विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 410, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३८८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
‘इसके सिवा, उत्तम करवीरपुरमे राजा शृगालका वध करके उसके पुत्रका वहाँ अभिषेक किया गया और वहाँके नागरिकोंको तुम्हारी ओरसे सान्त्वना दी गयी ॥ १४॥
मधुरायां प्रवेशश्च कीर्तनीयः सुरोत्तमैः।
प्रतिष्ठिता च वसुधा पार्थिवाश्च वशीकृताः ॥ १५॥
‘फिर तुमलोगोंका मथुरामें प्रवेश हुआ, जो देवताओंके लिये कीर्तन करने योग्य है। पृथ्वीका भार उतारकर तुमने इसे भलीभाँति प्रतिष्ठित कर दिया और भूमण्डलके सभी नरेशोंको वशमें कर लिया ॥ १५ ॥
तत्र चागमनं दृष्ट्वा सभाग्याः स्म यथा पुरा।
तेन स्म परितुष्टा वै हृषिताश्च सबान्धवाः ॥ १६॥
‘तुम्हारा शुभागमन देखकर हम पूर्ववत् सौभाग्यशाली हो गये हैं। हमें सब तरहसे संतोष प्राप्त हुआ है और हम अपने बन्धु-बान्धवोंसहित हर्षसे उत्फुल्ल हो उठे हैं’॥ १६॥
प्रत्युवाच ततो रामः सर्वांस्तानभितः स्थितान्।
यादवेष्वपि सर्वेषु भवन्तो मम बान्धवाः ॥ १७॥
इहावयोर्गतं बाल्यमिह चैवावयो रतम्।
भवद्भिर्वर्द्धिताद्वैव यास्यामो विक्रियां कथम् ॥ १८॥
तब बलरामजीने अपने सब ओर खड़े हुए उन समस्त गोपोंसे कहा—‘समस्त यादवोंके होते हुए भी आपलोग ही हमारे सगे बान्धव हैं। यहीं हम लोगोंका बचपन बीता, यहीं हम खेले-कूदे और आप लोगोंने ही हमें पाल-पोषकर बड़ा किया; फिर हम आप लोगोंको भुला कैसे सकते हैं॥ १७-१८॥
गृहेषु भवतां भुक्तं गावश्च परिरक्षिताः।
अस्माकं बान्धवाः सर्वे भवन्तो वृद्धसौहृदाः ॥ १९॥
‘हमने आपके घरोंमें खाया-पीया और गौएँ चरायीं। आप सब लोग हममे अनुराग रखनेवाले हमारे बन्धु-बान्धव हैं’ ॥ १९॥
ब्रुवत्येवं यथातत्त्वं गोपमध्ये हलायुधे।
संहृष्टवदना भूयो बभूवुर्व्रजयोषितः ॥ २०॥
हल धारण करनेवाले बलरामजी जब इस प्रकार यथार्थ बात कह रहे थे, उस समय उनकी बातें सुनकर व्रजसुन्दरियोंके मुखपर पुनः प्रसन्नता छा गयी ॥ २० ॥
ततो वनान्तरगतो रेमे रामो महाबलः।
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ते रामाय विदितात्मने ॥ २१॥
गोपालैर्देशकालज्ञैरूपानीतं वारुणी।
सोऽपिबत् पाण्डुराभ्रामस्तत्कालं ज्ञातिभिर्वृतः॥२२॥
तदनन्तर, महाबली बलराम वनके भीतर जाकर सुखपूर्वक विचरने लगे। इसी समय उनके मनोभावको जानकर देश-कालके ज्ञाता गोपालगण उनके लिये वारुणी (सुधा या शहद) ले आये। फिर उन बन्धुजनोंसे घिरे हुए गौर-कान्ति बलरामने उस समय उसका पान किया ॥ २१-२२ ॥
वनान्तरगतो रामः पानं मदसमीरणम्।
उपनिन्युस्ततस्तस्मै वन्यानि विविधानि च ॥ २३॥
प्रत्यग्ररमणीयानि पुष्पाणि च फलानि च।
मेध्यांश्च विविधान् गन्धान् भक्ष्यांश्च हृदयंगमान्।
सद्यो हृतानि पद्मानि विकचान्युत्पलानि च ॥ २४॥
वनमें गये हुए बलरामजीने जो मद्य पीया था, वह कुछ नशा लानेवाला था; उसके पीनेके बाद ग्वाल-बाल उनके लिये वनके नाना प्रकारके पुष्प और फल ले आये, जो अभी नये (ताजे) होनेके कारण बड़े रमणीय लगते थे। इसके सिवा गोपोंने उनके लिये भाँति-भाँतिकी पवित्र गन्ध तथा मनोरम भक्ष्य पदार्थ प्रस्तुत किये। तुरंतके लाये हुए विकसित कमल और उत्पल भी भेंट किये ॥ २३-२४॥
शिरसा चारुकेशेन किंचिदावृत्तमौलिना।
श्रवणैकावलम्बेन कुण्डलेन विराजता ॥ २५॥
चन्दनाद्रेण पीतेन वनमालावलम्बिना।
विबभावुरसा रामः कैलासेनेव मन्दरः ॥ २६॥
बलरामजीके सिरके बाल बड़े मनोहर थे। उसपर रखा हुआ मुकुट कुछ टेढ़ा था। उनके एक कानमें सुन्दर कुण्डल लटक रहा था। वक्षःस्थल चन्दनके अनुलेपसे आर्द्र एवं पीत था, उसपर वनमाला लटक रही थी। ऐसे वक्षसे बलरामजीकी वैसी ही शोभा होती थी, जैसे कैलास पर्वतसे मन्दराचल सुशोभित होता है॥ २५-२६॥
नीले वसानो वसने प्रत्यग्रजलदप्रभे।
रराज वपुषा शुभ्रस्तिमिरेद्ये यथा शशी ॥ २७॥
उन्होंने नूतन जलधरके समान कान्तिवाले दो नीले वस्त्र धारण कर रखे थे और शरीरसे वे गोरे थे; अतः अन्धकार-राशिमें चन्द्रमाके समान सुशोभित होते थे ॥ २७॥
लाङ्गलेनावसिक्तेन भुजगाभोगवर्तिना।
तथा भुजाग्रश्लिष्टेन मुसलेन च भास्वता ॥ २८॥
उनके एक हाथमें सर्प-शरीरके समान हल शोभा पाता था और दूसरेमें प्रकाशमान मुसल ॥ २८ ॥
स मत्तो बलिनां श्रेष्ठो रराजाघूर्णित्ताननः।
शैशिरीषु त्रियामासु यथा स्वेदालसः शशी ॥ २९॥
बलवानोंमे श्रेष्ठ बलरामजी मधुसे मत्त-से हो रहे थे। उनका मुख झूम रहा था। वे ऐसे लगते थे, मानो शरद्की रातोंमे स्वेद-बिन्दुओंसे युक्त अलसाये हुए चन्द्रमा शोभा पाते हों ॥ २९ ॥
रामस्तु यमुनामाह स्नातुमिच्छे महानदि।
एहि मामभिगच्छ त्वं रूपिणी सागरंगमे ॥ ३०॥