विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
३८४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
उरांस्युरसिजांश्चैव शिरोजान्याकुलान्यपि ।
निर्दयं ताडयन्त्यस्ता विस्वरं रुरुदुः स्त्रियः ॥ ४१ ॥
वे स्त्रियाँ अपनी छाती, स्तन और वहाँ फैले हुए सिरके बालोंको भी निर्दयतापूर्वक पीटती हुई फुक्का फाड़-फाड़कर रोने लगीं ॥ ४१ ॥
तस्योरसि सुदुःखार्ता मृदिताः क्लिन्नलोचनाः ।
पेतुरूध्वंभुजाः सर्वाश्छिन्नमूला लता इव ॥ ४२ ॥
वे सब रानियाँ अत्यन्त दुःखसे आतुर और मर्दित हो नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई दोनों बाँहें ऊपर उठाकर जड़से कटी हुई लताओंकी भाँति राजाकी छातीपर गिर पड़ीं ॥ ४२ ॥
तासां बाष्पाम्बुपूर्णानि नेत्राणि नृपयोषिताम् ।
वारिविप्रहतानीव पङ्कजानि चकाशिरे ॥ ४३ ॥
उन राजरानियोंके आँसूभरे नेत्र जल (या ओले) से आहत हुए कमलोंके समान प्रकाशित होते थे ॥ ४३ ॥
ताः पतिं पतितं भूमौ रुदन्त्यो हृदि ताडिताः ।
लालप्यमानाः करुणं योषितः पर्यदेवयन् ॥ ४४ ॥
धरतीपर पड़े हुए पतिकी ओर देखकर रोती और छाती पीटती हुई ये राजपत्नियां करुण विलाप करती हुई शोकोद्गार प्रकट करने लगीं ॥ ४४ ॥
पुत्रं चास्य पुरस्कृत्य बालं प्रस्रुतलोचनम् ।
शक्रदेवं पितुः पार्श्वे द्विगुणं रुरुदुः स्त्रियः ॥ ४५ ॥
उस राजाके बालक पुत्र शक्रदेवको अपने आगे पिताके पास खड़ा करके वे रानियाँ और दूने वेगसे रोने तथा विलाप करने लगीं । उस बालकके नेत्रोंसे भी आँसू बह रहा था ॥
अयं ते वीर विक्रान्तो बालः पुत्रो न पण्डितः ।
त्वद्विहीनः कथमयं पदे स्थास्यत पैतृके ॥ ४६ ॥
वे बोलीं—'वीर महाराज ! यह आपका पराक्रमी पुत्र अभी बालक है, विद्वान् नहीं हो सका है । अब आपके बिना यह अपने पैतृक राज्यपर कैसे प्रतिष्ठित हो सकेगा ? ॥ ४६ ॥
कथमेकपदे त्यक्त्वा गतोऽस्यन्तःपुरं परम् ।
अतृप्तास्तव सौख्यानां किं कुर्मो विधवा वयम् ॥ ४७ ॥
'(प्राणनाथ !) आप अपने अन्तःपुरकी रानियोंको सहसा त्यागकर क्यों परलोकको चले गये ? हम आपके दिये हुए सुखोंसे अभी तृप्त नहीं हुई थीं । हाय ! हम विधवा हो गयीं, अब क्या करें ?' ॥ ४७ ॥
तस्य पद्मावती नाम महिषी प्रमदोत्तमा ।
रुदती पुत्रमादाय वासुदेवमुपस्थिता ॥ ४८ ॥
राजा शृगालकी पटरानीका नाम पद्मावती था । वह स्त्रियोंमें श्रेष्ठ थी । पद्मावती रोती हुई अपने पुत्रको साथ ले भगवान् वासुदेवके पास गयी ॥ ४८ ॥
यस्त्वया पातितो वीर रणप्रोक्तेन कर्मणा ।
तस्य प्रेतगतस्यायं पुत्रस्त्वां शरणं गतः ॥ ४९ ॥
और बोली—'वीर ! आपने युद्ध-कर्मके द्वारा जिन्हें मार गिराया है, उन्हीं परलोकवासी नरेशका यह पुत्र आपकी शरणमें आया है ॥ ४९ ॥
यदि त्वां प्रणमेतासौ कुर्याद् वा शासनं तव ।
नायमेकप्रहारेण जनस्तप्येत दारुणम् ॥ ५० ॥
'यदि ये महाराज आपको प्रणाम करते—आपके सम्मुख विनीत भावका परिचय देते अथवा आपकी आज्ञाका पालन करते तो आपके एक ही प्रहारसे इन्हें संतापका भागी नहीं होना पड़ता ॥ ५० ॥
यदि कुर्यादयं मूढस्त्वयि बान्धवकं विधिम् ।
नैवं परीतः कृपणः सेवेत धरणीतलम् ॥ ५१ ॥
'यदि ये मूढ (विवेकशून्य) नरेश आपके प्रति बन्धु-जनोचित बर्ताव करते तो इन्हें मांसभक्षी जन्तुओंसे घिरकर पृथ्वीका सेवन नहीं करना पड़ता ॥ ५१ ॥
अयमस्य विपन्नस्य बान्धवस्य तवानघ ।
सन्तती रक्ष्यतां वीर पुत्रः पुत्र इवात्मजः ॥ ५२ ॥
'अनघ ! वीर ! यह आपके इस मरे हुए बान्धवकी ही सन्तति है; आप अपने पुत्रकी ही भाँति इसकी रक्षा करें' ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा महिष्या यदुनन्दनः ।
मृदुपूर्वमिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ॥ ५३ ॥
रानीका यह वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ यदुनन्दन श्रीकृष्णने मधुर वाणीमें कहा--॥ ५३ ॥
राजपत्नि गतो रोषः सहानेन दुरात्मना ।
प्रकृतिस्था वयं जाता देवि सैषोऽस्मि बान्धवः ॥ ५४ ॥
'राजरानी ! मेरा रोष तो इस दुरात्माके मारे जानेके साथ ही दूर हो गया । देखें ! अब हम स्वाभाविक स्थितिमें हैं । मैं आपका वही भाई-बन्धु हूँ ॥ ५४ ॥
रोषो मे विगतः साध्वि तव वाक्यैरकल्मषैः ।
योऽयं पुत्रः शृगालस्य ममाप्येष न संशयः ॥ ५५ ॥
'साध्वी रानी ! तुम्हारे इन निर्दोष वचनोंसे मेरा सारा क्रोध दूर हो गया । राजा शृगालका जो यह पुत्र है, यह मेरे लिये भी पुत्रके ही समान है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५५ ॥
अभयं चाभिषेकं च ददाम्यस्मै सुखाय वै ।
आहूयन्तां प्रकृतयः पुरोधा मन्त्रिणस्तथा ॥ ५६ ॥
पितृपैतामहे राज्ये तत्र पुत्रोऽभिषिच्यताम् ।
'मैं इसके सुखके लिये इसे अभय देनेके साथ ही इसका राज्याभिषेक भी कर दूँगा । आप समस्त प्रकृतियों तथा मन्त्री और पुरोहितोंको भी बुलवाइये, जिससे आपके इस पुत्र-
विष्णुपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः [ ३८५
को, इसके बाप-दादोंके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया जाय' ॥
ततः प्रकृतयः सर्वाः पुरोधा मन्त्रिणस्तथा ॥ ५७ ॥
अभिषेकार्थमाजग्मुर्यतो वै रामकेशवौ ।
तदनन्तर, सारी प्रकृतियाँ (प्रजा आदि), पुरोहित और मन्त्री भी राजकुमारका अभिषेक करनेके लिये उस स्थानपर आये, जहाँ श्रीबलराम और श्रीकृष्ण विराजमान थे ॥ ५७ ॥
ततः सिंहासनस्थं तु राजपुत्रं जनार्दनः ॥ ५८ ॥
अभिषेकेन दिव्येन योजयामास वीर्यवान् ।
इसके बाद पराक्रमी भगवान् जनार्दनने राजकुमारको राज्य सिंहासनपर बिठाकर दिव्य अभिषेककी विधिसे उसका राज्याभिषेक कर्म सम्पन्न किया ॥ ५८ ॥
अभिषिच्य शृगालस्य करवीरपुरे सुतम् ।
कृष्णस्तदहरेवाशु प्रस्थानमभ्यरोचयत् ॥ ५९ ॥
शृगालके पुत्रको करवीरपुरके राज्यपर अभिषिक्त करके श्रीकृष्णने उसी दिन वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कर देना उचित समझा ॥ ५९ ॥
रथेन हरियुक्तेन तेन युद्धार्जितेन वै ।
केशवः प्रस्थितोऽध्वानं वृत्रहा त्रिदिवं यथा ॥ ६० ॥
जैसे इन्द्र स्वर्गलोकको जाते हैं, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण भी युद्धमें प्राप्त हुए उस अश्वयुक्त रथके द्वारा मथुराके पथपर चल दिये ॥ ६० ॥
शक्रदेवोऽपि धर्मात्मा सह मात्रा परंतपः ।
सबालवृद्धयुवतीमुख्याः प्रकृतयस्तथा ॥ ६१ ॥
शिविकायामथारोप्य शृगालं युद्धदुर्मदम् ।
संहता दूरमार्गेण पश्चिमाभिमुखा ययुः ॥ ६२ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाला धर्मात्मा राजा शक्रदेव भी माताके साथ बालक, वृद्ध और युवती आदि सारी प्रकृतियोंको साथ ले रणदुर्मद शृगालके शवको पालकीमें सुलाकर सब लोग संगठित हो नगरसे दूरके रास्तेपर पश्चिमाभिमुखी ओर चले ॥ ६१-६२ ॥
नैधनस्य विधानेन चक्रुस्ते तस्य सत्क्रियाम् ।
सत्कारं कारयामासुः पितॄणां पारलौकिकम् ॥ ६३ ॥
श्मशान-भूमिमें ले जाकर अन्त्येष्टिकी विधिसे उन सबने शक्रदेवद्वारा राजाका दाह-संस्कार करवाया और पितरोंके लिये पारलौकिक कृत्यका सम्पादन कराया ॥ ६३ ॥
उद्दिश्योद्दिश्य राजानं श्राद्धं कृत्वा सहस्रशः ।
ततस्ते सलिलं दत्त्वा नामगोत्रादि कीर्तनैः ॥ ६४ ॥
पितुर्युपरते घोरे शोकसंविनमानसाः ।
कृत्वोदकं तदा राजा प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥ ६५ ॥
राजाके उद्देश्यसे सहस्रों प्रकारकी वस्तुएँ श्राद्धमें देकर उन सबने शृगालके लिये नाम-गोत्र आदिके उच्चारणपूर्वक जलदान किया। इस प्रकार पिताकी घोर मृत्यु हो जानेपर शोकसे व्याकुलचित्त हुए राजा शक्रदेवने उन्हे जलाञ्जलि देकर अपने उत्तम नगरमें प्रवेश किया ॥ ६४-६५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शृगालवधो नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शृगालका वधनामक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
बलराम और श्रीकृष्णका मथुरामें प्रत्यागमन और स्वागत
वैशम्पायन उवाच
तौ तु स्वल्पेन कालेन दमघोषेण संगतो ।
अथाध्वविधिना तौ तु पञ्चरात्रोषितौ पथि ॥ १ ॥
दमघोषेण संगम्य एकरात्रोषिताविव ।
जग्मतुः सहितौ वीरौ मुदा परमया युतौ ।
नगरीं मथुरां प्राप्तौ वसुदेवसुतावुभौ ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर, वे दोनों भाई चेदिराज दमघोषके साथ मिलकर यात्रा करने लगे। मार्गके नियमानुसार चलते हुए उन्होंने बीच-बीचमें पाँच रात निवास किया; किंतु दमघोषके साथ रहनेसे उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि हम एक ही रात मार्गमें रहे हैं। इस प्रकार परमानन्दसे सम्पन्न हो वे दोनों वीर वसुदेवकुमार साथ-साथ थोड़े ही समयमें मथुरा नगरीमें जा पहुँचे ॥ १-२ ॥
ततः प्रत्युद्गताः सर्वे यादवा यदुनन्दनौ ।
सबला हृष्टमनस उग्रसेनपुरोगमाः ॥ ३ ॥
उस समय उग्रसेन आदि सभी यादवोंने सेनासहित आगे आकर प्रसन्नचित्तसे उन दोनों यदुनन्दन वीरोंका स्वागत किया ॥ ३ ॥
श्रेण्यः प्रकृतयश्चैव मन्त्रिणश्च यथोचिताः ।
सबालवृद्धा सा चैव पुरी समभिवर्तत ॥ ४ ॥
अनेक प्रकारके शिल्पियोंद्वारा जीवन-निर्वाह करनेवाले नाना जातिके शिल्पी, प्रजावर्ग, मन्त्री तथा बालकों और
३८६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
वृद्धोंसहित सारी मथुरापुरी यथोचित रीतिसे उनके स्वागतमें जुटी थी॥ ४॥
नन्दितूर्याण्यवाद्यन्त स्तूयेतां पुरुषर्षभौ।
रथ्याः पताकामालिन्यो भासन्ति स्म समन्ततः॥ ५॥
आनन्दवर्धक मङ्गल-वाद्य बजने लगे। उन दोनों पुरुष-प्रवर वीरोंकी स्तुति होने लगी। सब ओरकी गलियाँ और सड़कें पताकाओंसे अलङ्कृत हो उत्तम शोभा पाने लगीं॥
हृष्टा प्रमुदिता सर्वा पुरी परमशोभिता।
आश्रोस्तयोरागमने यथैवेन्द्रमहे तथा॥ ६॥
उन दोनों भाइयोंके आनेसे इन्द्रोत्सवके समान सारी पुरी परम शोभासे सम्पन्न हो हर्षसे खिल उठी। सर्वत्र आनन्द छा गया॥ ६॥
मुदितास्तत्र गायन्ति राजमार्गेषु गायकाः।
स्तवाशीर्बहुला गाथा यादवानां प्रियंकराः॥ ७॥
सड़कोंपर आनन्दमग्न हुए गायक यादवोंको प्रिय लगने-वाली आशीर्वादयुक्त गाथाएँ गा रहे थे॥ ७॥
गोविन्दरामौ सम्प्राप्तौ भ्रातरौ लोकविश्रुतौ।
स्वे पुरे निर्भयाः सर्वे क्रीडध्वं यादवाः सुखम्॥ ८॥
और सर्वत्र यह घोषणा करते थे कि 'यादवो! विश्वविख्यात वीर दोनों भाई श्रीकृष्ण और बलराम अब अपने नगरमें आ गये हैं, अतः सबलोग निर्भय होकर सुखपूर्वक क्रीड़ा करो'॥ ८॥
न तत्र कश्चिद् दीनो वा मलिनो वा विचेतनः।
मथुरायामभूत् कश्चिद् रामकृष्णसमागमे॥ ९॥
बलराम और श्रीकृष्णके आ जानेपर उस मथुरापुरीमें कोई भी दीन, मलिन अथवा उदासचित्त नहीं दिखायी देता था॥ ९॥
वयांसि साधुवाक्यानि प्रहृष्टा गोहयद्विपाः।
नरनारीगणाश्चैव भेजिरे मानसं सुखम्॥ १०॥
पक्षी सुमधुर बोली बोलते थे; गौ, घोड़े और हाथी भी बहुत प्रसन्न थे तथा स्त्रियों और पुरुषोंके मनको भी बड़ा ही सुख मिला॥ १०॥
शिवाश्च प्रववुर्वाता विरजस्का दिशो दश।
दैवतान्यपि सर्वाणि हृष्यन्त्यायतनेष्वथ॥ ११॥
शीतल एवं सुखदायिनी हवाएँ चलने लगीं, दसों दिशाओंकी धूल उड़ गयी और मन्दिरोंमें स्थित सम्पूर्ण देवता भी बड़े प्रसन्न हुए॥ ११॥
यानि लिङ्गानि लोकस्य वृत्तानीह कृते युगे।
तानि सर्वाण्यदृश्यन्त तयोरागमने तदा॥ १२॥
सत्ययुग आनेपर इस जगत्में जो-जो लक्षण एवं वृत्तान्त घटित होते हैं, वे सब-के-सब श्रीकृष्ण एवं बलरामके आगमन-पर प्रत्यक्ष दिखायी देने लगे॥ १२॥
ततः काले शिवे पुण्ये स्यन्दनेनारिमर्दनौ।
हरियुक्तेन तौ वीरौ प्रविष्टौ मथुरां पुरीम्॥ १३॥
तदनन्तर, मङ्गलमय पुण्यमुहूर्तमें वे दोनों शत्रुमर्दन वीर उस अश्वयुक्त रथके द्वारा मथुरापुरीमें प्रविष्ट हुए॥ १३॥
प्रविशन्तं पुरीं रम्यां गोविन्दं राममेव च।
अनुजग्मुर्यदुगणाः शक्रं देवगणा इव॥ १४॥
उस रमणीय पुरीमें प्रवेश करते समय श्रीकृष्ण और बलरामके पीछे समस्त यादव उसी प्रकार चले, जैसे देवता इन्द्रके पीछे चलते हैं॥ १४॥
