विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 404, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३८२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
वह बारंबार अपने दुःसह धनुषको हिलाता हुआ उसकी प्रत्यञ्चा खींचता था और आगकी ज्वालाओंसे युक्त रोषजनित उच्छ्वास छोड़ रहा था ॥ ९ ॥
भाभिर्भूषणपंक्तीनां दीप्तो मेरुरिवाचलः।
रथस्थ इव शैलेन्द्रः शृगालः प्रत्यदृश्यत ॥ १० ॥
अपने आभूषण-समूहोंकी प्रभाओंसे प्रकाशित होकर वह राजा शृगाल मेरूपर्वतके समान शोभा पाता था और रथपर बैठे हुए गिरिराज-सा दृष्टिगोचर होता था ॥ १० ॥
तस्यारसितशब्देन रथनेमिस्वनेन च।
गुरुत्वेन च नाम्यन्ती चचालोर्वी भयातुरा ॥ ११ ॥
उसके गर्जनेकी ध्वनि, रथके पहियोंकी घर्घराहट और भारीपनसे दबी जाती हुई पृथ्वी भयसे आतुर हो डगमगाने लगी ॥ ११ ॥
तमापतन्तं श्रीमन्तं मूर्तिमन्तमिवाचलम्।
शृगालं लोकपालाभं दृष्ट्वा कृष्णो न विव्यथे ॥ १२ ॥
लोकपालोंके समान तेजस्वी और मूर्तिमान् पर्वतके समान विशालकाय श्रीमान् राजा शृगालको आक्रमण करते देख श्रीकृष्णके मनमें तनिक भी व्यथा नहीं हुई ॥ १२ ॥
शृगालश्चापि संरब्धः स्यन्दनेनाशुगामिना।
समीपे वासुदेवस्य युयुत्सुः प्रत्यदृश्यत ॥ १३ ॥
इधर शृगाल भी रोषमें भरकर उस शीघ्रगामी रथके द्वारा श्रीकृष्णके पास आकर युद्धके लिये उत्सुक दिखायी देने लगा ॥ १३ ॥
वासुदेवं स्थितं दृष्ट्वा शृगालो युद्धलालसः।
अभिदुद्राव वेगेन मेघराशिरिवाचलम् ॥ १४ ॥
श्रीकृष्णको अपने सामने खड़ा देख शृगालकी युद्ध-लालसा जाग उठी और जिस प्रकार मेघोंका समूह वर्षाद्वारा पर्वतपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उसने वेगपूर्वक उन-पर धावा किया ॥ १४ ॥
वासुदेवः स्मितं कृत्वा प्रतियुद्धाय तस्थिवान्।
तद् युद्धमभवत् ताभ्यां समरे घोरदर्शनम्।
उभाभ्यामिव मत्ताभ्यां कुञ्जराभ्यां यथा वने ॥ १५ ॥
तब भगवान् श्रीकृष्ण मुसकराकर उसका सामना करनेके लिये खड़े हो गये; फिर तो समरभूमिमें उन दोनोंका बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा, जैसे वनमें दो मदमत्त हाथी आपसमे लड़ रहे हों ॥ १५ ॥
शृगालस्त्वब्रवीत् कृष्णं समरे समुपस्थितम्।
युद्धरागेण तेजस्वी मोहात्स्खलितगौरवः ॥ १६ ॥
उस समय मोहवश जो अपने गौरवसे गिर गया था, उस तेजस्वी शृगालने समराङ्गणमें उपस्थित हुए श्रीकृष्णसे युद्धविषयक आसक्तिसे प्रेरित होकर कहा ॥ १६ ॥
गोमन्ते युद्धमार्गेण यत् त्वया कृष्ण चेष्टितम्।
अनायकानां मूर्खाणां नृपाणां दुर्बले बले ॥ १७ ॥
स मे सुविदितः कृष्ण क्षत्रियाणां पराजयः।
कृपणानामसत्त्वाना मयुद्धानां रणोत्सवे ॥ १८ ॥
'कृष्ण! तुमने गोमन्तके समीप नायकरहित मूर्ख नरेशों-की दुर्बल सेनाके भीतर युद्धके मार्गसे जो-जो चेष्टाएँ की हैं, उनके विषयमें मुझे सब कुछ भलीभाँति विदित हो गया है। क्षत्रियोंके उस पराजयसे मैं अच्छी तरह परिचित हूँ; परंतु वे क्षत्रिय कायर, धैर्य और शक्तिसे रहित तथा समरोत्सवमें कभी युद्ध न कर सकनेवाले थे ॥ १७-१८ ॥
तिष्ठेदानीं यथाकामं स्थितोऽहं पार्थिवे पदे।
क्व यास्यसि मया रुद्धो रणेष्वापरिनिष्ठितः ॥ १९ ॥
'परंतु इस समय तुम इच्छानुसार युद्ध करनेके लिये खड़े हो जाओ, मैं यहाँ राजाके पदपर प्रतिष्ठित हूँ। यदि मैं तुम्हें सब ओरसे घेरा डालकर रोक लूँ, तो तुम कहाँ जाओगे; क्योंकि तुम तो रणकर्ममें परिनिष्ठित (निपुण) हो नहीं ॥ १९ ॥
न चाहमेकं सबलो युक्तस्त्वां योद्धुमाहवे।
अहमेकस्त्वमप्येको द्वौ युध्यस्व रणे स्थितौ ॥ २० ॥
'तुम अकेले हो और मैं सेनाके साथ हूँ। अतः रणभूमि-में तुम्हारे साथ युद्ध करना मेरे लिये उचित न होगा। इधरसे मैं अकेला रहूँ और उधरसे तुम, फिर हम दोनों समरभूमिमें डटकर युद्ध करें ॥ २० ॥
किं जनेन निरस्तेन त्वं वाहं च रणे स्थितः।
धर्मयुद्धेन निधनं व्रजत्वेकतरो रणे ॥ २१ ॥
'साधारण लोगोंको मारनेसे क्या लाभ? रणभूमिमें खड़े हुए तुम या मैं—दोनोंमेंसे एक योद्धा धर्मयुद्धके द्वारा मृत्युको प्राप्त हो ॥ २१ ॥
लोकेऽस्मिन् वासुदेवोऽहं भविष्यामि हते त्वयि।
हते मयि त्वमप्येको वासुदेवो भविष्यसि ॥ २२ ॥
'तुम्हारे मारे जानेपर इस संसारमें मैं अकेला ही वासुदेव रहूँगा और मेरे मारे जानेपर तुम भी अकेले वासुदेव बने रहोगे' ॥ २२ ॥
शृगालस्य वचः श्रुत्वा वासुदेवः क्षमापरः।
ईर्ष्यान्तं प्रहरस्वेति तमुक्त्वा चक्रमददे ॥ २३ ॥
शृगालकी यह बात सुनकर क्षमाशील भगवान् वासुदेव-ने उस ईर्ष्यालु नरेशसे कहा, 'पहले तुम प्रहार करो' ऐसा कहकर उन्होंने हाथमें चक्र ले लिया ॥ २३ ॥
ततः सायकजालानि शृगालः क्रोधमूर्च्छितः।
चिक्षेप कृष्णे घोराणि युद्धाय लघुविक्रमः ॥ २४ ॥
तब युद्धके लिये शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले