्षितान् सत्विमान् मन्ये मृत्युना नृपसत्तमान् ।
स्वर्गगामीनि चाप्येषां वपूंषि प्रचकाशिरे ॥ ६० ॥
‘मैं तो समझता हूँ कि मृत्युने रणयज्ञमें आहुति देनेके लिये इन श्रेष्ठ राजाओंका प्रोक्षण कर लिया है। इनके स्वर्गगामी शरीर अभीसे प्रकाशित हो रहे हैं ॥ ६० ॥
स्थाने भारपरिश्रान्ता वसुधेयं दिवं गता ।
एषां नृपतिसिंहानां बलौघैरभिपीडिता ॥ ६१ ॥
‘यह पृथ्वी इन राजसिंहोंके सैन्यसमूहोंसे पीड़ित हो इनके भारसे थककर जो देवलोकमें गयी थी, वह इसका जाना उचित ही था ॥ ६१ ॥
अल्पेन खलु कालेन विविक्तं पृथिवीतलम् ।
भविष्यति नरेन्द्रौघैराकीर्णं च नभस्तलम् ॥ ६२ ॥
‘अब थोड़े ही समयमें यह भूमण्डल इन राजसमूहोंसे खाली हो जायगा और आकाश भर जायगा’ ॥ ६२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि जरासंधाभिगमनं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें जरासंधका अभियानविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥४१॥
[ विष्णुपर्व ] द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ३६९
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
जरासंधकी सेनाका वर्णन, उसका सेनाको पर्वतपर आक्रमण करनेकी आज्ञा देना, शिशुपालकी सम्मतिसे गोमन्तपर्वतमें आग लगाया जाना, पर्वतका जलना तथा बलराम और श्रीकृष्णका पर्वतसे कूदकर राजाओंकी सेनामें आ पहुँचना—
वैशम्पायन उवाच
जरासंधस्ततः प्राप्तो नृपः सर्वमहीक्षिताम् ।
नराधिपैर्बलयुक्तैरनुयातो महाद्युतिः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर समस्त राजाओंका राजा महातेजस्वी जरासंध वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे अपनी-अपनी सेनाओंके साथ दूसरे भी बहुत-से नरेश थे ॥ १ ॥
व्यायतोद्यततुरगैर्धिष्ण्यप्रार्थसमाहितैः ।
रथैः साङ्ग्रामिकैर्युक्तैरसङ्गतगतिभिः क्वचित् ॥ २ ॥
कहीं अस्त्र-शस्त्रके ज्ञाता पुरुषोंद्वारा भलीभाँति सिखाये गये विशाल एवं प्रचण्ड बलशाली अश्वोंसे युक्त रथ युद्धोपयोगी सामग्रियोंसे सम्पन्न होकर आगे बढ़ रहे थे। उन रथोंकी गति कहीं भी अवरुद्ध नहीं होती थी ॥ २ ॥
हेमकक्षैर्महाघण्टैर्वारणैर्वारिदोपमैः ।
महामात्रोत्तमैरारूढैः कल्पितै रणगर्वितैः ॥ ३ ॥
कहीं बहुसंख्यक हाथी चल रहे थे, जिन्हें सोनेकी जंजीरोंसे कसा गया था। उनके दोनों पार्श्वमे बड़े-बड़े घंटे लटक रहे थे। वे सभी हाथी मेघोंकी घटाके समान जान पड़ते थे। उनके ऊपर अच्छे महावत बैठे थे तथा रणगर्वित कुशल योद्धाओं-द्वारा उन्हें सुसज्जित किया गया था ॥ ३ ॥
खारूढैः सादिभिर्युक्तैः प्रेङ्खमाणैः प्रवल्गितैः ।
वाजिभिर्वायुसङ्काशैः प्लवद्भिरिव पत्रिभिः ॥ ४ ॥
कहीं घुड़सवार योद्धा घोड़ोंपर अच्छी तरहसे सवार थे। उनके वे घोड़े वायुके समान वेगशाली थे और उछलते-कूदते हुए आगे बढ़ते समय आकाशमे उड़ते हुए पक्षियोंके समान प्रतीत होते थे ॥ ४ ॥
खड्गचर्मवलोद्नग्नैः पत्तिभिर्बलिनां वरैः ।
सहस्रसंख्यैर्निर्मुक्तैरुत्पतद्भिरिवोरगैः ॥ ५ ॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ पैदल सैनिक भी ढाल और तलवार लिये प्रचण्डरूप धारण करके आगे बढ़ते थे। वे हजार-हजार-की टोलियोंमे एक साथ चलते और केंचुलसे छुटे हुए सर्पोंके समान उछलते थे ॥ ५ ॥
एवं चतुर्विधैः सैन्यैः प्रचलद्भिरिवाम्बुदैः ।
नृपोऽभियातो बलवाञ्जरासंधो धृतव्रतः ॥ ६ ॥
इस प्रकार मँडराते हुए बादलोंके समान चतुरङ्गिणी सेनाएँ साथ लेकर वीर-व्रतको धारण करनेवाला बलवान् राजा जरासंध युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था ॥ ६ ॥
स रथैर्नेमिघोषैश्च गजैश्च मदसंयुतैः ।
हेषद्भिश्चापि तुरगैः क्ष्वेडितोग्रैश्च पत्तिभिः ॥ ७ ॥
संनादयन् दिशः सर्वाः सर्वांश्चापि गुहाशयान् ।
स राजा सागराकारः ससैन्यः प्रत्यदृश्यत ॥ ८ ॥
वह राजा पहियोंके घर्घर घोषसे युक्त रथों, (चिग्घाड़ते हुए) मतवाले हाथियों, हिनहिनाते हुए घोड़ो तथा गर्जते हुए पैदल सैनिकोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओं एवं समस्त पर्वताय कन्दराओंको प्रतिध्वनित करता हुआ, सेनाके साथ समुद्रके समान दिखायी देता था ॥ ७-८ ॥
तद्द्बलं पृथिवीशानां हृष्टयोधजनाकुलम् ।
क्ष्वेडितास्फोटितरवं मेघसैन्यमिवाबभौ ॥ ९ ॥
भूमिपालोंकी वह सेना हृष्टपुष्ट योद्धाओंसे परिपूर्ण थी। गर्जने और ताल ठोंकनेकी गम्भीर ध्वनिसे वह गर्जती हुई मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होती थी ॥ ९ ॥
रथैः पवनसंपातैर्गजैश्च जलदोपमैः ।
तुरगैश्च सिताभ्राभैः पत्तिभिश्चापि दंशितैः ॥ १० ॥
व्यामिश्रं तद्बलं भाति मत्तद्विपसमाकुलम् ।
घर्मान्ते सागरगतं यथाभ्रपटलं तथा ॥ ११ ॥
वायुके समान तीव्र गतिसे चलनेवाले रथों, काले मेघोंके समान प्रतीत होनेवाले हाथियों, श्वेत बादलोंके समान घोड़ों तथा कवच आदिसे सुसज्जित पैदल योद्धाओसे मिश्रित हुई वह सेना सब ओरसे सुशोभित हो रही थी। मतवाले हाथियोंसे व्याप्त हुई वह विशाल वाहिनी वर्षाऋतुमें समुद्रके भीतर लक्षित होनेवाले मेघोंके समूहकी शोभा धारण करती थी ॥ १०-११ ॥
सबलास्ते महीपाला जरासंधपुरोगमाः ।
परिवार्य गिरिं सर्वे निवेशायोपचक्रमुः ॥ १२ ॥
जरासंध आदि समस्त भूपाल अपनी सेनाके साथ उस पर्वतको चारों ओरसे घेरकर छावनी डालनेकी तैयारी करने लगे ॥ १२ ॥
बभौ तस्य निविष्टस्य बलश्रीः शिविरस्य वै ।
शुक्ले पर्वणि पूर्णस्य यथा रूपं महोदधेः ॥ १३ ॥
वहाँ डेरा डाले हुए जरासंधके सैनिकशिविरकी शोभा वैसी ही प्रतीत होती थी, जैसा कि शुक्लपक्षकी पूर्णिमाको
| ३७० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशो |
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अपनी उत्ताल तरंगोंसे परिपूर्ण हुए महासागरका रूप देखनेमें आता है॥ १३॥
वीतरात्रे ततः काले नृपास्ते कृतकौतुकाः।
आरोहणार्थं शैलस्य समेता युद्धलालसाः॥ १४॥
तदनन्तर रात बीतनेपर सब राजा उठे और मंगलाचारमें सम्पन्न हो युद्धकी लालसासे गोमन्तपर्वतपर चढ़नेके लिये एकत्र होने लगे॥ १४॥
समवायीकृताः सर्वे गिरिम्रस्थेषु ते नृपाः।
निविष्टा मन्त्रयामासुर्युद्धकालकुतूहलाः॥ १५॥
पर्वतके शिखरोपर एकत्र हो वे सभी राजा बैठे और युद्धके शुभ अवसरके लिये उत्सुक हो आपसमें मन्त्रणा करने लगे॥ १५॥
एषां तु तुमुलः शब्दः शुश्रुवे पृथिवीक्षिताम्।
युगान्ते भिद्यमानानां सागराणां यथा स्वनः॥ १६॥