वसुदेवस्य भवनं पितुस्तौ यदुनन्दनौ।
प्रविष्टौ दृष्टवदनौ चन्द्रादित्याविवाचलम्॥ १५॥
जैसे चन्द्रमा और सूर्य सुमेरुपर्वतकी गुफामें प्रवेश करते हों, उसी प्रकार वे दोनों यदुनन्दन वीर पिता वसुदेवके घरमें प्रविष्ट हुए। उस समय उन दोनोंके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी॥ १५॥
तत्रायुधानि संन्यस्य गृहे स्वे स्वैरचारिणौ।
समुदाते यदुवरौ वसुदेवसुतावुभौ॥ १६॥
वहाँ अपने घरमें आयुधोंको रखकर वे दोनों यदुकुल-तिलक वसुदेवपुत्र स्वेच्छानुसार विचरते हुए आनन्दमग्न रहने लगे॥ १६॥
ततस्तु वसुदेवस्य पादौ समभिपीड्य च।
तत्रोग्रसेनं राजानमन्यांश्च यदुपुङ्गवान्॥ १७॥
यथान्यायं पूजयित्वा तौ सर्वैश्चाभिनन्दितौ।
जग्मतुर्हृष्टमनसौ मातुरेव निवेशनम्॥ १८॥
तदनन्तर, वसुदेवजीके दोनों चरणोंको दबाकर राजा उग्रसेन तथा अन्य प्रधान यदुवंशियोंका यथोचित सत्कार करनेके पश्चात् उन सबके द्वारा स्वयं भी अभिनन्दित हो, वे दोनों भाई प्रसन्न मनसे माताके ही महलमें चले गये १७-१८
एवं तावेकनिर्माणौ मथुरायां शुभाननौ।
उग्रसेनानुगौ भूत्वा कंचित्कालं सुमोदतुः॥ १९॥
इस प्रकार एक ही तत्त्वके बने और एक ही उद्देश्यकी सिद्धिके लिये प्रकट हुए वे दोनों श्रीकृष्ण और बलराम राजा उग्रसेनके अनुगामी होकर कुछ कालतक वहाँ सुखसे रहे॥ १९॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रामकृष्णयोर्मथुरां प्रत्यागमने पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बलराम और श्रीकृष्णका मथुरामें प्रत्यागमनविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥
[विष्णुपर्व ] षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ३८७
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः
बलरामजीकी व्रजयात्रा तथा उनके द्वारा यमुनाजीका आकर्षण
वैशम्पायन उवाच
कस्यचित् त्वथ कालस्य स्मृत्वा गोषेषु सौहृदम्।
जगामैको व्रजं रामः कृष्णस्यानुमते स्थितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कुछ कालके अनन्तर गोपोंके सौहार्दका स्मरण करके श्रीकृष्णकी अनुमति ले बलरामजी अकेले ही व्रजमें गये ॥ १ ॥
स गतस्तत्र रम्याणि ददर्श विपुलानि वै।
भुक्तपूर्वाण्यरणयानि सरांसि सुरभीणि च ॥ २ ॥
वहाँ जाकर उन्होंने बहुत-से बड़े-बड़े सुगन्धित वन तथा सरोवर देखे, जो पहले उनके उपभोगमें आ चुके थे ॥ २ ॥
स प्रविष्टस्तु वेगेन तं व्रजं कृष्णपूर्वजः।
वन्येन रमणीयेन वेषेणालंकृतः प्रभुः ॥ ३ ॥
श्रीकृष्णके पूर्वज बलरामजी बड़े वेगसे उस व्रजमें प्रविष्ट हुए। उस समय वे प्रभावशाली संकर्षण वनवासियोंके योग्य रमणीय वेष-भूषासे अलंकृत थे ॥ ३ ॥
स तानभाषत प्रीत्या यथापूर्वमरिंदमः।
गोपांस्तेनैव विधिना यथान्यायं यथावयः ॥ ४ ॥
शत्रुदमन बलराम पहलेकी ही भाँति उसी तौर-तरीकेसे अवस्थाकी छोटाई-बड़ाईके अनुसार यथायोग्य सब गोपोंके साथ मिले और प्रेमपूर्वक उनसे बातचीत करने लगे ॥ ४ ॥
तथैव प्राह तान् सर्वांस्तथैव परिहर्षयन्।
तथैव सह गोपीभिर्योजयन् मधुराः कथाः ॥ ५ ॥
उन्होंने पूर्ववत् सबका हर्ष बढ़ाते हुए सबसे उसी तरह बातें कीं तथा गोपियोंके साथ भी पहले-जैसी ही मधुर चर्चाएँ छेड़ दीं ॥ ५ ॥
तमूचुः स्थविरा गोपाः प्रियं मधुरभाषिणः।
रामं रमयतां श्रेष्ठं प्रवासात् पुनरागतम् ॥ ६ ॥
रमानेवाले (मनको आनन्दित करनेवाले) पुरुषोंमें श्रेष्ठ बलरामजी परदेशमे रहकर फिर लौटे थे और गोपोंके बहुत ही प्रिय थे। अतः मधुरभाषी बड़े-बूढ़े गोपोंने उनसे कहा—॥ ६ ॥
स्वागतं ते महाबाहो यदूनां कुलन्दन।
अद्य स्म निर्वृतास्तात यत्त्वां पश्यामहे वयम् ॥ ७ ॥
'यदुकुलको आनन्दित करनेवाले महाबाहो ! तुम्हारा स्वागत है। तात ! आज हम बहुत खुश हैं, क्योंकि हमे दीर्घकालके बाद तुम्हे देखनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है ॥ ७ ॥
प्रीताश्चैव वयं वीर यत्त्वं पुनरिहागतः।
विख्यातस्त्रिषु लोकेषु रामः शत्रुभयंकरः ॥ ८ ॥
'वीर ! तुम जो पुनः लौटकर यहाँ आये हो, इससे हम बहुत संतुष्ट हैं। शत्रुओंको भय देनेवाले वीर बलरामकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि है ॥ ८ ॥
वर्धनीया वयं वीर त्वया यादवन्दन।
अथवा प्राणिनस्तात रमन्ते जन्मभूमिषु ॥ ९ ॥
'वीर ! यादवन्दन ! यहाँ आकर तुमने हमारा गौरव बढ़ाया है, यह तुम्हारे लिये उचित ही है। अथवा तात ! अपनी जन्मभूमिमें सभी प्राणियोंको सुख मिलता है ॥ ९ ॥
त्रिदशानां वयं मान्या ध्रुवमद्यामलानन।
ये स्म दृष्टास्त्वया तात काङ्क्षमाणारतवागमम् ॥ १०॥
'अमलानन ! तुमने जो हम लोगोंपर कृपादृष्टि की है, इससे निश्चय ही अब हम देवताओके लिये भी माननीय हो गये। तात ! हमलोग प्रतिदिन तुम्हारा शुभागमन चाहते थे॥१०॥
दिष्ट्या ते निहता मल्लाः कंसश्च विनिपातितः।
उग्रसेनोऽभिषिक्तश्च माहात्म्येन जनेन वै ॥ ११ ॥
'बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम दोनों भाइयोंके द्वारा वे मल्ल मारे गये, कंस भी मार गिराया गया तथा उग्रसेनका राज्यपर अभिषेक हो गया। उनके महात्मापन (साधुस्वभाव) के कारण ही सब लोगोंने उनको राज्यपर अभिषिक्त किया है ॥ ११ ॥
समुद्रे च श्रुतोऽस्माभिस्तिमिना सह विग्रहः।
वधः पञ्चजनस्यैव जरासंधेन विग्रहः।
गोमन्ते च श्रुतोऽस्माभिः क्षत्रियैः सह विग्रहः ॥ १२ ॥
'हमने यह भी सुना है कि समुद्रमे तिमि (पञ्चजन नामक मगरमच्छ) के साथ तुमलोगोंका युद्ध हुआ था। उसमें पञ्चजन मारा गया। तत्पश्चात् मथुरामें जरासंधके साथ बड़ा भारी युद्ध हुआ। इतना ही नहीं, हमारे सुननेमें यह भी आया है कि गोमन्तपर्वतके निकट क्षत्रियोंके साथ तुम लोगोंका घोर युद्ध हुआ था ॥ १२ ॥
दरदस्य वधश्चैव जरासंधपराजयः।
तत्रायुधावतरणं श्रुतं नः परमाहवे ॥ १३ ॥
'उस संग्राममे राजा दरदका वध हुआ और जरासंधकी पराजय हुई। सुना था कि उस महायुद्धमें तुम लोगोंके लिये आकाशसे दिव्य आयुध उतर आये थे ॥ १३ ॥
वधश्चैव शृगालस्य करवीरपुरोत्तमे।
तत्सुतस्याभिषेकश्च नागराणां च सान्त्वनम् ॥ १४ ॥
३८८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
‘इसके सिवा, उत्तम करवीरपुरमे राजा शृगालका वध करके उसके पुत्रका वहाँ अभिषेक किया गया और वहाँके नागरिकोंको तुम्हारी ओरसे सान्त्वना दी गयी ॥ १४॥
मधुरायां प्रवेशश्च कीर्तनीयः सुरोत्तमैः।
प्रतिष्ठिता च वसुधा पार्थिवाश्च वशीकृताः ॥ १५॥
‘फिर तुमलोगोंका मथुरामें प्रवेश हुआ, जो देवताओंके लिये कीर्तन करने योग्य है। पृथ्वीका भार उतारकर तुमने इसे भलीभाँति प्रतिष्ठित कर दिया और भूमण्डलके सभी नरेशोंको वशमें कर लिया ॥ १५ ॥
तत्र चागमनं दृष्ट्वा सभाग्याः स्म यथा पुरा।
तेन स्म परितुष्टा वै हृषिताश्च सबान्धवाः ॥ १६॥
‘तुम्हारा शुभागमन देखकर हम पूर्ववत् सौभाग्यशाली हो गये हैं। हमें सब तरहसे संतोष प्राप्त हुआ है और हम अपने बन्धु-बान्धवोंसहित हर्षसे उत्फुल्ल हो उठे हैं’॥ १६॥
प्रत्युवाच ततो रामः सर्वांस्तानभितः स्थितान्।
यादवेष्वपि सर्वेषु भवन्तो मम बान्धवाः ॥ १७॥
इहावयोर्गतं बाल्यमिह चैवावयो रतम्।
भवद्भिर्वर्द्धिताद्वैव यास्यामो विक्रियां कथम् ॥ १८॥
तब बलरामजीने अपने सब ओर खड़े हुए उन समस्त गोपोंसे कहा—‘समस्त यादवोंके होते हुए भी आपलोग ही हमारे सगे बान्धव हैं। यहीं हम लोगोंका बचपन बीता, यहीं हम खेले-कूदे और आप लोगोंने ही हमें पाल-पोषकर बड़ा किया; फिर हम आप लोगोंको भुला कैसे सकते हैं॥ १७-१८॥
गृहेषु भवतां भुक्तं गावश्च परिरक्षिताः।
अस्माकं बान्धवाः सर्वे भवन्तो वृद्धसौहृदाः ॥ १९॥
‘हमने आपके घरोंमें खाया-पीया और गौएँ चरायीं। आप सब लोग हममे अनुराग रखनेवाले हमारे बन्धु-बान्धव हैं’ ॥ १९॥
ब्रुवत्येवं यथातत्त्वं गोपमध्ये हलायुधे।
संहृष्टवदना भूयो बभूवुर्व्रजयोषितः ॥ २०॥
हल धारण करनेवाले बलरामजी जब इस प्रकार यथार्थ बात कह रहे थे, उस समय उनकी बातें सुनकर व्रजसुन्दरियोंके मुखपर पुनः प्रसन्नता छा गयी ॥ २० ॥
ततो वनान्तरगतो रेमे रामो महाबलः।
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ते रामाय विदितात्मने ॥ २१॥
गोपालैर्देशकालज्ञैरूपानीतं वारुणी।
सोऽपिबत् पाण्डुराभ्रामस्तत्कालं ज्ञातिभिर्वृतः॥२२॥
तदनन्तर, महाबली बलराम वनके भीतर जाकर सुखपूर्वक विचरने लगे। इसी समय उनके मनोभावको जानकर देश-कालके ज्ञाता गोपालगण उनके लिये वारुणी (सुधा या शहद) ले आये। फिर उन बन्धुजनोंसे घिरे हुए गौर-कान्ति बलरामने उस समय उसका पान किया ॥ २१-२२ ॥
वनान्तरगतो रामः पानं मदसमीरणम्।
उपनिन्युस्ततस्तस्मै वन्यानि विविधानि च ॥ २३॥
प्रत्यग्ररमणीयानि पुष्पाणि च फलानि च।
मेध्यांश्च विविधान् गन्धान् भक्ष्यांश्च हृदयंगमान्।
सद्यो हृतानि पद्मानि विकचान्युत्पलानि च ॥ २४॥
वनमें गये हुए बलरामजीने जो मद्य पीया था, वह कुछ नशा लानेवाला था; उसके पीनेके बाद ग्वाल-बाल उनके लिये वनके नाना प्रकारके पुष्प और फल ले आये, जो अभी नये (ताजे) होनेके कारण बड़े रमणीय लगते थे। इसके सिवा गोपोंने उनके लिये भाँति-भाँतिकी पवित्र गन्ध तथा मनोरम भक्ष्य पदार्थ प्रस्तुत किये। तुरंतके लाये हुए विकसित कमल और उत्पल भी भेंट किये ॥ २३-२४॥
शिरसा चारुकेशेन किंचिदावृत्तमौलिना।
श्रवणैकावलम्बेन कुण्डलेन विराजता ॥ २५॥
चन्दनाद्रेण पीतेन वनमालावलम्बिना।
विबभावुरसा रामः कैलासेनेव मन्दरः ॥ २६॥
बलरामजीके सिरके बाल बड़े मनोहर थे। उसपर रखा हुआ मुकुट कुछ टेढ़ा था। उनके एक कानमें सुन्दर कुण्डल लटक रहा था। वक्षःस्थल चन्दनके अनुलेपसे आर्द्र एवं पीत था, उसपर वनमाला लटक रही थी। ऐसे वक्षसे बलरामजीकी वैसी ही शोभा होती थी, जैसे कैलास पर्वतसे मन्दराचल सुशोभित होता है॥ २५-२६॥
नीले वसानो वसने प्रत्यग्रजलदप्रभे।
रराज वपुषा शुभ्रस्तिमिरेद्ये यथा शशी ॥ २७॥
उन्होंने नूतन जलधरके समान कान्तिवाले दो नीले वस्त्र धारण कर रखे थे और शरीरसे वे गोरे थे; अतः अन्धकार-राशिमें चन्द्रमाके समान सुशोभित होते थे ॥ २७॥
लाङ्गलेनावसिक्तेन भुजगाभोगवर्तिना।
तथा भुजाग्रश्लिष्टेन मुसलेन च भास्वता ॥ २८॥
उनके एक हाथमें सर्प-शरीरके समान हल शोभा पाता था और दूसरेमें प्रकाशमान मुसल ॥ २८ ॥
स मत्तो बलिनां श्रेष्ठो रराजाघूर्णित्ताननः।
शैशिरीषु त्रियामासु यथा स्वेदालसः शशी ॥ २९॥
बलवानोंमे श्रेष्ठ बलरामजी मधुसे मत्त-से हो रहे थे। उनका मुख झूम रहा था। वे ऐसे लगते थे, मानो शरद्की रातोंमे स्वेद-बिन्दुओंसे युक्त अलसाये हुए चन्द्रमा शोभा पाते हों ॥ २९ ॥
रामस्तु यमुनामाह स्नातुमिच्छे महानदि।
एहि मामभिगच्छ त्वं रूपिणी सागरंगमे ॥ ३०॥
विष्णुपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ३८९
उस समय बलरामजीने यमुनासे कहा—'महानदि ! मैं स्नान करना चाहता हूँ। सागरगामिनि ! मूर्तिमती होकर आओ, चलो मेरे साथ' ॥ ३० ॥
संकर्षणस्य मत्तोक्तां भारतीं परिभूय सा । नाभ्यवर्तत तं देशं स्त्रीस्वभावेन मोहिता ॥ ३१ ॥
संकर्षणकी बातको मतवालेकी बहक समझकर नारी-स्वभावसे मोहित हुई उस नदीने उसकी अवहेलना कर दी। वह उनके अभीष्ट स्थानको नहीं गयी ॥ ३१ ॥
ततश्चुक्रोध बलवान् रामो मदसमीरितः । चकार स हलं हस्ते कर्षणाधोमुखं बली ॥ ३२ ॥
तब बलवान् बलराम मदसे प्रेरित हो कुपित हो उठे। उन्होंने यमुनाका कर्षण करनेके लिये हलका मुख नीचेको कर लिया ॥ ३२ ॥
तस्यामुपरि मेदिन्यां पेतुस्तामरसस्रजः । मुमुचुः पुष्पकोशैश्च वासरेण्वरुणं जलम् ॥ ३३ ॥
यमुनाको खींचते समय उनके गलेसे जो कमल-पुष्पकी मालाएँ टूटकर पृथ्वीपर गिरीं, वे पुष्प-कोशोंद्वारा सुगन्धित परागसे अरुण रंगका जल छोड़ने लगीं ॥ ३३ ॥
स हलेनानताग्रेण कूले गृह्य महानदीम् । चकर्ष यमुनां रामो व्युत्थितां वनितामिव ॥ ३४ ॥
