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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

विष्णुपर्व ] पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४०३


देवमासाद्य तौ वीरौ विदर्भनगरार्धिपौ ॥ ९ ॥
ऊचतुस्तौ महाभागौ प्रणम्य शिरसा हरिम् ।

भगवान्‌के पास पहुँचकर विदर्भनगरके स्वामी वे दोनों महाभाग वीर उन श्रीहरिको शिर झुकाकर प्रणाम करनेके पश्चात् उनसे इस प्रकार बोले—॥ ९३ ॥

अद्यावां सफलं जन्म अद्यावां सफलं यशः ।
अद्यावां पितरस्तृप्ता देवे चावां गृहागते ॥ १० ॥

‘भगवन् ! आज आप हमारे घर पधारे, इससे हम दोनोंका जीवन सफल हो गया, हमारा यश भी सफल हो गया और हमारे सम्पूर्ण पितर भी तृप्त हो गये ॥ १० ॥

चामरं व्यजनं छत्रं ध्वजं सिंहासनं बलम् ।
स्फीतकोशा पुरी चेयमावाभ्यां सहिता तव ॥ ११ ॥

‘यह चामर, व्यजन, छत्र, ध्वज, सिंहासन, सेना तथा समृद्धिशाली कोषसे परिपूर्ण यह पुरी हम दोनों भाइयोंके साथ आपकी सेवामें समर्पित है—हम सब आपके हैं ॥ ११ ॥

उपेन्द्रस्त्वं महाबाहो देवेन्द्रेणाभिषिक्तवान् ।
आवामिह हि राज्ये त्वामभिषिक्तं दद्महि ते ॥ १२ ॥

‘महाबाहो ! आप उपेन्द्र हैं। साक्षात् देवेन्द्रने आपका अभिषेक किया है। हम भी इस राज्यपर आपका अभिषेक करते हैं—सारा राज्य आपको दे रहे हैं ॥ १२ ॥

आवयोर्यत्कृतं कार्यं बहुभिः पार्थिवैरपि ।
न शक्यतेऽन्यथा कर्तुं जरासंधेन वा स्वयम् ॥ १३ ॥

‘हम दोनोंने जो आपका अभिषेकरूप कार्य कर दिया है, उसे बहुत-से भूपाल अथवा स्वयं राजा जरासंध भी अन्यथा नहीं कर सकता ॥ १३ ॥

शत्रुस्ते मागधो राजा जरासंधो महाद्युतिः ।
कथां ते ब्रुवते नित्यं नृपाणामभयप्रदः ॥ १४ ॥

‘मगधदेशका अधिपति महातेजस्वी राजा जरासंध आपका शत्रु है। उसने आपके विरुद्ध होकर राजाओंको अभय प्रदान किया है। वह प्रतिदिन आपके सम्बन्धमें इस तरहकी बातें किया करता है ॥ १४ ॥

सिंहासनमनध्यास्यं पुरं चास्य न विद्यते ।
कथं राजसमाजेऽस्मिन्नास्यते देवकीस्रुतः ॥ १५ ॥

“कोई भी सिंहासन श्रीकृष्णके बैठने योग्य नहीं है (क्योंकि इसपर मूर्धाभिषिक्त नरेश ही बैठ सकते हैं), इनका कोई नगर या राजधानी भी नहीं है, अतः देवकी-नन्दन श्रीकृष्ण राजाओंके इस समाजमें सिंहासनपर कैसे बैठेंगे ॥ १५ ॥

कृष्णोऽपि सुमहावीर्यो ह्यभिमानी महाद्युतिः ।
न चागमिष्यते चास्मिन् कन्यार्थे च स्वयंवरे ॥ १६ ॥

‘श्रीकृष्ण भी महापराक्रमी, अभिमानी और महातेजस्वी हैं। वे कन्याके लिये इस स्वयंवरमें कदापि नहीं पधारेंगे ॥ १६॥

पार्थिवेषूपविष्टेषु स्वेषु सिंहासनेषु वै।
कथमास्यति नीचेषु आसनेषु महाद्युतिः ॥ १७ ॥

‘जब राजालोग अपने सिंहासनोंपर बैठे होंगे, उस समय वहाँ महातेजस्वी श्रीकृष्ण नीच आसनोंपर कैसे बैठेंगे” ॥ १७ ॥

इति संचोद्यमानस्तु श्रुत्वासौ भीष्मको नृपः ।
आवयोः सह सम्मन्त्र्य विग्रहोपशमाय च ॥ १८ ॥
तव विश्रामहेतोर्हि कारितेंदं गृहोत्तमम् ।

‘इस प्रकार पूछे जानेपर राजा भीष्मकने उसकी बात सुनकर हम दोनोंके साथ सलाह की और कलहकी शान्तिके लिये उन्होंने आपके विश्रामके लिये इस उत्तम भवनका निर्माण कराया है ॥ १८३ ॥

देवानामादिदेवोऽसि सर्वलोकनमसकृतः ॥ १९ ॥
मानुष्ये मर्त्यलोकेऽस्मिन् राजेन्द्रत्वं समाचर ।
समाजे मनुजेन्द्राणां मा भूदासनसंकटम् ॥ २० ॥

‘प्रभो ! आप देवताओंके भी आदिदेव हैं। समस्त संसार आपके चरणोंमें मस्तक झुकाता है। आप मर्त्यलोकमें इस मानव-जगत्‌में राजा ही नहीं, राजेन्द्र बनकर रहिये, जिससे नरेन्द्रोंके समुदायमे आसनका संकट (सिंहासनपर बैठनेके प्रश्नको लेकर विवाद) उपस्थित न हो ॥ १९-२०॥

विदर्भनगरे वैषां राजेन्द्रत्वं विचेष्टय ।
आस्यतामासने शुभ्रे श्वः प्रभाते महाद्युते ॥ २१ ॥

‘महातेजस्वी गोविन्द ! विदर्भनगरमे इन राजाओंकी राजेन्द्रताको आप विचलित कर दीजिये और कल प्रातः-काल रंग-भूमिमें एक उज्ज्वल सिंहासनपर विराजमान होइये ॥ २१ ॥

अधिवास्याद्य चात्मानं विधिदृष्टेन कर्मणा ।
यथा गमिष्यन्ति नृपाः करिष्ये देवशासनात् ॥ २२ ॥

‘आज आप शास्त्रीय विधिके अनुसार अपने आपको अधिवासित (राज्याभिषेकके पूर्वाङ्ग संस्कारसे सम्पन्न) कीजिये। फिर कल मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे देवराज इन्द्रके आदेशसे सब राजा आपके अभिषेकके लिये यहाँ पधारेंगे’ ॥ २२ ॥

एवमुक्त्वा सुरश्रेष्ठं प्रणिपत्य कृताञ्जली ।
प्रेषयामासतुर्वीरौ रङ्गमध्ये नृपैर्वृते ॥ २३ ॥

ऐसा कहकर वीर क्रथ और कैशिकने दोनों हाथ जोड़-कर सुरश्रेष्ठ श्रीकृष्णको प्रणाम किया और राजाओंसे भरे हुए रङ्गस्थलमें (देवराज इन्द्रका वह आदेशपत्र) भेजा ॥ २३॥

४०५श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

देवदूतस्य वचनं यथोक्तं वज्रपाणिना ।
निशम्य सुमहान्तेजाः कैशिकः प्राह शासनम् ॥ २४ ॥

मनस्वी कैशिकने देवदूतके वचनको, जैसा कि वज्रधारी इन्द्रने उसके द्वारा कहलाया था, स्वयं विचारकर राजाओंको सुनाया तथा इन्द्रके आदेशपत्रको भी पढ़ा ॥ २४ ॥

