विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 406, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३८४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
उरांस्युरसिजांश्चैव शिरोजान्याकुलान्यपि ।
निर्दयं ताडयन्त्यस्ता विस्वरं रुरुदुः स्त्रियः ॥ ४१ ॥
वे स्त्रियाँ अपनी छाती, स्तन और वहाँ फैले हुए सिरके बालोंको भी निर्दयतापूर्वक पीटती हुई फुक्का फाड़-फाड़कर रोने लगीं ॥ ४१ ॥
तस्योरसि सुदुःखार्ता मृदिताः क्लिन्नलोचनाः ।
पेतुरूध्वंभुजाः सर्वाश्छिन्नमूला लता इव ॥ ४२ ॥
वे सब रानियाँ अत्यन्त दुःखसे आतुर और मर्दित हो नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई दोनों बाँहें ऊपर उठाकर जड़से कटी हुई लताओंकी भाँति राजाकी छातीपर गिर पड़ीं ॥ ४२ ॥
तासां बाष्पाम्बुपूर्णानि नेत्राणि नृपयोषिताम् ।
वारिविप्रहतानीव पङ्कजानि चकाशिरे ॥ ४३ ॥
उन राजरानियोंके आँसूभरे नेत्र जल (या ओले) से आहत हुए कमलोंके समान प्रकाशित होते थे ॥ ४३ ॥
ताः पतिं पतितं भूमौ रुदन्त्यो हृदि ताडिताः ।
लालप्यमानाः करुणं योषितः पर्यदेवयन् ॥ ४४ ॥
धरतीपर पड़े हुए पतिकी ओर देखकर रोती और छाती पीटती हुई ये राजपत्नियां करुण विलाप करती हुई शोकोद्गार प्रकट करने लगीं ॥ ४४ ॥
पुत्रं चास्य पुरस्कृत्य बालं प्रस्रुतलोचनम् ।
शक्रदेवं पितुः पार्श्वे द्विगुणं रुरुदुः स्त्रियः ॥ ४५ ॥
उस राजाके बालक पुत्र शक्रदेवको अपने आगे पिताके पास खड़ा करके वे रानियाँ और दूने वेगसे रोने तथा विलाप करने लगीं । उस बालकके नेत्रोंसे भी आँसू बह रहा था ॥
अयं ते वीर विक्रान्तो बालः पुत्रो न पण्डितः ।
त्वद्विहीनः कथमयं पदे स्थास्यत पैतृके ॥ ४६ ॥
वे बोलीं—'वीर महाराज ! यह आपका पराक्रमी पुत्र अभी बालक है, विद्वान् नहीं हो सका है । अब आपके बिना यह अपने पैतृक राज्यपर कैसे प्रतिष्ठित हो सकेगा ? ॥ ४६ ॥
कथमेकपदे त्यक्त्वा गतोऽस्यन्तःपुरं परम् ।
अतृप्तास्तव सौख्यानां किं कुर्मो विधवा वयम् ॥ ४७ ॥
'(प्राणनाथ !) आप अपने अन्तःपुरकी रानियोंको सहसा त्यागकर क्यों परलोकको चले गये ? हम आपके दिये हुए सुखोंसे अभी तृप्त नहीं हुई थीं । हाय ! हम विधवा हो गयीं, अब क्या करें ?' ॥ ४७ ॥
तस्य पद्मावती नाम महिषी प्रमदोत्तमा ।
रुदती पुत्रमादाय वासुदेवमुपस्थिता ॥ ४८ ॥
राजा शृगालकी पटरानीका नाम पद्मावती था । वह स्त्रियोंमें श्रेष्ठ थी । पद्मावती रोती हुई अपने पुत्रको साथ ले भगवान् वासुदेवके पास गयी ॥ ४८ ॥
यस्त्वया पातितो वीर रणप्रोक्तेन कर्मणा ।
तस्य प्रेतगतस्यायं पुत्रस्त्वां शरणं गतः ॥ ४९ ॥
और बोली—'वीर ! आपने युद्ध-कर्मके द्वारा जिन्हें मार गिराया है, उन्हीं परलोकवासी नरेशका यह पुत्र आपकी शरणमें आया है ॥ ४९ ॥
यदि त्वां प्रणमेतासौ कुर्याद् वा शासनं तव ।
नायमेकप्रहारेण जनस्तप्येत दारुणम् ॥ ५० ॥
'यदि ये महाराज आपको प्रणाम करते—आपके सम्मुख विनीत भावका परिचय देते अथवा आपकी आज्ञाका पालन करते तो आपके एक ही प्रहारसे इन्हें संतापका भागी नहीं होना पड़ता ॥ ५० ॥
यदि कुर्यादयं मूढस्त्वयि बान्धवकं विधिम् ।
नैवं परीतः कृपणः सेवेत धरणीतलम् ॥ ५१ ॥
'यदि ये मूढ (विवेकशून्य) नरेश आपके प्रति बन्धु-जनोचित बर्ताव करते तो इन्हें मांसभक्षी जन्तुओंसे घिरकर पृथ्वीका सेवन नहीं करना पड़ता ॥ ५१ ॥
अयमस्य विपन्नस्य बान्धवस्य तवानघ ।
सन्तती रक्ष्यतां वीर पुत्रः पुत्र इवात्मजः ॥ ५२ ॥
'अनघ ! वीर ! यह आपके इस मरे हुए बान्धवकी ही सन्तति है; आप अपने पुत्रकी ही भाँति इसकी रक्षा करें' ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा महिष्या यदुनन्दनः ।
मृदुपूर्वमिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ॥ ५३ ॥
रानीका यह वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ यदुनन्दन श्रीकृष्णने मधुर वाणीमें कहा--॥ ५३ ॥
राजपत्नि गतो रोषः सहानेन दुरात्मना ।
प्रकृतिस्था वयं जाता देवि सैषोऽस्मि बान्धवः ॥ ५४ ॥
'राजरानी ! मेरा रोष तो इस दुरात्माके मारे जानेके साथ ही दूर हो गया । देखें ! अब हम स्वाभाविक स्थितिमें हैं । मैं आपका वही भाई-बन्धु हूँ ॥ ५४ ॥
रोषो मे विगतः साध्वि तव वाक्यैरकल्मषैः ।
योऽयं पुत्रः शृगालस्य ममाप्येष न संशयः ॥ ५५ ॥
'साध्वी रानी ! तुम्हारे इन निर्दोष वचनोंसे मेरा सारा क्रोध दूर हो गया । राजा शृगालका जो यह पुत्र है, यह मेरे लिये भी पुत्रके ही समान है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५५ ॥
अभयं चाभिषेकं च ददाम्यस्मै सुखाय वै ।
आहूयन्तां प्रकृतयः पुरोधा मन्त्रिणस्तथा ॥ ५६ ॥
पितृपैतामहे राज्ये तत्र पुत्रोऽभिषिच्यताम् ।
'मैं इसके सुखके लिये इसे अभय देनेके साथ ही इसका राज्याभिषेक भी कर दूँगा । आप समस्त प्रकृतियों तथा मन्त्री और पुरोहितोंको भी बुलवाइये, जिससे आपके इस पुत्र-