सेनासहित इन नरेशोंकी तुमुल ध्वनि प्रलयकालमें मर्यादाको तोड़कर बहनेवाले समुद्रोंकी भयंकर गर्जनाके समान सुनायी देती थी॥ १६॥
तेषां सकञ्चुकोष्णीषाः स्थविरा वेत्रपाणयः।
चेरुर्मा शब्द इत्येवं ब्रुवन्तो राजशासनात्॥ १७॥
'उन राजाओंके छड़ीदार वृद्ध सिपाही चोगा और पगड़ी धारण किये तथा हाथमें बेंत लिये राजाज्ञासे यह कहते हुए विचरने लगे कि सब लोग मौन रहें। कोई एक शब्द भी न बोले॥ १७॥
तस्य रूपं बलस्यासीन्निःशब्दस्तिमितस्य वै।
लीनमीनभुजङ्गस्य निःशब्दस्य पयोदधेः॥ १८॥
उस समय नीरव और निश्चल हुए उस सैन्यसमूहका रूप उस शब्दहीन प्रशान्त महासागरके समान प्रतीत होता था, जिसके मत्स्य और भुजङ्ग जलके भीतर विलीन हो गये हों॥ १८॥
तस्मिन् स्तिमितनिशब्दे योगादिव महार्णवे।
जरासन्धो बृहद्वाक्यं बृहस्पतिरिवाददे॥ १९॥
वह सैन्यसागर मानो योगबलसे जन सहसा नीरव तथा निश्चल हो गया, तब बृहस्पतिके समान नीतिज्ञ जरासंधने यह महत्त्वपूर्ण बात कही—॥ १९॥
शीघ्रं समभिवर्तन्तां बलानीह महीक्षिताम्।
सर्वतः पर्वतश्चायं बलौघैः परिवार्यताम्॥ २०॥
'राजाओंकी सेनाएँ शीघ्र ही आक्रमण करें और सब ओरसे सैनिकसमूह इस पर्वतको घेर लें॥ २०॥
अश्मयन्त्राणि युज्यन्तां क्षेपणीयाश्च मुद्गराः।
ऊर्ध्वं चापिप्रवाद्यान्तां प्रासा वै तोमराणि च॥ २१॥
'पत्थरोंके गोले बरसानेवाले यन्त्र लगा दिये जायें। क्षेपणीय (गोफना या ढेलवाँस) तथा मुद्गर सँभाल लिये जायें। प्रास और तोमर भी ऊपर कर लिये जायें॥ २१॥
ऊर्ध्वं प्रक्षेपणार्याय दृढानि च लघूनि च।
शस्त्रपातविघातानि क्रियन्तामाशु शिल्पिभिः॥ २२॥
'शत्रुओंके शस्त्रप्रहारको नष्ट करनेमें समर्थ सुदृढ़ और हल्के गोलोंको ऊपर फेंकनेके लिये हमारे शिल्पी शीघ्र तैयार करें॥ २२॥
शूराणां युद्ध्यमानानां प्रमत्तानां परस्परम्।
यथा नरपतिः प्राह तथा शीघ्रं विधीयताम्॥ २३॥
'परस्पर प्रमत्त होकर युद्ध करनेवाले शूरवीरोंके लिये जैसा राजा शिशुपाल कहे, शीघ्र वैसा ही प्रबन्ध किया जाय॥
दार्यतामेष टङ्कौघैः खनित्रैश्च नगोत्तमः।
नृपाश्च युद्धमार्गज्ञा विम्यस्यन्तामदूरतः॥ २४॥
'उस उत्तम पर्वतको टंकसमूहों और खनित्रोंसे खोदकर विदीर्ण कर डाला जाय। युद्धकी प्रणालीके जानकार नरेशोंको इसके समीप ही यथास्थान खड़ा किया जाय॥ २४॥
अद्यप्रभृति सैन्यैर्मे गिरिरोधः प्रवर्त्यताम्।
यावदेतौ पातयामो वसुदेवसुतावुभौ॥ २५॥
'आजसे मेरे सैनिक इस पर्वतपर घेरा डाल दें और इसे तबतक चालू रखें, जबतक कि हम इन दोनों वसुदेवपुत्रोंको मार न डालें॥ २५॥
अचलोऽयं शिलायोनिः क्रियतां निश्चलाण्डजः।
आकाशमपि वाणौघैर्निःसम्पातं विधीयताम्॥ २६॥
'शिलाओंसे ही उत्पन्न हुआ (अथवा शिलाओंका उत्पादक) यह पर्वत स्वयं तो अचल है ही, इसपर रहनेवाले पक्षियोंको भी सायकोंद्वारा अचल (हिलने-डुलने या उड़नेमें असमर्थ) कर दिया जाय। आकाशको भी वाणसमूहोंसे इस तरह रूँध दिया जाय कि उसमें पक्षी भी उड़ न सकें॥ २६॥
मयानुशिष्टास्तिष्ठन्तु गिरिभूमिषु भूमिपाः।
तेषु तेष्ववकाशेषु शीघ्रमारुह्यतां गिरिः॥ २७॥
'मेरी आज्ञा मानकर समस्त भूपाल पर्वतीय स्थानोंमें खड़े रहें और जहाँ-जहाँ अवकाश मिल जाय, वहाँ-वहाँसे शीघ्र ही पर्वतपर चढ़ जायें॥ २७॥
मद्रः कलिङ्गाधिपतिश्चेकितानश्च बाह्लिकः।
काश्मीरराजो गोनर्दः करूषाधिपतिस्तथा॥ २८॥
द्रुमः किंपुरुषश्चैव पर्वतीयाश्च मानवाः।
पर्वतस्यापरं पार्श्वं क्षिप्रमारोहयन्त्वमी॥ २९॥
'मद्रराज शल्य, कलिङ्गराज श्रुतायु, चेकितान, बाह्लिक, काश्मीरराज गोनर्द, करूषराज दन्तवक्त्र, किन्नरराज द्रुम तथा
विष्णुपर्व ] द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ३७१
पर्वतीय प्रदेशके योद्धा—ये सब लोग इस पर्वतके पश्चिम भागपर शीघ्र ही चढ़ाई कर दें ॥ २८-२९ ॥
पौरवो वेणुदारिश्च वैदर्भः सोमकतथा ।
रुक्मी च भोजाधिपतिः सूर्याक्षश्चैव मालवः ॥ ३० ॥
पाञ्चालाधिपतिश्चैव द्रुपदश्च नराधिपः ।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ दन्तवक्त्रश्च वीर्यवान् ॥ ३१ ॥
छागलिः पुरुमित्रश्च विराटश्च महीपतिः ।
कौशाम्ब्यो मालवश्चैव शतधन्वा विदूरथः ॥ ३२॥
भूरिश्रवास्त्रिगर्तश्च वाणः पञ्चनदस्तथा ।
उत्तरं पर्वतोद्देशमेते दुर्गसहा नृपाः ।
आरोहन्तु विमर्द्दन्तो वज्रप्रतिमगौरवाः ॥ ३३ ॥
पूरुवंशीय वेणुदारि, विदर्भदेशीय सोमक, भोजोंके अधिपति रुक्मी, मालवाके राजा सूर्याक्ष, पाञ्चालदेशके अधिपति राजा द्रुपद, अवन्तिके दोनों राजकुमार विन्द और अनुविन्द, पराक्रमी दन्तवक्त्र, छागलि, पुरुमित्र, राजा विराट, कौशाम्बीनरेश मालव, शतधन्वा, विदूरथ, भूरिश्रवा, त्रिगर्त, वाण और पञ्चनद-ये दुर्गयुद्धका वेग सह सकनेवाले नरेश शत्रुओंको कुचलते हुए इस पर्वतके उत्तरभागपर चढ़ाई करें, इनका गौरव वज्रके तुल्य है ॥ ३०-३३ ॥
उलूकः कैतवेयश्च वीरश्चांशुमतः सुतः ।
एकलव्यो दृढाश्वश्च क्षत्रधर्मा जयद्रथः ॥ ३४ ॥
उत्तमौजास्तथा शाल्वः कैरलेयश्च कैशिकः ।
वैदिशो वामदेवश्च सुकेतुश्चापि वीर्यवान् ॥ ३५ ॥
पूर्वपर्वतनिव्यूहमतेष्वायतमस्तु नः ।
विदारयन्तो धावन्तो वाता इव बलाहकान् ॥ ३६ ॥
'शकुनिपुत्र उलूक, अंशुमानके पुत्र वीर, एकलव्य, दृढ़ाश्व, क्षत्रधर्मा, जयद्रथ, उत्तमौजा, शाल्व, केरलराज कैशिक, विदिशाके राजा वामदेव और पराक्रमी सुकेतु—इन सबके अधीन इस पर्वतका पूर्वभाग सौंप दिया जाय । ये लोग जैसे वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार शत्रुओंको विदीर्ण करते हुए उनपर धावा बोल दें ॥३४-३६॥
अहं च दरदश्चैव चेदिराजश्च वीर्यवान् ।
दक्षिणं शैलनिचयं दारयिष्याम दंशितः ॥ ३७ ॥
'मैं दरद तथा पराक्रमी चेदिराज शिशुपाल कवच आदि-से सुसज्जित होकर इस पर्वतके दक्षिणभागको विदीर्ण कर डालेंगे ॥ ३७ ॥
एवमेष गिरिः क्षिप्रं समन्ताद् वेष्टितो बलैः ।
वज्रप्रपातप्रतिमं प्राप्नोतु तुमुलं भयम् ॥ ३८ ॥
'इस प्रकार हमारी सेनाओंद्वारा चारों ओरसे घिरा हुआ यह पर्वत शीघ्र ही, मानो इसपर वज्रका आघात हो रहा हो, इस तरह घोर भय प्राप्त करे ॥ ३८ ॥
गदिनो वै गदाभिश्च परिघैः परिघायुधाः ।
अपरे विविधैः शस्त्रैर्दारयन्तु नगोत्तमम् ॥ ३९ ॥
'गदाधारी वीर गदाओंसे, परिघ चलानेवाले परिघोंसे तथा अन्य वीर नाना प्रकारके दूसरे अस्त्र-शस्त्रोंसे इस श्रेष्ठ पर्वतके टुकड़े-टुकड़े कर डालें ॥ ३९ ॥
एष भूमिधरोऽद्यैव विषमोज्चशिलान्वितः ।
कार्यो भूमिसमः सर्वो भवद्भिर्वसुधाधिपैः ॥ ४० ॥