कैशिक उवाच
विदितं वो नृपाः सर्वे वैनतेयसहायच्युतः ।
आगतोऽतिथिरूपेण विदर्भनगरीं हरिः ॥ २५ ॥

कैशिक बोले—राजाओ ! आप सब लोगोंको यह विदित है कि अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले भगवान् श्रीहरि गरुड़के साथ अतिथिरूपसे विदर्भपुरीमें पधारे हैं ॥ २५ ॥

प्राप्तमालोक्य पात्रोऽयमिति संचिन्त्य भूपतिः ।
प्रददौ वासुदेवाय स्वं राज्यं धर्महेतुना ॥ २६ ॥
इदमासनमास्वेति भ्रात्रा मे चोदिते ततः ।
वागुक्ता चाशरीरेण केनापि व्योमचारिणा ॥ २७ ॥

उन्हें आया देख 'यह उत्तम पात्र हैं' ऐसा सोचकर राजा क्रथने भगवान् वासुदेवको धर्मके लिये अपना सारा राज्य समर्पित कर दिया । फिर मेरे भाई क्रथने भगवान्‌से कहा, 'प्रभो ! यह सिंहासन आपकी सेवामें समर्पित है; इस-पर बैठिये।' उनके इतना कहते ही किसी आकाशचारी दिव्य प्राणीने, जिसका शरीर दिखायी नहीं देता था, यह बात कही ॥ २६-२७ ॥

देवदूत उवाच
न युक्तमासनं दातुं त्वयासीनं नराधिप ।
इदमभ्यासनं दिव्यं सर्वरत्नविभूषितम् ॥ २८ ॥
जाम्बूनदमयं शुभ्रं रचितं विश्वकर्मणा ।
प्रेषितं देवराजेन सिंहलक्षणलक्षितम् ॥ २९ ॥
अत्रोपविष्टं देवेशं चराचरनमस्कृतम् ।
अभिषिञ्चन्तु राजेन्द्रं यदुभिः पार्थिवैः सह ॥ ३० ॥

देवदूत बोला—नरेश्वर ! जिसपर दूसरे लोग बैठ चुके हैं, ऐसा सिंहासन तुम्हें श्रीकृष्णके लिये देना उचित नहीं है। इनके लिये तो यह सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित दिव्य सिंहासन प्रस्तुत है, जो जाम्बूनद नामक सुवर्णका बना हुआ और परम उज्ज्वल है। साक्षात् विश्वकर्माने इसका निर्माण किया है। यह सिंहके चिह्नोंसे चिह्नित है, देवराज इन्द्रने यह आसन भगवान्‌के लिये भेजा है। समस्त चराचर प्राणी जिनके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं, वे देवेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण जब इसपर बैठ जायँ, तब तुम लोग बहुत-से राजाओंके साथ मिलकर इनका राजेन्द्रके पदपर अभिषेक करो ॥ २८-३० ॥

समागताः कुण्डिननगरे कन्याहेतोर्नराधिपाः ।
नागमिष्यति यः कश्चित् सोऽस्य वध्यो भविष्यति ॥ ३१ ॥

इस कुण्डिनपुरमें राजकन्याकी प्राप्तिके लिये जो-जो नरेश पधारे हैं, उनमेंसे जो कोई भी इनके अभिषेकमें न आयेगा, वह इनका वध्य होगा ॥ ३१ ॥

इमे चैवाष्टकलशा निधीनामंशसम्भवाः ।
अक्षया राजराजस्य धनेशस्य महात्मनः ॥ ३२ ॥
दिव्या काञ्चनरत्नाढ्या दिव्याभरणयोनयः ।
राजेन्द्रस्याभिषेकार्थमागच्छन्ति नृपैर्वृताः ॥ ३३ ॥

ये आठ अक्षय कलश हैं, जो निधियोंके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। ये राजाधिराज महात्मा धनेश (कुबेर) के कलश दिव्य कलश हैं, जो सुवर्ण और रत्नोंसे सम्पन्न हैं। इनके आभूषण और आसन भी दिव्य हैं। ये कलश श्रीकृष्णका राजेन्द्रपदपर अभिषेक करनेके लिये राजाओंके साथ आ रहे हैं ॥ ३२-३३ ॥

एष शक्रस्य संदेशः कथितो वो नराधिपाः ।
लेखेनाहूय तान् सर्वानभिषिञ्चन्तु केशवम् ॥ ३४ ॥

नरेश्वरो ! यह मैंने आपलोगोंसे इन्द्रका संदेश सुनाया है। अतः आपलोग इस लिखित आज्ञापत्रके द्वारा सब राजाओंको बुलाकर भगवान् श्रीकृष्णका अभिषेक करें ॥ ३४ ॥

कैशिक उवाच
इति संचोद्य खस्थोऽसौ देवदूतो गतो दिवम् ।
दत्त्वाऽऽसनं च कृष्णाय बालार्कसदृशप्रभम् ॥ ३५ ॥

कैशिकने कहा—ऐसी प्रेरणा देकर तथा श्रीकृष्णके लिये प्रातःकालीन सूर्यके समान कान्तिमान् सिंहासन समर्पित करके वह आकाशमें स्थित हुआ देवदूत स्वर्गलोकको चला गया ॥ ३५ ॥

नैताहं नोदयिष्यामि भवद्भियै समागताः ।
दुर्নিবার्यतरं घोरं शक्रस्य स्वयमीरितम् ॥ ३६ ॥

इसलिये मैं आपलोगोंको श्रीकृष्णका अभिषेक करनेके लिये प्रेरित कर रहा हूँ। आपमेंसे जो लोग यहाँ पधारे हैं, उन सबके लिये साक्षात् इन्द्रके द्वारा दी गयी इस आज्ञा-का उल्लङ्घन करना अत्यन्त कठिन एवं भयंकर है ॥ ३६ ॥

युष्माभिर्दर्शनं युक्तमद्भुतं भुवि दुर्लभम् ।
कलशैर्भिषिच्यन्तं स्वयमेव नभस्तलात् ॥ ३७ ॥
दृष्ट्वाऽऽश्चर्ये हि नः सर्वान्, ध्रुवं पापक्षयो भवेत् ।

आकाशसे आठ कलशोंद्वारा श्रीकृष्णका स्वयं ही अभिषेक होगा—यह अद्भुत दृश्य पृथ्वीपर सर्वथा दुर्लभ है। आपलोगोंको भी यह दर्शनीय उत्सव अवश्य देखना चाहिये। इस आश्चर्यजनक दृश्यको देखकर हम सब लोगों-का पाप निश्चय ही दूर हो जायगा ॥ ३७३ ॥

विष्णुपर्व ] पञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ४०५


स्नापनार्थं च कृष्णाय देवदेवाय विष्णवे ॥ ३८ ॥
आगच्छध्वं नृपश्रेष्ठा न भयं कर्तुमर्हथ ।
श्रेष्ठ नरपतियो ! आपलोग देवाधिदेव विष्णुरूप श्रीकृष्णको नहलानेके लिये आइये। उनसे भय न कीजिये॥ ३८॥

आवयोः कृतसन्धानो युष्मदर्थे जनार्दनः ॥ ३९ ॥
सर्वेषां मनुजेन्द्राणामभयं कुरुते हरिः ।
विशुद्धभावः कृष्णस्तु आवयोर्दृष्टतस्त्वतः ॥ ४० ॥
हमने आपलोगोंके लिये जनार्दनसे संधि कर ली है। भगवान् श्रीहरि समस्त नरेशोंको अभयदान कर रहे हैं। हमने श्रीकृष्णके स्वरूपको अच्छी तरह देख और समझ लिया है । आपलोगोंके प्रति इनका भाव सर्वथा शुद्ध है ॥ ३९-४० ॥

