विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 414, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३९२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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यादवाश्चापरे तत्र वासुदेवानुयायिनः ।
रथैरादित्यसंकाशैः किङ्किणीप्रतिनादितैः ॥ १५ ॥
दूसरे यादव भी सूर्यके समान तेजस्वी तथा छोटी-छोटी घण्टियोंके नादसे निनादित रथोंद्वारा भगवान् वासुदेवके पीछे-पीछे वहाँ जानेको उद्यत हुए ॥ १५ ॥
उग्रसेनं तु गोविन्दः प्राह निश्चितदर्शनः ।
तिष्ठ त्वं नृपशार्दूल भ्रात्रा मे सहितोऽनघ ॥ १६ ॥
उस समय निश्चित दृष्टि रखनेवाले भगवान् गोविन्दने राजा उग्रसेनसे कहा— 'अनघ ! नृपश्रेष्ठ ! आप मेरे बड़े भाई बलरामजीके साथ यहीं रहिये ॥ १६ ॥
क्षत्रिया विकृतिप्रज्ञाः शास्त्रनिश्चितदर्शनाः ।
पुरीं शून्यामिमां वीर जघन्येऽभिपतन्ति ह ॥ १७ ॥
'वीर ! प्रायः क्षत्रिय छल-कपटमे चतुर होते हैं, उनकी दृष्टि राजनीतिक ही सीमित रहती है । कहीं ऐसा न हो कि वे मेरे जानेके पश्चात् इस पुरीको सूनी समझकर इसपर आक्रमण कर दें ॥ १७ ॥
अस्माकं शङ्किताः सर्वे जरासंधवशानुगाः ।
मोदन्ते सुखिनस्तत्र देवलोके यथामराः ॥ १८ ॥
'हमसे शङ्कित हो वे सब-के सब जरासंधके वशवर्ती हो गये हैं और देवलोकमे निवास करनेवाले देवताओंकी भाँति वे जरासंधके यहाँ बड़े सुख और आनन्दसे रहते हैं' ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भोजराजो महायशाः ।
कृष्णस्नेहेन विक्लुतं बभाषे वचनामृतम् ॥ १९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीकृष्णकी वह बात सुनकर महायशस्वी भोजराज उग्रसेन उनके स्नेहसे गद्गद हुई अमृतमयी वाणीमें बोले ॥ १९ ॥
कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां नन्दिवर्द्धन ।
श्रूयतां यदहं त्वद्य वक्ष्यामि रिपुसूदन ॥ २० ॥
'कृष्ण ! कृष्ण !! महाबाहो !!! तुम यादवोंका आनन्द बढ़ानेवाले हो। शत्रुसूदन ! इस समय मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसको सुनो ॥ २० ॥
त्वया विहीनाः सर्वे स्म न शक्ताः सुखमासितुम् ।
पुरेऽस्मिन् विषयान्ते वा पतिहीना इव स्त्रियः ॥ २१ ॥
'तुम्हारे बिना हम सब लोग इस नगर या राज्यमे सुखसे नहीं रह सकते, ठीक उसी तरह जैसे पतिहीन स्त्रियाँ कहीं भी सुखसे नहीं रह पाती हैं ॥ २१ ॥
त्वत्सनाथा वयं तात त्वद्बाहुबलमाश्रिताः ।
विभीमो न नरेन्द्राणां सेन्द्राणामपि मानद ॥ २२ ॥
'दूसरोंको मान देनेवाले तात ! तुमसे ही हमलोग सनाथ हैं। तुम्हारे बाहुबलका आश्रय लेकर हम नरेन्द्रोंकी तो बात ही क्या है ? देवेन्द्रसहित देवताओंसे भी नहीं डरते हैं ॥ २२ ॥
विजयाय यदुश्रेष्ठ यत्र यत्र गमिष्यसि ।
तत्र त्वं सहितोऽस्माभिर्गच्छेथा यादवर्षभ ॥ २३ ॥
'यदुश्रेष्ठ ! यादवप्रवर ! तुम विजयके लिये जहाँ-जहाँ भी जाओ, वहाँ हम लोगोंके साथ ही चलो' ॥ २३ ॥
तस्य राज्ञो वचः श्रुत्वा सस्मितं देवकीसुतः ।
यथेष्टं भवतामद्य तथा कर्तास्म्यसंशयम् ॥ २४ ॥
राजा उग्रसेनका यह वचन सुनकर देवकीनन्दन श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए बोले, 'महाराज ! आप लोगोंकी जैसी इच्छा होगी, वैसा ही मैं करूँगा इसमें संशय नहीं है' ॥ २४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु वै कृष्णो जगामाशु रथेन वै ।
भीष्मकस्य गृहं प्राप्तो लोहितायति भास्करे ॥ २५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर श्रीकृष्ण शीघ्र ही रथसे चल दिये और सूर्यका रंग लाल होते राजा भीष्मकके घरपर जा पहुँचे ॥ २५ ॥
प्राप्ते राजसमाजे तु शिविराकीर्णभूतले ।
रङ्गं सुविपुलं दृष्ट्वा राजसीं तनुमाविशत् ॥ २६ ॥
राजाओंका समाज आ चुका था । उनके शिविरोंसे कुण्डिनपुरके आस-पासका भूभाग आच्छादित हो गया था । स्वयंवरका रङ्गमथल भी बहुत विस्तृत था । उसे देखकर भगवान् श्रीकृष्णने राजस प्रकृतिका आश्रय लिया ॥ २६ ॥
वित्रासनार्थं भूपानां प्रकाशार्थं पुरातनम् ।
मनसा चिन्तयामास वैनतेयं महाबलम् ॥ २७ ॥
उन्होंने राजाओंको डराने और अपने प्रभावको प्रकाशित करनेके लिये पुरातन वाहन महाबली विनतानन्दन गरुड़का मन-ही-मन चिन्तन किया ॥ २७ ॥
ततश्चिन्तितमात्रस्तु विदित्वा विनतात्मजः ।
सुखलक्ष्यं वपुः कृत्वा निलिल्ये केशवान्तिके ॥ २८ ॥
उनके चिन्तन करनेमात्रसे ही उनके मनोभावको जान-कर विनताकुमार गरुड़ सुखपूर्वक देखने योग्य सौम्य शरीर धारण करके श्रीकृष्णके पास छिपे हुए आये ॥ २८ ॥
तस्य पक्षनिपातेन पवनोद्ध्रान्तकारिणा ।
कम्पिता मनुजाः सर्वे न्युब्जाश्च पतिता भुवि ॥ २९ ॥
उनका पंखसंचालन वायुको भी उद्भ्रान्त कर देनेवाला था । इसकी हवा लगनेसे वहाँके सारे मनुष्य काँप उठे और औंधे होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २९ ॥
गरुडाभिहताः सर्वे प्रचेष्टन्तो यथोरगाः ।
तान् संनिपतितान् दृष्ट्वा कृष्णो गिरिरिवाचलः ॥ ३० ॥