'विषम एवं ऊँची शिलाओंसे युक्त इस भूधरको आप सभी भूपाल मिलकर आज ही भूमिके समान समतल कर डालें' ॥ ४० ॥
जरासंधवचः श्रुत्वा पार्थिवा राजशासनात् ।
गोमन्तं वेष्टयामासुः सागराः पृथिवीमिव ॥ ४१ ॥
जरासंधकी बात सुनकर समस्त राजाओंने मगधराजकी आज्ञासे गोमन्तपर्वतको चारों ओरसे घेर लिया, ठीक उसी तरह जैसे समुद्र पृथ्वीको घेरे हुए है ॥ ४१॥
उवाच राजा चेदीनां देवानां मघवानिव ।
किं ते युद्धेन दुर्गेऽस्मिन् गोमन्ते च नगोत्तमे ॥ ४२ ॥
उस समय देवताओंके राजा इन्द्रके समान चेदिवासियोंके अधिपति राजा दमघोषने जरासंधसे कहा—राजन् ! यह पर्वतोंमें श्रेष्ठ गोमन्त दुर्गम पर्वत है । इसपर युद्ध करनेसे आपको क्या लाभ होगा ॥ ४२ ॥
दुरारोहश्च शिखरे प्रांशुपादपकण्टके ।
काष्ठैस्तृणैश्च बहुभिः परिचार्य समन्ततः ॥ ४३ ॥
अद्यैव दीप्यतां क्षिप्रमलमन्येन कर्मणा ।
'इसके शिखरपर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष और काँटेरे हैं; अतः इसपर चढ़ना बहुत कठिन काम है । मेरी तो राय है, बहुत-से काठ और घासफूस जुटाकर इस पर्वतको चारों ओरसे घेर दिया जाय और अभी इसमें आग लगा दी जाय । इसी कार्यमें शीघ्रता करनी चाहिये । दूसरे किसी प्रयत्नसे कुछ होने-जानेवाला नहीं है ॥ ४३॥
क्षत्रियाः सुकुमारा हि रणे सायकयोधिनः ॥ ४४ ॥
नियुक्ताः पर्वते दुर्गे नियोक्तुं पादयोधिनः ।
ननाम प्रतिबन्धेन न चावस्कन्दकर्मणा ॥ ४५ ॥
शक्य एष गिरिस्तात देवैरप्यवमर्दितुम् ।
'क्योंकि क्षत्रिय लोग सुकुमार होते है। ये रणभूमिमें बाणोंद्वारा ही युद्ध कर सकते हैं । ( पर्वतपर चढ़ना इनके लिये अत्यन्त कठिन है । ) इस समय इन्हें दुर्गम पर्वतपर चढ़कर वहाँके पैदल योद्धाओंके साथ युद्ध करनेके कामपर नियुक्त किया गया है ( जो इनके लिये दुष्कर है ) । तात ! केवल घेरा डालनेसे या ऊपर चढ़ जानेसे देवता भी इस पर्वतका मर्दन नहीं कर सकते ॥ ४४-४५½ ॥
| ३७२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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दुर्गयुद्धे क्रमः श्रेयान् रोधयुद्धेन पार्थिवाः ॥ ४६ ॥
भक्तोदकेन्धनैः क्षीणाः पात्यन्ते गिरिसंश्रिताः ।
वयं बहव इत्येवं नाप्येष निपुणो नयः ॥ ४७ ॥
राजाओ ! दुर्गयुद्धमें रोधयुद्ध (घेरा डालने) के द्वारा जो लड़ाईका क्रम चालू किया जाता है, वह श्रेयस्कर होता है (क्योंकि दुर्गकी खाद्यसामग्री समाप्त होनेपर वहाँके निवासियोंका पतन अवश्यम्भावी है; परंतु यहाँ पर्वतनिवासियोंके लिये खाने-पीनेकी सामग्री सदा सुलभ है) । अन्न, जल और लकड़ीकी कमी हो जाय तभी पर्वतवासी योद्धाओंको धराशायी किया जा सकता है। हमारी संख्या बहुत है और विपक्षियोंकी कम—ऐसा सोचना भी निपुण नीतिका परिचायक नहीं है ॥ ४६-४७ ॥
यादवौ नावमन्तव्यौ द्वावप्येतौ रणे स्थितौ ।
अविज्ञातबलावेतौ श्रूयेते देवसम्मितौ ॥ ४८ ॥
'ये दोनों यदुवंशी भी युद्धके लिये तैयार खड़े हैं; अतः इनकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। इनके पूरे-पूरे बलका ज्ञान किसीको नहीं है। ये दोनों देवताओंके समान तेजस्वी सुने जाते हैं ॥ ४८ ॥
कर्मभिस्त्वमरौ विभो बालावतिबलान्वितौ ।
दुष्कराणीह कर्माणि कृतवन्तौ यदूत्तमौ ॥ ४९ ॥
'अपने कर्मोंसे तो ये अमर जान पड़ते हैं; क्योंकि बाल्यावस्थामें ही ये अत्यन्त बलशाली हैं। यदुकुलके इन श्रेष्ठ पुरुषोंने इस जगत्में बड़े-बड़े दुष्कर कर्म किये हैं ॥ ४९ ॥
शुष्कैःकाष्ठैस्तृणैर्वेष्ट्य सर्वतः पर्वतोत्तमम् ।
अग्निना दीपयिष्यामो दहोतां गतचेतनौ ॥ ५० ॥
'अतः सूखे काठों और तिनकोंसे आवेष्टित करके इस उत्तम पर्वतमें हम सब ओरसे आग लगा देंगे। इससे अचेत होकर वे दोनों भस्म हो जायेंगे ॥ ५० ॥
यदि चेन्निष्क्रमिष्येते दह्यमानावितोऽन्तिके ।
समेत्य पातयिष्यामस्त्यक्ष्यतो जीवितं ततः ॥ ५१ ॥
'यदि आगसे जलते हुए वे दोनों हमारे पाससे निकलेंगे तो हम सब लोग मिलकर उन्हें मार गिरायेंगे। इस तरह उन दोनोंको अपने जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा' ॥ ५१॥
वाक्यमेतत्तु रुरुचे सबलानां महीक्षिताम् ।
यदुक्तं चेदिराजेन नृपाणां हितशंसिना ॥ ५२ ॥
राजाओंके हितकी बात बतानेवाले चेदिराजने जो बात वहाँ कही, वह सेनासहित समस्त राजाओंको अच्छी लगी ॥ ५२ ॥
ततः काष्ठैस्तृणैर्वेष्ट्यैः शुष्कशाखैश्च पादपैः ।
उपादीप्यत शैलेन्द्रः सूर्यपादैरिवाम्बुदः ॥ ५३ ॥
तदनन्तर उन्होंने काठ-कबाड़, घास-फूस और सूखी डालवाले वृक्ष लाकर उनके द्वारा उस गिरिराज गोमन्तमें आग लगा दी। उस समय आगकी ज्वालाओंसे घिरा हुआ वह पर्वत सूर्यकी किरणोंमे आवृत मेघके समान प्रतीत होता था ॥ ५३ ॥
ददुस्ते सर्वतस्तूर्णं पावकं तत्र पार्थिवाः ।
यथोद्देशं यथावातं शैलस्य लघुविक्रमाः ॥ ५४ ॥
इसके बाद शीघ्रतापूर्वक पैर बढ़ाते हुए राजाओंने जहाँ जैसा हवाका रुख था, उसके अनुसार तुरंत ही पर्वतके चारों ओर वह आग फैला दी ॥ ५४ ॥
स वायुदीपतो वह्निरुत्पपात समन्ततः ।
सधूमज्वालमालाभिर्भाभिः खमिव शोभयन् ॥ ५५ ॥
वायुसे प्रज्वलित हुई आग वहाँ सब ओरसे ऊपरको उठने लगी और धूमयुक्त ज्वालामालाओंकी प्रभासे आकाशकी शोभा-सी बढ़ाने लगी ॥ ५५ ॥
सोऽनलः पवनायस्तः काष्ठसंचयमूलवान् ।
ददाह शैलं श्रीमन्तं गोमन्तं कान्तपादपम् ॥ ५६ ॥
सूखे काठोंके ढेर ही जिसकी जड़ थे, वह आग वायुके सहारेसे बढ़कर कमनीय वृक्षोंवाले शोभा-सम्पन्न गोमन्तपर्वतको चारों ओरसे दग्ध करने लगी ॥ ५६ ॥
स दह्यमानः शैलेन्द्रो मुमोच विपुलाः शिलाः ।
शतशः शतधा भूत्वा महोल्काकारदर्शनाः ॥ ५७ ॥
उस आगसे दग्ध होता हुआ गिरिराज गोमन्त बड़ी-बड़ी शिलाएँ छोड़ने लगा (अग्निके तापसे चटककर प्रस्तर-खण्ड टूट-टूटकर गिरने लगे), वे सैकड़ों शिलाएँ सौ-सौ टूक होकर गिरते समय बड़ी-बड़ी उल्काओंके समान दिखायी देती थीं ॥ ५७ ॥
स चित्रभानुः शैलेन्द्रं भाभिर्भानुरिवाम्बुदम् ।
आलिम्पतीव विधिवत् समन्तादर्चिरुद्गतः ॥ ५८ ॥
लपटोंसे ऊपरको उठती हुई वह आग उस पर्वतराजको सब ओरसे प्रभाओंद्वारा विधिपूर्वक लीपती-सी प्रतीत होती थी, ठीक उसी तरह जैसे सूर्यदेव अपनी किरणोंद्वारा मेघोंको अनुलिप्त कर देते हैं ॥ ५८ ॥
धातुभिः पच्यमानैश्च ज्वलद्भिश्चैव पादपैः ।
उद्भ्रान्तश्वापदो रौति तुद्यमान इवाद्रिराट् ॥ ५९ ॥
पकती हुई धातुओं, जलते हुए वृक्षो तथा घबराये हुए हिंसक जन्तुओंसे युक्त वह पर्वतराज ऐसा जान पड़ता था, मानो व्यथासे पीड़ित होकर रो रहा हो ॥ ५९ ॥