मागधस्य विशेषेण न वैरं हृदि दृश्यते ।
यदत्र कारणं कार्यं तद् भवद्भिर्विचिन्त्यताम् ॥ ४१ ॥
विशेषतः मगधराज जरासंधके लिये उनके हृदयमें तनिक भी वैर नहीं दिखायी देता है। इसलिये यहाँ जो कार्य-कारण उपस्थित है, उसपर आपलोग अच्छी तरह विचार कर लें ॥ ४१ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवं संचिन्तयामासुर्नृपाः शापभयार्दिताः ।
भूयः शुश्रुवु राजेन्द्रः केशवाय महात्मने ॥ ४२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसी बात सुनकर वे राजा शापके भयसे पीड़ित हो नाना प्रकारकी चिन्ताएँ करने लगे। इतनेमें ही उन राजेन्द्रोने महात्मा केशवके निमित्त पुनः आकाशवाणी सुनी ॥ ४२ ॥

मेघगम्भीरनादेन स्वरेणापूरयन् नभः ।
वागुवाचाशरीरेण देवराजस्य शासनात् ॥ ४३ ॥
देवराजके शासनसे किसी अदृश्य व्यक्तिने मेघके समान गम्भीर ध्वनिसे आकाशको पूर्ण करते हुए इस प्रकार कहा—॥ ४३ ॥

चित्राङ्गद उवाच
त्रैलोक्याधिपतिः शक्रः प्रजापालनहेतुना ।
आज्ञापयति युष्माकं नृपाणां हितकाम्यया ॥ ४४ ॥
चित्राङ्गद बोला—त्रिलोकीनाथ इन्द्र प्रजा-पालनके लिये तुम सब राजाओंका हित चाहते हुए तुम्हें इस प्रकार आज्ञा दे रहे हैं ॥ ४४ ॥

न युक्तं वसतान्योन्यं कृष्णेन सह वैरिणा ।
वसध्वं प्रीतिमुत्पाद्य स्वराष्ट्रेषु नृपोत्तमाः ॥ ४५ ॥
श्रेष्ठ नरेशगण! तुमलोग श्रीकृष्णके साथ वैरभाव रखकर अथवा श्रीकृष्णको वैरी बनाकर जो उनके साथ रहते हो, ऐसा तुम्हारे लिये उचित नहीं है । तुम्हें एक दूसरेके साथ वैरभाव नहीं रखना चाहिये । तुमलोग परस्पर प्रेम-भाव उत्पन्न करके अपने-अपने राष्ट्रोंमें निवास करो ॥ ४५ ॥

प्रणतार्तिहरः कृष्णः प्रतिसेनान्तकोऽनलः ।
अनेन सह सम्प्रीत्या मोदध्वं विगतज्वराः ॥ ४६ ॥
श्रीकृष्ण शरणागतोंका दुःख दूर करनेवाले हैं; परंतु शत्रुओंकी सेनाके लिये काल और अग्निके समान भयंकर हैं । तुमलोग इनके साथ प्रेमभाव रखकर निश्चिन्त एवं प्रसन्न रहो ॥ ४६ ॥

मानुषाणां नृपा देवा नृपाणां देवताः सुराः ।
सुराणां देवता शक्रः शक्रस्यापि जनार्दनः ॥ ४७ ॥
साधारण मनुष्योंके लिये राजा ही देवता हैं । राजाओंके लिये देवता ही आराध्यदेव हैं । देवताओंके देवता इन्द्र हैं और इन्द्रके भी देवता भगवान् श्रीकृष्ण हैं ॥ ४७ ॥

एष विष्णुः प्रभुर्देवो देवानामति दैवतम् ।
जातोऽयं मानुषे लोके नररूपेण केशवः ॥ ४८ ॥
ये भगवान् विष्णुदेव देवताओंके भी देवता हैं । ये केशव ही मनुष्यलोकमें मानवरूपमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ ४८ ॥

अजेयः सर्वलोकेषु देवदानवमानवैः ।
कार्त्तिकेयसहायस्य अपि शूलभृतः स्वयम् ॥ ४९ ॥
समस्त लोकोंमें देवता, दानव और मनुष्य इन्हें कभी जीत नहीं सकते । कार्त्तिकेयके साथ साक्षात् भगवान् त्रिशूलधारी शंकरके लिये भी ये अजेय हैं ॥ ४९ ॥

तस्मै देवाधिदेवाय केशवाय महात्मने ।
अभिषेक्तुं सुरैः सार्द्धं किमिच्छेयमतः परम् ॥ ५० ॥
उन्हीं देवाधिदेव महात्मा केशवके लिये देवताओंसहित मेरी यह इच्छा है कि इनका राजेन्द्रपदपर अभिषेक हो । इससे बढ़कर मुझे और कौन-सी इच्छा हो सकती है ॥ ५०॥

न चाधिकारो देवानां राजेन्द्रस्याभिषेचने ।
तेनाहं नाभिषिञ्चामि सर्वलोकनमस्र्कतम् ॥ ५१ ॥
परंतु राजेन्द्रपदपर किसीका अभिषेक करनेके लिये देवताओंका अधिकार नहीं है; इसीलिये मैं सर्वलोकवन्दित श्रीकृष्णका स्वयं भी अभिषेक नहीं कर रहा हूँ ॥ ५१ ॥

नृपाणामधिकारोऽयं राजेन्द्रस्य निवेशने ।
गत्वा यूयं विदर्भायां क्रथकैशिकयोः सह ॥ ५२ ॥
संचिन्त्य विधिदृष्टेन कुरुध्वं नृपसत्तमाः ।
श्रेष्ठ नरेशगण ! राजेन्द्रपदपर किसीको प्रतिष्ठित करनेका अधिकार केवल राजाओंको ही प्राप्त है। अतः तुम लोग क्रथ और कैशिकके साथ विदर्भपुरीमें जाकर भलीभाँति सोच-विचार करके शास्त्रीय विधिके अनुसार श्रीकृष्णका अभिषेक करो ॥ ५२॥

४०६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

प्रीतिसन्धानकालोऽयमिति संचिन्त्य वासवः ॥ ५३ ॥
बोधनार्थं विसृष्टोऽहं युष्माकं मनुजेश्वराः ।

नरेश्वरो ! यह तुम लोगोंके लिये परस्पर प्रेमपूर्वक संधि कर लेनेका समय है। इसलिये तुम्हें समझानेके लिये मैं देवताओंकी ओरसे दूत बनाकर भेजा गया हूँ ॥ ५३½ ॥

विदर्भनगरे कृष्णः श्रावितोऽस्याधिवासनम् ॥ ५४ ॥
राजेन्द्रत्वाभिषेकार्थं राजानौ क्रथकैशिकौ ।
ताभ्यां सह नृपश्रेष्ठाः कृत्वा सुमहदुत्सवम् ॥ ५५ ॥
अभिषेकेण सत्कृत्य प्रतिगृह्यास्य दक्षिणाम् ।
आगमिष्यथ संहृष्टाः पुनरेव स्वयंवरम् ॥ ५६ ॥

श्रेष्ठ राजाओ ! भगवान् श्रीकृष्ण विदर्भ नगरमें विराजमान हैं और उन्हें उनका अधिवास (अभिषेकका पूर्वाङ्ग संस्कार) सुना दिया गया है अर्थात् वे पूर्वाङ्ग संस्कारसे सम्पन्न हो गये हैं। राजा क्रथ और कैशिक उनका राजेन्द्र-पदपर अभिषेक करनेके लिये सारी तैयारी कर चुके हैं। तुम सब लोग उन दोनोंके साथ महान् उत्सव करके राज्याभिषेक-के द्वारा भगवान्‌का सत्कार और उनकी परिक्रमा करनेके पश्चात् पुनः प्रसन्नतापूर्वक स्वयंवरमें लौट आओ ॥ ५४-५६ ॥

