विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 425, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४०३
देवमासाद्य तौ वीरौ विदर्भनगरार्धिपौ ॥ ९ ॥
ऊचतुस्तौ महाभागौ प्रणम्य शिरसा हरिम् ।
भगवान्के पास पहुँचकर विदर्भनगरके स्वामी वे दोनों महाभाग वीर उन श्रीहरिको शिर झुकाकर प्रणाम करनेके पश्चात् उनसे इस प्रकार बोले—॥ ९३ ॥
अद्यावां सफलं जन्म अद्यावां सफलं यशः ।
अद्यावां पितरस्तृप्ता देवे चावां गृहागते ॥ १० ॥
‘भगवन् ! आज आप हमारे घर पधारे, इससे हम दोनोंका जीवन सफल हो गया, हमारा यश भी सफल हो गया और हमारे सम्पूर्ण पितर भी तृप्त हो गये ॥ १० ॥
चामरं व्यजनं छत्रं ध्वजं सिंहासनं बलम् ।
स्फीतकोशा पुरी चेयमावाभ्यां सहिता तव ॥ ११ ॥
‘यह चामर, व्यजन, छत्र, ध्वज, सिंहासन, सेना तथा समृद्धिशाली कोषसे परिपूर्ण यह पुरी हम दोनों भाइयोंके साथ आपकी सेवामें समर्पित है—हम सब आपके हैं ॥ ११ ॥
उपेन्द्रस्त्वं महाबाहो देवेन्द्रेणाभिषिक्तवान् ।
आवामिह हि राज्ये त्वामभिषिक्तं दद्महि ते ॥ १२ ॥
‘महाबाहो ! आप उपेन्द्र हैं। साक्षात् देवेन्द्रने आपका अभिषेक किया है। हम भी इस राज्यपर आपका अभिषेक करते हैं—सारा राज्य आपको दे रहे हैं ॥ १२ ॥
आवयोर्यत्कृतं कार्यं बहुभिः पार्थिवैरपि ।
न शक्यतेऽन्यथा कर्तुं जरासंधेन वा स्वयम् ॥ १३ ॥
‘हम दोनोंने जो आपका अभिषेकरूप कार्य कर दिया है, उसे बहुत-से भूपाल अथवा स्वयं राजा जरासंध भी अन्यथा नहीं कर सकता ॥ १३ ॥
शत्रुस्ते मागधो राजा जरासंधो महाद्युतिः ।
कथां ते ब्रुवते नित्यं नृपाणामभयप्रदः ॥ १४ ॥
‘मगधदेशका अधिपति महातेजस्वी राजा जरासंध आपका शत्रु है। उसने आपके विरुद्ध होकर राजाओंको अभय प्रदान किया है। वह प्रतिदिन आपके सम्बन्धमें इस तरहकी बातें किया करता है ॥ १४ ॥
सिंहासनमनध्यास्यं पुरं चास्य न विद्यते ।
कथं राजसमाजेऽस्मिन्नास्यते देवकीस्रुतः ॥ १५ ॥
“कोई भी सिंहासन श्रीकृष्णके बैठने योग्य नहीं है (क्योंकि इसपर मूर्धाभिषिक्त नरेश ही बैठ सकते हैं), इनका कोई नगर या राजधानी भी नहीं है, अतः देवकी-नन्दन श्रीकृष्ण राजाओंके इस समाजमें सिंहासनपर कैसे बैठेंगे ॥ १५ ॥
कृष्णोऽपि सुमहावीर्यो ह्यभिमानी महाद्युतिः ।
न चागमिष्यते चास्मिन् कन्यार्थे च स्वयंवरे ॥ १६ ॥
‘श्रीकृष्ण भी महापराक्रमी, अभिमानी और महातेजस्वी हैं। वे कन्याके लिये इस स्वयंवरमें कदापि नहीं पधारेंगे ॥ १६॥
पार्थिवेषूपविष्टेषु स्वेषु सिंहासनेषु वै।
कथमास्यति नीचेषु आसनेषु महाद्युतिः ॥ १७ ॥
‘जब राजालोग अपने सिंहासनोंपर बैठे होंगे, उस समय वहाँ महातेजस्वी श्रीकृष्ण नीच आसनोंपर कैसे बैठेंगे” ॥ १७ ॥
इति संचोद्यमानस्तु श्रुत्वासौ भीष्मको नृपः ।
आवयोः सह सम्मन्त्र्य विग्रहोपशमाय च ॥ १८ ॥
तव विश्रामहेतोर्हि कारितेंदं गृहोत्तमम् ।
‘इस प्रकार पूछे जानेपर राजा भीष्मकने उसकी बात सुनकर हम दोनोंके साथ सलाह की और कलहकी शान्तिके लिये उन्होंने आपके विश्रामके लिये इस उत्तम भवनका निर्माण कराया है ॥ १८३ ॥
देवानामादिदेवोऽसि सर्वलोकनमसकृतः ॥ १९ ॥
मानुष्ये मर्त्यलोकेऽस्मिन् राजेन्द्रत्वं समाचर ।
समाजे मनुजेन्द्राणां मा भूदासनसंकटम् ॥ २० ॥
‘प्रभो ! आप देवताओंके भी आदिदेव हैं। समस्त संसार आपके चरणोंमें मस्तक झुकाता है। आप मर्त्यलोकमें इस मानव-जगत्में राजा ही नहीं, राजेन्द्र बनकर रहिये, जिससे नरेन्द्रोंके समुदायमे आसनका संकट (सिंहासनपर बैठनेके प्रश्नको लेकर विवाद) उपस्थित न हो ॥ १९-२०॥
विदर्भनगरे वैषां राजेन्द्रत्वं विचेष्टय ।
आस्यतामासने शुभ्रे श्वः प्रभाते महाद्युते ॥ २१ ॥
‘महातेजस्वी गोविन्द ! विदर्भनगरमे इन राजाओंकी राजेन्द्रताको आप विचलित कर दीजिये और कल प्रातः-काल रंग-भूमिमें एक उज्ज्वल सिंहासनपर विराजमान होइये ॥ २१ ॥
अधिवास्याद्य चात्मानं विधिदृष्टेन कर्मणा ।
यथा गमिष्यन्ति नृपाः करिष्ये देवशासनात् ॥ २२ ॥
‘आज आप शास्त्रीय विधिके अनुसार अपने आपको अधिवासित (राज्याभिषेकके पूर्वाङ्ग संस्कारसे सम्पन्न) कीजिये। फिर कल मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे देवराज इन्द्रके आदेशसे सब राजा आपके अभिषेकके लिये यहाँ पधारेंगे’ ॥ २२ ॥
एवमुक्त्वा सुरश्रेष्ठं प्रणिपत्य कृताञ्जली ।
प्रेषयामासतुर्वीरौ रङ्गमध्ये नृपैर्वृते ॥ २३ ॥
ऐसा कहकर वीर क्रथ और कैशिकने दोनों हाथ जोड़-कर सुरश्रेष्ठ श्रीकृष्णको प्रणाम किया और राजाओंसे भरे हुए रङ्गस्थलमें (देवराज इन्द्रका वह आदेशपत्र) भेजा ॥ २३॥