प्रतप्तो दह्यमानस्तु स शैलः कृष्णवर्त्मना ।
रीतीर्निर्वर्तयामास काञ्चनाञ्जनराजतीः ॥ ६० ॥
आगसे दग्ध होकर तपा हुआ वह पर्वत सोने, चाँदी
विष्णुपर्व ] द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ३७३
तथा काले रंगकी धातुओंके पिघले हुए रसोंकी धारा बहाने लगा॥ ६० ॥
वह्निना चापि दीप्ताङ्गो गिरिनातिविराजते।
धूमान्धकारोर्ध्वतनुर्मज्जमान इवाम्बुदः॥ ६१॥
यद्यपि अग्निसे उसका सारा अङ्ग उद्भासित हो उठा था, तो भी उसके ऊपरी भागमें धुएँका अन्धकार छा रहा था; इसलिये उस पर्वतकी अधिक शोभा नहीं हो रही थी। वह समुद्रमें डूबते हुए मेघके समान जान पड़ता था॥ ६१॥
विश्लिष्टोपलसंघातः कर्कशाङ्गारवर्षणः।
गिरिर्भात्यनलोद्गारैरूल्कावृष्टिरिवाम्बुदः ॥ ६२॥
उसके प्रस्तरसमूह अलग हो-होकर गिर रहे थे। उससे कड़े अङ्गारोंकी वर्षा हो रही थी। उस समय आग उगलनेके कारण वह पर्वत उल्काओंकी वर्षा करनेवाले मेघके समान प्रतीत होता था॥ ६२॥
प्रपातप्रस्रवेण्विक्षो धूमसंवर्द्धितोदरः।
स गिरिर्भस्मसां यातो युगान्ताग्निरितोपमः॥ ६३॥
उसके झरनोंके स्रोत सूख गये, मध्यभागमें धुआँ फैल गया। उस अवस्थामें वह पर्वत प्रलयाग्निसे दग्ध होकर भस्म हुआ-सा जान पड़ता था॥ ६३॥
विह्वलास्तस्य पार्श्वेभ्यः सर्पा दग्धार्धदेहिनः।
श्वसन्तः पृथुमूर्धानो निश्चेरूरुशिवेक्षणाः॥ ६४॥
उसके पार्श्वभागोंसे, घबराये हुए सर्प निकलने लगे। उनके आधे शरीर जल गये थे। उनकी आँखोंसे क्रूरता टपक रही थी तथा वे अपने फैले हुए मस्तकों (फनो) से फुङ्कार मार रहे थे॥ ६४॥
उत्पत्योत्पत्य गगनात् पुनः पुनरवाङ्मुखाः।
रेसुश्चोद्वेजिताः सिंहाः शार्दूलाश्चानलाखिलाः॥ ६५॥
आगसे झुलसे हुए सिंह और व्याघ्र भयसे उद्विग्न हो बार-बार उछलकर आकाशसे नीचे मुँह किये गिरते और आर्तनाद करते थे॥ ६५॥
मुमुचुः पादपाश्चैव दाहनिर्यासं जलम्॥ ६६॥
वहाँके वृक्ष दग्ध होनेके कारण अपने भीतरके रसको पानीके रूपमे वहाने लगे॥ ६६॥
वहत्यूर्ध्वगतिर्वातो भस्माङ्गारारतिपिङ्गलः।
धूमच्छाया च गगने दर्पिताम्भोददर्शना॥ ६७॥
ऊपरको उठनेवाली वायु भस्म और अङ्गारोंसे अत्यन्त पिंगलवर्णको होकर बहने लगी और आकाशमें धूमकी छाया घुमड़कर घिरी हुई मेघोंकी घटाके समान दिखायी देने लगी
त्यज्यमानो महासानुर्विहगैः श्वापदैरपि।
गिरिर्वैकल्यमायाति प्रागल्भ्यात्कृष्णवर्त्मनः॥ ६८॥
पक्षी और हिंसक जन्तु भी उसे छोड़कर भाग रहे थे। वह महान् शिखरवाला पर्वत अधिक आग बढ़ जानेके कारण व्याकुल-सा हो उठा था॥ ६८॥
स मुमोच शिलाः शैलश्चलोदग्रशिलोच्चयः।
वज्रेण पुरुहूतस्य यथा स्याद् दारितस्तथा॥ ६९॥
बड़ी-बड़ी चञ्चल शिलाओंके ढेरसे युक्त वह पर्वत आगसे तपकर अपनी शिलाओंको इस प्रकार छोड़ रहा था, मानो इन्द्रके वज्रसे विदीर्ण होकर बिखरा जा रहा हो॥ ६९॥
आदीप्य तं तु शैलेन्द्रं क्षत्रिया व्यूहदर्शिताः।
अर्धक्रोशमपक्रान्ताः पावकेनाभितापिताः॥ ७०॥
उस पर्वतराज़में आग लगाकर व्यूहके आकारमें सुसज्जित होकर खड़े हुए क्षत्रिय उस प्रचण्ड पावकसे सन्तप्त हो आधा कोस पीछे हट गये॥ ७०॥
दह्यमाने नगश्रेष्ठे सीदमानैर्महाद्रुमैः।
धूमभारैरनालक्ष्ये मूले शिथिलतां गते॥ ७१॥
सरोषं हि तदा रामो वचनं केनिसूदनम्।
बभाषे पद्मपत्राक्षं स साक्षान्मधुसूदनम्॥ ७२॥
वह पर्वतोंमे श्रेष्ठ गोमन्त नष्ट होते हुए महान् वृक्षोंके साथ जब इस प्रकार दग्ध होने लगा, धूमभारसे उसकी ओर देखना असम्भव हो गया और उसका मूलभाग शिथिल होने लगा, तब वलरामजीने केशी और मधुनामक दैत्योंका संहार करनेवाले साक्षात् विष्णुरूप कमलनयन श्रीकृष्णसे रोषपूर्वक कहा-॥ ७१-७२॥
दह्यतेऽयं गिरिस्तात ससानुशिखरद्रुमः।
आवयोः कृष्ण वैरेण चलिभिर्वसुधाधिपैः॥ ७३॥
'तात! श्रीकृष्ण! हमलोगोंसे वैर हो जानेके कारण इन बलवान् भूपतियोंद्वारा छोटे-बड़े शिखरों और वृक्षोंसहित यह पर्वत जलाया जा रहा है॥ ७३॥
पश्य कृष्णानलौष्णानां सधूमानां समन्ततः।
वनानां विरसन्तीय नगाभ्याशे द्विपोत्तमाः॥ ७४॥
'श्रीकृष्ण! देखो, चारो ओर आगमे तपे और धुएँसे भरे इन जंगलोंके वृक्षोंके निकट ये उत्तम हाथी करुण-क्रन्दन-सा कर रहे हैं॥ ७४॥
अयं यद्यावयोरर्थे गोमन्तस्तात दह्यते।
अयशस्यमिदं लोके कौलीनं च भविष्यति॥ ७५॥
'तात! यदि हम दोनोंके लिये गोमन्त जला दिया जायगा, तो यह संसारमें हमारे लिये महान् अयश और कलङ्ककी बात होगी॥ ७५॥
तदम्यानृण्यहेतोर्हि नगस्य नगसंनिभ।
क्षत्रियाञ्छिनिष्यामो दोर्भ्यामेव युधां वर॥ ७६॥
'अतः योद्धाओंमें श्रेष्ठ तथा युद्धमें पर्वतके समान
३७४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे
अविचल रहनेवाले श्रीकृष्ण ! इस गोमन्त पर्वतसे उन्ऋण होनेके लिये हमलोग अपनी भुजाओंसे ही इन क्षत्रियोंको मार डालेंगे ॥ ७६ ॥
एते ते क्षत्रियाः सर्वे गिरिमादीप्य दंशिताः ।
रथिनस्तात दृश्यन्ते यथादेशं युयुत्सवः ॥ ७७ ॥
'तात ! ये सारे क्षत्रिय इस पर्वतको जलाकर कवच आदिसे सुसज्जित हो रथपर बैठकर यथास्थान युद्ध करनेके लिये उत्सुक दिखायी देते हैं ॥ ७७ ॥
एवमुक्त्वा गिरेः शृङ्गान्ममेरुशृङ्गादिवोडुराट् ।
निपपात बलः श्रीमान् वनमालाधरो युवा ॥ ७८ ॥
ऐसा कहकर मेरु पर्वतके शिखरसे नीचे उतरनेवाले चन्द्रमाके समान कान्तिमान् वनमालाधारी नवयुवक बलराम गोमन्त पर्वतकी चोटीसे कूद पड़े ॥ ७८ ॥
कादम्बरीमदक्षीबो नीलवासाः सिताननः ।
स शारदेन्दुसंकाशो वनमालाञ्चितोदरः ॥ ७९ ॥
उस समय वे कादम्बरी (सुधा या मधु) के मदसे कुछ मत्त-से हो रहे थे । उनके शरीरपर नील वस्त्र शोभा पाता था । उनका मुख गौर वर्णका था । वे शरत्-कालके चन्द्रमाकी भाँति उज्ज्वल प्रभासे उद्भासित हो रहे थे । उनका उदरभाग वन-मालासे अलंकृत था ॥ ७९ ॥
कान्तैककुण्डलधरश्चारुमौलिरवाङ्मुखः ।
निपपात नरेन्द्राणां मध्ये केशवपूर्वजः ॥ ८० ॥
उन्होंने एक कानमें कमनीय कुण्डल धारण कर रखा था तथा उनके मस्तकपर मनोहर मुकुट शोभा दे रहा था । श्रीकृष्णके बड़े भाई बलराम नीचे मुँह किये राजाओंके बीचमें ही कूद पड़े ॥ ८० ॥
अवप्लुते ततो रामे कृष्णः कृष्णाम्बुदोपमः ।
गोमन्तशिखराच्छ्रीमानाप्लुतोऽमितविक्रमः ॥ ८१ ॥
बलरामजीके कूदनेके पश्चात् काले मेघके समान श्याम कान्तिमान् और अमित पराक्रमी श्रीमान् कृष्ण भी गोमन्त-शिखरसे कूद पड़े ॥ ८१ ॥
ततस्तं पीडयामास पद्भ्यां गिरिवरं हरिः ।
स पीडितो गिरिस्तेन निर्ममज्ज समन्ततः ॥ ८२ ॥
जलाकुलोपलस्तत्र प्रस्रुतो द्विरदो यथा ।
स तेन वारिणा वह्निस्तत्क्षणात् प्रशमं ययौ ॥ ८३ ॥
कल्पान्ते वारिधाराभिर्मेघजालैरिवांशुमान् ।
कूदते समय श्रीहरिने उस श्रेष्ठ पर्वतको अपने दोनों पैरोंसे दबाया । उनके द्वारा दबाव पड़नेपर वह पर्वत चारों ओरसे जलमग्न-सा हो गया । उसका एक-एक पत्थर जलसे नहा उठा और मदकी बूँदें टपकानेवाले हाथीके समान जल-का स्रोत बहाने लगा । उस जलसे वहाँकी सारी आग तत्काल बुझ गयी । मानो प्रलयकालमें मेघसमूहोंद्वारा बरसायी हुई वारिधाराओंसे अंशुमाली सूर्य शान्त हो गये हों ॥ ८२-८३ ॥
सिंहारसितनिर्घोषः पीतवासा घनाकृतिः ॥ ८४ ॥
किरीटमूर्द्धा सौम्यास्यः पुण्डरीकनिभेक्षणः ।
श्रीवत्सवक्षाः सुमुखः सहस्राक्षसमद्युतिः ॥ ८५ ॥
रामादनन्तरं कृष्णः प्लुतो वै वीर्यवांस्ततः ।
उस समय पीताम्बरधारी घनश्याम-विग्रह कमलनयन श्रीकृष्ण सिंहके समान दहाड़ रहे थे । उनके मस्तकपर दिव्य किरीट शोभा पा रहा था और मुख बड़ा ही सौम्य दिखायी देता था । उनके वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित था । मुख बहुत ही सुन्दर था और अंगोंकी कान्ति देवराज इन्द्रके समान प्रकाशित हो रही थी । बलरामजीके बाद पराक्रमी श्रीकृष्ण भी वहीं (राजाओंके बीचमें ही) कूद पड़े थे ॥
ताभ्यामेव प्लुताभ्यां च चरणैः पीडितो गिरिः ॥ ८६ ॥
मुमोच सलिलोत्पीडांस्तीव्रपावकशान्तये ।
सलिलोत्पीडनं दृष्ट्वा पार्थिवा भयमाविशन् ॥ ८७ ॥
उन दोनों भाइयोंके कूदनेसे उनके चरणोंका दबाव पाकर वह पर्वत जलके स्रोत बहाने लगा था, जो उस भयानक अग्निको बुझानेमे सहायक हुआ । पर्वतसे जलके स्रोत निकलते देखकर राजाओंके मनमें भय समा गया ॥ ८६-८७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गोमन्तदाहे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें गोमन्त-पर्वतका दाहविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥
त्रयश्चत्वारिंशोऽध्यायः
श्रीकृष्ण और बलरामका जरासंध और उसकी सेनाओंके साथ युद्ध, राजा दरदकी मृत्यु, जरासंधका पराजित होकर पलायन तथा चेदिराज दमघोषके साथ श्रीकृष्ण और बलरामका करवीरपुरमें जाना
वैशम्पायन उवाच
तौ नगादाप्लुतौ दृष्ट्वा वसुदेवसुतावुभौ ।
क्षुब्धं नरवरानीकं सर्वं सम्मूढवाहनम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वसुदेवके
विष्णुपर्व ] त्रयश्चत्वारिंशोऽध्यायः ३७५
उन दोनों पुत्रोंको पर्वतसे कूदकर आया देख उन नरेशोंकी सारी सेनामें हलचल मच गयी। उसके वाहनोंपर मोह छा गया ॥ १ ॥
बाहुप्रहरणौ तौ तु चेरतुस्तत्र यादवौ ।
मकराविव संरुद्धौ समुद्रक्षोभणावुभौ ॥ २ ॥
रोषमें भरे हुए वे दोनों यदुवंशी वीर अपनी भुजाओंसे ही आयुधका काम लेते हुए उस विशाल सेनामें विचरने लगे, जैसे दो महान् मगर समुद्रको विक्षुब्ध करते हुए उसके भीतर घूम रहे हों ॥ २ ॥
ताभ्यां मृधे प्रविष्टाभ्यां यादवाभ्यां मतिस्त्वभूत् ।
आयुधानां पुराणानामादानकृतलक्षणा ॥ ३ ॥
समराङ्गणमें प्रविष्ट होनेपर उन दोनों यादवोंके मनमें अपने पुराने आयुधोंको ग्रहण करनेका विचार हुआ ॥ ३ ॥
ततोऽम्बरतलाद् भूयः पतन्ति स्म महात्मनोः ।
मध्ये राजसहस्रस्य समरं प्रतिकाङ्क्षिणोः ॥ ४ ॥
यानि वै माथुरे युद्धे प्राप्तान्याहवशोभिनोः ।
फिर तो सहस्रो राजाओके बीचमें युद्धकी आकांक्षा रखने तथा समरमें शोभा पानेवाले उन दोनों महात्माओंके हाथमें आकाशसे वे ही अस्त्र-शस्त्र आ गये, जो मथुराके युद्धमें उन दोनोंको प्राप्त हुए थे ॥ ४½ ॥
तान्यम्बरात् पतन्ति स्म दिव्याान्याहवसप्लवे ॥ ५ ॥
लेलिहानानि दीप्तानि दीप्ताग्निसदृशानि वै ।
निक्षिप्य यानि तत्रैव तानि प्राप्तौ स्म यादवौ ॥ ६ ॥
उस युद्धसम्बन्धी विप्लवके समय वे ही प्रज्वलित अग्निके तुल्य तेजस्वी, दीप्तिमान् तथा शत्रुओंको चाट जानेवाले दिव्यास्त्र आकाशसे आ पड़े। जिन्हें वे यादव-वीर मथुरामें ही (आकाशमें) फेंककर चले गये थे, उन यदुवंशी वीरोंको पुनः उन दिव्यास्त्रोंकी प्राप्ति हो गयी ॥ ५-६ ॥
क्रव्यादैरनुयातानि मूर्तिमन्ति बृहन्ति च ।
तृषितान्याहवे भोक्तुं नृपमांसानि सर्वशः ॥ ७ ॥
उन अस्त्रोंके पीछे मांसभक्षी भूत-प्रेत आदि भी आ रहे थे। वे विशाल अस्त्र मूर्तिमान् होकर उस युद्धमे समस्त राजाओंके रक्त-मांसका उपभोग करनेके लिये मानो भूखे-प्यासे थे ॥ ७ ॥
दिव्यस्रग्दामधारीणि त्रासयन्ति च खेचरान् ।
प्रभया भासमानानि दंशितानि दिशो दश ॥ ८ ॥
उन सबने दिव्य पुष्पोंकी मालाएँ धारण की थीं। वे अपनी प्रभासे प्रकाशित होकर दसों दिशाओंको सुशोभित करते थे और आकाशचारी प्राणियोंको भी भयभीत कर देते थे ॥ ८ ॥
हलं सांवर्तकं नाम सौनन्दं मुसलं तथा ।
चक्रं सुदर्शनं नाम गदां कौमोदकीं तथा ॥ ९ ॥
चत्वार्येतानि तेजांसि विष्णुप्रहरणानि वै ।
ताभ्यां समवतीर्णानि यादवाभ्यां महामृधे ॥ १० ॥
सांवर्तक हल, सौनन्द मूसल, सुदर्शन चक्र और कौमोदकी गदा—भगवान् विष्णुके ये चार तेजस्वी अस्त्र-शस्त्र उस महासमरमें उन दोनों यादव-वीरोंके लिये उतरे थे ॥ ९-१० ॥
जग्राह प्रथमं रामो ललामप्रतिमं रणे ।
सर्पन्तमिव सर्पेन्द्रं दिव्यमालाकुलं हलम् ॥ ११ ॥
पहले बलरामजीने रणभूमिमें सुन्दर आकृतिवाले सर्पराजके समान सर्पणशील तथा दिव्यमालाओंसे अलंकृत हलको अपने दायें हाथमे ग्रहण किया ॥ ११ ॥
सव्येन सात्वतां श्रेष्ठो जग्राह मुसलोत्तमम् ।
सौनन्दं नाम बलवान् निरानन्दकरं द्विषाम् ॥ १२ ॥
फिर उन यदुकुलतिलक बलवान् वीरने बायें हाथसे सौनन्द नामक उत्तम मूसलको ग्रहण किया, जो शत्रुओंको आनन्दशून्य कर देनेवाला था ॥ १२ ॥
दर्शनीयं च लोकेषु चक्रमादित्यवर्चसम् ।
नाम्ना सुदर्शनं नाम प्रीतो जग्राह केशवः ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णने सम्पूर्ण लोकोंमे दर्शनीय तथा सूर्यके समान तेजस्वी सुदर्शन नामक चक्रको बड़ी प्रसन्नताके साथ ग्रहण किया ॥ १३ ॥
दर्शनीयं च लोकेषु धनुर्जलदनिःस्वनम् ।
नाम्ना शार्ङ्गमिति ख्यातं प्रीतो जग्राह वीर्यवान् ॥ १४ ॥
फिर समस्त लोकोंमें दर्शनीय तथा मेघोंकी गर्जनाके समान टंकारध्वनि करनेवाले शार्ङ्ग नामसे विख्यात धनुषको भी उन बलवान् श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक अपने हाथमें ले लिया ॥
देवैर्निगदितार्थस्य गदा तस्यापरे करे ।
निपक्ता कुमुदाक्षस्य नाम्ना कौमोदकीति सा ॥ १५ ॥