जरासंधः सुनीथश्च रुक्मी चैव महारथः ।
शाल्वः सौभपतिश्चैव चत्वारो राजसत्तमाः ॥ ५७ ॥
रङ्गस्याशून्यहेतोर्हि तिष्ठन्तु इह पार्थिवाः ।

यह रङ्गभूमि सूनी न हो जाय—इसके लिये यहाँ चार श्रेष्ठ राजा बैठे रहें—जरासंध, सुनीथ, महारथी रुक्मी और सौभविमानके अधिपति राजा शाल्व ॥ ५७½ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमाज्ञां सुरेशस्य श्रुत्वा चित्राङ्गदेरिताम् ॥ ५८ ॥
गमनाय मतिं चक्रुः सर्व एव नृपोत्तमाः ।
अनुज्ञाता नरेन्द्रेण जरासंधेन धीमता ॥ ५९ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—इस प्रकार चित्राङ्गदके द्वारा कही गयी देवेश्वर इन्द्रकी आज्ञा सुनकर उन सभी श्रेष्ठ नरेशोंने श्रीकृष्णके अभिषेकमें जानेका विचार कर लिया। बुद्धिमान् नरेश जरासंधने भी उन्हें जानेकी अनुमति दे दी ॥ ५८-५९ ॥

भीष्मकं पुरतः कृत्वा प्रयाताः स्वबलैर्वृताः ।
भीष्मकश्च महाबाहुः स्वबलेन समन्वितः ॥ ६० ॥
जगाम पार्थिवैः सार्द्धं दह्यमानेन चेतसा ।
यत्र कृष्णो महाबाहुः कैशिकस्य निवेशने ॥ ६१ ॥

फिर तो वे राजा भीष्मकको आगे करके अपनी सेनाओं-के साथ वहाँ गये। महाबाहु भीष्मक भी अपनी सेनाके साथ दूसरे राजाओंको साथ लिये कैशिकके भवनमें, जहाँ महाबाहु श्रीकृष्ण विराजमान थे, गये। उस समय अपने पुत्रके दोषसे उनका चित्त चिन्ताकी आगमें जल रहा था ॥ ६०-६१ ॥

दूरादेव प्रकाशन्ती पताकाध्वजमालिनी ।
शुभा देवसभा रम्या स्नानहेतोरिहागता ॥ ६२ ॥

भगवान्‌के स्नानके लिये सुन्दर सुरम्य देवसभा इस भूतलपर उतर आयी थी, जो दूरसे ही प्रकाशित हो रही थी। वह ध्वजा, पताकाओंसे अलंकृत थी ॥ ६२ ॥

दिव्यरत्नप्रभाकीर्णा दिव्यध्वजसमाकुला ।
दिव्याम्बरपताकाढ्या दिव्याभरणभूषिता ॥ ६३ ॥

उसमें दिव्य रत्नोंकी प्रभा सब ओर व्याप्त हो रही थी। दिव्य ध्वजाएँ फहराती थीं। दिव्य वस्त्रोंकी पताकाएँ उसकी शोभा बढ़ाती थीं और दिव्य आभूषणों (सजावटकी सामग्रियों) से वह सभा विभूषित थी ॥ ६३ ॥

दिव्यस्रग्दामकलिला दिव्यगन्धाधिवासिता ।
विमानयानैः श्रीमद्भिः समन्तात् परिवारिता ॥ ६४ ॥

उसमें जगह-जगह दिव्य पुष्पोंकी मालाएँ लटक रही थीं। दिव्य गन्धोंसे वह सभा सुवासित थी। विमानपर चलनेवाले कान्तिमान् देवताओंने उसे सब ओरसे घेर रखा था ॥ ६४ ॥

दिव्याप्सरोगणांश्चैव विद्याधरगणांस्तथा ।
गन्धर्वा मुनयश्चैव किन्नराश्च समन्ततः ॥ ६५ ॥
उपगायन्ति देवेशमम्बरान्तरमाश्रिताः ।
स्तुवन्ति मुनयश्चैव सिद्धाश्च परमर्षयः ॥ ६६ ॥

दिव्य अप्सराओंके समुदाय, विद्याधरोंके समूह, गन्धर्व, मुनि और किन्नर सब ओर आकाशमे स्थित हो देवेश्वर श्रीकृष्णका यश गाते थे तथा मुनि, सिद्ध एवं महर्षि उनकी स्तुति करते थे ॥ ६५-६६ ॥

देवदुन्दुभयश्चैव स्वयमेवानदन् दिवि ।
पञ्चयोनिसमुत्थानि गन्धचूर्णान्यनेकशः ॥ ६७ ॥
समन्तात् पात्यमानानि चाकाशस्थैर्दिवौकसैः ।

देवताओंकी दुन्दुभियाँ आकाशमें स्वयं ही बज उठीं। आकाशमें खड़े हुए देवता सब ओरसे बारंबार पञ्चयोनि-जनित सुगन्धचूर्ण गिरा रहे थे ॥ ६७½ ॥

स्वयमागत्य देवेन्द्रो देवैः सह शचीपतिः ॥ ६८ ॥
विमानवरमारुह्य सप्रकाशः स्थितोऽम्बरे ।

देवताओंके साथ शचीवल्लभ देवेन्द्र स्वयं आकर एक श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो आकाशमें स्थित थे और सब लोग उन्हें प्रत्यक्ष देख रहे थे ॥ ६८½ ॥


१ विभिन्न वृक्षोंके मूल, त्वचा, पत्र, पुष्प और फल—ये पाँच योनि अर्थात् कारण हैं। इनसे जो गन्धचूर्ण तैयार किये गये हैं, उन्हें पञ्चयोजनित कहते हैं। अथवा मन्दार, पारिजात, संतान, कल्पवृक्ष और हरिचन्दन नामक जो पाँच देववृक्ष हैं, उनसे प्रकट हुए दिव्य गन्धचूर्णको भी यहाँ पञ्चयोजनित कहा गया है।

विष्णु पर्व ] पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४०७


अष्टौ ये लोकपालास्ते स्वासु दिक्षु समास्थिताः ॥ ६९ ॥
उपगायन्ति नृत्यन्ति स्तुवन्ति च समन्ततः ।
· जो आठ लोकपाल थे, वे अपनी दिशाओंमे स्थित हो सब ओर भगवान्‌के यशका गान, नृत्य एवं स्तुति करते थे ॥ ६९ ½ ॥

श्रुत्वा सुतुमुलं नादं सर्व एव नराधिपाः ॥ ७० ॥
विस्मयोत्फुल्लनयना विविशुस्ते सभां शुभाम् ।
उनके नृत्य-गान आदिके सम्मिलित शब्दको सुनकर सभी नरेशोंके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे और उन्होंने उस मङ्गलमयी दिव्य सभामें प्रवेश किया ॥ ७० ½ ॥

कैशिकश्च महाबाहुरुपगम्य नराधिपान् ॥ ७१ ॥
प्रवेशयामास बली प्रतिपूज्य यथाविधि ।
उस समय बलवान् महाबाहु कैशिक समस्त नरेशोंके पास जाकर उनका विधिपूर्वक पूजन करके उन सबको भीतर ले आये ॥ ७१ ½ ॥

निवेदिते सुरश्रेष्ठे पार्थिवानां समागमे ॥ ७२ ॥
निर्जगाम हरिः श्रीमान् सर्वमङ्गलपूजितः ।
जब सुरश्रेष्ठ भगवान्‌को समस्त राजाओंके शुभागमनकी सूचना दी गयी, तब सम्पूर्ण मङ्गलमयी सामग्रियोंसे पूजित हुए वे श्रीमान् हरि भवनसे बाहर निकले ॥ ७२ ½ ॥

