विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 402, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३८० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
अहं पितृष्वसुर्भर्ता तव यादवनन्दन । सबलस्त्वामुपावृत्तस्त्वं हि मे दयितः प्रभो ॥ ८० ॥
‘यादवनन्दन ! मैं तुम्हारी बूआका पति हूँ और सेना-सहित तुम्हारे पास आया हूँ। प्रभो ! तुम मेरे परम प्रिय हो ॥ ८० ॥
उक्तश्चैष मया राजा जरासंधोऽल्पचेतनः । कृष्णाद् विरम दुर्बुद्धे विग्रहाद् रणकर्मणि ॥ ८१ ॥
‘मैंने इस मन्दबुद्धि राजा जरासंधसे कहा था कि अरे दुर्बुद्धे ! तू इस विग्रहमें श्रीकृष्णके साथ युद्ध करनेसे विरत हो जा, किंतु इसने नहीं माना ॥ ८१ ॥
तदेषोऽद्य मया त्यक्तो मम वाक्यस्य दूषकः । भग्नो युद्धे जरासंधस्त्वया द्रवति सानुगः ॥ ८२ ॥
‘इसने मेरे इस कथनकी निन्दा की थी, अतः अब मैंने इसे त्याग दिया है। युद्धमें तुम्हारे द्वारा पराजित होकर यह जरासंध अपने साथियोंसहित भागा जा रहा है ॥ ८२ ॥
निर्वैरो नैष संयाति स्वपुरं पृथिवीपतिः । त्वय्येव भूयोऽप्यपरं दर्शयिष्यति किल्बिषम् ॥ ८३ ॥
‘परंतु यह राजा वैर-भाव छोड़कर अपने नगरको नहीं लौट रहा है; अतः यह फिर तुम्हारे प्रति ही दूसरे पापपूर्ण कृत्यका प्रदर्शन करेगा ॥ ८३ ॥
तदिमां संत्यजाशु त्वं महीं हतनराकुलाम् । क्रव्यादगणसंकीर्णां सेवितव्याममानुषैः ॥ ८४ ॥
‘इसलिए अब तुम शीघ्र ही इस भूमिको त्याग दो। यह मुर्दे मनुष्योंसे भरी हुई है और यहाँ सब ओर हिंसक प्राणी छा गये हैं। अब यह स्थान मानवेतर (राक्षस आदि) प्राणियोंके ही सेवन करने योग्य है ॥ ८४ ॥
करवीरपुरं कृष्ण गच्छामः सबलानुगाः । शृगालं वासुदेवं वै द्रक्ष्यामस्तत्र पार्थिवम् ॥ ८५ ॥
‘श्रीकृष्ण ! अब हमलोग सैनिकों और सेवकोंसहित करवीरपुरमें चलें। वहाँ शृगालनामसे विख्यात राजा वासुदेव रहते हैं। उनसे हम मिलेंगे ॥ ८५ ॥
इमौ रथवरोदग्रौ युवयोः कारितौ मया । योजितौ शीघ्रतुरगैः खङ्गचक्राक्षकूवरौ ॥ ८६ ॥
‘ये दो श्रेष्ठ रथ मैंने तुम दोनों भाइयोंके लिये तैयार कराये हैं। इनमें शीघ्रगामी घोड़े जुते हुए हैं। इनके सभी अङ्ग, पहिये, धुरे और कूबर आदि सुदृढ़ हैं ॥ ८६ ॥
शीघ्रमारुह भद्रं ते बलदेवसहायवान् । त्वरामः करवीरस्थं द्रष्टुं तं वसुधाधिपम् ॥ ८७ ॥
‘तुम्हारा भला हो। तुम बलदेवके साथ शीघ्र रथपर आरूढ़ हो जाओ। हमें करवीरपुरमें निवास करनेवाले राजा शृगालसे मिलनेके लिये जल्दी लगी हुई है' ॥ ८७ ॥
वैशम्पायन उवाच पितृष्वसृपतेर्वाक्यं श्रुत्वा चेदिपतेस्तदा । वाक्यं हृष्टमनाः कृष्णो जगाद जगतो गुरुः ॥ ८८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस समय अपने फूफा चेदिराज दमघोषका यह वचन सुनकर जगद्गुरु श्रीकृष्णके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोले—॥ ८८ ॥
अहो युद्धाभिसंतप्तौ देशकालोचितं त्वया । बान्धवप्रतिरूपेण संसिक्तौ वचनाम्बुना ॥ ८९ ॥
‘अहो ! हमलोग युद्धसे संतप्त हो गये थे। आपने एक आत्मीय बन्धुकी भाँति आकर अपने देशकालोचित वचन-रूपी जलसे हमें नहला दिया है ॥ ८९ ॥
देशकालविशिष्टस्य हितस्य मधुरस्य च । वाक्यस्य दुर्लभा लोके वक्तारश्चेदिसत्तम ॥ ९० ॥
‘चेदिराज ! इस जगत्में देशकालके अनुरूप हितकर और मधुर वचन बोलनेवाले लोग दुर्लभ हैं ॥ ९० ॥
चेदिनाथ सनाथौ स्वः संवृत्तौ तव दर्शनात् । नावयोः किंचिदप्राप्यं ययोस्त्वं बन्धुरीदृशः ॥ ९१ ॥
‘चेदिनाथ ! आपके दर्शनसे हम दोनों सनाथ हो गये। जब हमारे आप-जैसे बन्धु यहाँ मौजूद हैं, तब यहाँ हमारे लिये कुछ भी अप्राप्य नहीं है ॥ ९१ ॥
जरासंधस्य निधनं ये चान्ये तत्समा नृपाः । पर्याप्तौ त्वत्सनाथौ स्वः कर्तुं चेदिकुलोद्वह ॥ ९२ ॥
‘चेदिकुलभूषण ! हम दोनों आपसे सनाथ होकर जरासंध तथा उसके समान जो दूसरे राजा हैं, उन सबको मौतके घाट उतार देनेमें समर्थ हैं ॥ ९२ ॥
यदूनां प्रथमो बन्धुस्त्वं हि सर्वमहीक्षिताम् । अतःप्रभृति संग्रामान् द्रक्ष्यसे चेदिसत्तम ॥ ९३ ॥
‘चेदिप्रवर ! समस्त राजाओंमें आप ही यदुवंशियोंके प्रथम बन्धु हैं। अबसे आपको बहुत-से संग्राम देखनेको मिलेंगे ॥ ९३ ॥
चाक्रं मौसलमित्येवं संग्रामं रणवृत्तयः । कथयिष्यन्ति लोकेऽस्मिन् ये धरिष्यन्ति पार्थिवाः ॥ ९४ ॥
‘युद्धसे जीवन-निर्वाह करनेवाले जो राजा इस लोकमें जीवित रहेंगे, वे आजके इस चाक्र-मौसल युद्धकी सदा चर्चा करेंगे ॥ ९४ ॥
राज्ञां पराजयं युद्धे गोमन्तेऽचलसत्तमे । श्रवणाद् धारणाद्वापि स्वर्गलोकं व्रजन्ति हि ॥ ९५ ॥
‘पर्वतोंमें श्रेष्ठ गोमन्तके समीप युद्धमें हमारे द्वारा जो यह राजाओंकी पराजय हुई है, इसके सुनने अथवा स्मरण करने-से भी मनुष्य स्वर्गलोकमें जायँगे ॥ ९५ ॥
तद्गच्छाम महाराज करवीरं पुरोत्तमम् ।