जिसका अग्रभाग कुछ झुका हुआ था, उस हलको यमुनाके तटसे लगाकर स्वेच्छाचारिणी वनिताके समान उस महानदीको अभीष्ट दिशाकी ओर खींचा ॥ ३४ ॥
सा विह्वलजलस्रोता ह्रदप्रस्थितसंचया । व्यावर्तत नदी भीता हलमार्गानुसारिणी ॥ ३५ ॥
उसका जल-स्रोत क्षुब्ध हो उठा। कुण्डोंमें जो अगाध जलराशिका संचय था, वह वहाँसे निकलने लगा और वह नदी भयभीत-सी होकर हलके बनाये हुए मार्गसे चलने लगी ॥
लाङ्गलादिष्टवर्त्मा सा वेगगा वक्रगामिनी । संकर्षणभयत्रस्ता योषेवाकुलतां गता ॥ ३६ ॥
हलकी रेखा ही उसे गन्तव्य मार्गका आदेश दे रही थी। सीधे मार्गपर वेगसे बहनेवाली वह नदी टेढ़े रास्तेपर मन्थर गतिसे चलने लगी। वह संकर्षणके भयसे त्रस्त हुई किसी युवतीकी भाँति व्याकुल हो उठी थी ॥ ३६ ॥
पुलिनश्रोणिविम्बोष्ठी मृदितैस्तोयताडितैः । फेनमेखलसूत्रैश्च च्छिन्नैरम्बुदगामिनी ॥ ३७ ॥
दोनों किनारे ही उसके नितम्ब थे, रक्तकमलोंका समूह ही उसके अरुण अधरोंका प्रतीक था। फेन ही उसके मेखला-सूत्र थे, जो जलसे ताड़ित और मर्दित होकर छिन्न-भिन्न हो गये थे; वह नदीरूपिणी युवती समुद्ररूपी प्रियतमके साथ समागम करनेवाली थी ॥ ३७ ॥
तरङ्गविषमापीडा चक्रवाकोन्नतस्तनी । वेगगम्भीरवक्राङ्गी त्रस्तमीनविभूषणा ॥ ३८ ॥
उसके तरङ्गरूपी शिरोभूषण ऊँचे-नीचे हो रहे थे; चक्रवाकरूपी स्तन ऊँचे उठे हुए थे; उसके गम्भीर अंग वेगके कारण वक्र हो रहे थे; वह त्रस्त मीनरूपी आभूषणोंसे विभूषित थी ॥ ३८ ॥
सितहंसेक्षणापाङ्गी काशक्षौमोच्छ्रिताम्बरा । तीरजोधूतकेशान्ता जलस्खलितगामिनी ॥ ३९ ॥
श्वेत हंस उसके नेत्र और अपाङ्ग थे, काश-पुष्प उसके फहराते हुए रेशमी वस्त्र थे, तटवर्ती पौधे या वृक्ष उसके केश थे तथा जलका प्रवाह ही उसकी स्खलित गतिका प्रतीक था॥
लाङ्गलोल्लिखितापाङ्गी क्षुभिता सागरंगमा । मत्तेव कुटिला नारी राजमार्गेण गच्छती ॥ ४० ॥
उसके नेत्र-प्रान्त मानो हलकी नोकसे छिल गये थे, वह सागरगामिनी क्षुब्ध हो उठी थी, वह कुटिला एवं मतवाली स्त्रीके समान खुली सड़कपर चल रही थी ॥ ४० ॥
कृष्यते सातिवेगेन स्रोतःस्खलितगामिनी । उन्मार्गानीतमार्गा सा येन वृन्दावनं वनम् ॥ ४१ ॥
ऊँचे-नीचे प्रवाह ही उसकी स्खलित गतिके सूचक थे। वह उस विपरीत मार्गपर लायी गयी थी, जिस ओर वृन्दावन सुशोभित होता था ॥ ४१ ॥
वृन्दावनस्य मध्येन सा नीता यमुना नदी । रोरूयमाणेव खगैरन्विता तोयवासिभिः ॥ ४२ ॥
यमुना नदी वृन्दावनके बीचसे लायी गयी थी। जलमें निवास करनेवाले पक्षी उसके साथ-साथ बोलते हुए आ रहे थे। उन पक्षियोंके शब्दोंमें मानो वह नदी ही जोर-जोरसे रो रही थी ॥ ४२ ॥
सा यदा समतिक्रान्ता नदी वृन्दावनं वनम् । तदा स्त्रीरूपिणी भूत्वा यमुना राममब्रवीत् ॥ ४३ ॥
वह नदी जब वृन्दावनको लाँघ गयी, तब स्त्रीरूपमें प्रकट हो बलरामजीसे बोली—॥ ४३ ॥
प्रसीद नाथ भीतास्मि प्रतिलोमेन कर्मणा । विपरीतमिदं रूपं तोयं च मम जायते ॥ ४४ ॥
'नाथ ! प्रसन्न होइये। मैं आपके इस विपरीत कर्मसे बहुत डर गयी हूँ। मेरा यह रूप और जल विपरीत हो गया है ॥ ४४ ॥
असत्यहं नदीमध्ये रौहिणेय त्वया कृता । कर्षणेन महाबाहो स्वमार्गाव्यभिचारिणी ॥ ४५ ॥
१. नेत्रके अन्तभाग।
| ३९० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
'रोहिणीनन्दन ! महाबाहो ! आपने इस तरह मुझे खींचकर नदियोंके बीचमें 'असती' बना दिया। मुझे मेरे मार्गसे भ्रष्ट कर दिया ॥ ४५ ॥
प्राप्तां मां सागरे पूर्वं सपत्न्यो वेगगर्विताः।
फेनहासैर्हसिष्यन्ति तोयव्यावृत्तगामिनीम् ॥ ४६॥
'जब मैं समुद्रके निकट जाऊँगी, उस समय मेरी सौतें वेगसे गर्वित होकर अपने फेनरूपी हासोंद्वारा मेरी हँसी उड़ायेंगी, मुझे जलके द्वारा विपरीतगामिनी बतायेंगी ॥४६॥
प्रसादं कुरु मे वीर याचे त्वां कृष्णपूर्वज ।
सुप्रसन्नमना नित्यं भव त्वं सुरसत्तम ॥ ४७ ॥
'श्रीकृष्णके बड़े भैया वीर सुरश्रेष्ठ ! आप मुझपर कृपा करें। मैं आपसे याचना करती हूँ, आप मुझपर सदा प्रसन्न-चित्त रहें ॥ ४७ ॥
कर्षणायुधकृष्टास्मि रोषोऽयं विनिवर्त्यताम् ।
मूर्ध्ना गच्छामि चरणौ तवैषा लाङ्गलायुध ।
मार्गमादिष्टुमिच्छामि क्व गच्छामि महाभुज ॥ ४८ ॥
'हलायुध ! मैं आपके कर्षणायुध (हल) से यहाँतक खींच लायी गयी हूँ। आप अपने इस रोषको लौटा लें। मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखती हूँ। महाबाहो ! मुझे राह बताइये, मैं कहाँ जाऊँ ?' ॥ ४८ ॥
वैशम्पायन उवाच
प्रणयावनतां दृष्ट्वा यमुनां लाङ्गलायुधः।
प्रत्युवाचार्णववधूं मदक्लान्त इदं वचः ॥ ४९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! समुद्र-पत्नी यमुनाको प्रेमसे नतमस्तक हुई देख मधुके मदसे क्लान्त हुए बलरामजीने यह बात कही ॥ ४९ ॥
लाङ्गलादिष्टमार्गा त्वमिमं मे प्रियदर्शने।
देशमम्बुप्रदानेन प्लावयस्वाखिलं शुभे ॥ ५० ॥
'शुभे ! प्रियदर्शने ! मैंने हलके द्वारा तुम्हारे जानेके लिये मार्ग बता दिया है, तुम इस सारे प्रदेशको अपना जल देकर आप्लावित कर दो ॥ ५० ॥
एष ते सुभ्रु संदेशः कथितः सागरंगमे ।
शान्तिं व्रज महाभागे गम्यतां च यथासुखम् ॥ ५१ ॥
यावत् स्थास्यति लोकोऽयं तावत् तिष्ठतु मे यशः।
'सुभ्रू ! सागरगामिनी महाभागे ! यह तुम्हारे लिये सन्देश कहा गया है। शान्ति धारण करो और जहाँ तुम्हारी मौज हो चली जाओ। जबतक यह संसार रहेगा, तबतक मेरा यह सुयश भी बना रहेगा' ॥ ५१ १/२ ॥
यमुनाकर्षणं दृष्ट्वा सर्वे ते व्रजवासिनः ॥ ५२ ॥
साधु साध्विति रामाय प्रणामं चक्रिरे तदा ।
यमुनाजीका आकर्षण हुआ देख समस्त व्रजवासियोंने उस समय साधु ! साधु !! (वाह-वाह) कहकर बलरामजीको प्रणाम किया ॥ ५२ १/२ ॥
तां विसृज्य महाभागां तांश्च सर्वान् व्रजौकसः॥ ५३ ॥
ततः संचिन्त्य मनसा रामः प्रहरतां वरः।
पुनः प्रतिजगामाशु मथुरां रोहिणीसुतः ॥ ५४ ॥
महाभागा यमुना तथा उन समस्त व्रजवासियोंको विदा करके प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ रोहिणीपुत्र बलरामजीने मन-ही-मन कुछ सोचकर पुनः शीघ्र ही मथुराको प्रस्थान किया॥
स गत्वा मथुरां रामो भवने मधुसूदनम् ।
परिवर्तमानं ददृशे पृथिव्याः सारमव्ययम् ॥ ५५ ॥
मथुरा पहुँचकर बलरामने पृथ्वीके सारभूत अविनाशी मधुसूदनको भवनके भीतर शय्यापर करवट बदलते देखा ॥
तथैवाध्वन्यवेषेण सोपदिङ्गे जनार्दनम् ।
प्रत्यग्रवनमालेन वक्षसाभिविराजता ॥ ५६ ॥
तब उसी राहगीरके वेषमें बलरामने नूतन वनमालासे विभूषित सुन्दर वक्षःस्थलद्वारा भगवान् जनार्दनका आलिङ्गन किया ॥ ५६ ॥
स दृष्ट्वा तूर्णमायान्तं रामं लाङ्गलधारिणम् ।
सहसोत्थाय गोविन्दो ददावासनमुत्तमम् ॥ ५७ ॥
लाङ्गलधारी बलरामको शीघ्रतापूर्वक आते देख गोविन्दने सहसा उठकर उनके लिये उत्तम आसन दिया ॥ ५७ ॥
उपविष्टं तदा रामं पप्रच्छ कुशलं व्रजे ।
बान्धवेषु च सर्वेषु गोषु चैव जनार्दनः ॥ ५८ ॥
जब बलरामजी बैठ गये, तब श्रीकृष्णने उनसे व्रजकी कुशल पूछी। समस्त बान्धवों तथा गौओंके विषयमें भी जिज्ञासा की ॥ ५८ ॥
प्रत्युवाच ततो रामो भ्रातरं साधुभाषिणम् ।
सर्वत्र कुशलं कृष्ण येषां कुशलमिच्छसि ॥ ५९ ॥
तब बलरामने उत्तम भाषण करनेवाले भाई श्रीकृष्णको इस प्रकार उत्तर दिया, 'श्रीकृष्ण ! तुम जिनकी कुशल चाहते हो, उनकी सर्वत्र कुशल है' ॥ ५९ ॥
ततस्तयोर्विचित्रार्थाः पौराण्योऽत्राभवन् कथाः।
वसुदेवाग्रतः पुण्या रामकेशवयोस्र्तदा ॥ ६० ॥
तदनन्तर वसुदेवजीके आगे बलराम और श्रीकृष्णकी विचित्र अर्थसे युक्त पवित्र एवं पुरातन कथाएँ होने लगीं ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि यमुनाकर्षणे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बलरामजीके द्वारा यमुनाजीका आकर्षणविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥
विष्णुपर्व ] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ३९१ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः श्रीकृष्णका यादवोंके साथ रुक्मिणी-स्वयंवरके अवसरपर कुण्डिनपुरमें जाना तथा राजा कैशिकद्वारा उनका सत्कार . वैशम्पायन उवाच एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता लोकप्रवृत्तिका नराः । चक्रायुधगृहं सर्वे लोकपालगृहोपमम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! इसी बीचमें जगत्में होनेवाली प्रवृत्तियों अथवा घटनाओंकी सूचना देने- वाले सब लोग मथुरामें आये और लोकपालोंके भवनकी भाँति शोभा पानेवाले चक्रधारी श्रीकृष्णके गृहमें एकत्र हुए ॥ १ ॥ तेष्वात्ययिकशंसीषु लोकप्रवृत्तिकेष्विह । कृतसंज्ञा यदुश्रेष्ठाः समेताः कृष्णसंसदि ॥ २ ॥ वे लोग विनाशकारी युद्धका समाचार बताना चाहते थे। उनके आ जानेपर आपसका संकेत पाकर समस्त श्रेष्ठ यादव श्रीकृष्णकी सभामें जुट गये ॥ २ ॥ समागतेषु सर्वेषु यदुमुख्येषु संसदि । प्रवृत्तिका नराः प्राहुः पार्थिवात्ययिकं वचः ॥ ३ ॥ समस्त प्रधान यादवोंके उस सभामे आ जानेपर वे समाचार या सन्देश लानेवाले मनुष्य राजाओंके विनाशका कारणभूत वचन इस प्रकार बोले-॥ ३ ॥ जनार्दन नरेन्द्राणां पार्थिवानां समागमः । भविष्यति क्षितीशानां समृद्धानामनेकशः ॥ ४ ॥ 'जनार्दन ! अनेक देशोंके विवाहार्थी पृथ्वीपतियों, शासकों एवं नरेशोंका समागम होनेवाला है ॥ ४ ॥ त्वरितास्तत्र गच्छन्ति नानाजनपदेश्वराः । कुण्डिने पुण्डरीकाक्ष भोजपुत्रस्य शासनात् ॥ ५ ॥ 'कमलनयन ! भोजपुत्र रुक्मीका निमन्त्रण पाकर अनेक जनपदोंके राजा बड़ी उतावलीके साथ वहाँ कुण्डिनपुरमें जा रहे हैं ॥ ५ ॥ प्रकाशं सा कथास्तत्र श्रूयन्ते मनुजेरिताः । रुक्मिणी किल नामास्ति रुक्मिणः प्रथमा स्वसा ॥ ६ ॥ भावी स्वयंवरस्तत्र तस्याः किल जनार्दन । इत्यर्थमेते सबला गच्छन्ति मनुजाधिपाः ॥ ७ ॥ 'जनार्दन ! वहाँ लोगोंके मुँहसे यह बात स्पष्टरूपसे सुनी जाती है कि रुक्मीकी जो पहली बहन है, जिसका नाम रुक्मिणी है, उसका वहाँ स्वयंवर होनेवाला है। इसीलिये ये नरेशगण सेनाओंसहित वहाँ पधार रहे हैं ॥ ६-७ ॥ तस्यास्त्रैलोक्यसुन्दर्यास्तृतीयेऽहनि यादव । रुक्मभूषणभूषिण्या भविष्यति स्वयंवरः ॥ ८ ॥ 'यदुनन्दन ! आजसे तीसरे दिन सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित रहनेवाली उस त्रिलोकसुन्दरी रुक्मिणीका स्वयंवर होगा ॥ ८ ॥ राज्ञां तत्र समेतानां हस्त्यश्वरथगामिनाम् । द्रक्ष्यामः शतशस्तत्र शिबिराणि महात्मनाम् ॥ ९ ॥ 'हाथी, घोड़े और रथसे यात्रा करके वहाँ एकत्र हुए महामनस्वी नरेशोंके सैकड़ों शिविर हमें वहाँ देखनेको मिलेंगे। सिंहशार्दूलदृप्तानां मत्तद्विरदगामिनाम् । सदा युद्धप्रियाणां हि परस्परममर्षिणाम् ॥ १० ॥ जयाय शीघ्रं सहिता बलौघेन समन्विताः । निरुद्धाः पृथिवीपालाः किमेकान्तचरा वयम् । निरुत्साहा भविष्यामो गच्छामो यदुनन्दन ॥ ११ ॥ 'जो सिंह और बाघके समान अपने बलके घमण्डमें भरे रहते हैं, मतवाले हाथियोंके समान चलते हैं, सदा युद्धसे ही प्रेम रखते हैं और आपसमें एक दूसरेके प्रति अमर्षसे भरे रहते हैं, ऐसे नरेशोंपर शीघ्र विजय पानेके लिये बहुत-से भूपाल अपने सैन्यसमूहके साथ संगठित होकर वहाँ रुक्मिणी- को पानेकी इच्छासे रुके हुए हैं। यदुनन्दन ! क्या हमलोग एकान्तमे रहनेवाले कोल-भील हैं, जो ऐसे अवसरपर उत्साह- हीन हो बैठे रहेंगे, हम भी अवश्य उत्साहपूर्वक वहाँ चलेंगे' ॥ श्रुत्वैतत् केशवो वाक्यं हृदि शल्यमिवार्पितम् । निर्जगाम यदुश्रेष्ठो यदूनां संहितो बलैः ॥ १२ ॥ यह समाचार सुनकर श्रीकृष्णको ऐसा लगा, जैसे उनके हृदयमें किसीने काँटा-सा चुभो दिया हो। वे यदुश्रेष्ठ गोविन्द यदुवंशियोंकी सेनाके साथ नगरसे बाहर निकले ॥ १२ ॥ यादवास्ते बलोदग्राः सर्वे संग्रामलालसाः । निर्ययुः स्यन्दनवरैर्गर्वितास्त्रिदशा इव ॥ १३ ॥ वे समस्त यादव, जो बलमें बढ़े-चढ़े थे और संग्रामकी लालसा रखते थे, श्रेष्ठ रथोंद्वारा यात्राके लिये निकले। उस समय वे गर्वीले देवताओंके समान जान पड़ते थे ॥ १३ ॥ बलाग्रेण नियुक्तेन हरिरीशानसम्मतः । चक्रोद्यतकरः कृष्णे गदापाणिर्व्यरोचत ॥ १४ ॥ अपनी आज्ञाके अनुसार चलनेवाली श्रेष्ठ सेनाके साथ यात्राके लिये उद्यत हुए भगवान् श्रीकृष्ण, जो शिवजीके परम प्रिय हैं, एक हाथमें चक्र और दूसरेमें गदा लिये बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ १४ ॥
| ३९२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
यादवाश्चापरे तत्र वासुदेवानुयायिनः ।
रथैरादित्यसंकाशैः किङ्किणीप्रतिनादितैः ॥ १५ ॥
दूसरे यादव भी सूर्यके समान तेजस्वी तथा छोटी-छोटी घण्टियोंके नादसे निनादित रथोंद्वारा भगवान् वासुदेवके पीछे-पीछे वहाँ जानेको उद्यत हुए ॥ १५ ॥
उग्रसेनं तु गोविन्दः प्राह निश्चितदर्शनः ।
तिष्ठ त्वं नृपशार्दूल भ्रात्रा मे सहितोऽनघ ॥ १६ ॥
उस समय निश्चित दृष्टि रखनेवाले भगवान् गोविन्दने राजा उग्रसेनसे कहा— 'अनघ ! नृपश्रेष्ठ ! आप मेरे बड़े भाई बलरामजीके साथ यहीं रहिये ॥ १६ ॥
क्षत्रिया विकृतिप्रज्ञाः शास्त्रनिश्चितदर्शनाः ।
पुरीं शून्यामिमां वीर जघन्येऽभिपतन्ति ह ॥ १७ ॥
'वीर ! प्रायः क्षत्रिय छल-कपटमे चतुर होते हैं, उनकी दृष्टि राजनीतिक ही सीमित रहती है । कहीं ऐसा न हो कि वे मेरे जानेके पश्चात् इस पुरीको सूनी समझकर इसपर आक्रमण कर दें ॥ १७ ॥
अस्माकं शङ्किताः सर्वे जरासंधवशानुगाः ।
मोदन्ते सुखिनस्तत्र देवलोके यथामराः ॥ १८ ॥
'हमसे शङ्कित हो वे सब-के सब जरासंधके वशवर्ती हो गये हैं और देवलोकमे निवास करनेवाले देवताओंकी भाँति वे जरासंधके यहाँ बड़े सुख और आनन्दसे रहते हैं' ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भोजराजो महायशाः ।
कृष्णस्नेहेन विक्लुतं बभाषे वचनामृतम् ॥ १९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीकृष्णकी वह बात सुनकर महायशस्वी भोजराज उग्रसेन उनके स्नेहसे गद्गद हुई अमृतमयी वाणीमें बोले ॥ १९ ॥
कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां नन्दिवर्द्धन ।
श्रूयतां यदहं त्वद्य वक्ष्यामि रिपुसूदन ॥ २० ॥
'कृष्ण ! कृष्ण !! महाबाहो !!! तुम यादवोंका आनन्द बढ़ानेवाले हो। शत्रुसूदन ! इस समय मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसको सुनो ॥ २० ॥
त्वया विहीनाः सर्वे स्म न शक्ताः सुखमासितुम् ।
पुरेऽस्मिन् विषयान्ते वा पतिहीना इव स्त्रियः ॥ २१ ॥
'तुम्हारे बिना हम सब लोग इस नगर या राज्यमे सुखसे नहीं रह सकते, ठीक उसी तरह जैसे पतिहीन स्त्रियाँ कहीं भी सुखसे नहीं रह पाती हैं ॥ २१ ॥
त्वत्सनाथा वयं तात त्वद्बाहुबलमाश्रिताः ।
विभीमो न नरेन्द्राणां सेन्द्राणामपि मानद ॥ २२ ॥
'दूसरोंको मान देनेवाले तात ! तुमसे ही हमलोग सनाथ हैं। तुम्हारे बाहुबलका आश्रय लेकर हम नरेन्द्रोंकी तो बात ही क्या है ? देवेन्द्रसहित देवताओंसे भी नहीं डरते हैं ॥ २२ ॥
विजयाय यदुश्रेष्ठ यत्र यत्र गमिष्यसि ।
तत्र त्वं सहितोऽस्माभिर्गच्छेथा यादवर्षभ ॥ २३ ॥
'यदुश्रेष्ठ ! यादवप्रवर ! तुम विजयके लिये जहाँ-जहाँ भी जाओ, वहाँ हम लोगोंके साथ ही चलो' ॥ २३ ॥
तस्य राज्ञो वचः श्रुत्वा सस्मितं देवकीसुतः ।
यथेष्टं भवतामद्य तथा कर्तास्म्यसंशयम् ॥ २४ ॥
राजा उग्रसेनका यह वचन सुनकर देवकीनन्दन श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए बोले, 'महाराज ! आप लोगोंकी जैसी इच्छा होगी, वैसा ही मैं करूँगा इसमें संशय नहीं है' ॥ २४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु वै कृष्णो जगामाशु रथेन वै ।
भीष्मकस्य गृहं प्राप्तो लोहितायति भास्करे ॥ २५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर श्रीकृष्ण शीघ्र ही रथसे चल दिये और सूर्यका रंग लाल होते राजा भीष्मकके घरपर जा पहुँचे ॥ २५ ॥
प्राप्ते राजसमाजे तु शिविराकीर्णभूतले ।
रङ्गं सुविपुलं दृष्ट्वा राजसीं तनुमाविशत् ॥ २६ ॥
राजाओंका समाज आ चुका था । उनके शिविरोंसे कुण्डिनपुरके आस-पासका भूभाग आच्छादित हो गया था । स्वयंवरका रङ्गमथल भी बहुत विस्तृत था । उसे देखकर भगवान् श्रीकृष्णने राजस प्रकृतिका आश्रय लिया ॥ २६ ॥
वित्रासनार्थं भूपानां प्रकाशार्थं पुरातनम् ।
मनसा चिन्तयामास वैनतेयं महाबलम् ॥ २७ ॥
उन्होंने राजाओंको डराने और अपने प्रभावको प्रकाशित करनेके लिये पुरातन वाहन महाबली विनतानन्दन गरुड़का मन-ही-मन चिन्तन किया ॥ २७ ॥
ततश्चिन्तितमात्रस्तु विदित्वा विनतात्मजः ।
सुखलक्ष्यं वपुः कृत्वा निलिल्ये केशवान्तिके ॥ २८ ॥
उनके चिन्तन करनेमात्रसे ही उनके मनोभावको जान-कर विनताकुमार गरुड़ सुखपूर्वक देखने योग्य सौम्य शरीर धारण करके श्रीकृष्णके पास छिपे हुए आये ॥ २८ ॥
तस्य पक्षनिपातेन पवनोद्ध्रान्तकारिणा ।
कम्पिता मनुजाः सर्वे न्युब्जाश्च पतिता भुवि ॥ २९ ॥
उनका पंखसंचालन वायुको भी उद्भ्रान्त कर देनेवाला था । इसकी हवा लगनेसे वहाँके सारे मनुष्य काँप उठे और औंधे होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २९ ॥
गरुडाभिहताः सर्वे प्रचेष्टन्तो यथोरगाः ।
तान् संनिपतितान् दृष्ट्वा कृष्णो गिरिरिवाचलः ॥ ३० ॥
विष्णुपर्व ] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ३९३
स तदा पक्षवातेन मेने पतगसत्तमम्।
गरुडके वेगसे आहत होकर पृथ्वीपर गिरे हुए वे सारे मनुष्य सर्पोंके समान छटपटाने लगे। उन सबको गिरा हुआ देख पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हुए श्रीकृष्णने उस समय पङ्खकी हवासे ही यह अनुमान कर लिया कि पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ आ गये ।(फिर उन्होंने मन-ही-मन उनका आदर किया) ॥ ३०१/२ ॥
ददर्श गरुडं प्राप्तं दिव्यस्रगनुलेपनम् ॥ ३१ ॥
पक्षवातेन पृथिवीं चालयन्तं मुहुर्मुहुः।
थोड़ी देरमें ही उन्होंने देखा, गरुड़ आ पहुँचे। वे दिव्य पुष्पोंके हार और दिव्य चन्दनसे अलंकृत थे। वे अपने पंखोंके संचालनसे उठी हुई वायुके द्वारा पृथ्वीको भी वारंवार हिला देते थे ॥ ३११/२ ॥
पृष्ठासक्तैः प्रहरणैर्लेलिहन्तमिवोरगैः ॥ ३२ ॥
वैष्णवं हस्तसंश्लेपं मन्यमानमवाङ्मुखम् ।
उनके पृष्ठभागमें कुछ दिव्य आयुध सटे हुए थे, जिनसे ऐसा जान पड़ता था कि कुछ सर्प उन्हें चाट रहे हैं। वे मुँह नीचे किये मन-ही-मन अनुभव कर रहे थे कि मुझे भगवान् विष्णुके वरद हस्तका स्पर्श प्राप्त हो रहा है॥३२१/२॥
चरणाभ्यां प्रकर्षन्तं पाण्डुरं भोगिनां वरम् ॥ ३३ ॥
हेमपत्रैरुपचितं धातुमन्तमिवाचलम्।
गरुड़ अपने दोनों पंजोंसे एक विशाल सर्पको खींचे चले आ रहे थे, जिसका रंग श्वेत था। वे सुवर्णमय पंखोंसे सम्पन्न होनेके कारण विविध धातुओंसे युक्त पर्वतके समान प्रतीत होते थे ॥ ३३१/२ ॥
अमृतारम्भहर्तारं द्विजिह्वेन्द्रविनाशनम् ॥ ३४ ॥
त्रासनं दैत्यसंघानां वाहनं ध्वजलक्षणम्।
ये वे ही गरुड़ थे, जिन्होंने एक बार अमृतका अपहरण कर लिया था। वे बड़े-बड़े सर्पराजोंका विनाश करनेमें समर्थ, दैत्यसमूहोंको भयभीत करनेवाले तथा भगवान् विष्णुके ध्वजचिह्न एवं वाहन थे ॥ ३४१/२ ॥
तं दृष्ट्वा स ध्वजं प्राप्तं सचिवं साम्परायिकम् ॥ ३५ ॥
धृतिमन्तं गरुत्मन्तं जगाद मधुसूदनः।
दृष्ट्वा परमसंरूहृष्टः स्थितं देवमिवापरम्।
तुल्यसामर्थ्यया वाचा गरुत्मन्तमवस्थितम् ॥ ३६ ॥
अपने ध्वज, सचिव तथा संकटकालके साथी धैर्यवान् गरुड़को आया देख भगवान् मधुसूदनको बड़ा हर्ष हुआ। वे दूसरे देवताकी भाँति सामने खड़े थे। इस प्रकार सम्मुख उपस्थित हुए गरुड़से अपने समान शक्तिशालीनी वाणीद्वारा मधुसूदनने इस प्रकार कहा ॥ ३५-३६ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
स्वागतं खेचरश्रेष्ठ सुरसेनारिमर्दन ।
विनताहृदयानन्द स्वागतं केशवप्रिय ॥ ३७ ॥
**श्रीकृष्ण बोले—**आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ ! तुम्हारा स्वागत है। देवसेनाके शत्रुओंका मर्दन करनेवाले केशवप्रिय विनतानन्दन ! तुम्हारा स्वागत है ॥ ३७ ॥
व्रज पत्ररथश्रेष्ठ कैशिकस्य निवेशनम् ।
वयं तत्रैव गत्वाद्य प्रतीक्षाम स्वयंवरम् ॥ ३८ ॥
पंख ही जिनका रथ है, उन पक्षियोंमें सबसे श्रेष्ठ गरुड़ ! तुम राजा कैशिकके भवनमे चलो। हम आज वहीं चलकर स्वयंवरकी प्रतीक्षा करें ॥ ३८ ॥
राज्ञां तत्र समेतानां हस्त्यश्वरथगामिनाम्।
द्रक्ष्यामः शतशस्तत्र समेतानां महात्मनाम् ॥ ३९ ॥
वहाँ हाथी, घोड़े और रथोंद्वारा यात्रा करनेवाले सैकड़ों महामनस्वी नरेश एकत्र हुए हैं, जिनका हमें दर्शन प्राप्त होगा ॥ ३९ ॥
एवमुक्त्वा महाबाहुर्वैनतेयं महाबलम् ।
जगामाथ पुरीं कृष्णः कैशिकस्य महात्मनः ॥ ४० ॥
वैनतेयसखः श्रीमान् यादवैश्च महारथैः।
महाबली विनतानन्दन गरुड़से ऐसा कहकर महाबाहु श्रीमान् कृष्ण गरुड़ तथा महारथी यादवोंके साथ महामना कैशिककी राजधानी कुण्डिनपुरमें गये ॥ ४०१/२ ॥
विदर्भनगरीं प्राप्ते कृष्णे देवकिनन्दने ॥ ४१ ॥
हृष्टाः प्रमुदिताः सर्वे निवासायोपचक्रमुः ।
सर्वे शस्त्रास्त्रायुधधरा राजानो बलशालिनः ॥ ४२ ॥
देवकीनन्दन श्रीकृष्णके विदर्भनगरमें पहुँच जानेपर उनके साथके सब लोग बड़े प्रसन्न हुए । सबके मनमे बड़ा हर्ष हुआ। वे समस्त बलशाली तथा अस्त्र-शस्त्रधारी राजपूत वहाँ ठहरनेकी तैयारी करने लगे ॥ ४१-४२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु राजा नयविशारदः ।
कैशिकस्तत उत्थाय प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ४३ ॥
अर्घ्यमाचमनं दत्त्वा स राजा कैशिकः स्वयम्।
सत्कृत्य विधिवत् कृष्णं स्वपुरं सम्प्रवेशयत् ॥ ४४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! इसी समय नीतिविशारद राजा कैशिक प्रसन्नचित्तसे उठकर स्वयं ही श्रीकृष्णके पास गये और उन्हें अर्घ्य, आचमन आदि देकर विधिपूर्वक सत्कार करके अपने नगरमें ले आये ॥ ४३-४४॥
पूर्वमेव तु कृष्णाय कारितं दिव्यमन्दिरम्।
१. ये राजा कैशिक विदर्भराज भीष्मकके पिता तथा रुक्मीके पितामह थे।
| ३९४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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विवेश सबलः श्रीमान् कैलासं शंकरो यथा ॥ ४५ ॥
उन्होंने श्रीकृष्णके लिये पहलेसे ही एक दिव्य भवनका निर्माण करा रखा था। जैसे भगवान् शंकर कैलासधाममें जाते हैं, उसी प्रकार श्रीमान् कृष्णने अपनी सेनाके साथ कैशिकके उस भवनमें प्रवेश किया ॥ ४५ ॥
सुखेन उषितः कृष्णस्तस्य राज्ञो निवेशने ।
पूजितो बहुमानेन स्नेहपूर्णेन चेतसा ॥ ४६ ॥
इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्ण उस राजमहलमें खान-पान आदिसे एवं रत्न-राशियोंद्वारा भलीभाँति पूजित हो सुखपूर्वक रहने लगे। राजा कैशिकने बड़े ही सम्मानके साथ स्नेहपूर्ण हृदयसे उनका पूजन किया था ॥ ४६ ॥
खाद्यपानादिरत्नौघैरर्चितो वासवानुजः ।
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिणीस्वयंवरो सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीस्वयंवरविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः
श्रीकृष्णके आगमनसे चिन्तित हुए राजाओंकी सभामें जरासंध और सुनीथका भाषण
वैशम्पायन उवाच
ते कृष्णमागतं दृष्ट्वा वैनतेयसहाच्युतम् ।
बभूवुश्चिन्ताव्यग्रिणः सर्वे नृपतिसत्तमाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले श्रीकृष्णको गरुड़के साथ आया देख सभी श्रेष्ठ नरपति चिन्तामग्न हो गये ॥ १ ॥
ते समेत्य सभां राजन् राजानो भीमविक्रमाः ।
मन्त्राय मन्त्रकुशला नीतिशास्त्रार्थवित्तमाः ॥ २ ॥
राजन् ! वे भयानक पराक्रमी राजा नीति-शास्त्रके भी अच्छे ज्ञाता तथा मन्त्रणा करनेमें कुशल थे। उन्होंने परस्पर मन्त्रणा करनेके लिये एक सभामें एकत्र होनेका विचार किया ॥ २ ॥
भीष्मकस्य सभां गत्वा रम्यां हेमपरिष्कृताम् ।
सिंहासनेषु चित्रेषु विचित्रास्तरणेषु च ।
निपेदुस्ते नृपवरा देवा देवसभामिव ॥ ३ ॥
फिर जैसे देवता देवसभामें विराजमान होते हैं, उसी प्रकार वे श्रेष्ठ नरेशगण राजा भीष्मककी सुवर्णभूषित रमणीय सभामें जाकर विचित्र बिछौनोंसे युक्त भाँति-भाँतिके सिंहासनोंपर बैठे ॥ ३ ॥
तेषां मध्ये महाबाहुर्जरासंधो महाबलः ।
बभाषे स महातेजा देवान् देवेश्वरो यथा ॥ ४ ॥
उनके बीचमें महाबली, महातेजस्वी और महाबाहु जरासंधने उसी तरह भाषण देना आरम्भ किया, जैसे देवराज इन्द्र देवताओंके समक्ष प्रवचन करते हैं ॥ ४ ॥
जरासंध उवाच
श्रूयतां भो नृपश्रेष्ठा भीष्मकश्च महामतिः ।
कथ्यमानं मया बुद्ध्या वचनं वदतां वराः ॥ ५ ॥
जरासंध बोला—इस सभामें उपस्थित हुए वक्ताओंमें श्रेष्ठ नरेशो ! मैं यहाँ अपनी बुद्धिके अनुसार जो कुछ कह रहा हूँ, उसे आपलोग तथा परम बुद्धिमान् राजा भीष्मक भी सुनें ॥ ५ ॥
योऽसौ कृष्ण इति ख्यातो वसुदेवसुतो बली ।
वैनतेयसहायैन सम्प्राप्तः कुण्डिनं त्विह ॥ ६ ॥
कन्याहेतोर्महातेजा यादवैरभिसंवृतः ।
अवश्यं कुरुते यत्नं कन्यायाप्तिर्यथा भवेत् ॥ ७ ॥
वे जो श्रीकृष्ण नामसे विख्यात बलवान् वसुदेवपुत्र इस कुण्डिनपुरमें गरुड़के साथ पधारे हैं, बड़े तेजस्वी हैं। यहाँकी राजकन्याको प्राप्त करनेके लिये ही वे यादवोंसे घिरे हुए यहाँतक आये हैं। जिस तरह भी कन्याकी प्राप्ति हो सके वैसा प्रयत्न वे अवश्य करेंगे ॥ ६-७ ॥
यदत्र कारणं कार्यं सुनयोपेतमृद्धिमत् ।
कुरुध्वं नृपशार्दूला विनिश्चित्य बलाबलम् ॥ ८ ॥
श्रेष्ठ नरपतियो ! यहाँ जो सुनीतिसे युक्त तथा समृद्धिका हेतुभूत कारण (उपाय) काममें लाने योग्य है, उसे अपने बलाबलका विचार करके आपलोग करें ॥ ८ ॥
पदातिनौ महावीर्यौ वसुदेवसुतावुभौ ।
वैनतेयं विना तस्मिन् गोमन्ते पर्वतोत्तमे ।
कृतवन्तौ महाघोरं भवद्भिर्विदितं हि तत् ॥ ९ ॥
वसुदेवके ये दोनों पुत्र महान् पराक्रमी हैं। ये लोग पर्वतोंमें श्रेष्ठ गोमन्तपर गरुडको साथ लिये बिना पैदल ही आये थे, तो भी इन्होंने जो घोर महायुद्ध किया था, वह आपलोगोंको विदित ही है ॥ ९ ॥
वृष्णिभिर्यादवैश्चैव भोजान्धकमहारथैः ।
समेत्य युध्यमानस्य कीदृशो विग्रहो भवेत् ॥ १० ॥
इस समय जब ये यदुवंशी, वृष्णिवंशी, भोजवंशी तथा अन्धकवंशी महारथियोंके साथ मिलकर युद्ध करेंगे, तब इनका
[ विष्णुपर्व ] अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ३९५
संग्राम कैसा होगा—(यह आपलोग स्वयं अनुमान कर सकते हैं) ॥१०॥
कन्यार्थे यतमानेन गरुडस्थेन विष्णुना।
कः स्थास्यति रणे तस्मिन्नपि शक्रः सुरैः सह ॥ ११॥
राजकन्याके लिये यत्न करते हुए इन गरुडवाहन भगवान् विष्णुके साथ युद्धमे देवताओंसहित इन्द्र ही क्यों न हों, कौन ठहर सकेगा ॥ ११॥
यदा चास्मै नापि सुता कदाचित् सम्प्रदीयते ।
ततो ह्ययं बलादेनां नेतुं शक्तः सुरैः सह ॥ १२॥
यदि कदाचित् इन्हें कन्या न भी दी जाय तो ये देवताओंके साथ उपस्थित हो बलपूर्वक इसे ले जानेमे समर्थ हैं॥
पुरा एकार्णवे घोरे श्रूयते मेदिनी वियम् ।
पातालतलसम्मग्ना विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ १३॥
वाराहं रूपमास्थाय उद्धृता जगदादिना ।
हिरण्याक्षश्च दैत्येन्द्रो वराहेण निपातितः ॥ १४ ॥
सुना जाता है कि प्राचीन कालमे यह पृथ्वी भयंकर एकार्णवमें निमग्न हो रसातलमे जा पहुँची थी। उस समय जगत्के आदि कारण इन्हीं प्रभावशाली विष्णुने वाराहरूप धारण करके इसका उद्धार किया था। उस समय दैत्यराज हिरण्याक्षको भी वाराहरूपसे ही मार गिराया था ॥ १३-१४॥
हिरण्यकशिपुश्चैव महाबलपराक्रमः ।
अवध्योऽमरदैत्यानामृषिगन्धर्वकिन्नरैः ॥ १५॥
यक्षराक्षसनागानां नाकाशे नावनिस्थले ।
न चाभ्यन्तररात्र्यहोर्न शुष्केणार्द्रेकेण च ॥ १६ ॥
महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न दैत्यराज हिरण्यकशिपु देवताओं और दैत्योके लिये भी अवध्य था। ऋषि, गन्धर्व और किन्नर भी उसे मार नहीं सकते थे। यक्ष, राक्षस और नागोंके लिये भी वह अजेय था। वह न तो आकाशमें मर सकता था, न पृथ्वीपर। न रातमे न दिनमे और न सूखे अस्त्रसे न गीले अस्त्रसे ही ॥ १५-१६ ॥
अवध्यस्त्रिषु लोकेषु दैत्येन्द्रस्त्वपराजितः ।
नरसिंहेन रूपेण निहतो विष्णुना पुरा ॥ १७॥
तीनो लोकोंमे अवध्य वह दैत्यराज किसीसे पराजित होनेवाला नहीं था, तो भी पूर्वकालमे भगवान् विष्णुने नरसिंहरूप धारण करके उसे मार डाला ॥ १७॥
वामनेन तु रूपेण कश्यपस्यात्मजो बली ।
अदित्या गर्भसम्भूतॊ बलिर्बद्धोऽसुरोत्तमः ॥ १८॥
सत्यरज्जुमयैः पाशैः कृतः पातालसंश्रयः ।
बनाये गये पाशोंद्वारा बाँध लिया और उसे पाताललोकका निवासी बना दिया ॥ १८½ ॥
कार्तवीर्यो महावीर्यः सहस्रभुजविग्रहः ॥ १९ ॥
दत्तात्रेयप्रसादेन मत्तो राज्यमदेन च ।
कृतवीर्यका पुत्र महापराक्रमी अर्जुनका शरीर दत्तात्रेयजीकी कृपासे सहस्र भुजाओंसे सुशोभित होता था। वह राज्यमदसे उन्मत्त हो गया था ॥ १९½ ॥
जामदग्न्यो महातेजा रेणुकागर्भसंभवः ॥ २० ॥
त्रेताद्वापरयोः संधौ रामः शस्त्रभृतां वरः ।
(उसके दमनके लिये भगवान् विष्णु) त्रेता और द्वापरकी सन्धिके समय रेणुकाके गर्भसे प्रकट हुए। वे शस्त्रधारियोंमे श्रेष्ठ महातेजस्वी जमदग्निकुमार परशुरामके नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ २०½ ॥
पशुना वज्रकल्पेन सप्तद्वीपेश्वरो नृपः ।
विष्णुना निहतो भूयः छद्मरूपेण हैहयः ॥ २१ ॥
इस तरह पुनः छद्मरूपधारी भगवान् विष्णुने हैहयवंशमे उत्पन्न राजा कार्तवीर्यको, जो सातो द्वीपोंका स्वामी था, अपने वज्रतुल्य फरसेसे मार डाला ॥ २१ ॥
इक्ष्वाकुकुलसम्भूतो रामो दाशरथिः पुरा ।
त्रिलोकविजयं वीरं रावणं संन्यपातयत् ॥ २२॥
तत्पश्चात् वे इक्ष्वाकु-कुलमें दशरथनन्दन श्रीरामके रूपमें प्रकट हुए। उन्होंने पूर्वकालमें त्रिलोकविजयी वीर रावणको मार गिराया था ॥ २२ ॥
पुरा कृतयुगे विष्णुः संग्रामे तारकामये ।
षोडशार्द्धभुजो भूत्वा गरुडस्थो हि वीर्यवान् ॥ २३॥
निजघानासुरान् युद्धे वरदानेन गर्वितान् ।
कालनेमिश्च दैत्येयो देवानां च भयप्रदः ॥ २४॥
प्राचीन कालकी बात है—सत्ययुगमें जब तारकामय संग्राम हुआ था, उस समय पराक्रमी विष्णु आठ भुजाओंसे युक्त हो गरुडपर बैठकर वहाँ पधारे। वहाँ उन्होंने वरदानसे गर्वित हुए असुरोंको युद्धमे मार डाला तथा देवताओंको भय देनेवाले कालनेमि नामक दैत्यका भी वध कर दिया ॥ २३-२४॥
सहस्रकिरणाभेन चक्रेण निहतो युधि ।
महायोगबलेनाजौ विश्वरूपेण विष्णुना ॥ २५ ॥
यह सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, उन भगवान् विष्णुने युद्धमे महान् योगबलसे सूर्य-तुल्य तेजस्वी चक्रद्वारा उस दैत्यका संहार किया था ॥ २५ ॥
अनेन प्राप्तकालास्ते निहता बहवोऽसुराः ।
वने वनचरा दैत्या महाबलपराक्रमाः ॥ २६ ॥
निहता बालभावेन प्रलम्बारिष्टधेनुकाः ।
३९६ | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश
इन श्रीकृष्णने ऐसे बहुत-से असुरोंको मार डाला है, जिनका काल आ पहुँचा था। वनमें विचरनेवाले महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न प्रलम्ब और धेनुक नामक दैत्योंको इन्होंने बाल्यावस्था में ही वनके भीतर मार गिराया ॥ २६ ॥
शकुनीं केशिनं चैव यमलार्जुनकावपि ॥ २७ ॥
नागं कुवलयापीडं चाणूरं मुष्टिकं तथा।
कंसं च बलिनां श्रेष्ठं सगणं देवकीसुतः ॥ २८ ॥
न्यहनद् गोपवेषेण क्रीडमानो हि केशवः।
पूतना, केशी, यमलार्जुन, कुवलयापीड हाथी, चाणूर, मुष्टिक तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ कंसको भी उसके गणोंसहित इन देवकीपुत्र केशवने नष्ट कर दिया है। उस समय ये गोपवेषमें क्रीडा करते थे ॥ २७-२८ ॥
एवमादीनि दिव्यानि छद्मरूपाणि चक्रिणा ॥ २९ ॥
कृतानि दिव्यरूपाणि विष्णुना प्रभविष्णुना ।
इन प्रभावशाली चक्रधारी विष्णुने ये तथा और भी इसी तरहके बहुत-से दिव्य छद्मरूप समय-समयपर धारण किये हैं॥
तेनाहं वः प्रवक्ष्यामि भवतां हितकाम्यया ॥ ३० ॥
तं मन्ये केशवं विष्णुं सुराद्यमसुरान्तकम् ।
इसलिये मैं आपलोगोंके हितकी इच्छासे यह कह रहा हूँ कि श्रीकृष्ण देवताओंके आदि कारण एवं असुर-विनाशक विष्णु हैं। मैं उन्हें ऐसा ही समझता हूँ ॥ ३० ॥
नारायणं जगद्योनिं पुराणं पुरुषं ध्रुवम् ॥ ३१ ॥
स्रष्टारं सर्वभूतानां व्यक्ताव्यक्तं सनातनम् ।
अधृष्यं सर्वलोकानां सर्वलोकनमसकृतम् ॥ ३२ ॥
अनादिमध्यनिधनं क्षरमक्षरमव्ययम् ।
स्वयम्भुवमजं स्थाणुमजेयं सचराचरैः ॥ ३३ ॥
त्रिविक्रमं त्रिलोकेशं त्रिदशेन्द्रारिनाशनम् ।
वे जगत्की उत्पत्तिके स्थानभूत पुराणपुरुष अविनाशी भगवान् नारायण हैं। वे ही समस्त भूतोंकी सृष्टि करनेवाले तथा व्यक्ताव्यक्तरूप सनातन परमात्मा हैं। सम्पूर्ण लोक मिलकर भी उन्हें पराजित नहीं कर सकते। सारा संसार उनके चरणोंमें मस्तक झुकाता है। वे आदि, मध्य और अन्तसे रहित, क्षर (सर्वभूतय), अक्षर (कूटस्थ) और अविकारी हैं। वे ही स्वयंभू, अजन्मा, सदा स्थिर रहनेवाले तथा चराचर प्राणियोंके लिये अजेय हैं। उन्हींको मैं देवेन्द्रके शत्रुओंका विनाशक, त्रिलोकीनाथ, त्रिविक्रमरूपधारी विष्णु मानता हूँ ॥ ३१-३३ ॥
इति मे निश्चिता बुद्धिर्जातोऽयं मथुरामधि ॥ ३४ ॥
कुले महति वै राज्ञां विपुले चक्रवर्तिनाम् ।
कथमन्यस्य मर्त्यस्य गरुडो वाहनं भवेत् ॥ ३५ ॥
यही मेरी बुद्धिका निश्चय है। ये विष्णु ही मथुरामें चक्रवर्ती राजाओंके महान् एवं विशाल कुलमें प्रकट हुए हैं। अन्यथा दूसरे किसी मनुष्यका वाहन गरुड़ कैसे हो सकते हैं॥
विक्षेपेण तु कन्यार्थे विक्रमिष्ये जनार्दने ।
कः स्थास्यति पुमानद्य गरुडस्याग्रतो बली ॥ ३६ ॥
विशेषतः जब भगवान् जनार्दन राजकन्याकी प्राप्तिके लिये पराक्रम प्रकट करनेपर तुल जायेंगे, तब कौन ऐसा बलवान् पुरुष है, जो आज गरुड़के सामने खड़ा हो सकेगा॥
स्वयंवरकृतेनासीद् विष्णुः स्वयमिहागतः।
विष्णोरागमनं चैव महान् दोषः प्रकीर्तितः ॥ ३७ ॥
भवद्भिरनुचिन्त्येदं क्रियतां यदनन्तरम् ।
इस स्वयंवरके लिये साक्षात् विष्णु यहाँ पधारे हैं। विष्णुका आगमन होनेपर हमारे लिये जो महान् दोष (बाधा) उपस्थित है, उसे मैंने बताया। अब आप लोग भी इसपर विचार करके आगे जो कुछ करना हो, वह करें ॥ ३७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं विप्लवमाणे तु मगधानां जनेश्वरे ॥ ३८ ॥
सुनीथोऽथ महाप्राज्ञो वचनं चेदमब्रवीत् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! मगधदेशका राजा जब इस प्रकार भाषण दे चुका, तब महाबुद्धिमान् सुनीथने इस प्रकार कहा ॥ ३८ ॥
सुनीथ उवाच
सम्यगाह महाबाहुर्मगधाधिपतिर्नृपः ॥ ३९ ॥
समक्षं नरदेवानां यदानृत्तं महाहवे।
गोमन्ते रामकृष्णभ्यां कृतं कर्म सुदुष्करम् ॥ ४० ॥
सुनीथ बोले—महाबाहु मगधराज ठीक कहते हैं। गोमन्त पर्वतके गभीर महासमरमें जैसी घटना घटित हुई थी तथा बलराम और श्रीकृष्णने जो अत्यन्त दुष्कर कर्म कर दिखाया था, वह इन समस्त नरेशोंने अपनी आँखों देखा था ॥ ३९-४० ॥
गजाश्वरथसम्बाधा पत्तिध्वजसमाकुला ।
निर्दग्धा महती सेना चक्रलाङ्गलवह्निना ॥ ४१ ॥
हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी तथा पैदलों और ध्वजोंसे व्याप्त हुई राजाओंकी वह विशाल सेना चक्र और हलरूपी अग्निसे जलकर भस्म हो गयी ॥ ४१ ॥
तेनायं मागधः श्रीमाननागतमचिन्तयत् ।
ध्रुवते राजसेनायामनुस्मृत्य सुदारुणम् ॥ ४२ ॥
पद्मात्योर्युध्यतोस्तत्र बलकेशवयोर्भुवि ।
दुर्निचार्यतरो घोरो ह्यभवद् वाहिनीक्षयः ॥ ४३ ॥
इसलिये इन श्रीमान् मगधनेशाने आज भावी परिणाम-का विचार किया है। राजाओंकी सेनामें जो अत्यन्त दारुण घटना घटित हुई थी, उसका स्मरण करके ये इस समय...