ततोऽम्बरस्थास्ते दिव्याः कलशाश्चैलकण्ठिनः ॥ ७३ ॥
सहकारसमायुक्ता ववर्षुर्जलं दा इव ।
तदनन्तर, आकाशमें स्थित हुए वे दिव्य कलश, जिनके कण्ठमे वस्त्र लपेटे गये थे तथा जो आम्रपल्लवोंसे सुशोभित थे, भगवान्‌के ऊपर बादलोंके समान जलकी वर्षा करने लगे ॥ ७३ ½ ॥

दिव्यकाञ्चनरत्नौघैर्दिव्यपुष्पसमन्वितैः ॥ ७४ ॥
गन्धचूर्णविमिश्रैश्च राजेन्द्रस्याभिषेचने ।
यथोक्तविधिपूर्वेण अभिषिच्य जनार्दनम् ॥ ७५ ॥
दर्शयित्वा नरेन्द्राणां दिव्यैराभरणैः शुभैः ।
उन दिव्य कलशोंने भगवान्‌का राजेन्द्रपदपर अभिषेक करते समय दिव्य सुवर्ण एवं रत्नोंके समुदायसे युक्त, दिव्य पुष्पोंसे सुवासित तथा सुगन्धचूर्णसे मिश्रित जलके द्वारा शास्त्रोक्त विधिके अनुसार श्रीकृष्णके अभिषेकका कार्य सम्पन्न करके उन्हें सुन्दर दिव्य वस्त्राभूषणोंद्वारा अलंकृत एवं नरेशोंके लिये दर्शनीय कर दिया ॥ ७४-७५ ½ ॥

दिव्याम्बरविचित्रैश्च दिव्यमाल्यानुलेपनैः ॥ ७६ ॥
सत्कृत्य विधिवद्राज्ञ उपविष्टो जनार्दनः ।
शुभे देवसभे रम्ये स्नानहेतोरिहागते ॥ ७७ ॥
तत्पश्चात् दिव्य वस्त्र, विचित्र दिव्य माला और दिव्य अनुलेपनसे यहाँ आये हुए राजाओंका विधिपूर्वक सत्कार करके उनकी अनुमति ले, भगवान् श्रीकृष्ण अपने स्नानके लिये इस भूतलपर उतरी हुई सुन्दर एवं रमणीय देवसभाके भीतर (एक उज्ज्वल दिव्य सिंहासनपर) विराजमान हुए ॥

उपास्यमानो यदुभिर्विदर्भैश्च नराधिपैः ।
वैनतेयश्च बलवान् कामरूपी नराकृतिः ॥ ७८ ॥
दक्षिणं पार्श्वमाश्रित्य आसनस्थो महाबलः ।
क्रथश्च कैशिको वीरो वामपार्श्वे तथासने ॥ ७९ ॥
उपविष्टौ महात्मानौ देवस्यानुमते नृपौ ।
तथैव वामपार्श्वे तु वृष्ण्यन्धकमहारथाः ॥ ८० ॥
सात्यकिप्रमुखा वीरा उपविष्टा महाबलाः ।
उस समय यादव तथा विदर्भदेशीय नरेश उनकी सेवामें पास ही खड़े थे । इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले बलवान् एवं महापराक्रमी गरुड़ मनुष्यका रूप धारण करके भगवान्‌के दाहिने बगलमें जाकर एक आसनपर बैठे । वीर क्रथ और कैशिक—ये दोनों महात्मा नरेश भगवान्‌की आज्ञा पाकर उनके वाम पार्श्वमें एक आसनपर बैठे । उसी प्रकार वाम भागमें ही वृष्णि और अन्धक वंशके महारथी सात्यकि आदि महाबली वीर भी विराजमान हुए ॥ ७८-८० ½ ॥

भास्करप्रतिमे दिव्ये दिव्यास्तरणविस्तृते ॥ ८१ ॥
सुखोपविष्टं श्रीमन्तं देवैरिव शचीपतिम् ।
सूर्यके समान तेजस्वी तथा दिव्य बिछौनोंसे सुसज्जित दिव्य सिंहासनपर सुखपूर्वक बैठे हुए श्रीमान् भगवान् श्रीकृष्ण देवताओंके साथ विराजमान शचीपति इन्द्रके समान शोभा पा रहे थे ॥ ८१ ½ ॥

सचिवैः श्राविताः सर्वे प्रविष्टास्ते नराधिपाः ॥ ८२ ॥
यथार्हेण च सम्पूज्य राजानः सर्व एव ते ।
सुखोपविष्टास्ते स्वेषु आसनेषु नराधिपाः ॥ ८३ ॥
तदनन्तर मन्त्रियोंसे राजाज्ञा पाकर सभी नरेश उस भवनमें प्रविष्ट हुए । उन समस्त नरेशोंने यथायोग्य भगवान्‌का पूजन किया; फिर वे अपने आसनोंपर सुखपूर्वक बैठ गये ॥ ८२-८३ ॥

कैशिकस्तु महाप्राज्ञः सर्वशास्त्रार्थवित्तमः ।
पूजयित्वा यथान्यायमुवाच वदतां वरः ॥ ८४ ॥
इसके बाद वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाज्ञानी कैशिक, जो समस्त शास्त्रोंके मर्मज्ञ थे, यथोचितरूपसे भगवान्‌का पूजन करके इस प्रकार बोले—॥ ८४ ॥

कैशिक उवाच
अविज्ञाता नृपाः सर्वे मानुषोऽयमिति प्रभो ।
भवन्तमुपरुद्धानां देव त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ ८५ ॥
कैशिकने कहा—प्रभो ! देव ! अबतक सब राजा अज्ञानवश आपके विषयमें यही जानते थे कि ये भी मनुष्यही हैं;

४०८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे
इसीलिए ये लोग आपके प्रति अपराध कर बैठे हैं। आप इन अपराधियोंको क्षमा कर दें॥ ८५॥<br><br>श्रीकृष्ण उवाच<br>न मे वैरं प्रवसति एकाहमपि कैशिक।<br>विशेषेण नरेन्द्राणां क्षत्रधर्मेऽवतिष्ठताम्॥ ८६॥<br>योद्धव्यमिति धर्मेण अधर्मे तु पराङ्मुखे।<br>तेषां किंहेतुना कोपः कर्तव्यस्त्ववनीश्वराः॥ ८७॥<br>यदृतं तदतिक्रान्तं ये मृतास्ते दिवं गताः।<br>एष धर्मो नृलोकेऽस्मिञ्जायन्ते च म्रियन्ति च॥ ८८॥<br><br>श्रीकृष्ण बोले—कैशिक! मेरे मनमें एक दिन भी वैर नहीं टिकता है। विशेषतः क्षत्रिय-धर्ममें स्थिर रहनेवाले नरेशोंपर, जो युद्धको धर्म समझकर उसमें प्रवृत्त होते और अधर्मसे मुँह मोड़े रहते हैं, किसलिये क्रोध किया जाय। भूमिपालो! जो बीत गया, वह गया; जो लोग मर गये, वे स्वर्गमें चले गये। इस मनुष्य-लोकका यह स्वाभाविक धर्म (नियम) है कि यहाँ प्राणी जन्म लेते और मरते रहते हैं॥तस्मादशोच्यं भवतां मृतार्थे च नराधिपाः।<br>क्षन्तव्यं रोचतेऽस्माकं वीतवैरा भवन्तु ते॥ ८९॥<br><br>अतः नरेश्वरो! जो लोग मर गये या मारे गये, उनके लिये आपलोगोंको शोक नहीं करना चाहिये। हमे तो क्षमा ही अच्छी लगती है। अतः वे सब राजा आजसे वैरभावका त्याग करके निर्वैर हो जायें॥ ८९॥<br><br>वैशम्पायन उवाच<br>एवमुक्त्वा नरेन्द्रांस्तानाश्वास्य मधुसूदनः।<br>कैशिकस्य मुखं वीक्ष्य विरराम महाद्युतिः॥ ९०॥<br><br>वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन नरेशोंसे ऐसा कहकर उन्हें आश्वासन दे महातेजस्वी भगवान् मधुसूदन कैशिकके मुँहकी ओर देखकर चुप हो गये॥ ९०॥<br><br>एतस्मिन्नेव काले तु भीष्मको नयकोविदः।<br>पूजयित्वा यथान्यायमुवाच वदतां वरः॥ ९१॥<br><br>इसी समय वक्ताओंमें श्रेष्ठ नीतिकुशल राजा भीष्मक भगवान्‌का यथोचित पूजन करके बोले—॥ ९१॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिणीस्वयंवरे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५०॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीका स्वयंवरनिरूपक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५०॥


एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण और भीष्मकका संवाद, भीष्मकद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णका मथुरागमन

भीष्मक उवाचश्रीकृष्ण उवाच
पुत्रो मे बालभावेन भगिनीं दातुमिच्छति।<br>स्वयंवरे नरेन्द्राणां न चाहं दातुमुत्सहे॥ १॥<br><br>भीष्मकने कहा—भगवन्! मेरा पुत्र रुक्मी अपने बालचापल्य या अविवेकके कारण अपनी बहिनको नरेन्द्रोंके समक्ष स्वयंवरमें देना चाहता है; परंतु मेरी इच्छा उसे स्वयंवरमें देनेकी नहीं है॥ १॥<br><br>अतीव बालभावत्वादु दातुमिच्छेन्मतिम॑म।<br>एका ह्येकं समालोक्य वरयिष्यति मे मतिः॥ २॥<br><br>अत्यन्त बचपन या मूर्खताके कारण ही वह अपनी बहिनको स्वयंवरमे देना चाहता है, ऐसा मेरा विश्वास है। मेरी राय तो यही है कि वह अकेली एकमात्र मनोनीत पति-का वरण करे॥ २॥<br><br>अतः प्रसादयिष्ये त्वां पुत्रदुर्नयहेतुना।<br>प्रसादं कुरु देवेश क्षन्तुमर्हसि मे प्रभो॥ ३॥<br><br>अतः प्रभो! मैं अपने पुत्रकी दुर्नीतिका कारण (अपने-को अपराधी मानकर) आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। देवेश्वर! आप मुझपर कृपा बनाये रखें और मेरे अपराधको क्षमा कर दें॥ ३॥बालभावेन पुत्रेण चालितं नृपमण्डलम्।<br>यदा भवति वै प्रौढः कीदृशोऽविनयो भवेत्॥ ४॥<br><br>श्रीकृष्ण बोले—राजन्! आपके पुत्रने बाल्यावस्थामें ही समस्त नरेश-मण्डलमे हलचल मचा दी है; फिर जब वह प्रौढ़ होगा, तब न जाने उसकी उद्दण्डता कैसी हो जायेगी?॥ ४॥<br><br>सूर्येन्दुसदृशाँल्लोकांस्तपसोपार्जितानभियः।<br>लोकेऽस्मिन् नरदेवानां महाकुलसमुद्भवान्॥ ५॥<br>एकस्यापि नृपस्याग्रे मोहाद् यो वितथं वदेत्।<br>न स तिष्ठति लोकेऽस्मिन् निर्दहेद् दण्डवह्निना॥ ६॥<br><br>जो एक राजाके सामने भी मोहवश झूठ बोलता है, वह राजाओंको मिलनेवाले सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशमान तथा तपस्यासे श्रीसम्पन्न हुए लोकोंको, जो उसे महान् कुलमें उत्पन्न होनेके कारण सुगमतापूर्वक किये गये बड़े-बड़े यज्ञों-द्वारा प्राप्त हुए हैं, यम-यातनाकी आगसे दग्ध कर देता है और उन लोकोंमेसे ही एक जो यह लोक है, इसमें भी वह रह नहीं पाता है॥ ५-६॥

विष्णुपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४०१


एष धर्मो नरेन्द्राणामिति ते विदितं प्रभो।
लोकधर्मं पुरस्कृत्य पुरा गीतं स्वयम्भुवा ॥ ७ ॥

प्रभो ! यह (सत्यभाषण) नरेशोंका धर्म है। इस बात-को आप भी जानते ही होंगे। स्वयम्भू ब्रह्माजीने पूर्वकालमें लोकधर्मको सामने रखते हुए सत्यके ही महत्त्वका गान किया है॥ ७ ॥

कथं तव सुतस्तेषामग्रतो मनुजेश्वर।
वक्तुमर्हति राजेन्द्र वितथं राजसंसदि ॥ ८ ॥

मनुजेश्वर ! राजेन्द्र ! ऐसी दशामें आपका पुत्र राज-सभामें उन राजाओंके आगे झूठ कैसे बोल सकता है ? (जिसमें आपकी सम्मति नहीं होगी, उसकी घोषणा वह कैसे कर सकता है) ॥ ८ ॥

तादृशं रङ्गममुलं कारयंस्तनयस्तव।
कथं त्वया ह्यविज्ञात इति मे संशयो महान् ॥ ९ ॥

आपका पुत्र जब वैसा अनुपम रंगस्थल बनवा रहा था, तब आप उसकी उस चेष्टासे किस तरह अनजान रह गये ? यह मेरे मनमें महान् संशय है ॥ ९ ॥

आगतानां नरेन्द्राणामनलार्केन्दुवर्चसाम्।
यथार्हेण तु सम्पूज्य आतिथ्यं कृतवानसि ॥ १०॥

अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके समान कान्तिमान् नरेश यहाँ पधारे हैं और आपने उन सबका यथायोग्य पूजन करके आतिथ्यसत्कार किया है। (फिर आप इन सब बातोंसे अपने-को अपरिचित कैसे बता रहे हैं) ॥ १० ॥

रथाश्वनरनागानां विमर्दममुलं तथा।
कथं न ज्ञातवान् राजंस्तव पुत्रस्य चेष्टितम् ॥ ११ ॥

राजन् ! रथ, घोड़े, हाथी और पैदल सैनिकोंसे भरी हुई चतुरङ्गिणी सेनाका जो अनुपम संहार हुआ है, वह सब आपके पुत्रकी कुचेष्टाका ही फल है, इस बातकी जानकारी आपको कैसे नहीं हुई ? ॥ ११ ॥

विषादो न भवेद्यत्र चतुरङ्गबलागमे।
कथं न ज्ञायते राजन्निति मे बुद्धिसंशयः ॥ १२ ॥

राजन् ! जब यहाँ चतुरङ्गिणी सेनाका जमाव होगा, तब क्या कोई खेदजनक घटना नहीं घटित होगी—यह बात आप-की समझमें कैसे नहीं आ रही है। यह मेरी बुद्धिमें संशय उत्पन्न हो गया है ॥ १२ ॥

ममागमनमेवेह प्रायेण न हितं तव।
अतो न कृतमातिथ्यमपात्राय नरेश्वर ॥ १३ ॥

नरेश्वर ! मेरा यहाँ आगमन ही प्रायः आपके लिये हित-कर नहीं है—ऐसा समझकर ही आपने मुझ अपात्रका आतिथ्य-सत्कार नहीं किया ॥ १३ ॥