तदनन्तर देवताओंने जिनसे अपना प्रयोजन निवेदन किया था तथा जिनके नेत्र विकसित कुमुद-कुसुमके समान शोभायमान हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णके दूसरे हाथमें कौमोदकी नामक गदा आ गयी ॥ १५ ॥
तौ सप्रहरणौ वीरौ साक्षाद्विष्णुतनुपमौ ।
समरे रामगोविन्दौ रिपूंस्तान् प्रत्ययुद्ध्यताम् ॥ १६ ॥
साक्षात् विष्णुके-से विग्रहवाले वे दोनों वीर बलराम और श्रीकृष्ण जब अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो गये, तब समरभूमिमें उन शत्रुओंके साथ युद्ध करने लगे ॥ १६ ॥
आयुधप्रग्रहौ वीरौ तावन्योन्यमयावुभौ ।
पूर्वजानुजसंह्रदौ तु रामगोविन्दलक्षणौ ॥ १७ ॥
३७६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
अस्त्र ग्रहण करके समराङ्गणमे खडे हुए वे दोनों अग्रज और अनुज वीर बलराम तथा श्रीकृष्ण अन्योन्यमय (एक-दूसरेपर आश्रित अथवा एक दूसरेके स्वरूप ) थे ॥ १७ ॥
समरेऽप्रतिरूपौ तौ विष्णुरेको द्विधा कृतः।
द्विषत्सु प्रतिकुर्वाणौ पराक्रान्तौ यथेश्वरौ ॥ १८ ॥
रणभूमिमें उनकी तुलना करनेवाला दूसरा कोई नहीं था। वे दोनों एक ही विष्णुके दो स्वरूप थे तथा शत्रुओंका प्रतीकार करते हुए सर्वसमर्थ ईश्वरकी भाँति पराक्रम प्रकट कर रहे थे ॥ १८ ॥
हलमुद्यम्य रामस्तु सर्पेन्द्रमिव कोपनम्।
चचार समरे वीरो द्विषतामन्तकोपमः ॥ १९ ॥
वीर बलराम क्रोधमे भरे हुए सर्पराजके तुल्य सांवर्तक हलको हाथमें उठाकर समरमें शत्रुओंके लिये कालरूप होकर विचरने लगे ॥ १९ ॥
विकर्षन् रथवृन्दानि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।
चकार रोषं सफलं नागेषु च हयेषु च ॥ २० ॥
कुञ्जराँल्लाङ्गलोत्क्षिप्तन् मुसलाक्षेपताडितान् ।
रामोऽभिरामः समरे निर्ममन्थ यथाचलान् ॥ २१ ॥
वे महामनस्वी क्षत्रियोंके रथसमूहोंको पीछे ढकेलते हुए हाथियों और घोड़ोंपर अपना रोष सफल करने लगे। समरमें परम सुन्दर प्रतीत होनेवाले बलराम हलसे हाथियोंको ऊपर उछाल देते और मूसल फेंककर उन्हें मार डालते थे। इस प्रकार उन पर्वतोपम हाथियोंको उन्होंने मार डाला ॥ २०-२१॥
ते वध्यमाना रामेण समरे क्षत्रियर्षभाः ।
जरासंधान्तिकं भीता विरथाः प्रतिजग्मिरे ॥ २२ ॥
समराङ्गणमें बलरामजीके द्वारा मारे जाते हुए वे क्षत्रिय-शिरोमणि योद्धा रथहीन हो भयके मारे जरासंधके पास भाग गये ॥ २२ ॥
तानुवाच जरासंधः क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः ।
धिगेतां क्षत्रवृत्तिं वः समरे कातरात्मनाम् ॥ २३ ॥
तब क्षत्रियधर्ममें स्थित रहनेवाले जरासंधने उनसे कहा- 'समरभूमिमे आकर मनमे कायरता लानेवाले तुमलोगोंकी इस क्षत्रियवृत्तिको धिक्कार है ॥ २३ ॥
पराक्रान्तस्य समरे विरथस्य पलायतः।
भ्रूणहत्यामिवासह्यां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ २४ ॥
'मनीषी पुरुष समरमें पराक्रम प्रकट करके रथहीन होकर भागनेवाले योद्धाकी इस कायरताको भ्रूणहत्याके समान असह्य बताते हैं ॥ २४ ॥
पत्तिनो भुवि चैकस्य गोपस्याल्पबलीयसः ।
भीताः किं विनिवर्तध्वं धिगेतां क्षत्रवृत्तिताम् ॥ २५ ॥
'यह ग्वाला अत्यन्त बलहीन है, पैदल है और पृथ्वीपर अकेला खड़ा है। भला, इससे भयभीत होकर तुमलोग क्यों भाग रहे हो ? तुम्हारी इस क्षत्रियवृत्तिको धिक्कार है ॥२५॥
क्षिप्रं समभिवर्तन्तां मम वाक्येन नोदिताः ।
यावदेतौ रणे गोपौ प्रेषयामि यमक्षयम् ॥ २६ ॥
'मेरी आज्ञासे प्रेरित होकर तुम सब लोग शीघ्र ही शत्रुओंपर आक्रमण करो। तबतक मैं रणभूमिमें इन दोनो ग्वालोंको मारकर यमलोक भेज देता हूँ' ॥ २६ ॥
ततस्ते क्षत्रियाः सर्वे जरासंधेन नोदिताः।
क्षिपन्तः शरजालानि हृष्टा योद्धुमुपस्थिताः ॥ २७ ॥
ते हयैः काञ्चनापीडै रथैश्चेन्दुसमप्रभैः ।
नागैश्चाम्भोदसंकाशैर्महामात्रप्रणोदितैः ॥ २८ ॥
तब जरासंधसे प्रेरित होकर वे समस्त क्षत्रिय वाणसमूहों-की वर्षा करते हुए बड़े हर्षके साथ युद्धके लिये डट गये । वे सोनेके आभूषणोंसे विभूषित अश्वों, चन्द्रमाके समान कान्तिमान् रथों और महावतोंद्वारा हाँके गये एवं मेघोंके समान काले रंगवाले हाथियोंद्वारा रणभूमिमें आगे बढ़ने लगे ॥
सतनुत्राणनिस्त्रिंशाः सायुधाभरणाम्बराः ।
स्वारोपितधनुष्मन्तः सतूणीराः ससायकाः ॥ २९ ॥
उनके शरीरोंमें कवच और हाथोंमें खड्ग थे। वे आयुध, आभूषण तथा वस्त्रोंसे सुसज्जित थे। उन्होंने धनुषोंको भली-भाँति चढ़ा रखा था। वे बाणों और तरकशोंसे सम्पन्न थे॥२९॥
सच्छत्रोत्सेधिनः सर्वे चारुचामरवीजिताः ।
रणावनिगता रेजुः स्यन्दनस्था महीक्षितः ॥ ३० ॥
जो राजा रणभूमिमें रथोंपर बैठे हुए थे, उनके सिरपर ऊँचे छत्र तने थे तथा मनोहर चामरोंद्वारा उनके लिये हवा की जा रही थी। इस तरह वे सभी बड़ी शोभा पाते थे ॥ ३० ॥
तौ युद्धरङ्गापतितौ विधावन्तौ महाभुजौ।
वसुदेवसुतौ वीरौ युयुत्सू प्रत्यदृश्यताम् ॥ ३१ ॥
युद्धकी रंगभूमिमे उतर कर सब ओर धावा करनेवाले वे महाबाहु वीर वसुदेवपुत्र युद्धके लिये उत्सुक दिखायी देते थे ॥ ३१ ॥
तद् युद्धमभवत् तत्र तयोस्तेषां तु संयुगे।
सायकोत्सर्गबहुल गदानिर्घातदारुणम् ॥ ३२ ॥
वहाँ रणभूमिमें उन दोनो भाइयो तथा उन राजाओंमे भारी युद्ध होने लगा। उसमें बहुत-से वाणोंकी वर्षा की जा रही थी। गदाओंके आघातसे उस युद्धकी भयंकरता और बढ़ गयी थी ॥ ३२ ॥
ततः शरसहस्राणि प्रतीच्छन्तौ रणेविणौ।
तस्थतुर्योधमुख्यौ तावभिवृष्टौ यथाचलौ ॥ ३३ ॥
[विष्णुपर्व ] त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ३७७
तदनन्तर सहस्रों बाणोंकी बौछार ग्रहण करते हुए वे दोनों युद्धाभिलाषी महायोद्धा वर्षाका आघात सहन करनेवाले दो पर्वतोंके समान वहाँ अविचलभावसे खड़े रहे ॥ ३३ ॥
गदाभिश्चैव शूर्मीभिः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः ।
अदर्द्यमानौ महेष्वासौ यादवौ न चकम्पतुः ॥ ३४ ॥
शत्रुओंकी भारी गदाओं, गोफनों या ढेलवासों तथा मुद्गरोंकी मारसे पीड़ित होते हुए भी वे दोनों महाधनुर्धर यादव वीर कम्पित नहीं हुए ॥ ३४ ॥
ततः कृष्णोऽम्बुदाकारः शङ्खचक्रगदाधरः ।
व्यवधंत महातेजा वातयुक्त इवानलः ॥ ३५ ॥
तत्पश्चात् शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले घनश्यामविग्रह महातेजस्वी श्रीकृष्ण वायुसे प्रेरित होकर प्रज्वलित हुई अग्निके समान बढ़ने लगे ॥ ३५ ॥
स चक्रेणार्कनृत्येन दीप्यमानेन तेजसा ।
चिच्छेद समरे वीरो नृगजाश्वमहारथान् ॥ ३६ ॥
