विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 405, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ३८३
शृगालने क्रोधमे उन्मत्त होकर श्रीकृष्णपर घोर वाण-समूहोंकी वर्षा आरंभ कर दी ॥ २४ ॥
शस्त्राणि यानि चान्यानि मुसलाद्यानि संयुगे ।
पातयामास गोविन्दे स शृगालः प्रतापवान् ॥ २५ ॥
प्रतापी शृगालने उस युद्धमें गोविन्दपर मूसल आदि अन्य शस्त्रोंका भी प्रहार किया ॥ २५ ॥
शृगालप्रहितैरस्त्रैः पावकज्वालमालिभिः ।
निर्दयाभिहतः कृष्णः स्थितो गिरिरिवाचलः ॥ २६ ॥
सोऽस्त्रप्रहाराभिहतः किंचिद् रोषसमन्वितः ।
चक्रमुद्यम्य गोविन्दः शृगालस्य परिक्षिपत् ॥ २७ ॥
शृगालके चलाये हुए अस्त्रोंद्वारा, जिनसे आगकी लपटें उठ रही थीं, निर्दयतापूर्वक आहत होनेपर भी श्रीकृष्ण पर्वतके समान अविचल-भावसे खड़े रहे। उसके अस्त्रोंके प्रहारसे घायल होकर किञ्चित् रोषसे युक्त हुए भगवान् गोविन्दने चक्र उठाकर शृगालपर प्रहार किया ॥ २६-२७ ॥
तं रथस्थं प्रमाणस्थं शृगालं युद्धदुर्मदम् ।
जघान समरे चक्रं जातदर्पं महाबलम् ॥ २८ ॥
रणदुर्मद महाबली शृगाल घमण्डमें भरकर रथपर ही बैठा रहा, अपनी जगहसे हटा नहीं। इसी समय (भगवान्के चलाये हुए) चक्रने समरभूमिमें उसपर गहरी चोट की ॥ २८ ॥
ततः सुदर्शनं चक्रं पुनरायाद् गुरोः करे ।
चक्रेणोरसि निर्भिन्नः स गतासुर्गतोत्सवः ।
पपात क्षतजस्रावी शृगालोऽद्रिरिवाहतः ॥ २९ ॥
इसके बाद सुदर्शन चक्र पुनः जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णके हाथमें आ गया। उस चक्रसे आहत होकर शृगालकी छाती फट गयी और वह वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति खूनकी धारा बहाता हुआ प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके जीवनका सारा आनन्दोत्सव समाप्त हो गया ॥ २९ ॥
निशाम्य तं निपतितं वज्रपातादिवाचलम् ।
तस्य सैन्यान्यपययुर्विमनांसि हते नृपे ॥ ३० ॥
वज्रपातसे धराशायी हुए पर्वतकी भाँति राजा शृगालको पृथ्वीपर पड़ा देख, उसके मारे जानेपर उसके सारे सैनिक खिन्नचित्त होकर भाग गये ॥ ३० ॥
केचित् प्रविश्य नगरं कश्मलाभिहता भृशम् ।
रुरुदुर्दुःखसंतप्ता भर्तृशोकाभिपीडिताः ॥ ३१ ॥
कुछ सैनिक नगरमे प्रवेश करके अत्यन्त मोहग्रस्त, दुःखसे सन्तप्त तथा स्वामीके शोकसे पीड़ित हो फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ३१ ॥
केचित् तत्रैव शोचन्तः स्मरन्तः सुकृतानि च ।
पतितं भूपतिं भूमौ न त्यजन्ति स्म दुःखिताः ॥ ३२ ॥
कुछ सैनिक वहीं शोक करने लगे। वे स्वामीके उपकारोंका स्मरण करके दुखी हो भूमिपर पड़े हुए भूपालको छोड़ नहीं रहे थे ॥ ३२ ॥
ततो मेघनिनादेन स्वरेणारिविमर्दनः ।
कृष्णः कमलपत्राक्षो जनानामभयं ददौ ॥ ३३ ॥
तदनन्तर शत्रुमर्दन कमलनयन श्रीकृष्णने मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर स्वरसे उन सब लोगोंको अभयदान दिया ॥ ३३ ॥
चक्रोचितेन हस्तेन राजताङ्गुलिपर्वणा ।
न भेतव्यं न भेतव्यमिति तानभ्यभाषत ॥ ३४ ॥
नास्य पापस्य दोषेण निराबाधकरं जनम् ।
घातयिष्यामि समरे नेदं शूरव्रतं मतम् ॥ ३५ ॥
उन्होंने अङ्गुलिपर्वसे सुशोभित तथा चक्र धारण करनेके योग्य उठे हुए दाहिने हाथके द्वारा संकेत करके उन सब-से कहा, 'सैनिको ! तुम डरो मत ! डरो मत !! इस पापीके अपराधसे मैं समरभूमिमें निरपराध मनुष्योंका वध नहीं करूँगा; क्योंकि—यह वीरोंका व्रत नहीं है' ॥ ३४-३५ ॥
अश्रुपूर्णमुखा दीनाः क्रन्दमाना भृशं तदा ।
ते स्म पश्यन्ति पतितं धरण्यां धरणीपतिम् ॥ ३६ ॥
चक्रनिर्दारितोरस्कं भिन्नशृङ्गमिवाचलम् ॥ ३७ ॥
वे सैनिक अत्यन्त दीनभावसे क्रन्दन करते हुए उस समय पृथ्वीपर पड़े हुए पृथ्वीपति शृगालकी ओर देख रहे थे। उनका सारा मुखमण्डल आँसुओंसे भींगा हुआ था। राजाका वक्षःस्थल चक्रसे विदीर्ण हो गया था। वह टूटे हुए शिखरवाले पर्वतके समान भूमिपर पड़ा था ॥ ३६-३७ ॥
विलपन्ति स्म ते सर्वे सचिवाः सप्रजा भृशम् ।
साश्रुपातेक्षणा दीनाः शोकस्य वशमागताः ॥ ३८ ॥
वे समस्त सचिव तथा प्रजावर्गके लोग शोकके वशीभूत हो नेत्रोंसे अश्रुपात करते हुए अत्यन्त दीनभावसे विलाप करते थे ॥ ३८ ॥
तेषां रुदितशब्देन पौराणां विस्वरैः स्वरैः ।
महिष्यस्तस्य निष्पेतुः सपुत्रा रुदिताननाः ॥ ३९ ॥
उन पुरवासियोंके रोनेके शब्द तथा फटे हुए स्वरोंसे अनिष्टकी आशङ्का करके राजा शृगालकी रानियाँ भी पुत्रोंको साथ लिये रोती हुई वहाँ निकल आयीं ॥ ३९ ॥
तास्तं निपतितं दृष्ट्वा श्लाघ्यं भूमिपतिं पतिम् ।
स्तनानाुरुज्य करजैर्भृशार्ताः पर्यदेवयन् ॥ ४० ॥
अपने स्पृहणीय पति भूमिपाल शृगालको वहाँ धरतीपर पड़ा देख वे रानियाँ अत्यन्त आर्त हो अपनी अङ्गुलियोंसे स्तनोंको नोचती हुई करुण विलाप करने लगीं ॥ ४० ॥