विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 401, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ३७९
वे दोनों महाबली वीर संसारमें गदायुद्धके उत्तम आचार्य कहे जाते थे। वे दो मदमत्त विशालकाय हाथियोंके समान परस्पर आक्रमण करते थे ॥ ६४ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । यक्षाश्चाप्सरसश्चैव समाजग्मुः सहस्रशः ॥ ६५ ॥
उस समय देवता, गन्धर्व, सिद्ध, महर्षि, यक्ष तथा सहस्रों अप्सराएँ वह युद्ध देखनेके लिये आ गयीं ॥ ६५ ॥
तद्देवयक्षगन्धर्वमहर्षिभिरलंकृतम् । शुशुभेऽभ्यधिकं राजन् नभो ज्योतिर्गणैरिव ॥ ६६ ॥
राजन् ! देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों और महर्षियोंसे अलंकृत हुआ वहाँका आकाश नक्षत्रोंसे आवृत्त हुआ-सा अधिक शोभा पाने लगा ॥ ६६ ॥
अभिदुद्राव रामं तु जरासंधो नराधिपः । सव्यं मण्डलमाश्रित्य बलदेवस्तु दक्षिणम् ॥ ६७ ॥
राजा जरासंध बायीं ओरसे पैंतरा देकर बलरामजीपर टूट पड़ा और बलदेवजीने दाहिनी ओरसे उसपर धावा किया ॥ ६७ ॥
तावन्योन्यं प्रजह्राते गदायुद्धविशारदौ । दन्ताभ्यामिव मातङ्गौ नादयन्तौ दिशो दश ॥ ६८ ॥
गदायुद्धमें निपुण वे दोनों वीर एक दूसरेपर प्रहार करने लगे। जैसे दो मतवाले हाथी अपने दाँतोंसे परस्पर चोट करते हों, उसी प्रकार गदाओंसे आघात करते हुए वे दसों दिशाओंको निनादित करने लगे ॥ ६८ ॥
गदानिपातो रामस्य शुश्रुवेऽशनिनिःस्वनः । जरासंधस्य च रणे पर्वतस्येव दीर्यतः ॥ ६९ ॥
रणभूमिमें बलरामजीकी गदाके आघातका शब्द वज्रपातके समान सुनायी पड़ता था तथा जरासंधके गदाघातकी ध्वनि फटते हुए पहाड़के समान प्रतीत होती थी ॥ ६९ ॥
न स्म कम्पयते रामं जरासंधकरच्युता । गदा गदाभृतां श्रेष्ठं विन्ध्यं गिरिमिवानिलः ॥ ७० ॥
जरासंधके हाथसे छूटी हुई गदा गदाधारियोंमें श्रेष्ठ बलरामजीको उसी प्रकार कम्पित नहीं कर पाती थी, जैसे वायु विन्ध्यगिरिको नहीं हिला सकती है ॥ ७० ॥
रामस्य तु गदावेगं राजा स मगधेश्वरः । सेहे धैर्येण महता शिक्षया च व्यपोथयत् ॥ ७१ ॥
बलरामजीकी गदाका वेग मगधराज जरासंध बड़े धैर्यसे सहन करता और शिक्षा-कौशलसे उसको विफल भी कर देता था ॥ ७१ ॥
ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् सुखरा लोकसाक्षिणी । "न त्वया राम वध्योऽयमलं खेदेन मानद ॥७२॥ विहितोऽस्य मया मृत्युस्तस्मात् साधु व्युपरम । अचिरेणैव कालेन प्राणांस्त्यक्ष्यति मागधः ॥७३॥"
उस समय आकाशमें सब लोगोंके समक्ष सुस्पष्ट स्वरमें दैवी वाणी सुनायी दी—'दूसरोंको मान देनेवाले बलराम ! जरासंधका वध तुम्हारे हाथोंसे होनेवाला नहीं है, अतः खेद न करो। इसकी मृत्युका विधान मेरे द्वारा बना दिया गया है, अतः तुम इस युद्धसे विरत हो जाओ। थोड़े ही समयमें मगधराजको अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ेगा' ॥७२-७३॥
जरासंधस्तु तच्छ्रुत्वा विमनाः समपद्यत । न प्राहरत् ततस्तस्मै पुनरेव हलायुधः । तौ व्युपरमतां युद्धाद् वृष्णयस्ते च पार्थिवाः ॥ ७४ ॥ दीर्घकालं महाराज निजघ्नुरितरेतरम् । पराजिते त्वपक्रान्ते जरासंधे महीपतौ । विविक्तमभवत् सैन्यं परावृत्तमहारथम् ॥ ७५ ॥
वह आकाशवाणी सुनकर जरासंधका मन उदास हो गया। तदनन्तर बलरामने उसपर पुनः प्रहार नहीं किया। वे दोनों वीर युद्धसे विरत हो गये। महाराज ! इसके पहले ये वृष्णिवंशी योद्धा और वे राजा लोग दीर्घकालतक एक दूसरेपर प्रहार करते रहे। जब राजा जरासंध पराजित होकर पलायन करने लगा, तब उसकी सारी सेना खाली हो गयी। उसके विशाल रथ पीछेकी ओर लौट गये ॥७४-७५॥
ते नृपाश्वोदितैर्नागैः स्यन्दनैस्तुरगैस्तथा । दुद्रुवुर्भीतमनसो व्याघ्राघ्राता मृगा इव ॥ ७६ ॥
वे राजा व्याघ्रके सूंघे हुए मृगोंके समान मन-ही-मन बहुत डरे हुए थे, अतः अपने हाथी, घोड़े और रथोंको हाँकते हुए रणभूमिसे भाग चले ॥ ७६ ॥
तन्नरेन्द्रैः परित्यक्तं भग्नदर्पैर्महारथैः । घोरं क्रव्यादबहुलं रौद्रमायोधनं वभौ ॥ ७७ ॥
जिनका घमंड चूर-चूर हो गया था, उन महारथी नरेशोंद्वारा परित्यक्त हुए उस घोर युद्धस्थलमें अधिकतर मांसभक्षी जीव-जन्तु ही रह गये थे। इससे वह बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ ७७ ॥
द्रवत्सु रथमुख्येषु चेदिराजो महाद्युतिः । स्मृत्वा यादवसम्बन्धं कृष्णमेवान्ववर्तत ॥ ७८ ॥
जब मुख्य-मुख्य रथी भाग चले, तब महातेजस्वी चेदिराज दमघोषने यादवोंके साथ अपने सम्बन्धको स्मरण करके श्रीकृष्णका ही अनुसरण किया ॥ ७८ ॥
वृतः कारूषसैन्येन चेदिसैन्येन चानघ । सम्बन्धकामो गोविन्दमिदमाह स चेदिराट् ॥ ७९ ॥
निष्पाप जनमेजय ! करूष और चेदिदेशकी सेनासे घिरे हुए चेदिराज श्रीकृष्णके साथ सम्बन्ध बढ़ानेकी इच्छासे उनसे इस प्रकार बोले— ॥ ७९ ॥