समराङ्गणमें उन वीर मधुसूदनने तेजसे उद्दीप्त होनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी चक्रके द्वारा मनुष्यों, हाथियों, घोड़ों तथा बड़े-बड़े रथोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ३६ ॥
गदानिपातविहता लाङ्गलेन च कर्षिताः ।
न शेकुस्ते रणे स्थातुं पार्थिवा नष्टचेतसः ॥ ३७ ॥
गदाके आघातसे मारे गये तथा हलसे खींचकर नष्ट किये गये राजा लोग अपनी चेतना खोकर रणभूमिमें खड़े न रह सके ॥ ३७ ॥
चक्रक्षुरनिकृत्तानि विचित्राणि महीक्षिताम् ।
रथयूथानि भग्नानि न शेकुश्चलितुं रणे ॥ ३८ ॥
चक्रके छुरोंसे टुकड़े-टुकड़े किये गये राजाओंके विचित्र रथसमूह भग्न होकर युद्धभूमिमें आगे न बढ़ सके ॥ ३८ ॥
मुसलाक्षेपभग्नाश्च कुञ्जराः षष्टिहायनाः ।
घना इव घनापाये भग्नदन्ता विचुक्रुशुः ॥ ३९ ॥
मूसलोंकी मारसे घायल हुए साठ वर्षोंकी अवस्थावाले हाथी दाँत टूट जानेके कारण शरद्-ऋतुके जलहीन बादलोंके समान असमर्थ हो आर्तभावसे चीत्कार कर रहे थे ॥ ३९ ॥
चक्रानलज्वालहताः सादिनः सपदातयः ।
पेतुः परासवस्तत्र यथा वज्रहतास्तथा ॥ ४० ॥
सुदर्शन चक्रसे प्रकट हुई आगकी ज्वालासे झुलसकर कितने ही घुड़सवार और पैदल योद्धा धरतीपर पड़े थे। उनके प्राण-पखेरू उड़ गये थे तथा वे वज्रके आघातसे मरे हुएके तुल्य प्रतीत होते थे ॥ ४० ॥
चक्रलाङ्गलनिर्दग्धं तत्सैन्यं विदिलीकृतम् ।
युगान्तोपहतप्रख्यं सर्वं पतितमब्भौ ॥ ४१ ॥
चक्र और हलसे दग्ध होकर विदीर्ण की गयी वह सारी सेना इस तरह धरतीपर पड़ी थी मानो प्रलयकालमें सबका एक साथ संहार हो गया हो ॥ ४१ ॥
आक्रीडभूमिं दिव्यानामायुधानां वपुष्मताम् ।
वैष्णवानां नृपास्ते तु द्रष्टुमप्यबलीयसः ॥ ४२ ॥
वहाँ मूर्तिमान् होकर प्रकट हुए उन वैष्णव दिव्यास्त्रोंकी क्रीडा-भूमिरूप युद्धस्थलकी ओर देखनेमें भी वे राजालोग असमर्थ हो गये थे ॥ ४२ ॥
केचिद्रथाः सम्मृदिताः केचिन्निहतपार्थिवाः ।
भग्नैकचक्रास्त्वपरे विकीर्णा धरणीतले ॥ ४३ ॥
कितने ही रथ रौंद डाले गये। कितनोंके राजा मार डाले गये और कितने ही एक-एक पहिया नष्ट हो जानेके कारण भूतलपर बिखरे पड़े थे ॥ ४३ ॥
तस्मिन् विशसने घोरे चक्रलाङ्गलसम्प्लवे ।
दारुणानि प्रवृत्तानि रक्षांस्यौत्पातिकानि च ॥ ४४ ॥
चक्र और हलद्वारा जहाँ विप्लव मच गया था, उस घोर संग्राममें राक्षसोंद्वारा उपस्थित की गयी भयंकर उत्पातसूचक घटनाएँ घटित होने लगीं ॥ ४४ ॥
आर्तानां कूजमानानां पाटितानां च वेणुवत् ।
अन्तो न शक्यतेऽन्वेष्टुं नृनागरथवाजिनाम् ॥ ४५ ॥
जो आर्तभावसे चीख रहे थे तथा जो बाँसकी तरह चीर डाले गये थे, ऐसे मनुष्यों, हाथियों, रथारोहियों और घोड़ोंकी अन्तिम संख्या कितनी है, इसका पता लगाना असम्भव हो गया था ॥ ४५ ॥
सा पतितनरेन्द्राणां रुधिराऽऽर्द्रा रणक्षितिः ।
योषेव चन्दनाद्रार्ङ्गी भैरवा प्रतिभाति वै ॥ ४६ ॥
धरतीपर पड़े हुए राजाओंके रुधिरसे भीगी हुई वह रणभूमि लाल चन्दनसे आर्द्र अङ्गवाली नारीके समान भयंकर प्रतीत होती थी ॥ ४६ ॥
नरकेशास्थिमज्जान्त्रैः शातितानां च दन्तिनाम् ।
रुधिरौघप्लवस्तत्र च्छादयामास मेदिनीम् ॥ ४७ ॥
मनुष्योंके केशों, हड्डियों, मज्जाओं तथा आँतोंसे मिला हुआ कटे हाथियोंके रक्तका प्रवाह वहाँकी भूमिको आच्छादित करता जा रहा था ॥ ४७ ॥
तस्मिन् महाभीषणके नरवाहनसंक्षये ।
शिवानामशिवैः शब्दैर्नादिते घोरदर्शने ॥ ४८ ॥
वह रणभूमि बड़ी भयानक प्रतीत होती थी। वहाँ मनुष्यों और उनके वाहनोंका संहार हो रहा था। गीदड़ियोंके अमङ्गलसूचक शब्द वहाँ सदा गूँजते रहते थे। वह देखनेमें भी बड़ी भयंकर थी ॥ ४८ ॥
| ३७८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
आर्तस्तनितसंनादे रुधिराम्बुह्रदाकुले।
अन्तकाक्रीडसदृशे नागदेहैः समावृते॥ ४९॥
आर्त प्राणियोंकी चीख—पुकारका शब्द सब ओर फैला हुआ था। रक्तके कितने ही कुण्ड बन गये थे। हाथियोंकी लाशोंसे ढकी हुई वह युद्धस्थली कालकी क्रीडाभूमिके समान प्रतीत होती थी॥ ४९॥
अपास्तैर्बाहुभिर्योधैस्तुरगैश्च विदारितैः।
कङ्कैश्च वलगृध्रैश्च नादितैः प्रतिनादिते॥ ५०॥
कहीं योद्धाओंकी बाँहें कटकर गिरी थीं। कहीं बहुत-से योद्धा ही मरे पड़े थे और कहीं विदीर्ण हुए घोड़ोंकी लाशें बिछी हुई थीं। बड़े-बड़े बगुलों, कौओं और गीधोंकी बोलियोंसे वह समराङ्गण गूँज रहा था॥ ५०॥
निपाते पृथिवीशानां मृत्युसाधारणे रणे।
कृष्णः शत्रुवधं कर्तुं चचारान्तकदर्शनः॥ ५१॥
जहाँ बड़े-बड़े भूमिपाल धराशायी हो रहे थे और मृत्यु एक साधारण-सी बात हो गयी थी, उस रणभूमिमें कालके समान दिखायी देनेवाले श्रीकृष्ण शत्रुओंका वध करनेके लिये विचर रहे थे॥ ५१॥
युगान्तार्कप्रभं चक्रं कालीं चैवायसीं गदाम्।
गृह्य सैन्यावनिगतो बभाषे केशवो नृपान्॥ ५२॥
प्रलयकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होनेवाले चक्र और लोहेकी बनी हुई काली गदाको हाथमें लेकर भगवान् श्रीकृष्ण सेनाके मध्यकी भूमिमें खड़े हो राजाओंसे इस प्रकार बोले—॥
किन्न युद्ध्यत वै शूरा हस्त्यश्वरथसंयुताः।
किमिदं गम्यते शूराः कृतास्त्रा दृढनिश्चयाः।
अहं सपूर्वजः संख्ये पदातिः प्रमुखे स्थितः॥ ५३॥
'हाथी, घोड़े और रथोंसे युक्त शूरवीरो! अब युद्ध क्यों नहीं करते हो? अस्त्रोंके विद्वान् तथा युद्धका दृढ़ निश्चय रखनेवाले वीरो! क्यों इस प्रकार पलायन करते हो? मैं तो युद्धमें अपने बड़े भाईके साथ तुम्हारे सामने पैदल ही खड़ा हूँ॥ ५३॥
अदृष्टदोषेण रणे भवन्तो येन पालिताः।
स इदानीं जरासंधः किमर्थं नाभिवर्तते॥ ५४॥
'युद्धमें जिसने दोष नहीं देखा है तथा जिसके द्वारा तुम लोग पालित हुए हो, वह जरासंध अब हमारे सामने क्यों नहीं आ रहा है?'॥ ५४॥
एवमुक्ते तु नृपतिर्दरदो नाम वीर्यवान्।
रामं हलाग्रोग्रभुजं प्रत्ययात् सैन्यमध्यगम्॥ ५५॥
श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पराक्रमी राजा दरद सेनाके मध्यमें खड़े हुए तथा हलके अग्रभागसे उग्र भुजावाले बलरामके सामने आया॥ ५५॥
बभाषे स तु ताम्राक्षमुक्षाणमिव सेचनी।
एहोहि राम युध्यस्व मया सार्द्धमरिंदम॥ ५६॥
जैसे किसान बैलसे बात करता है, उसी प्रकार उसने लाल नेत्रोंवाले बलरामजीसे इस प्रकार कहा—'शत्रुदमन राम! आओ, आओ। मेरे साथ युद्ध करो'॥ ५६॥
तद् युद्धमभवत् ताभ्यां रामस्य दरदस्य च।
मृधे लोकवरिष्ठाभ्यां कुञ्जराभ्यामिवौजसा॥ ५७॥
बलराम और दरद—दोनों जगत्के श्रेष्ठ वीर थे। युद्धस्थलमें उन दोनोंका बलपूर्वक संग्राम होने लगा, मानो दो हाथी आपसमें लड़ रहे हों॥ ५७॥