पात्रेभ्यो दीयतां कन्या मामपास्य नरेश्वर।
ममागमनदोषेण कथं कन्यां न दास्यसे ॥ १४ ॥

राजन् ! मुझे छोड़कर आप इन सुपात्र राजाओंको अपनी कन्या दीजिये। मेरे आ जानेके ही दोषसे आप अपनी कन्या-का दान कैसे नहीं करेंगे ॥ १४ ॥

कन्याविघ्नं च कुर्वाणो नरके परिपच्यते।
इति धर्मविदैर्गीतं मन्वादिभिर्नरोत्तमैः ॥ १५ ॥

कन्याके विवाहमें विघ्न डालनेवाला मनुष्य नरककी आगमें पकाया जाता है—ऐसा मनु आदि धर्मज्ञ नरेशोंने कहा है ॥ १५ ॥

अतोऽर्थं न प्रविष्टोऽहं रङ्गमध्ये विशाम्पते।
विदित्वा नकृतातिथ्यं नरदेव तवालयम् ॥ १६ ॥

प्रजानाथ ! इसीलिये मैं रङ्गभूमिमें नहीं आया हूँ, नरदेव ! मुझे पहले ही ज्ञात हो गया था कि आपका घर आतिथ्यहीन है ॥ १६ ॥

ह्रियाभिभूतो राजेन्द्रपार्थिवोऽहं नराधिप।
विदर्भनगरे राजन् बलविश्रामहेतुना ॥ १७ ॥

राजन् ! नरेश्वर ! मैंने विदर्भ नगरमें विश्रामके लिये जो अपनी सेनाको ठहरा दिया—इसके कारण राजेन्द्रोंका राजा होकर भी मैं लज्जासे गड़ गया हूँ (क्योंकि यदि मैंने यहाँ विश्राम न किया होता, तो मुझे आपके द्वारा सत्कृत न होने-का अपमान नहीं सहना पड़ता) ॥ १७ ॥

आवाभ्यां कृतमातिथ्यं कैशिकस्तु प्रियातिथिः।
उषितौ च यथा स्वर्गे पुरा गरुडकेशवौ ॥ १८ ॥

इतनेपर भी मैंने और गरुड़ने पूरा-पूरा आतिथ्य-सत्कार प्राप्त किया है; क्योंकि राजा कैशिकको अतिथि प्रिय है। हम दोनों यहाँ उसी तरह सुखसे रहे हैं, जैसे पहले वैकुण्ठधाममें रहा करते थे ॥ १८ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमेव ब्रुवाणं तु कृष्णं वाग्वज्रचोदितम्।
श्लक्ष्णवाचाम्बुनाऽऽसिच्य शमितोऽग्निरिव ज्वलन् १९

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसी ही बातें कहकर जिन्होंने वाग्वज्रका प्रहार किया था, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णको, जो अग्निके समान प्रज्वलित हो रहे थे, राजा भीष्मकने अपनी मधुर-वाणीरूप जलसे सींचकर शान्त किया ॥ १९ ॥

भीष्मक उवाच

प्रसीद देवलोकेश पाहि मां लोकशासन।
अज्ञानतमसाविष्टं ज्ञानचक्षुःप्रदो भव ॥ २० ॥

भीष्मक बोले—'देवलोकेश्वर ! आप मुझपर प्रसन्न हों, लोकशासक परमेश्वर ! मेरी रक्षा कीजिये। मैं अज्ञानरूपी

४१०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

अन्धकारसे घिरा हुआ हूँ, आप मुझे ज्ञानरूपी नेत्र प्रदान करें ॥ २० ॥

मानुष्ये मांसचक्षुष्ट्वादसम्यग्विदिता वयम् । न प्रसिद्धयन्ति कर्माणि क्रियतामविचारणात् ॥ २१ ॥

मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर मांसपिण्डपर ही दृष्टि रखनेके कारण अथवा केवल स्थूलदर्शी होनेके कारण हम सम्यग् ज्ञान-से वञ्चित हैं (हमारी बुद्धि उलटी हो गयी है)। अतः अवि-चारपूर्वक कर्म करनेके कारण हमारे कार्य सिद्ध नहीं हो पाते ॥ २१ ॥

भवन्तं शरणं प्राप्य देवानाम्पि दैवतम् । सम्यग् भवतु मे दृष्टिः सम्पद्यन्तु च मे क्रियाः॥ २२ ॥

आप देवताओंके भी देवता हैं। आपकी शरणमें आकर मेरी दृष्टि उत्तम हो जाय और मेरे सारे कर्म ठीक ढंगसे सम्पन्न हों ॥ २२ ॥

अनिष्पन्नामपि क्रियां नयोपेतां विचक्षणाः । फलदां हि प्रकुर्वन्ति महासेनापतिर्यथा ॥ २३ ॥

जैसे प्रधान-सेनापति अयोग्य सेनाका भी नीतिपूर्वक सञ्चालनकर उसे सफल बना देता है, उसी तरह विद्वान् पुरुष असम्पन्न कर्मको भी यदि वह न्याययुक्त है, तो फल-दायक बना देते हैं ॥ २३ ॥

भवन्तं शरणं प्राप्य नाति बाधति मे भयम् । यन्मया चिन्तितं कार्यं तद् भवाञ्छ्रोतुमर्हति ॥ २४ ॥

आपकी शरणमें आ जानेके कारण अब मुझे किसी प्रकारका भय नहीं सता रहा है। मैंने जो कार्य सोचा है, उसे आप सुननेकी कृपा करें ॥ २४ ॥

न दातुमिच्छे कन्यां वै पार्थिवेभ्यः स्वयंवरे । प्रसादं कुरु देवेश न कोपं कर्तुमर्हसि ॥ २५ ॥

देवेश्वर ! मैं स्वयंवरमें आये हुए राजाओंको अपनी कन्या देना नहीं चाहता। आप मुझपर कृपा करें, क्रोध न करें ॥

श्रीकृष्ण उवाच

वचनेन किमुक्तेन त्वया राजन् महामते । स्वकन्यां दास्यसे नेति कोऽत्र नेता तवानघ ॥ २६ ॥

श्रीकृष्ण बोले—महामते नरेश्वर ! आप केवल बातें बनाते हैं। इससे क्या होगा ? अनघ ! आप अपनी कन्या किसीको देंगे या नहीं—इस विषयमें आपको रोकनेवाला कौन है ? ॥ २६ ॥

मा देहीति न चाख्येयं ददस्वेति न मे वचः । रुक्मिण्या दिव्यमूर्तित्वं सम्बन्धे कारणं मम ॥ २७ ॥

'आप दूसरेको कन्या न दीजिये, मुझे ही दीजिये' यह दोनों प्रकारकी बातें मुझे नहीं कहनी चाहिये। रुक्मिणी दिव्य-रूपधारिणी देवी है, उसकी यह दिव्यता ही उसके साथ मेरे भावी सम्बन्धमें कारण है ॥ २७ ॥

मेरुकूटे पुरा देवैः कृतमंशावतारणम् । तदा निसृष्टा श्रीः पूर्वे गच्छ त्वं पतिना सह ॥ २८ ॥ मानुष्ये कुण्डिननगरे भीष्मकस्याङ्कनोदरे । जायस्व विपुलश्रोणि प्रत्यवेक्ष्य च वासवम् ॥ २९ ॥

पूर्वकालमें मेरुपर्वतके शिखरपर एकत्र हुए देवताओंने अपने-अपने अंशको भूतलपर उतारा था। उस समय ब्रह्माजी-ने लक्ष्मीसे कहा—'देवि ! तुम भी अपने पतिके साथ जाओ। और मनुष्यलोकमें कुण्डिनपुरके भीतर राजा भीष्मककी रानी-के गर्भसे जन्म लो। विपुलश्रोणि ! इन्द्रपर कृपा करके तुम्हें ऐसा करना चाहिये ॥ २८-२९ ॥

