विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 411, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ३८९
उस समय बलरामजीने यमुनासे कहा—'महानदि ! मैं स्नान करना चाहता हूँ। सागरगामिनि ! मूर्तिमती होकर आओ, चलो मेरे साथ' ॥ ३० ॥
संकर्षणस्य मत्तोक्तां भारतीं परिभूय सा । नाभ्यवर्तत तं देशं स्त्रीस्वभावेन मोहिता ॥ ३१ ॥
संकर्षणकी बातको मतवालेकी बहक समझकर नारी-स्वभावसे मोहित हुई उस नदीने उसकी अवहेलना कर दी। वह उनके अभीष्ट स्थानको नहीं गयी ॥ ३१ ॥
ततश्चुक्रोध बलवान् रामो मदसमीरितः । चकार स हलं हस्ते कर्षणाधोमुखं बली ॥ ३२ ॥
तब बलवान् बलराम मदसे प्रेरित हो कुपित हो उठे। उन्होंने यमुनाका कर्षण करनेके लिये हलका मुख नीचेको कर लिया ॥ ३२ ॥
तस्यामुपरि मेदिन्यां पेतुस्तामरसस्रजः । मुमुचुः पुष्पकोशैश्च वासरेण्वरुणं जलम् ॥ ३३ ॥
यमुनाको खींचते समय उनके गलेसे जो कमल-पुष्पकी मालाएँ टूटकर पृथ्वीपर गिरीं, वे पुष्प-कोशोंद्वारा सुगन्धित परागसे अरुण रंगका जल छोड़ने लगीं ॥ ३३ ॥
स हलेनानताग्रेण कूले गृह्य महानदीम् । चकर्ष यमुनां रामो व्युत्थितां वनितामिव ॥ ३४ ॥
जिसका अग्रभाग कुछ झुका हुआ था, उस हलको यमुनाके तटसे लगाकर स्वेच्छाचारिणी वनिताके समान उस महानदीको अभीष्ट दिशाकी ओर खींचा ॥ ३४ ॥
सा विह्वलजलस्रोता ह्रदप्रस्थितसंचया । व्यावर्तत नदी भीता हलमार्गानुसारिणी ॥ ३५ ॥
उसका जल-स्रोत क्षुब्ध हो उठा। कुण्डोंमें जो अगाध जलराशिका संचय था, वह वहाँसे निकलने लगा और वह नदी भयभीत-सी होकर हलके बनाये हुए मार्गसे चलने लगी ॥
लाङ्गलादिष्टवर्त्मा सा वेगगा वक्रगामिनी । संकर्षणभयत्रस्ता योषेवाकुलतां गता ॥ ३६ ॥
हलकी रेखा ही उसे गन्तव्य मार्गका आदेश दे रही थी। सीधे मार्गपर वेगसे बहनेवाली वह नदी टेढ़े रास्तेपर मन्थर गतिसे चलने लगी। वह संकर्षणके भयसे त्रस्त हुई किसी युवतीकी भाँति व्याकुल हो उठी थी ॥ ३६ ॥
पुलिनश्रोणिविम्बोष्ठी मृदितैस्तोयताडितैः । फेनमेखलसूत्रैश्च च्छिन्नैरम्बुदगामिनी ॥ ३७ ॥
दोनों किनारे ही उसके नितम्ब थे, रक्तकमलोंका समूह ही उसके अरुण अधरोंका प्रतीक था। फेन ही उसके मेखला-सूत्र थे, जो जलसे ताड़ित और मर्दित होकर छिन्न-भिन्न हो गये थे; वह नदीरूपिणी युवती समुद्ररूपी प्रियतमके साथ समागम करनेवाली थी ॥ ३७ ॥
तरङ्गविषमापीडा चक्रवाकोन्नतस्तनी । वेगगम्भीरवक्राङ्गी त्रस्तमीनविभूषणा ॥ ३८ ॥
उसके तरङ्गरूपी शिरोभूषण ऊँचे-नीचे हो रहे थे; चक्रवाकरूपी स्तन ऊँचे उठे हुए थे; उसके गम्भीर अंग वेगके कारण वक्र हो रहे थे; वह त्रस्त मीनरूपी आभूषणोंसे विभूषित थी ॥ ३८ ॥
सितहंसेक्षणापाङ्गी काशक्षौमोच्छ्रिताम्बरा । तीरजोधूतकेशान्ता जलस्खलितगामिनी ॥ ३९ ॥
श्वेत हंस उसके नेत्र और अपाङ्ग थे, काश-पुष्प उसके फहराते हुए रेशमी वस्त्र थे, तटवर्ती पौधे या वृक्ष उसके केश थे तथा जलका प्रवाह ही उसकी स्खलित गतिका प्रतीक था॥
लाङ्गलोल्लिखितापाङ्गी क्षुभिता सागरंगमा । मत्तेव कुटिला नारी राजमार्गेण गच्छती ॥ ४० ॥
उसके नेत्र-प्रान्त मानो हलकी नोकसे छिल गये थे, वह सागरगामिनी क्षुब्ध हो उठी थी, वह कुटिला एवं मतवाली स्त्रीके समान खुली सड़कपर चल रही थी ॥ ४० ॥
कृष्यते सातिवेगेन स्रोतःस्खलितगामिनी । उन्मार्गानीतमार्गा सा येन वृन्दावनं वनम् ॥ ४१ ॥
ऊँचे-नीचे प्रवाह ही उसकी स्खलित गतिके सूचक थे। वह उस विपरीत मार्गपर लायी गयी थी, जिस ओर वृन्दावन सुशोभित होता था ॥ ४१ ॥
वृन्दावनस्य मध्येन सा नीता यमुना नदी । रोरूयमाणेव खगैरन्विता तोयवासिभिः ॥ ४२ ॥
यमुना नदी वृन्दावनके बीचसे लायी गयी थी। जलमें निवास करनेवाले पक्षी उसके साथ-साथ बोलते हुए आ रहे थे। उन पक्षियोंके शब्दोंमें मानो वह नदी ही जोर-जोरसे रो रही थी ॥ ४२ ॥
सा यदा समतिक्रान्ता नदी वृन्दावनं वनम् । तदा स्त्रीरूपिणी भूत्वा यमुना राममब्रवीत् ॥ ४३ ॥
वह नदी जब वृन्दावनको लाँघ गयी, तब स्त्रीरूपमें प्रकट हो बलरामजीसे बोली—॥ ४३ ॥
प्रसीद नाथ भीतास्मि प्रतिलोमेन कर्मणा । विपरीतमिदं रूपं तोयं च मम जायते ॥ ४४ ॥
'नाथ ! प्रसन्न होइये। मैं आपके इस विपरीत कर्मसे बहुत डर गयी हूँ। मेरा यह रूप और जल विपरीत हो गया है ॥ ४४ ॥
असत्यहं नदीमध्ये रौहिणेय त्वया कृता । कर्षणेन महाबाहो स्वमार्गाव्यभिचारिणी ॥ ४५ ॥
१. नेत्रके अन्तभाग।