भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 407

विष्णुपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः [ ३८५


को, इसके बाप-दादोंके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया जाय' ॥
ततः प्रकृतयः सर्वाः पुरोधा मन्त्रिणस्तथा ॥ ५७ ॥
अभिषेकार्थमाजग्मुर्यतो वै रामकेशवौ ।
तदनन्तर, सारी प्रकृतियाँ (प्रजा आदि), पुरोहित और मन्त्री भी राजकुमारका अभिषेक करनेके लिये उस स्थानपर आये, जहाँ श्रीबलराम और श्रीकृष्ण विराजमान थे ॥ ५७ ॥
ततः सिंहासनस्थं तु राजपुत्रं जनार्दनः ॥ ५८ ॥
अभिषेकेन दिव्येन योजयामास वीर्यवान् ।
इसके बाद पराक्रमी भगवान् जनार्दनने राजकुमारको राज्य सिंहासनपर बिठाकर दिव्य अभिषेककी विधिसे उसका राज्याभिषेक कर्म सम्पन्न किया ॥ ५८ ॥
अभिषिच्य शृगालस्य करवीरपुरे सुतम् ।
कृष्णस्तदहरेवाशु प्रस्थानमभ्यरोचयत् ॥ ५९ ॥
शृगालके पुत्रको करवीरपुरके राज्यपर अभिषिक्त करके श्रीकृष्णने उसी दिन वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कर देना उचित समझा ॥ ५९ ॥
रथेन हरियुक्तेन तेन युद्धार्जितेन वै ।
केशवः प्रस्थितोऽध्वानं वृत्रहा त्रिदिवं यथा ॥ ६० ॥
जैसे इन्द्र स्वर्गलोकको जाते हैं, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण भी युद्धमें प्राप्त हुए उस अश्वयुक्त रथके द्वारा मथुराके पथपर चल दिये ॥ ६० ॥
शक्रदेवोऽपि धर्मात्मा सह मात्रा परंतपः ।
सबालवृद्धयुवतीमुख्याः प्रकृतयस्तथा ॥ ६१ ॥
शिविकायामथारोप्य शृगालं युद्धदुर्मदम् ।
संहता दूरमार्गेण पश्चिमाभिमुखा ययुः ॥ ६२ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाला धर्मात्मा राजा शक्रदेव भी माताके साथ बालक, वृद्ध और युवती आदि सारी प्रकृतियोंको साथ ले रणदुर्मद शृगालके शवको पालकीमें सुलाकर सब लोग संगठित हो नगरसे दूरके रास्तेपर पश्चिमाभिमुखी ओर चले ॥ ६१-६२ ॥
नैधनस्य विधानेन चक्रुस्ते तस्य सत्क्रियाम् ।
सत्कारं कारयामासुः पितॄणां पारलौकिकम् ॥ ६३ ॥
श्मशान-भूमिमें ले जाकर अन्त्येष्टिकी विधिसे उन सबने शक्रदेवद्वारा राजाका दाह-संस्कार करवाया और पितरोंके लिये पारलौकिक कृत्यका सम्पादन कराया ॥ ६३ ॥
उद्दिश्योद्दिश्य राजानं श्राद्धं कृत्वा सहस्रशः ।
ततस्ते सलिलं दत्त्वा नामगोत्रादि कीर्तनैः ॥ ६४ ॥
पितुर्युपरते घोरे शोकसंविनमानसाः ।
कृत्वोदकं तदा राजा प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥ ६५ ॥
राजाके उद्देश्यसे सहस्रों प्रकारकी वस्तुएँ श्राद्धमें देकर उन सबने शृगालके लिये नाम-गोत्र आदिके उच्चारणपूर्वक जलदान किया। इस प्रकार पिताकी घोर मृत्यु हो जानेपर शोकसे व्याकुलचित्त हुए राजा शक्रदेवने उन्हे जलाञ्जलि देकर अपने उत्तम नगरमें प्रवेश किया ॥ ६४-६५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शृगालवधो नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शृगालका वधनामक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥


पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

बलराम और श्रीकृष्णका मथुरामें प्रत्यागमन और स्वागत

वैशम्पायन उवाच
तौ तु स्वल्पेन कालेन दमघोषेण संगतो ।
अथाध्वविधिना तौ तु पञ्चरात्रोषितौ पथि ॥ १ ॥
दमघोषेण संगम्य एकरात्रोषिताविव ।
जग्मतुः सहितौ वीरौ मुदा परमया युतौ ।
नगरीं मथुरां प्राप्तौ वसुदेवसुतावुभौ ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर, वे दोनों भाई चेदिराज दमघोषके साथ मिलकर यात्रा करने लगे। मार्गके नियमानुसार चलते हुए उन्होंने बीच-बीचमें पाँच रात निवास किया; किंतु दमघोषके साथ रहनेसे उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि हम एक ही रात मार्गमें रहे हैं। इस प्रकार परमानन्दसे सम्पन्न हो वे दोनों वीर वसुदेवकुमार साथ-साथ थोड़े ही समयमें मथुरा नगरीमें जा पहुँचे ॥ १-२ ॥

ततः प्रत्युद्गताः सर्वे यादवा यदुनन्दनौ ।
सबला हृष्टमनस उग्रसेनपुरोगमाः ॥ ३ ॥
उस समय उग्रसेन आदि सभी यादवोंने सेनासहित आगे आकर प्रसन्नचित्तसे उन दोनों यदुनन्दन वीरोंका स्वागत किया ॥ ३ ॥

श्रेण्यः प्रकृतयश्चैव मन्त्रिणश्च यथोचिताः ।
सबालवृद्धा सा चैव पुरी समभिवर्तत ॥ ४ ॥
अनेक प्रकारके शिल्पियोंद्वारा जीवन-निर्वाह करनेवाले नाना जातिके शिल्पी, प्रजावर्ग, मन्त्री तथा बालकों और