भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 424
४०२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

विचिन्त्य मनसा राजा दह्यमानेन चेतसा।
जगाम नरदेवानां समाजे प्रतिबोधितुम् ॥ ६६ ॥

राजाओंमें श्रेष्ठ भीष्मक उन नरेशोंमें भेद हुआ देखकर और स्वयं अपने ही किये हुए अचिन्त्य अपराधका विचार करके मन-ही-मन चिन्तासे दग्ध होते हुए उन नरदेवोंके समाजमें उन्हें समझानेके लिये गये ॥ ६५-६६ ॥

एतस्मिन्नन्तरे दूताः सम्प्राप्ताः क्रथकैशिकौ।
लेखमुद्धृत्य शिरसा विविशुस्ते नृपार्णवम् ॥ ६७ ॥

इसी बीचमें इन्द्रके दूत राजा क्रथ और कैशिकके पास जा पहुँचे और सिर झुका एक पत्र निकालकर उन्हें दिया; फिर वे राजाओंके समुद्र-जैसे समाजमें घुस गये ॥ ६७ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिणीस्वयंवरे एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीस्वयंवरविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥


पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

क्रथ और कैशिकद्वारा भगवान् श्रीकृष्णको अपने राज्यका समर्पण, देवराज इन्द्रके आदेशसे सब नरेशोंद्वारा भगवान्‌का राजेन्द्रके पदपर अभिषेक तथा भगवान्‌का सबको आश्वासन देना

जनमेजय उवाच
हत्वा कंसं महावीर्यं देवैरपि दुरासदम्।
नाभिषिक्तः स्वयं राज्ये नोपविष्टो नृपासने ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा— मुने ! जो देवताओंके लिये भी दुर्जय था, उस महापराक्रमी कंसका वध करके भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं न तो राज्यपर अभिषिक्त हुए और न राजाके आसनपर ही बैठे, इसका क्या कारण है ? ॥ १ ॥

कन्यार्थं चागतः कृष्णस्तत्रापि न कृतोऽतिथिः।
अमानमतुलं प्राप्य क्षान्तवान् केन हेतुना ॥ २ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण कुण्डिनपुरमें कन्याके लिये आये थे परंतु वहाँ भी वे निमन्त्रित अतिथि नहीं बनाये गये थे (अपने आप बिना बुलाये आये थे और अपने प्रभावके कारण पूजित हुए थे)। ऐसे अनुपम अपमानको पाकर भी श्रीकृष्णने किसलिये क्षमा कर दी ॥ २ ॥

विनतायाः सुतश्चैव महाबलपराक्रमः।
स चापि क्षमया युक्तः कारणं किमपेक्षितः।
एतदाख्याहि भगवन् परं कौतूहलं हि मे ॥ ३ ॥

विनताके पुत्र गरुड़ भी तो महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न हैं। उन्होंने भी किस कारणकी अपेक्षासे क्षमाभाव धारण कर लिया ? भगवन ! यह मुझे बताइये, इसको सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच
विदर्भनगरीं प्राप्ते वैनतेये सहाच्युते।
मनसा चिन्तयामास वासुदेवाय कैशिकः ॥ ४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! (क्रथ और कैशिक भगवान्‌के भक्त थे। उनपर कृपा करनेके लिये ही भगवान् वहाँ स्वयं पधारे थे।) जब भगवान् श्रीकृष्णके साथ विनतानन्दन गरुड़ भी विदर्भपुरीमें गये, उस समय कैशिकने उन वासुदेवके लिये मन-ही-मन इस प्रकार चिन्तन किया ॥ ४ ॥

दृष्ट्वाऽऽश्चर्येहिनः सर्वान् राजन्यान् प्रवदाम्यहम्।
वसुदेवसुते दृष्टे ध्रुवं पापक्षयो भवेत् ॥ ५ ॥
विशुद्धभावः कृष्णस्य आवयोर्दृष्टतत्त्वतः।
अतः पात्रतरः कोऽन्यस्त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ ६ ॥
कृष्णात् कमलपत्राक्षाद् देवदेवाज्जनार्दनात् ।

(यदि हम दोनों भाई श्रीकृष्णका अभिषेक कर दें तो) भगवान् श्रीकृष्णके आश्चर्यमय अभिषेकको देखकर हमारे पापोंका नाश हो जायगा तथा सबके मनमें विशुद्ध भावका उदय होगा, अतः मैं राजाओंसे कहूँगा—'वसुदेवपुत्र भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन कर लेनेपर निश्चय ही सबके पापोंका क्षय हो जाता है। हम दोनोंने श्रीकृष्णके तत्त्वका साक्षात्कार किया है। तीनों लोकोंमें उन कमलनयन देवाधिदेव जनार्दन श्रीकृष्णसे बढ़कर सुपात्र दूसरा कौन है ५-६॥

तस्यावां किं प्रदास्याव आतिथ्यकरणे नृप ॥ ७ ॥
पात्रमासाद्य वै राजन् यथा धर्मो न लुप्यते।

'नरेश्वर ! हम दोनों उनके आतिथ्य-सत्कारके समय उन्हें कौन सी ऐसी वस्तु भेंट करें, जिससे उत्तम पात्रको पाकर उसका समुचित आदर न करनेके कारण हमारे धर्मका लोप न होने पावे' ॥ ७½ ॥

एवमन्योन्यं संचिन्त्य भ्रातरौ क्रथकैशिकौ ॥ ८ ॥
स्वं राज्यं दातुकामौ तु जग्मतुः केशवान्तिकम्।

इस प्रकार दोनों भाई क्रथ और कैशिक आपसमें विचार करके अपना राज्य समर्पित करनेकी इच्छासे भगवान् केशवके निकट गये ॥ ८½ ॥