भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 403

विष्णुपर्व ] चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ३८१


त्वयोद्दिष्टेन मार्गेण चेदिराज शिवाय वै ॥ ९६ ॥

'अतः महाराज चेदिराज ! अब हमलोग आपके बताये हुए मार्गसे अपने कल्याणके लिये उत्तम नगर करवीरपुरको चलें' ॥ ९६ ॥

ते स्यन्दनगताः सर्वे पवनोत्पातिभिर्हयैः ।
भेजिरे दीर्घमध्वानं मूर्तिमन्त इवाग्नयः ॥ ९७ ॥

तदनन्तर वे सब-के-सब तीन मूर्तिमान् अग्नियोंके समान रथपर आरूढ़ हो हवाकी भाँति उड़नेवाले घोड़ोंद्वारा विशाल मार्गपर चल दिये ॥ ९७ ॥

ते त्रिरात्रोषिताः प्राप्ताः करवीरं पुरोत्तमम् ।
शिवाय च शिवे देशे निविष्टास्त्रिदशोपमाः ॥ ९८ ॥

वे देवोपम वीर मार्गमें तीन रात निवास करके उत्तम करवीरपुरमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने अपने भलेके लिये एक सुखद स्थानमें डेरा डाला ॥ ९८ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि करवीरपुराभिगमने त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्ण आदिकी करवीरपुरमें गमनविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥


चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः

श्रीकृष्णद्वारा शृगालका वध तथा उसके पुत्रका करवीरपुरके राज्यपर अभिषेक

वैशम्पायन उवाच

तानागतान् विदित्वाथ शृगालो युद्धदुर्मदः ।
पुरस्य धर्षणं मत्वा निर्जगामेन्द्रविक्रमः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! उन सबके आनेका समाचार पाकर इन्द्रके समान पराक्रमी रणदुर्मद राजा शृगाल अपनी पुरीपर आक्रमण हुआ समझकर नगरसे बाहर निकला ॥ १ ॥

रथेनादित्यवर्णेन भास्वता रणगामिना ।
आयुधप्रतिपूर्णेन नेमिनिर्घोषहासिना ॥ २ ॥
मन्दराचलकल्पेन चित्राभरणभूषिणा ।
अक्षय्यसायकैस्तूणैः पूर्णेनार्णवघोषिणा ॥ ३ ॥
हर्यश्वेनाशुगतिनासक्तेन शिखरेष्वपि ।
हेमकूबरगर्भेण दृढाक्षेणातिशोभिना ॥ ४ ॥
सुवन्धुरेण दीप्तेन पतत्त्रिचरगामिना ।
खगतेनेव शक्रस्य हर्यश्वेन रथाद्रिणा ॥ ५ ॥
सावित्रे नियमे पूर्णे यं ददौ सविता स्वयं ।
आदित्यरश्मिभिरिव रश्मिभिर्यो निगृह्यते ॥ ६ ॥
तेन स्यन्दनमुख्येन द्विषत्स्यन्दनघातिना ।
स शृगालोऽभ्ययात्कृष्णं शलभः पावकं यथा ॥ ७ ॥

वह एक श्रेष्ठ रथपर चढ़कर चला । उसका वह रथ सूर्यके समान तेजःपुञ्जसे प्रकाशित हो रहा था । वह रणभूमिमें (अप्रतिहतगति) से जानेवाला था । उसमें सभी तरहके अस्त्र-शस्त्र भरे हुए थे । उसके पहियोंकी जो घरघराहट होती थी, वही मानो उसका अट्टहास था ( अथवा वह पहियोंकी घर्घर ध्वनिसे मेघकी गम्भीर गर्जनाका उपहास कर रहा था)। उसका आकार मन्दराचलके समान था । उस रथको विचित्र आभरणोंसे विभूषित किया गया था । वह अक्षय सायकोंसे भरे हुए तूणीरोंसे परिपूर्ण था तथा समुद्रकी गम्भीर गर्जनाके समान घरघराहट पैदा करता था । उसमें हरे रङ्गके शीघ्रगामी घोड़े जुते हुए थे । वह पर्वतके शिखरोंपर भी कहीं अटकता नहीं था । उसके कूबरके *भीतरी भागमें सोना जड़ा हुआ था, उसका धुरा भी सुदृढ़ था, उस रथकी बड़ी शोभा हो रही थी । वह सुन्दर रस्सियोंसे भलीभाँति बँधा हुआ था, उसकी दीप्ति सब ओर छिटक रही थी; वह पक्षिराज गरुड़के समान तीव्र गतिसे चलनेवाला था और इन्द्रके हरित अश्वसे जुते हुए आकाशगामी पर्वताकार रथकी समानता करता था । शृगालने नियमपूर्वक गायत्री जप करके सूर्यदेवकी आराधना की थी । उसका वह नियम पूर्ण होनेपर साक्षात् भगवान् सूर्यने उसे वह रथ दिया था, जो सूर्यकी किरणोंके समान सुनहरी बागडोरोंसे उस रथके घोड़ोंको काबूमें लाया जाता था । शत्रुओंके रथोंको नष्ट कर देनेवाले उस श्रेष्ठ रथके द्वारा राजा शृगाल उसी तरह श्रीकृष्णपर चढ़ आया जैसे पतिंगा आगपर टूट पड़ता है॥२-७॥

चापपाणिः सुतीक्ष्णेषुः कवची हेममालिकः ।
सितप्रावरणोष्णीषः पावकाकारलोचनः ॥ ८ ॥

उसके हाथमें धनुष और तीखे बाण शोभा पाते थे । वह कवच धारण करके सोनेकी मालासे विभूषित था । उसकी चादर और पगड़ी श्वेतवर्णकी थी और नेत्र अग्निके समान जलते-से प्रतीत होते थे ॥ ८ ॥

मुहुर्मुहुर्ज्याचपलं विक्षिपन् दुःसहं धनुः ।
निर्वमन् रोषजं वायुं सानलज्वालमण्डलम् ॥ ९ ॥


* कूबर रथका वह भाग है, जिसपर जूआ बाँधा जाता है।