भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 409

[विष्णुपर्व ] षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ३८७


षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

बलरामजीकी व्रजयात्रा तथा उनके द्वारा यमुनाजीका आकर्षण

वैशम्पायन उवाच
कस्यचित् त्वथ कालस्य स्मृत्वा गोषेषु सौहृदम्।
जगामैको व्रजं रामः कृष्णस्यानुमते स्थितः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कुछ कालके अनन्तर गोपोंके सौहार्दका स्मरण करके श्रीकृष्णकी अनुमति ले बलरामजी अकेले ही व्रजमें गये ॥ १ ॥

स गतस्तत्र रम्याणि ददर्श विपुलानि वै।
भुक्तपूर्वाण्यरणयानि सरांसि सुरभीणि च ॥ २ ॥

वहाँ जाकर उन्होंने बहुत-से बड़े-बड़े सुगन्धित वन तथा सरोवर देखे, जो पहले उनके उपभोगमें आ चुके थे ॥ २ ॥

स प्रविष्टस्तु वेगेन तं व्रजं कृष्णपूर्वजः।
वन्येन रमणीयेन वेषेणालंकृतः प्रभुः ॥ ३ ॥

श्रीकृष्णके पूर्वज बलरामजी बड़े वेगसे उस व्रजमें प्रविष्ट हुए। उस समय वे प्रभावशाली संकर्षण वनवासियोंके योग्य रमणीय वेष-भूषासे अलंकृत थे ॥ ३ ॥

स तानभाषत प्रीत्या यथापूर्वमरिंदमः।
गोपांस्तेनैव विधिना यथान्यायं यथावयः ॥ ४ ॥

शत्रुदमन बलराम पहलेकी ही भाँति उसी तौर-तरीकेसे अवस्थाकी छोटाई-बड़ाईके अनुसार यथायोग्य सब गोपोंके साथ मिले और प्रेमपूर्वक उनसे बातचीत करने लगे ॥ ४ ॥

तथैव प्राह तान् सर्वांस्तथैव परिहर्षयन्।
तथैव सह गोपीभिर्योजयन् मधुराः कथाः ॥ ५ ॥

उन्होंने पूर्ववत् सबका हर्ष बढ़ाते हुए सबसे उसी तरह बातें कीं तथा गोपियोंके साथ भी पहले-जैसी ही मधुर चर्चाएँ छेड़ दीं ॥ ५ ॥

तमूचुः स्थविरा गोपाः प्रियं मधुरभाषिणः।
रामं रमयतां श्रेष्ठं प्रवासात् पुनरागतम् ॥ ६ ॥

रमानेवाले (मनको आनन्दित करनेवाले) पुरुषोंमें श्रेष्ठ बलरामजी परदेशमे रहकर फिर लौटे थे और गोपोंके बहुत ही प्रिय थे। अतः मधुरभाषी बड़े-बूढ़े गोपोंने उनसे कहा—॥ ६ ॥

स्वागतं ते महाबाहो यदूनां कुलन्दन।
अद्य स्म निर्वृतास्तात यत्त्वां पश्यामहे वयम् ॥ ७ ॥

'यदुकुलको आनन्दित करनेवाले महाबाहो ! तुम्हारा स्वागत है। तात ! आज हम बहुत खुश हैं, क्योंकि हमे दीर्घकालके बाद तुम्हे देखनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है ॥ ७ ॥

प्रीताश्चैव वयं वीर यत्त्वं पुनरिहागतः।
विख्यातस्त्रिषु लोकेषु रामः शत्रुभयंकरः ॥ ८ ॥

'वीर ! तुम जो पुनः लौटकर यहाँ आये हो, इससे हम बहुत संतुष्ट हैं। शत्रुओंको भय देनेवाले वीर बलरामकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि है ॥ ८ ॥

वर्धनीया वयं वीर त्वया यादवन्दन।
अथवा प्राणिनस्तात रमन्ते जन्मभूमिषु ॥ ९ ॥

'वीर ! यादवन्दन ! यहाँ आकर तुमने हमारा गौरव बढ़ाया है, यह तुम्हारे लिये उचित ही है। अथवा तात ! अपनी जन्मभूमिमें सभी प्राणियोंको सुख मिलता है ॥ ९ ॥

त्रिदशानां वयं मान्या ध्रुवमद्यामलानन।
ये स्म दृष्टास्त्वया तात काङ्क्षमाणारतवागमम् ॥ १०॥

'अमलानन ! तुमने जो हम लोगोंपर कृपादृष्टि की है, इससे निश्चय ही अब हम देवताओके लिये भी माननीय हो गये। तात ! हमलोग प्रतिदिन तुम्हारा शुभागमन चाहते थे॥१०॥

दिष्ट्या ते निहता मल्लाः कंसश्च विनिपातितः।
उग्रसेनोऽभिषिक्तश्च माहात्म्येन जनेन वै ॥ ११ ॥

'बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम दोनों भाइयोंके द्वारा वे मल्ल मारे गये, कंस भी मार गिराया गया तथा उग्रसेनका राज्यपर अभिषेक हो गया। उनके महात्मापन (साधुस्वभाव) के कारण ही सब लोगोंने उनको राज्यपर अभिषिक्त किया है ॥ ११ ॥

समुद्रे च श्रुतोऽस्माभिस्तिमिना सह विग्रहः।
वधः पञ्चजनस्यैव जरासंधेन विग्रहः।
गोमन्ते च श्रुतोऽस्माभिः क्षत्रियैः सह विग्रहः ॥ १२ ॥

'हमने यह भी सुना है कि समुद्रमे तिमि (पञ्चजन नामक मगरमच्छ) के साथ तुमलोगोंका युद्ध हुआ था। उसमें पञ्चजन मारा गया। तत्पश्चात् मथुरामें जरासंधके साथ बड़ा भारी युद्ध हुआ। इतना ही नहीं, हमारे सुननेमें यह भी आया है कि गोमन्तपर्वतके निकट क्षत्रियोंके साथ तुम लोगोंका घोर युद्ध हुआ था ॥ १२ ॥

दरदस्य वधश्चैव जरासंधपराजयः।
तत्रायुधावतरणं श्रुतं नः परमाहवे ॥ १३ ॥

'उस संग्राममे राजा दरदका वध हुआ और जरासंधकी पराजय हुई। सुना था कि उस महायुद्धमें तुम लोगोंके लिये आकाशसे दिव्य आयुध उतर आये थे ॥ १३ ॥

वधश्चैव शृगालस्य करवीरपुरोत्तमे।
तत्सुतस्याभिषेकश्च नागराणां च सान्त्वनम् ॥ १४ ॥