[विष्णुपर्व ] \hfill एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः \hfill ३९७
उपर्युक्त बात कह गये हैं। वहाँ युद्धमें बलराम और श्रीकृष्ण पैदल ही लड़ रहे थे, तो भी हमारी विशाल वाहिनीका ऐसा घोर संहार हुआ, जिसे रोकना अत्यन्त कठिन हो गया था ॥ ४२-४३ ॥
विदितं वः सुपर्णस्य स्वागतस्य नृपोत्तमाः।
पक्षवेगानिलोद्भूता वभ्रमुर्गगनेचराः ॥ ४४ ॥
श्रेष्ठ नरपतियो! गरुड़के आते समय यहाँ जो प्रभाव पड़ा था, उसे आपलोग अच्छी तरह जानते हैं। उनके पंखोंके वेगसे जो वायु उठी थी, उसका झोंका खाकर आकाशचारी प्राणी चक्कर काटने लगे थे ॥ ४४ ॥
समुद्राः क्षुभिताः सर्वे चचालाद्रिर्मही मुहुः।
वयं सर्वे सुसंत्रस्ताः किमुत्पातेति विह्वलाः ॥ ४५ ॥
सारे समुद्र क्षुब्ध हो उठे थे। पर्वत काँपने लगे और धरती भी बार-बार डोलने लगी थी। हम सब लोग यह सोचकर भयभीत एवं व्याकुल हो गये थे कि यह कैसा उत्पात खड़ा हो गया ॥ ४५ ॥
यदा संनह्य युध्येत आरूढः केशवः खगम्।
कथमस्मद्विधः शक्तः प्रतिस्थातुं रणाजिरे ॥ ४६ ॥
जब केशव कवच बाँधकर गरुड़की पीठपर आरूढ़ हो युद्ध करेंगे, उस समय हमारे-जैसा पुरुष समराङ्गणमें कैसे ठहर सकता है ॥ ४६ ॥
राज्ञां स्वयंवरो नाम सुमहान् हर्षवर्धनः।
कृतो नरवरैराद्यैर्यशोधर्मस्य वै विधिः ॥ ४७ ॥
स्वयंवर राजाओंके लिये महान् आनन्दवर्धक उत्सव है। पूर्वकालके श्रेष्ठ नरेशोंने इसे सुयश और धर्मकी सिद्धिके लिये प्रचलित किया था ॥ ४७ ॥
इदं तु कुण्डिनगरमासाद्य मनुजेश्वराः।
पुनरेवैष्यते क्षिप्रं महापुरुषविग्रहम् ॥ ४८ ॥
परंतु मनुजेश्वरो ! इस कुण्डिनपुरमें आकर हमारे सामने पुनः शीघ्र ही महापुरुषके साथ महान् युद्धका अवसर आन चाहता है ॥ ४८ ॥
यदि सा वरयेदन्यं राज्ञां मध्ये नृपात्मजा।
कृष्णस्य भुजयोर्वीर्यं कः पुमान् प्रसहिष्यति ॥ ४९ ॥
यदि राजकुमारी रुक्मिणी राजाओंके बीचमें किसी दूसरे नरेशका वरण कर ले, तब कौन ऐसा पुरुष है—जो श्रीकृष्णकी भुजाओंका पराक्रम सह सकेगा ॥ ४९ ॥
विज्ञापितमिदं दोषं स्वयंवरमहोत्सवे।
तदर्थमागतः कृष्णो वयं चैव नराधिपाः ॥ ५० ॥
इस स्वयंवर-महोत्सवमें यह युद्धकी सम्भावना ही महान् दोष है, जिसे सूचित कर दिया गया। श्रीकृष्ण तथा हम सब नरेश भी स्वयंवरके लिये ही यहाँ पधारे हैं ॥ ५० ॥
कृष्णस्यागमनं चैव नृपाणामतिगर्हितम्।
कन्याहेतोर्नरेन्द्राणां यथा वदति मागधः ॥ ५१ ॥
राजकन्याके उद्देश्यसे श्रीकृष्णका आगमन हम सब नरेशोंके लिये अत्यन्त गर्हित सिद्ध हो रहा है—जैसा कि मगधराजका कथन है ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलेषु हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिणीस्वयंवरे मागधसुनीथवाक्ये अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीस्वयंवरके प्रसंगमें जरासंध और सुनीथका भाषणविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
दन्तवक्त्र और शाल्वका भाषण सुनकर भीष्मकका श्रीकृष्णके प्रभावका वर्णन करते हुए उन्हें प्रसन्न करनेका ही निश्चय करना
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्ते वचने सुनीथेन महात्मना।
करूपाधिपतिर्वीरो दन्तवक्त्रोऽभ्यभाषत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! महामना सुनीथके ऐसा कहनेपर करूपदेशके वीर राजा दन्तवक्त्रने भाषण देना आरम्भ किया ॥ १ ॥
दन्तवक्त्र उवाच
यदुक्तं मागधेनात्र सुनीथेन नराधिपाः।
युक्तपूर्वमहं मन्ये यदस्माकं वचो हितम् ॥ २ ॥
दन्तवक्त्र बोला—राजाओ ! यहाँ मगधराजने और राजा सुनीथने जो कुछ कहा है, उसे मैं युक्तिसंगत मानता हूँ; क्योंकि इनका प्रवचन हमलोगोंके लिये हितकर है ॥ २ ॥
न च विद्वेषणेनाहं न चाहंकारवादिना।
न चात्मविजिगीषुत्वाद् दूषयामि वचोऽमृतम् ॥ ३ ॥
मैं न तो विद्वेषके कारण, न अहंकारवादी होनेके कारण और न अपनी विजयकी अभिलाषा रखनेके ही कारण आप दोनोंके अमृतमय वचनोंको सदोष बता रहा हूँ ॥ ३ ॥
| ३९८ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंश |
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वाक्यार्णवं महागाधं नीतिशास्त्रार्थवृंहितम्।
क एष निखिलं वक्तुं शक्तो वै राजसंसदि ॥ ४ ॥
इस राजसभामें कौन ऐसा पुरुष है जो इस प्रकार समुद्र-के समान अत्यन्त अगाध एवं नीतिशास्त्रके अनुकूल सर्वगुण-सम्पन्न बात कह सके ॥ ४ ॥
किं त्वनुस्मरणार्थेऽहं यद् ब्रवीमि शृणुध्व मे।
आगतो वासुदेवोति किमाश्चर्यं नराधिपाः ॥ ५ ॥
परंतु आपलोगोंको एक कर्तव्यकी याद दिलानेके लिये मैं जो कुछ कहता हूँ, मेरी वह बात सुन लीजिये। नरेशरो ! यदि वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ पधारे हैं, तो इसमें आश्चर्यकी क्या बात है ॥ ५ ॥
यथाऽऽगता वयं सर्वे कृष्णोऽपीह तथाऽऽगतः।
किमत्र दोषो गौण्यो वा कन्याहेतोः समागताः ॥ ६ ॥
जैसे हम सब लोग यहाँ आये हैं, उसी तरह श्रीकृष्ण भी चले आये हैं। इसमें क्या दोष है और क्या गुण। हम सब लोगोंके आगमनका एक ही उद्देश्य है—राजकन्याकी प्राप्ति॥
यदस्माभिः समेत्यैक्यात् कृतं गोमन्तरोधनम्।
तत्र युद्धकृतं दोषं कथं वै वक्तुमर्हथ ॥ ७ ॥
हमलोगोंने एक साथ मिलकर आपसमें एकता स्थापित करके जो गोमन्त पर्वतपर घेरा डाल रखा था, उस दशामें यदि वहाँ युद्ध हुआ तो उसे आपलोग दोष कैसे बता रहे हैं॥
वनवासे स्थितौ वीरौ कंसव्यामोहहेतुना।
देवर्षिवचनाद् राजन् वृन्दावनतटे स्थितौ ॥ ८ ॥
तावाहूय वधार्थेन उभौ रामजनार्दनौ।
नागेनोद्दीपिता वीरौ हत्वा नागं विवेशतुः ॥ ९ ॥
ततः स्ववीर्यमाश्रित्य निहतो रङ्गसागरे।
गतासुरिव चासीनो मधुरेशः सहानुगः ॥ १० ॥
किमत्र विहितो दोषो येनास्माभिर्विरोधिकैः।
उपरोधपरा राजन् वयं सर्वे समागताः ॥ ११ ॥
राजन् ! वीर बलराम और श्रीकृष्ण कंसको मोहमें डालनेके लिये ही वनवास कर रहे थे। वृन्दावनके किनारे रहते थे; परंतु देवर्षि नारदके कहनेसे उन दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णको कंसने उनका वध करनेके लिये बुलवाया और कुवलयापीड हाथीके द्वारा आक्रमण कराकर उन दोनों वीरोंके क्रोधको उद्दीपित किया। उस दशामें वे दोनों उस हाथीको मारकर समुद्रके समान विशाल रंगशालामें प्रविष्ट हुए; फिर उन्होंने अपने बाहुबलका आश्रय लेकर मुर्देके समान बैठे हुए मथुरानरेशको यदि उसके साथियोंसहित मार डाला तो इसमें उनके द्वारा क्या दोष बन गया। राजन् ! इसी तरह कंसका वध करके यदि श्रीकृष्ण और बलरामने हम वयोवृद्ध नरेशोंके साथ विरोध किया और उस दशामें यदि हम सब लोगोंने वहाँ पहुँचकर मथुरापुरीपर घेरा डाल दिया तो उसमें भी क्या दोष था ॥ ८-११ ॥
सेनातिबलमालोक्य विग्रस्तवौ रामकेशवौ।
पुरं बलं समुत्सृज्य गोमन्ते च गतावुभौ ॥ १२ ॥
हमारी सेनाका महान् बल देखकर बलराम और कृष्ण डर गये और अपने नगर तथा सेनाको छोड़कर दोनों भाई गोमन्तपर्वतपर चले गये ॥ १२ ॥
तत्रापि गतमस्माभिर्हन्तुं समग्रयोधिभिः।
अप्राप्तयौवनाभ्यां च पदातिभ्यां रणाजिरे ॥ १३ ॥
रथाश्वनरनागेन नास्माभिर्विग्रहः कृतः।
कृत्वोपरोधं शैलस्य क्षत्रधर्मेण दीपितः ॥ १४ ॥
तत्पश्चात् हम समग्रशस्त्रोंसे युद्ध करनेवाले योद्धाओंने उन्हें मार डालनेके लिये वहाँ भी धावा किया। वे दोनों अभी जवान नहीं हुए थे और रणभूमिमें पैदल ही लड़ते थे; इसलिये हमने हाथी-घोड़े, रथ और पैदल सेना होती हुई चतुरङ्गिणी सेनाद्वारा उनके साथ युद्ध नहीं किया; अपितु क्षत्रिय-धर्मके अनुसार गोमन्तपर्वतपर घेरा डालकर उसमें आग लगा दी थी॥
दावाग्निमुखमाविश्य दुर्विनीततपस्विनो।
विनीत इति मन्यामः सर्वे क्षत्रियपुङ्गवाः।
प्रत्युद्गते कृते त्वेवं दूषयाम जनार्दनम् ॥ १५ ॥
हम सभी क्षत्रिय-पुङ्गव यह समझते थे कि ये दोनों उद्दण्ड तपस्वी बालक दावानलके मुखमें पड़कर सीख जायेंगे ( अपने कियेका फल पा जायेंगे )। ऐसी दशामें उन दोनों भाइयोंने यदि प्रतिशोधात्मक युद्ध किया तो हम जनार्दनको इस तरह दोष क्यों दें ( उन्होंने जो कुछ किया, ठीक ही किया ) ॥ १५ ॥
यत्र यत्र प्रयास्यामो वयं तत्र भवेत् कलिः।
प्रीत्यर्थं प्रयतियामः कृष्णेन सह भूमिपाः ॥ १६ ॥
(श्रीकृष्णसे बैर रखनेपर) हमलोग जहाँ-जहाँ जायेंगे, वहीं-वहीं कलह हो सकता है। अतः राजाओ ! आइये हम श्रीकृष्णके साथ प्रेम बढ़ानेका प्रयत्न करेंगे ॥ १६ ॥
इदं कुण्डिनपुरं कृष्णो नागतः कलिहेतुना।
कन्यानिमित्तागमने कस्य युद्धं प्रयच्छति ॥ १७ ॥
इस कुण्डिनपुरमें श्रीकृष्ण युद्धके लिये नहीं आये हैं। यदि राजकन्याके निमित्त ही उनका आगमन हुआ है, तब वे किसके साथ युद्ध करेंगे ॥ १७ ॥
मर्त्येऽस्मिन् पुरुषेन्द्वोऽसौ न कश्चित् प्राकृतो नरः।
देवलोकेषु देवेषु प्रवरः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥
वे कोई प्राकृत मनुष्य नहीं हैं। इस मर्त्यलोकमें श्रेष्ठ पुरुष हैं। देवलोकवासी देवताओंमें भी सर्वश्रेष्ठ पुरुषोत्तम हैं॥
| [ विष्णुपर्व ] | एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | ३९९ |
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देवानापि कर्तासौ लोकानां च विशेषतः।
न चैव बालिशा बुद्धिर्न चेर्ष्या नापि मत्सरः॥ १९॥
वे देवताओंके भी कर्ता हैं और विशेषतः सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा भी वे ही हैं। उनकी बुद्धि गँवारों-जैसी नहीं है। उनके मनमें न ईर्ष्या है, न मात्सर्य॥ १९॥
न स्तब्धो न कृशो नार्तः प्रणतार्तिहरः सदा।
एष विष्णुः प्रभुर्देवो देवानापि दैवतम्॥ २०॥
ये न तो कठोर हैं, न दुर्बल हैं और न रोग-शोकसे पीड़ित ही हैं। ये तो सदा शरणागतोंका दुःख दूर करते रहते हैं। ये श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् विष्णु तथा देवताओंके भी देवता हैं॥ २०॥
आगतो गरुडेनेहच्छद्मप्रकाशयहेतुना।
नानाशस्त्रसहितो याति कृष्णः शत्रुविनाशने॥ २१॥
इमां यात्रां विजानीध्वं प्रीत्यर्थं ह्यागतो हरिः।
सहितो यादवेन्द्रैश्च भोजवृष्ण्यन्धकैरपि॥ २२॥
इस समय ये अपने छद्मरूपको प्रकाशित करनेके लिये गरुड़के द्वारा यहाँ पधारे हैं। श्रीकृष्ण शत्रुओंका विनाश करनेके लिये नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंके साथ यात्रा करते हैं। परंतु उनकी इस यात्राको वैसा न समझो। इस समय तो ये श्रीहरि भोज, वृष्णि, अन्धक आदि यादवेन्द्रोंके साथ यहाँ प्रीति बढ़ानेके लिये ही आये हैं॥ २१-२२॥
अर्घ्यमाचमनं दत्त्वा आतिथ्यं च नराधिपाः।
करिष्यामो वयं सर्वे केशवाय महात्मने॥ २३॥
अतः नरेश्वरो! हम सब लोग यहाँ महात्मा केशवको अर्घ्य और आचमन आदि देकर उनका आतिथ्य-सत्कार करेंगे॥ २३॥
एवं संधानतः कृत्वा कृष्णेन सहिता वयम्।
