विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 413, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ३९१ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः श्रीकृष्णका यादवोंके साथ रुक्मिणी-स्वयंवरके अवसरपर कुण्डिनपुरमें जाना तथा राजा कैशिकद्वारा उनका सत्कार . वैशम्पायन उवाच एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता लोकप्रवृत्तिका नराः । चक्रायुधगृहं सर्वे लोकपालगृहोपमम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! इसी बीचमें जगत्में होनेवाली प्रवृत्तियों अथवा घटनाओंकी सूचना देने- वाले सब लोग मथुरामें आये और लोकपालोंके भवनकी भाँति शोभा पानेवाले चक्रधारी श्रीकृष्णके गृहमें एकत्र हुए ॥ १ ॥ तेष्वात्ययिकशंसीषु लोकप्रवृत्तिकेष्विह । कृतसंज्ञा यदुश्रेष्ठाः समेताः कृष्णसंसदि ॥ २ ॥ वे लोग विनाशकारी युद्धका समाचार बताना चाहते थे। उनके आ जानेपर आपसका संकेत पाकर समस्त श्रेष्ठ यादव श्रीकृष्णकी सभामें जुट गये ॥ २ ॥ समागतेषु सर्वेषु यदुमुख्येषु संसदि । प्रवृत्तिका नराः प्राहुः पार्थिवात्ययिकं वचः ॥ ३ ॥ समस्त प्रधान यादवोंके उस सभामे आ जानेपर वे समाचार या सन्देश लानेवाले मनुष्य राजाओंके विनाशका कारणभूत वचन इस प्रकार बोले-॥ ३ ॥ जनार्दन नरेन्द्राणां पार्थिवानां समागमः । भविष्यति क्षितीशानां समृद्धानामनेकशः ॥ ४ ॥ 'जनार्दन ! अनेक देशोंके विवाहार्थी पृथ्वीपतियों, शासकों एवं नरेशोंका समागम होनेवाला है ॥ ४ ॥ त्वरितास्तत्र गच्छन्ति नानाजनपदेश्वराः । कुण्डिने पुण्डरीकाक्ष भोजपुत्रस्य शासनात् ॥ ५ ॥ 'कमलनयन ! भोजपुत्र रुक्मीका निमन्त्रण पाकर अनेक जनपदोंके राजा बड़ी उतावलीके साथ वहाँ कुण्डिनपुरमें जा रहे हैं ॥ ५ ॥ प्रकाशं सा कथास्तत्र श्रूयन्ते मनुजेरिताः । रुक्मिणी किल नामास्ति रुक्मिणः प्रथमा स्वसा ॥ ६ ॥ भावी स्वयंवरस्तत्र तस्याः किल जनार्दन । इत्यर्थमेते सबला गच्छन्ति मनुजाधिपाः ॥ ७ ॥ 'जनार्दन ! वहाँ लोगोंके मुँहसे यह बात स्पष्टरूपसे सुनी जाती है कि रुक्मीकी जो पहली बहन है, जिसका नाम रुक्मिणी है, उसका वहाँ स्वयंवर होनेवाला है। इसीलिये ये नरेशगण सेनाओंसहित वहाँ पधार रहे हैं ॥ ६-७ ॥ तस्यास्त्रैलोक्यसुन्दर्यास्तृतीयेऽहनि यादव । रुक्मभूषणभूषिण्या भविष्यति स्वयंवरः ॥ ८ ॥ 'यदुनन्दन ! आजसे तीसरे दिन सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित रहनेवाली उस त्रिलोकसुन्दरी रुक्मिणीका स्वयंवर होगा ॥ ८ ॥ राज्ञां तत्र समेतानां हस्त्यश्वरथगामिनाम् । द्रक्ष्यामः शतशस्तत्र शिबिराणि महात्मनाम् ॥ ९ ॥ 'हाथी, घोड़े और रथसे यात्रा करके वहाँ एकत्र हुए महामनस्वी नरेशोंके सैकड़ों शिविर हमें वहाँ देखनेको मिलेंगे। सिंहशार्दूलदृप्तानां मत्तद्विरदगामिनाम् । सदा युद्धप्रियाणां हि परस्परममर्षिणाम् ॥ १० ॥ जयाय शीघ्रं सहिता बलौघेन समन्विताः । निरुद्धाः पृथिवीपालाः किमेकान्तचरा वयम् । निरुत्साहा भविष्यामो गच्छामो यदुनन्दन ॥ ११ ॥ 'जो सिंह और बाघके समान अपने बलके घमण्डमें भरे रहते हैं, मतवाले हाथियोंके समान चलते हैं, सदा युद्धसे ही प्रेम रखते हैं और आपसमें एक दूसरेके प्रति अमर्षसे भरे रहते हैं, ऐसे नरेशोंपर शीघ्र विजय पानेके लिये बहुत-से भूपाल अपने सैन्यसमूहके साथ संगठित होकर वहाँ रुक्मिणी- को पानेकी इच्छासे रुके हुए हैं। यदुनन्दन ! क्या हमलोग एकान्तमे रहनेवाले कोल-भील हैं, जो ऐसे अवसरपर उत्साह- हीन हो बैठे रहेंगे, हम भी अवश्य उत्साहपूर्वक वहाँ चलेंगे' ॥ श्रुत्वैतत् केशवो वाक्यं हृदि शल्यमिवार्पितम् । निर्जगाम यदुश्रेष्ठो यदूनां संहितो बलैः ॥ १२ ॥ यह समाचार सुनकर श्रीकृष्णको ऐसा लगा, जैसे उनके हृदयमें किसीने काँटा-सा चुभो दिया हो। वे यदुश्रेष्ठ गोविन्द यदुवंशियोंकी सेनाके साथ नगरसे बाहर निकले ॥ १२ ॥ यादवास्ते बलोदग्राः सर्वे संग्रामलालसाः । निर्ययुः स्यन्दनवरैर्गर्वितास्त्रिदशा इव ॥ १३ ॥ वे समस्त यादव, जो बलमें बढ़े-चढ़े थे और संग्रामकी लालसा रखते थे, श्रेष्ठ रथोंद्वारा यात्राके लिये निकले। उस समय वे गर्वीले देवताओंके समान जान पड़ते थे ॥ १३ ॥ बलाग्रेण नियुक्तेन हरिरीशानसम्मतः । चक्रोद्यतकरः कृष्णे गदापाणिर्व्यरोचत ॥ १४ ॥ अपनी आज्ञाके अनुसार चलनेवाली श्रेष्ठ सेनाके साथ यात्राके लिये उद्यत हुए भगवान् श्रीकृष्ण, जो शिवजीके परम प्रिय हैं, एक हाथमें चक्र और दूसरेमें गदा लिये बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ १४ ॥