विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३८६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
वृद्धोंसहित सारी मथुरापुरी यथोचित रीतिसे उनके स्वागतमें जुटी थी॥ ४॥
नन्दितूर्याण्यवाद्यन्त स्तूयेतां पुरुषर्षभौ।
रथ्याः पताकामालिन्यो भासन्ति स्म समन्ततः॥ ५॥
आनन्दवर्धक मङ्गल-वाद्य बजने लगे। उन दोनों पुरुष-प्रवर वीरोंकी स्तुति होने लगी। सब ओरकी गलियाँ और सड़कें पताकाओंसे अलङ्कृत हो उत्तम शोभा पाने लगीं॥
हृष्टा प्रमुदिता सर्वा पुरी परमशोभिता।
आश्रोस्तयोरागमने यथैवेन्द्रमहे तथा॥ ६॥
उन दोनों भाइयोंके आनेसे इन्द्रोत्सवके समान सारी पुरी परम शोभासे सम्पन्न हो हर्षसे खिल उठी। सर्वत्र आनन्द छा गया॥ ६॥
मुदितास्तत्र गायन्ति राजमार्गेषु गायकाः।
स्तवाशीर्बहुला गाथा यादवानां प्रियंकराः॥ ७॥
सड़कोंपर आनन्दमग्न हुए गायक यादवोंको प्रिय लगने-वाली आशीर्वादयुक्त गाथाएँ गा रहे थे॥ ७॥
गोविन्दरामौ सम्प्राप्तौ भ्रातरौ लोकविश्रुतौ।
स्वे पुरे निर्भयाः सर्वे क्रीडध्वं यादवाः सुखम्॥ ८॥
और सर्वत्र यह घोषणा करते थे कि 'यादवो! विश्वविख्यात वीर दोनों भाई श्रीकृष्ण और बलराम अब अपने नगरमें आ गये हैं, अतः सबलोग निर्भय होकर सुखपूर्वक क्रीड़ा करो'॥ ८॥
न तत्र कश्चिद् दीनो वा मलिनो वा विचेतनः।
मथुरायामभूत् कश्चिद् रामकृष्णसमागमे॥ ९॥
बलराम और श्रीकृष्णके आ जानेपर उस मथुरापुरीमें कोई भी दीन, मलिन अथवा उदासचित्त नहीं दिखायी देता था॥ ९॥
वयांसि साधुवाक्यानि प्रहृष्टा गोहयद्विपाः।
नरनारीगणाश्चैव भेजिरे मानसं सुखम्॥ १०॥
पक्षी सुमधुर बोली बोलते थे; गौ, घोड़े और हाथी भी बहुत प्रसन्न थे तथा स्त्रियों और पुरुषोंके मनको भी बड़ा ही सुख मिला॥ १०॥
शिवाश्च प्रववुर्वाता विरजस्का दिशो दश।
दैवतान्यपि सर्वाणि हृष्यन्त्यायतनेष्वथ॥ ११॥
शीतल एवं सुखदायिनी हवाएँ चलने लगीं, दसों दिशाओंकी धूल उड़ गयी और मन्दिरोंमें स्थित सम्पूर्ण देवता भी बड़े प्रसन्न हुए॥ ११॥
यानि लिङ्गानि लोकस्य वृत्तानीह कृते युगे।
तानि सर्वाण्यदृश्यन्त तयोरागमने तदा॥ १२॥
सत्ययुग आनेपर इस जगत्में जो-जो लक्षण एवं वृत्तान्त घटित होते हैं, वे सब-के-सब श्रीकृष्ण एवं बलरामके आगमन-पर प्रत्यक्ष दिखायी देने लगे॥ १२॥
ततः काले शिवे पुण्ये स्यन्दनेनारिमर्दनौ।
हरियुक्तेन तौ वीरौ प्रविष्टौ मथुरां पुरीम्॥ १३॥
तदनन्तर, मङ्गलमय पुण्यमुहूर्तमें वे दोनों शत्रुमर्दन वीर उस अश्वयुक्त रथके द्वारा मथुरापुरीमें प्रविष्ट हुए॥ १३॥
प्रविशन्तं पुरीं रम्यां गोविन्दं राममेव च।
अनुजग्मुर्यदुगणाः शक्रं देवगणा इव॥ १४॥
उस रमणीय पुरीमें प्रवेश करते समय श्रीकृष्ण और बलरामके पीछे समस्त यादव उसी प्रकार चले, जैसे देवता इन्द्रके पीछे चलते हैं॥ १४॥
वसुदेवस्य भवनं पितुस्तौ यदुनन्दनौ।
प्रविष्टौ दृष्टवदनौ चन्द्रादित्याविवाचलम्॥ १५॥
जैसे चन्द्रमा और सूर्य सुमेरुपर्वतकी गुफामें प्रवेश करते हों, उसी प्रकार वे दोनों यदुनन्दन वीर पिता वसुदेवके घरमें प्रविष्ट हुए। उस समय उन दोनोंके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी॥ १५॥
तत्रायुधानि संन्यस्य गृहे स्वे स्वैरचारिणौ।
समुदाते यदुवरौ वसुदेवसुतावुभौ॥ १६॥
वहाँ अपने घरमें आयुधोंको रखकर वे दोनों यदुकुल-तिलक वसुदेवपुत्र स्वेच्छानुसार विचरते हुए आनन्दमग्न रहने लगे॥ १६॥
ततस्तु वसुदेवस्य पादौ समभिपीड्य च।
तत्रोग्रसेनं राजानमन्यांश्च यदुपुङ्गवान्॥ १७॥
यथान्यायं पूजयित्वा तौ सर्वैश्चाभिनन्दितौ।
जग्मतुर्हृष्टमनसौ मातुरेव निवेशनम्॥ १८॥
तदनन्तर, वसुदेवजीके दोनों चरणोंको दबाकर राजा उग्रसेन तथा अन्य प्रधान यदुवंशियोंका यथोचित सत्कार करनेके पश्चात् उन सबके द्वारा स्वयं भी अभिनन्दित हो, वे दोनों भाई प्रसन्न मनसे माताके ही महलमें चले गये १७-१८
एवं तावेकनिर्माणौ मथुरायां शुभाननौ।
उग्रसेनानुगौ भूत्वा कंचित्कालं सुमोदतुः॥ १९॥
इस प्रकार एक ही तत्त्वके बने और एक ही उद्देश्यकी सिद्धिके लिये प्रकट हुए वे दोनों श्रीकृष्ण और बलराम राजा उग्रसेनके अनुगामी होकर कुछ कालतक वहाँ सुखसे रहे॥ १९॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रामकृष्णयोर्मथुरां प्रत्यागमने पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बलराम और श्रीकृष्णका मथुरामें प्रत्यागमनविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