वसामो विगतोद्वेगा निर्भया विगतज्वराः॥ २४॥
इस प्रकार सन्धि करके हमलोग श्रीकृष्णके साथ उद्वेग, भय और चिन्तासे रहित होकर निवास करेंगे॥ २४॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दन्तवक्त्रस्य धीमतः।
शाल्वः प्रवदतां श्रेष्ठस्तानुवाच नराधिपान्॥ २५॥
बुद्धिमान् दन्तवक्त्रका यह वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ शाल्वने उन नरेशोंसे कहा—॥ २५॥
शाल्व उवाच
किं भयेनास्य नः सर्वे न्यस्तशस्त्रा भवामहे।
संधानकरणाद्धेतोः कृष्णस्य भयकम्पिताः॥ २६॥
शाल्व बोला—राजाओ! यदि ऐसी बात है तो क्या हम सब लोग श्रीकृष्णके भयसे अब अपने अस्त्र-शस्त्र नीचे डालकर निहत्थे हो जायें। सन्धि करनेके हेतुसे तो यही पता लगता है कि सब नरेश श्रीकृष्णके भयसे काँप रहे हैं॥ २६॥
परस्तवेन किं कार्यं विनिन्द्य बलमात्मनः।
नैष धर्मो नरेन्द्राणां क्षात्रे धर्मे च तिष्ठताम्॥ २७॥
अपने बलकी निन्दा करके दूसरेकी स्तुति करनेसे क्या प्रयोजन। क्षत्रिय-धर्ममें स्थित रहनेवाले नरेशोंका यह धर्म नहीं है॥ २७॥
महत्सु राजवंशेषु सम्भूताः कुलवर्द्धनाः।
तेषां कापुरुषा बुद्धिः कथं भवितुमर्हति॥ २८॥
जो महान् राजवंशोंमें उत्पन्न होकर अपने कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं, उन राजाओंकी बुद्धिमे ऐसे कायरतापूर्ण विचार-का उदय कैसे हो सकता है॥ २८॥
अहं जानामि वै कृष्णमादिदेवं सनातनम्।
प्रभुं सर्वामरेन्द्राणां नारायणपरायणम्॥ २९॥
मै जानता हूँ, श्रीकृष्ण समस्त अमरेन्द्रवरोंके स्वामी आदि-देव सनातन पुरुष हैं। नारायण ही इनके महान् आश्रय (स्वरूप) हैं॥ २९॥
वैकुण्ठमजयं लोके चराचरगुरुं हरिम्।
सम्भूतं देवकीगर्भे विष्णुं लोकनमस्कृतम्॥ ३०॥
कंसराजवधार्थाय भारावतरणाय च।
अस्माकं च विनाशाय लोकसंरक्षणाय च॥ ३१॥
अंशावतरणे कृत्स्नं जाने विष्णोर्विचेष्टितम्।
लोकमें अजेय, वैकुण्ठ-धामके अधिपति, चराचरगुरु, पापहारी विश्ववन्दित भगवान् विष्णु ही पृथ्वीका भार उतारने, कंसराजको मारने तथा हमारा विनाश और सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा करनेके लिये देवकीके गर्भसे प्रकट हुए हैं। अपने अंश-सहित भगवान् विष्णुके इस पूर्ण अवतारमे जो-जो कार्य होने-वाला है, वह सब मैं अच्छी तरह जानता हूँ॥ ३०-३१½॥
संग्राममतुलं कृत्वा विष्णुना सह भूमिपाः॥ ३२॥
चक्रानलविनिर्दग्धा यास्यामो यमसादनम्।
अतः भूमिपालो! हमलोग इन भगवान् विष्णुके साथ अनुपम संग्राम करके इनकी चक्राग्निसे दग्ध हो यमलोकमें जा पहुँचेंगे॥ ३२½॥
तत्त्वं जानामि राजेन्द्र्राः कालेनायुःक्षयो भवेत्॥ ३३॥
नाकाले म्रियते कश्चित् प्राप्ते काले न जीवति।
राजेन्द्रगण! मै इस तत्त्वको जानता हूँ कि कालसे ही आयु क्षीण होती है। जबतक काल न आया हो कोई नहीं मरता है और काल आ जानेपर कोई जीवित नहीं रहता॥
एवं विनिश्चयं कृत्वा न कुर्यात् कस्यचिद् भयम्॥३४॥
स एव भगवान् विष्णुरालोक्य तपसः क्षयम्।
निहन्ता दितिजेन्द्राणां यथाकालेन योगवित्॥ ३५॥
अपने मनमें ऐसा दृढ़ निश्चय रखकर कभी किसीसे भय नहीं रखना चाहिये। वे ही योगवेत्ता भगवान् विष्णु दैत्य-
४०० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
राजाओंकी तपस्या क्षीण हुई देख यथासमय उनका संहार करते हैं ॥ ३४-३५ ॥
बलिं वैरोचनिं चैवं बद्ध्वावध्यं महाबलम् । कृतवान् देवदेवेशः पातालतलवासिनम् ॥ ३६ ॥
उन्हीं देवदेवेश्वरने महाबली विरोचनकुमार बलिको, जो किसीके हाथसे मारे जानेवाले नहीं हैं, बाँधकर उन्हें पाताल-लोकका निवासी बना दिया है ॥ ३६ ॥
एवमादीनि वै विष्णोश्चेष्टानि च नराधिपाः । तस्मादयुक्तं भवतां विग्रहार्थं विचारणम् ॥ ३७॥
नरेश्वरो ! भगवान् विष्णुकी ऐसी ही चेष्टाएँ हुआ करती हैं। अतः आप लोगोंका युद्धके लिये विचार करना अनुचित है ॥ ३७ ॥
न च संग्रामहेतोर्हि कृष्णस्यागमनं त्विह । यस्य वा कस्य वा कन्या वरयिष्यति तस्य सा । किमत्र विग्रहो राज्ञां प्रीतिर्भवतु वै ध्रुवम् ॥ ३८ ॥
श्रीकृष्णका यहाँ आना युद्धके लिये नहीं हुआ है। राजकन्या जिस किसीका भी वरण करेगी, उसीकी पत्नी होगी। इसमें झगड़ेकी कौन-सी बात है। राजाओंमें सदा अटल प्रीति बनी रहनी चाहिये ॥ ३८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं कथयमानानां नृपाणां बुद्धिशालिनाम् । न किंचिदब्रवीद् राजा भीष्मकः पुत्रकारणात् ॥ ३९॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उन बुद्धिशाली नरेशोंके इस प्रकार कहनेपर भी राजा भीष्मक अपने पुत्रके कारण कुछ बोल न सके ॥ ३९ ॥
महावीर्यमदोत्सिक्तं भार्गवास्त्राभिरक्षितम् । रणप्रचण्डातिरथं विचिन्त्य मनसा सुतम् ॥ ४० ॥
वह अपने महान् बलके घमंडमें भरा रहता था। भार्गवास्त्रसे सुरक्षित था और रणभूमिमें प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करनेवाला अतिरथी वीर था। भीष्मकने मन-ही-मन अपने उस पुत्रका चिन्तन करके इस प्रकार कहा— ॥ ४० ॥
भीष्मक उवाच
कृष्णं न सहते नित्यं पुत्रो मे बलदर्पितः । नित्याभिमानी च रणे न बिभेति च कस्यचित् ॥ ४१ ॥
भीष्मक बोले—मेरा पुत्र सदा बलके घमंडमें भरा रहनेवाला और अभिमानी है। वह श्रीकृष्ण और उनके प्रभावको सहन नहीं कर पाता है तथा युद्धमें किससे डरता नहीं है ॥ ४१ ॥
कृष्णस्य भुजवीर्येण ह्रियते नात्र संशयः । भविष्यति ततो युद्धं महापुरुषविग्रहम् ॥ ४२ ॥
इसमें सन्देह नहीं कि श्रीकृष्णकी भुजाओंके बलसे कन्या-का अपहरण होगा। उस अवसरपर महापुरुषके साथ महान् विग्रह एवं युद्ध होकर ही रहेगा ॥ ४२ ॥
द्वेषी चैवाभिमानी च कुतो जीवति मे सुतः । जीवितं नात्र पश्यामि मम पुत्रस्य केशवात् ॥ ४३ ॥
उस अवस्थामें श्रीकृष्णसे द्वेष रखनेवाला मेरा अभिमानी पुत्र कैसे जीवित रह सकता है। अतः मुझे श्रीकृष्णके हाथसे यहाँ अपने पुत्रके जीवनकी रक्षा होती नहीं दिखायी देती ॥
कन्याहेतोः सुतं ज्येष्ठं पितृणां नन्दिवर्द्धनम् । कारयिष्ये कथं युद्धं पुत्रेण सह केशवम् ॥ ४४ ॥
कन्याके लिये पितरोंका आनन्द बढ़ानेवाले अपने ज्येष्ठ पुत्रको केशवके साथ और केशवको अपने पुत्रके साथ युद्ध करनेका अवसर कैसे दूँगा ॥ ४४ ॥
न च नारायणं देवं वरमिच्छति रुक्मवान् । मूढभावो मदोन्मत्तः संग्रामेष्वनिवर्तकः । नियतं भस्मसाद् याति तुलराशिरिवानलात् ॥ ४५ ॥
रुक्मीका मनोभाव मूढ़तासे भरा हुआ है। अतः वह भगवान् नारायणको रुक्मिणीका वर बनाना नहीं चाहता। वह बलके मदसे उन्मत्त रहता और युद्धसे कभी मुँह नहीं मोड़ता है। अतः जैसे आग लगनेसे रूईका ढेर जल जाता है, उसी प्रकार वह श्रीकृष्णसे भिड़कर निश्चय ही भस्म हो जायगा ॥ ४५ ॥
करवीरेश्वरः शूरः शृगालश्चित्रयोधिनः । क्षणेन भस्मसान्नीतः केशवेन बलीयसा ॥ ४६ ॥
विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेवाले अत्यन्त बलवान् केशवने करवीरपुरके शूरवीर राजा शृगालको क्षणभरमें धूलमें मिला दिया ॥ ४६ ॥
वृन्दावनेऽवसच्छ्रीमान् केशवो बलिनां वरः । उद्धृत्यैकेन हस्तेन सप्ताहं धृतवान् गिरिम् ॥ ४७ ॥ दुष्करं कर्म संस्मृत्य मनः सीदति मे भृशम् ॥ ४८ ॥
जब बलवानोंमें श्रेष्ठ श्रीमान् केशव वृन्दावनमें रहते थे, उस समय उन्होंने गोवर्धन पर्वतको उठाकर सात दिनोंतक उसे एक ही हाथसे धारण कर रखा था। उनके उस दुष्कर कर्मको याद करके मेरा हृदय अत्यन्त शिथिल हो जाता है ॥ ४७-४८ ॥
नगेन्द्रे सहसाऽऽगम्य दैवतैः सह वृत्रहा । अभिषिच्याब्रवीत् कृष्णमुपेन्द्रोति शचीपतिः ॥ ४९ ॥
उस समय देवताओंके साथ वृत्रासुरविनाशक शचीपति इन्द्रने सहसा गिरिराज गोवर्धनपर आकर श्रीकृष्णका गौओंके इन्द्रके पदपर अभिषेक किया और उन्हें उपेन्द्र कहकर पुकारा ॥
विष्णुपर्व ] एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४०१ यथा वै दमितो नागः कालियो यमुनाह्रदे । विषाग्निज्वलितो घोरः कालान्तकसमप्रभः ॥ ५० ॥ यमुनाके कुण्डमें निवास करनेवाले घोर कालिय नाग अपनी विषाग्निसे प्रज्वलित हो काल और अन्तकके समान प्रतीत होता था, किंतु इन श्रीकृष्णने उसका भी जिस प्रकार दमन किया ( वह सबको विदित है ) ॥ ५० ॥ केशी चापि महावीर्यो दानवो हयविग्रहः । निहतो वासुदेवेन देवैरपि दुरासदः ॥ ५१ ॥ महापराक्रमी केशी नामक दानव घोड़ेका शरीर धारण करके रहता था । उसको जीतना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन था; परंतु इन भगवान् वासुदेवने उसको भी मार डाला ॥ ५१ ॥ सान्दीपनिस्तुतश्चैव चिरनष्टो हि सागरे । दैत्यं पञ्चजनं हत्वा यानीतो यममन्दिरात् ॥ ५२ ॥ इन्होंने समुद्रमें चिरकालसे नष्ट हुए सान्दीपतिके पुत्र- को पञ्चजन दैत्यका वध करके यमलोकसे ला दिया था ॥ गोमन्ते सुमहद् युद्धं बहुभिर्वेष्टितावुभौ । कृत्वा वित्रासजननं नागाश्वरथसंक्षयम् ॥ ५३ ॥ गजेन गजवृन्दानि रथेन रथयोधिनः । सादिनश्चाश्वयोधेन नरेण च पदातिनः । जघ्नतुस्तौ महावीर्यौ वसुदेवसुतावुभौ ॥ ५४ ॥ गोमन्त पर्वतपर जो महान् युद्ध हुआ था, उसमें बहुत-से राजाओंद्वारा यह दोनों भाई घिर गये थे । परंतु वसुदेवके उन दोनों महापराक्रमी पुत्रोंने हाथी, घोड़े तथा रथोंका संहाररूप अत्यन्त भयदायक पराक्रम कर दिखाया । हाथीसे हाथियोंके समूहोंको, रथसे रथारूढ़ योद्धाओंको, घुड़सवारसे ही घुड़सवारोंको और पैदल योद्धासे ही पैदलोंको मारकर यम- लोक पहुँचा दिया ॥ ५३-५४ ॥ न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः । न नागा न च दैत्येन्द्रा न पिशाचान् न गुह्यकाः ॥ ५५ ॥ कृतवन्तस्तथा घोरं गजाश्वरथसंक्षयम् । तमनुस्मृत्य संग्रामं भृशं सीदति मे मनः ॥ ५६ ॥ देवताओं, असुरों, गन्धर्वों, यक्षों, सर्पों, राक्षसों, नागों, दैत्यराजों, पिशाचों और गुह्यकोंने भी कभी हाथी, घोड़े और रथोंका ऐसा घोर संहार नहीं मचाया था । उस संग्रामको बारंबार याद करके मेरा मन शिथिल होता जा रहा है ॥ ५५-५६ ॥ न मया श्रुतपूर्वो वा दृष्टपूर्वोः कुतोऽपि वा । तादृशो भुवि मत्योंऽन्यो वासुदेवात् सुरोत्तमात् ॥ ५७ ॥ मैंने पहले कभी भूतलपर सुरश्रेष्ठ भगवान् वासुदेवको छोड़कर दूसरे किसी वैसे मनुष्यका होना न तो देखा है और न सुना ही है ॥ ५७ ॥ सम्यगाह महाबाहुर्दन्तवक्त्रो महीपतिः । सान्त्वयित्वा महावीर्यं संविधास्याम यत्क्षमम् ॥ ५८ ॥ महाबाहु राजा दन्तवक्त्र ठीक कहते हैं। हम पहले महापराक्रमी श्रीकृष्णको सान्त्वनाद्वारा शान्त करके फिर जैसा उचित हो वैसा करे ॥ ५८ ॥ वैशम्पायन उवाच इति संचिन्त्य मनसा बलाबलबिनिश्चयम् । गमनाय मतिं चक्रे प्रसादयितुमच्युतम् ॥ ५९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय ! इस प्रकार मन-ही-मन अपने बलाबलका निश्चय करके राजा भीष्मकने भगवान् श्रीकृष्णको प्रसन्न करनेके लिये उनके पास जानेका विचार किया ॥ ५९ ॥ चिन्तयानो नरेन्द्रस्तु बहुभिर्नयशालिभिः । सूतमागधवन्दिभ्यो बोधितः स्तुतिमङ्गलैः ॥ ६० ॥ बहुत-से नीतिशाली विद्वान् मन्त्रियोंके साथ विचार करते हुए राजा भीष्मक जब रातमें सो गये, तब सबेरा होने- के समय सूतों, मागधों और वन्दियोंके मुखसे स्तुति एवं मङ्गल-पाठ सुनकर जगे ॥ ६० ॥ प्रभातायां रजन्यां तु कृतपूर्वाह्निकक्रियः । उपविष्टा नृपाः सर्वे स्वेषु विश्रामवेश्मसु ॥ ६१ ॥ जब रात बीतनेपर प्रभातकाल आया, तब सब नरेश पूर्वाह्नकालके नित्यकर्म पूर्ण करके अपने-अपने विश्राम-भवनों- में बैठे ॥ ६१ ॥ ये विसृष्टास्तु राजानो विदर्भायां नराधिपैः । तैरागस्य स्वभूपेषु रहो गत्वा निवेदितम् ॥ ६२ ॥ राजाओंने अपनी ओरसे जिन-जिन राजकुमारोंको विदर्भपुरीमें भेजा था, उन्होंने लौटकर अपने-अपने राजाओंके पास एकान्तमे जाकर वहाँका समाचार निवेदन किया ॥६२॥ श्रुत्वा कृष्णाभिषेकं तु केचिद् धृष्टानराधिपाः । केचिद् दीनतरा भीता उदासीनास्तथा परे ॥ ६३ ॥ श्रीकृष्णके अभिषेकका समाचार सुनकर कुछ नरेश तो बहुत ही प्रसन्न हुए, कुछ लोग अत्यन्त दीन, भयभीत हो गये और दूसरे राजा उदासीन ( तटस्थ ) बने रहे ॥ ६३ ॥ त्रिधा विभिन्ना सा सेना नरनागाश्वमालिनी । महार्णव इव क्षुब्धा अभिषेकेण चालिता ॥ ६४ ॥ इस प्रकार श्रीकृष्णके अभिषेकसे चालित हुई मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंसे भरी हुई वह सेना तीन भागोंमें बँट गयी और महासागरके समान विक्षुब्ध हो उठी ॥ ६४ ॥ नृपाणां भेदमालोक्य भीष्मको राजसत्तमः । व्यतिक्रममचिन्त्यं च कृतं नृपतिना स्वयम् ॥ ६५ ॥
| ४०२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
विचिन्त्य मनसा राजा दह्यमानेन चेतसा।
जगाम नरदेवानां समाजे प्रतिबोधितुम् ॥ ६६ ॥
राजाओंमें श्रेष्ठ भीष्मक उन नरेशोंमें भेद हुआ देखकर और स्वयं अपने ही किये हुए अचिन्त्य अपराधका विचार करके मन-ही-मन चिन्तासे दग्ध होते हुए उन नरदेवोंके समाजमें उन्हें समझानेके लिये गये ॥ ६५-६६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे दूताः सम्प्राप्ताः क्रथकैशिकौ।
लेखमुद्धृत्य शिरसा विविशुस्ते नृपार्णवम् ॥ ६७ ॥
इसी बीचमें इन्द्रके दूत राजा क्रथ और कैशिकके पास जा पहुँचे और सिर झुका एक पत्र निकालकर उन्हें दिया; फिर वे राजाओंके समुद्र-जैसे समाजमें घुस गये ॥ ६७ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिणीस्वयंवरे एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीस्वयंवरविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
क्रथ और कैशिकद्वारा भगवान् श्रीकृष्णको अपने राज्यका समर्पण, देवराज इन्द्रके आदेशसे सब नरेशोंद्वारा भगवान्का राजेन्द्रके पदपर अभिषेक तथा भगवान्का सबको आश्वासन देना
जनमेजय उवाच
हत्वा कंसं महावीर्यं देवैरपि दुरासदम्।
नाभिषिक्तः स्वयं राज्ये नोपविष्टो नृपासने ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— मुने ! जो देवताओंके लिये भी दुर्जय था, उस महापराक्रमी कंसका वध करके भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं न तो राज्यपर अभिषिक्त हुए और न राजाके आसनपर ही बैठे, इसका क्या कारण है ? ॥ १ ॥
कन्यार्थं चागतः कृष्णस्तत्रापि न कृतोऽतिथिः।
अमानमतुलं प्राप्य क्षान्तवान् केन हेतुना ॥ २ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कुण्डिनपुरमें कन्याके लिये आये थे परंतु वहाँ भी वे निमन्त्रित अतिथि नहीं बनाये गये थे (अपने आप बिना बुलाये आये थे और अपने प्रभावके कारण पूजित हुए थे)। ऐसे अनुपम अपमानको पाकर भी श्रीकृष्णने किसलिये क्षमा कर दी ॥ २ ॥
विनतायाः सुतश्चैव महाबलपराक्रमः।
स चापि क्षमया युक्तः कारणं किमपेक्षितः।
एतदाख्याहि भगवन् परं कौतूहलं हि मे ॥ ३ ॥
विनताके पुत्र गरुड़ भी तो महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न हैं। उन्होंने भी किस कारणकी अपेक्षासे क्षमाभाव धारण कर लिया ? भगवन ! यह मुझे बताइये, इसको सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
विदर्भनगरीं प्राप्ते वैनतेये सहाच्युते।
मनसा चिन्तयामास वासुदेवाय कैशिकः ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! (क्रथ और कैशिक भगवान्के भक्त थे। उनपर कृपा करनेके लिये ही भगवान् वहाँ स्वयं पधारे थे।) जब भगवान् श्रीकृष्णके साथ विनतानन्दन गरुड़ भी विदर्भपुरीमें गये, उस समय कैशिकने उन वासुदेवके लिये मन-ही-मन इस प्रकार चिन्तन किया ॥ ४ ॥
दृष्ट्वाऽऽश्चर्येहिनः सर्वान् राजन्यान् प्रवदाम्यहम्।
वसुदेवसुते दृष्टे ध्रुवं पापक्षयो भवेत् ॥ ५ ॥
विशुद्धभावः कृष्णस्य आवयोर्दृष्टतत्त्वतः।
अतः पात्रतरः कोऽन्यस्त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ ६ ॥
कृष्णात् कमलपत्राक्षाद् देवदेवाज्जनार्दनात् ।
(यदि हम दोनों भाई श्रीकृष्णका अभिषेक कर दें तो) भगवान् श्रीकृष्णके आश्चर्यमय अभिषेकको देखकर हमारे पापोंका नाश हो जायगा तथा सबके मनमें विशुद्ध भावका उदय होगा, अतः मैं राजाओंसे कहूँगा—'वसुदेवपुत्र भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन कर लेनेपर निश्चय ही सबके पापोंका क्षय हो जाता है। हम दोनोंने श्रीकृष्णके तत्त्वका साक्षात्कार किया है। तीनों लोकोंमें उन कमलनयन देवाधिदेव जनार्दन श्रीकृष्णसे बढ़कर सुपात्र दूसरा कौन है ५-६॥
तस्यावां किं प्रदास्याव आतिथ्यकरणे नृप ॥ ७ ॥
पात्रमासाद्य वै राजन् यथा धर्मो न लुप्यते।
'नरेश्वर ! हम दोनों उनके आतिथ्य-सत्कारके समय उन्हें कौन सी ऐसी वस्तु भेंट करें, जिससे उत्तम पात्रको पाकर उसका समुचित आदर न करनेके कारण हमारे धर्मका लोप न होने पावे' ॥ ७½ ॥
एवमन्योन्यं संचिन्त्य भ्रातरौ क्रथकैशिकौ ॥ ८ ॥
स्वं राज्यं दातुकामौ तु जग्मतुः केशवान्तिकम्।
इस प्रकार दोनों भाई क्रथ और कैशिक आपसमें विचार करके अपना राज्य समर्पित करनेकी इच्छासे भगवान् केशवके निकट गये ॥ ८½ ॥
विष्णुपर्व ] पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४०३
देवमासाद्य तौ वीरौ विदर्भनगरार्धिपौ ॥ ९ ॥
ऊचतुस्तौ महाभागौ प्रणम्य शिरसा हरिम् ।
भगवान्के पास पहुँचकर विदर्भनगरके स्वामी वे दोनों महाभाग वीर उन श्रीहरिको शिर झुकाकर प्रणाम करनेके पश्चात् उनसे इस प्रकार बोले—॥ ९३ ॥
अद्यावां सफलं जन्म अद्यावां सफलं यशः ।
अद्यावां पितरस्तृप्ता देवे चावां गृहागते ॥ १० ॥
‘भगवन् ! आज आप हमारे घर पधारे, इससे हम दोनोंका जीवन सफल हो गया, हमारा यश भी सफल हो गया और हमारे सम्पूर्ण पितर भी तृप्त हो गये ॥ १० ॥
चामरं व्यजनं छत्रं ध्वजं सिंहासनं बलम् ।
स्फीतकोशा पुरी चेयमावाभ्यां सहिता तव ॥ ११ ॥
‘यह चामर, व्यजन, छत्र, ध्वज, सिंहासन, सेना तथा समृद्धिशाली कोषसे परिपूर्ण यह पुरी हम दोनों भाइयोंके साथ आपकी सेवामें समर्पित है—हम सब आपके हैं ॥ ११ ॥
उपेन्द्रस्त्वं महाबाहो देवेन्द्रेणाभिषिक्तवान् ।
आवामिह हि राज्ये त्वामभिषिक्तं दद्महि ते ॥ १२ ॥
‘महाबाहो ! आप उपेन्द्र हैं। साक्षात् देवेन्द्रने आपका अभिषेक किया है। हम भी इस राज्यपर आपका अभिषेक करते हैं—सारा राज्य आपको दे रहे हैं ॥ १२ ॥
आवयोर्यत्कृतं कार्यं बहुभिः पार्थिवैरपि ।
न शक्यतेऽन्यथा कर्तुं जरासंधेन वा स्वयम् ॥ १३ ॥
‘हम दोनोंने जो आपका अभिषेकरूप कार्य कर दिया है, उसे बहुत-से भूपाल अथवा स्वयं राजा जरासंध भी अन्यथा नहीं कर सकता ॥ १३ ॥
शत्रुस्ते मागधो राजा जरासंधो महाद्युतिः ।
कथां ते ब्रुवते नित्यं नृपाणामभयप्रदः ॥ १४ ॥
‘मगधदेशका अधिपति महातेजस्वी राजा जरासंध आपका शत्रु है। उसने आपके विरुद्ध होकर राजाओंको अभय प्रदान किया है। वह प्रतिदिन आपके सम्बन्धमें इस तरहकी बातें किया करता है ॥ १४ ॥
सिंहासनमनध्यास्यं पुरं चास्य न विद्यते ।
कथं राजसमाजेऽस्मिन्नास्यते देवकीस्रुतः ॥ १५ ॥
“कोई भी सिंहासन श्रीकृष्णके बैठने योग्य नहीं है (क्योंकि इसपर मूर्धाभिषिक्त नरेश ही बैठ सकते हैं), इनका कोई नगर या राजधानी भी नहीं है, अतः देवकी-नन्दन श्रीकृष्ण राजाओंके इस समाजमें सिंहासनपर कैसे बैठेंगे ॥ १५ ॥
कृष्णोऽपि सुमहावीर्यो ह्यभिमानी महाद्युतिः ।
न चागमिष्यते चास्मिन् कन्यार्थे च स्वयंवरे ॥ १६ ॥
‘श्रीकृष्ण भी महापराक्रमी, अभिमानी और महातेजस्वी हैं। वे कन्याके लिये इस स्वयंवरमें कदापि नहीं पधारेंगे ॥ १६॥
पार्थिवेषूपविष्टेषु स्वेषु सिंहासनेषु वै।
कथमास्यति नीचेषु आसनेषु महाद्युतिः ॥ १७ ॥
‘जब राजालोग अपने सिंहासनोंपर बैठे होंगे, उस समय वहाँ महातेजस्वी श्रीकृष्ण नीच आसनोंपर कैसे बैठेंगे” ॥ १७ ॥
इति संचोद्यमानस्तु श्रुत्वासौ भीष्मको नृपः ।
आवयोः सह सम्मन्त्र्य विग्रहोपशमाय च ॥ १८ ॥
तव विश्रामहेतोर्हि कारितेंदं गृहोत्तमम् ।
‘इस प्रकार पूछे जानेपर राजा भीष्मकने उसकी बात सुनकर हम दोनोंके साथ सलाह की और कलहकी शान्तिके लिये उन्होंने आपके विश्रामके लिये इस उत्तम भवनका निर्माण कराया है ॥ १८३ ॥
देवानामादिदेवोऽसि सर्वलोकनमसकृतः ॥ १९ ॥
मानुष्ये मर्त्यलोकेऽस्मिन् राजेन्द्रत्वं समाचर ।
समाजे मनुजेन्द्राणां मा भूदासनसंकटम् ॥ २० ॥
‘प्रभो ! आप देवताओंके भी आदिदेव हैं। समस्त संसार आपके चरणोंमें मस्तक झुकाता है। आप मर्त्यलोकमें इस मानव-जगत्में राजा ही नहीं, राजेन्द्र बनकर रहिये, जिससे नरेन्द्रोंके समुदायमे आसनका संकट (सिंहासनपर बैठनेके प्रश्नको लेकर विवाद) उपस्थित न हो ॥ १९-२०॥
विदर्भनगरे वैषां राजेन्द्रत्वं विचेष्टय ।
आस्यतामासने शुभ्रे श्वः प्रभाते महाद्युते ॥ २१ ॥
‘महातेजस्वी गोविन्द ! विदर्भनगरमे इन राजाओंकी राजेन्द्रताको आप विचलित कर दीजिये और कल प्रातः-काल रंग-भूमिमें एक उज्ज्वल सिंहासनपर विराजमान होइये ॥ २१ ॥
अधिवास्याद्य चात्मानं विधिदृष्टेन कर्मणा ।
यथा गमिष्यन्ति नृपाः करिष्ये देवशासनात् ॥ २२ ॥
‘आज आप शास्त्रीय विधिके अनुसार अपने आपको अधिवासित (राज्याभिषेकके पूर्वाङ्ग संस्कारसे सम्पन्न) कीजिये। फिर कल मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे देवराज इन्द्रके आदेशसे सब राजा आपके अभिषेकके लिये यहाँ पधारेंगे’ ॥ २२ ॥
एवमुक्त्वा सुरश्रेष्ठं प्रणिपत्य कृताञ्जली ।
प्रेषयामासतुर्वीरौ रङ्गमध्ये नृपैर्वृते ॥ २३ ॥
ऐसा कहकर वीर क्रथ और कैशिकने दोनों हाथ जोड़-कर सुरश्रेष्ठ श्रीकृष्णको प्रणाम किया और राजाओंसे भरे हुए रङ्गस्थलमें (देवराज इन्द्रका वह आदेशपत्र) भेजा ॥ २३॥