योजयित्वा ततः स्कन्धे रामो दरदमाहवे।
हलेन बलिनां श्रेष्ठो मुसलेनावपोथयत्॥ ५८॥
तब बलवानोंमें श्रेष्ठ बलरामने युद्धस्थलमें दरदके कंधेसे हल फँसाकर उसे मुसलसे मार डाला॥ ५८॥
स्वकायगतमूर्धा वै मुसलेनावपोथितः।
पपात दरदो भूमौ दारिताद्रि रिवाचलः॥ ५९॥
मुसलसे मारे गये दरदका मस्तक उसके शरीरमें ही घुस गया और वह विदीर्ण हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ५९॥
रामेण निहते तस्मिन् दरदे राजसत्तमे।
जरासंधस्य राज्ञस्तु रामेणासीत् समागमः॥ ६०॥
महेन्द्रस्येव वृत्रेण दारुणो लोमहर्षणः।
राजाओंमें श्रेष्ठ दरदके बलरामद्वारा मारे जानेपर राजा जरासंधका उनके साथ अत्यन्त भयंकर एवं रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा। मानो देवराज इन्द्रका वृत्रासुरके साथ संग्राम हो रहा हो॥ ६०१/२॥
गदे गृहीत्वा विक्रान्तावन्योन्यमभिधावतः॥ ६१॥
कम्पयन्तौ भुवं वीरौ तावुद्यतमहागदौ।
ददृशाते महात्मानौ गिरी सशिखराविव॥ ६२॥
वे दोनों पराक्रमी वीर गदाएं हाथमें लेकर पृथ्वीको कम्पित करते हुए एक दूसरेकी ओर दौड़े। दो विशाल गदाएँ उठाये हुए वे दोनों महामनस्वी योद्धा शिखरोंसे युक्त दो पर्वतोंके समान दिखायी देते थे॥ ६१-६२॥
व्युपरमन्त युद्धानि प्रेक्ष्य तौ पुरुषर्षभौ।
संरम्भाविव धावन्तौ गदायुद्धेषु विश्रुतौ॥ ६३॥
उन दोनों पुरुषप्रवर वीरोंको युद्ध करते देख दूसरोंके युद्ध बंद हो गये। गदायुद्धोंमें विख्यात जरासंध और बलराम रोषावेशमें भरे हुए-से एक दूसरेपर धावा करते थे॥ ६३॥
तावुभौ परमाचार्यौ लोके ख्यातौ महाबलौ।
मत्ताविव महानागावन्योन्यं समधावताम्॥ ६४॥
विष्णुपर्व ] त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ३७९
वे दोनों महाबली वीर संसारमें गदायुद्धके उत्तम आचार्य कहे जाते थे। वे दो मदमत्त विशालकाय हाथियोंके समान परस्पर आक्रमण करते थे ॥ ६४ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । यक्षाश्चाप्सरसश्चैव समाजग्मुः सहस्रशः ॥ ६५ ॥
उस समय देवता, गन्धर्व, सिद्ध, महर्षि, यक्ष तथा सहस्रों अप्सराएँ वह युद्ध देखनेके लिये आ गयीं ॥ ६५ ॥
तद्देवयक्षगन्धर्वमहर्षिभिरलंकृतम् । शुशुभेऽभ्यधिकं राजन् नभो ज्योतिर्गणैरिव ॥ ६६ ॥
राजन् ! देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों और महर्षियोंसे अलंकृत हुआ वहाँका आकाश नक्षत्रोंसे आवृत्त हुआ-सा अधिक शोभा पाने लगा ॥ ६६ ॥
अभिदुद्राव रामं तु जरासंधो नराधिपः । सव्यं मण्डलमाश्रित्य बलदेवस्तु दक्षिणम् ॥ ६७ ॥
राजा जरासंध बायीं ओरसे पैंतरा देकर बलरामजीपर टूट पड़ा और बलदेवजीने दाहिनी ओरसे उसपर धावा किया ॥ ६७ ॥
तावन्योन्यं प्रजह्राते गदायुद्धविशारदौ । दन्ताभ्यामिव मातङ्गौ नादयन्तौ दिशो दश ॥ ६८ ॥
गदायुद्धमें निपुण वे दोनों वीर एक दूसरेपर प्रहार करने लगे। जैसे दो मतवाले हाथी अपने दाँतोंसे परस्पर चोट करते हों, उसी प्रकार गदाओंसे आघात करते हुए वे दसों दिशाओंको निनादित करने लगे ॥ ६८ ॥
गदानिपातो रामस्य शुश्रुवेऽशनिनिःस्वनः । जरासंधस्य च रणे पर्वतस्येव दीर्यतः ॥ ६९ ॥
रणभूमिमें बलरामजीकी गदाके आघातका शब्द वज्रपातके समान सुनायी पड़ता था तथा जरासंधके गदाघातकी ध्वनि फटते हुए पहाड़के समान प्रतीत होती थी ॥ ६९ ॥
न स्म कम्पयते रामं जरासंधकरच्युता । गदा गदाभृतां श्रेष्ठं विन्ध्यं गिरिमिवानिलः ॥ ७० ॥
जरासंधके हाथसे छूटी हुई गदा गदाधारियोंमें श्रेष्ठ बलरामजीको उसी प्रकार कम्पित नहीं कर पाती थी, जैसे वायु विन्ध्यगिरिको नहीं हिला सकती है ॥ ७० ॥
रामस्य तु गदावेगं राजा स मगधेश्वरः । सेहे धैर्येण महता शिक्षया च व्यपोथयत् ॥ ७१ ॥
बलरामजीकी गदाका वेग मगधराज जरासंध बड़े धैर्यसे सहन करता और शिक्षा-कौशलसे उसको विफल भी कर देता था ॥ ७१ ॥
ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् सुखरा लोकसाक्षिणी । "न त्वया राम वध्योऽयमलं खेदेन मानद ॥७२॥ विहितोऽस्य मया मृत्युस्तस्मात् साधु व्युपरम । अचिरेणैव कालेन प्राणांस्त्यक्ष्यति मागधः ॥७३॥"
उस समय आकाशमें सब लोगोंके समक्ष सुस्पष्ट स्वरमें दैवी वाणी सुनायी दी—'दूसरोंको मान देनेवाले बलराम ! जरासंधका वध तुम्हारे हाथोंसे होनेवाला नहीं है, अतः खेद न करो। इसकी मृत्युका विधान मेरे द्वारा बना दिया गया है, अतः तुम इस युद्धसे विरत हो जाओ। थोड़े ही समयमें मगधराजको अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ेगा' ॥७२-७३॥
जरासंधस्तु तच्छ्रुत्वा विमनाः समपद्यत । न प्राहरत् ततस्तस्मै पुनरेव हलायुधः । तौ व्युपरमतां युद्धाद् वृष्णयस्ते च पार्थिवाः ॥ ७४ ॥ दीर्घकालं महाराज निजघ्नुरितरेतरम् । पराजिते त्वपक्रान्ते जरासंधे महीपतौ । विविक्तमभवत् सैन्यं परावृत्तमहारथम् ॥ ७५ ॥
वह आकाशवाणी सुनकर जरासंधका मन उदास हो गया। तदनन्तर बलरामने उसपर पुनः प्रहार नहीं किया। वे दोनों वीर युद्धसे विरत हो गये। महाराज ! इसके पहले ये वृष्णिवंशी योद्धा और वे राजा लोग दीर्घकालतक एक दूसरेपर प्रहार करते रहे। जब राजा जरासंध पराजित होकर पलायन करने लगा, तब उसकी सारी सेना खाली हो गयी। उसके विशाल रथ पीछेकी ओर लौट गये ॥७४-७५॥
ते नृपाश्वोदितैर्नागैः स्यन्दनैस्तुरगैस्तथा । दुद्रुवुर्भीतमनसो व्याघ्राघ्राता मृगा इव ॥ ७६ ॥
वे राजा व्याघ्रके सूंघे हुए मृगोंके समान मन-ही-मन बहुत डरे हुए थे, अतः अपने हाथी, घोड़े और रथोंको हाँकते हुए रणभूमिसे भाग चले ॥ ७६ ॥
तन्नरेन्द्रैः परित्यक्तं भग्नदर्पैर्महारथैः । घोरं क्रव्यादबहुलं रौद्रमायोधनं वभौ ॥ ७७ ॥
जिनका घमंड चूर-चूर हो गया था, उन महारथी नरेशोंद्वारा परित्यक्त हुए उस घोर युद्धस्थलमें अधिकतर मांसभक्षी जीव-जन्तु ही रह गये थे। इससे वह बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ ७७ ॥
द्रवत्सु रथमुख्येषु चेदिराजो महाद्युतिः । स्मृत्वा यादवसम्बन्धं कृष्णमेवान्ववर्तत ॥ ७८ ॥
जब मुख्य-मुख्य रथी भाग चले, तब महातेजस्वी चेदिराज दमघोषने यादवोंके साथ अपने सम्बन्धको स्मरण करके श्रीकृष्णका ही अनुसरण किया ॥ ७८ ॥
वृतः कारूषसैन्येन चेदिसैन्येन चानघ । सम्बन्धकामो गोविन्दमिदमाह स चेदिराट् ॥ ७९ ॥
निष्पाप जनमेजय ! करूष और चेदिदेशकी सेनासे घिरे हुए चेदिराज श्रीकृष्णके साथ सम्बन्ध बढ़ानेकी इच्छासे उनसे इस प्रकार बोले— ॥ ७९ ॥