तेनाहं वः प्रवक्ष्यामि राजनकृत्तकं वचः । श्रुत्वा स्वयं विनिश्चित्य यद् युक्तं तत् करिष्यति ॥ ३० ॥ रुक्मिणी नाम ते कन्या न सा प्राकृतमानुषी । श्रीरेषा ब्रह्मवाक्येन जाता केनापि हेतुना ॥ ३१ ॥

राजन् ! इसीलिये मैं आपसे स्वाभाविक बात कह रहा हूँ, इसमें कहीं कृत्रिमता या बनावट नहीं है। इस बातको सुनकर आपकी कन्या रुक्मिणी स्वयं ही अपने कर्तव्यका निश्चय करके जो उचित समझेगी, वह करेगी; क्योंकि वह साधारण स्त्री नहीं है, यह साक्षात् लक्ष्मी है और किसी कारण-वश ब्रह्माजीके कहनेसे यहाँ प्रकट हुई है ॥ ३०-३१ ॥

न च सा मनुजेन्द्राणां स्वयंवरविधिक्षमा । एका त्वेकाय दातव्या इति धर्मो व्यवस्थितः ॥ ३२ ॥

वह नरेन्द्रोंके सामने स्वयंवरविधिक़ा पालन करने योग्य नहीं है। एक कन्याको एक ही वरके हाथमें देना चाहिये—यही सिद्धान्तभूत सुस्थिर धर्म है ॥ ३२ ॥

न च तां शक्यसे राजल्लक्ष्मीं दातुं स्वयंवरे । सदृशं वरमालोक्य दातुमर्हसि धर्मतः ॥ ३३ ॥

राजन् ! आप उस लक्ष्मीको स्वयंवरमे नहीं दे सकते। किसी योग्य वरको देखकर धर्मपूर्वक उसके हाथमें उसका दान कर देना ही आपके लिये उचित है ॥ ३३ ॥

अतोऽर्थे वैनतेयोऽयं विघ्नकारणहेतुना । आगतः कुण्डिननगरे देवराजेन चोदितः ॥ ३४ ॥

इसीलिये देवराज इन्द्रसे प्रेरित होकर यह विनतानन्दन गरुड़ इस स्वयंवरमें विघ्न डालनेके हेतु कुण्डिनपुरमें पधारे हैं ॥ ३४ ॥

अहं चैवागतो राज्ञां द्रष्टुकामो महोत्स्वम् । तां च कन्यां वरारोहां पद्मेन रहितां श्रियम् ॥ ३५ ॥

मैं राजाओंके इस महान् उत्सवको तथा बिना कमलकी लक्ष्मीरूपा इस परम सुन्दरी राजकन्याको देखनेकी इच्छासे यहाँ आया था ॥ ३५ ॥

विष्णुपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४११


क्षन्तव्यमिति यत् प्रोक्तं त्वया राजन् ममाग्रतः।
युक्तिपूर्वमहं मन्ये कलुषाय न पार्थिव ॥ ३६ ॥
राजन् ! पृथ्वीनाथ ! आपने जो मेरे सामने यह बात कही कि मेरा अपराध क्षमा करना चाहिये, सो ठीक है। मैं इसे युक्तिसंगत मानता हूँ। इसमें दुर्भावका कोई कारण नहीं है ॥ ३६ ॥

पूर्वमेव मयाऽऽख्यातं येनास्मि विषये तव ।
आगतः सौम्यरूपेण तेनैव क्षान्तवान् विभो ॥ ३७ ॥
विभो ! इस विषयमें तो मैं पहले ही कह चुका हूँ कि आपके राज्यमें सौम्यरूपसे आया हूँ (विरोधीरूपसे नहीं)। इसीसे आपको समझ लेना चाहिये कि मैंने क्षमा कर दी है ॥ ३७ ॥

क्षान्तेषु गुणबाहुल्यं दोषापहरणं क्षमा ।
कथमस्मद्विधे राजन् कलुषो वसते हृदि ॥ ३८ ॥
राजन् ! क्षमाशील पुरुषोंमें बहुत-से गुण प्रकट होते हैं। क्षमा सब दोषोंको हर लेनेवाली है। मुझ-जैसे पुरुषके हृदयमें दुर्भाव कैसे रह सकता है ॥ ३८ ॥

कुलजे सत्त्वसम्पन्ने धर्मज्ञे सत्यवादिनि ।
भवादृशे कथं राजन् कलुषो भुवि वर्तते ॥ ३९ ॥
नरेश्वर ! आप भी कुलीन, सत्त्वगुण-सम्पन्न, धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं। इस भूतलपर आप-जैसे पुरुषके हृदयमें कलुष-भाव कैसे टिक सकता है ॥ ३९ ॥

क्षान्तोऽयमिति मन्तव्यं मम सेनासहागतम् ।
न चाहं सेनया सार्द्धं यास्यामि रिपुवाहिनीम् ॥ ४० ॥
मैं सेनाके साथ यहाँ आया हूँ, इसलिये आपको यही मानना चाहिये कि ये क्षमाशील हैं; क्योंकि मैं शत्रुओंकी सेनामें अपनी सेना साथ लेकर नहीं जाता हूँ ॥ ४० ॥

अक्षान्तश्चारिसेनायां यास्यामि द्विजवाहने ।
स्थितः सोमार्कसंकाशान्यायुधानि करैर्वहन् ॥ ४१ ॥
जब मैं असहिष्णु होकर शत्रु-सेनापर आक्रमण करता हूँ, तब गरुड़पर बैठता हूँ और अपने हाथोंमें चन्द्रमा तथा सूर्य-के समान चमकीले अस्त्र-शस्त्र धारण करता हूँ ॥ ४१ ॥

मान्योऽस्माकं त्वया राजन् वयसा च पिता समः।
पालयस्व पुरीं सम्यक्क्षत्रेषु पितृवद् वस ॥ ४२ ॥
राजन् ! मेरे लिये पिता सबसे अधिक आदरणीय हैं, जो अवस्थामें आपके ही तुल्य हैं ( अतः आप भी मेरे लिये पिताके ही तुल्य हैं )। आप अपनी पुरीका भलीभाँति पालन कीजिये और क्षत्रियोंमें पिताके समान आदरणीय बनकर रहिये ॥

कलुषो नाम राजेन्द्र वसेत् कापुरुषेषु वै ।
शूरेषु शुद्धभावेषु कलुषो वसते कथम् ॥ ४३ ॥
राजेन्द्र ! दुर्भाव तो कायरोंमें रहा करता है, विशुद्ध भाववाले शूरवीरोंमें कलुषित भाव कैसे रह सकता है ॥४३॥

जानीध्वमेषा मे वृत्तिः पुत्रेषु पितृवद् वयम् ।
इमावपि च राजानौ विदर्भनगराधिपौ ॥ ४४ ॥
मेरी यह वृत्ति सर्वथा कलुष भावसे रहित है, इस बात-को आपलोग अच्छी तरह जान लें। हम पुत्रोंपर पिताके तुल्य ही स्नेह रखते हैं। ये दोनों विदर्भनगरके अधिपति राजा क्रथ और कैशिक भी ऐसे ही स्वभावके हैं ॥ ४४ ॥

आतिथ्यकरणेऽस्माकं स्वराज्यं दत्ततावुभौ ।
तेन दानफलेनास्य दशपूर्वा दिवं गताः ॥ ४५ ॥
इन दोनोंने हमलोगोंका आतिथ्य-सत्कार करते समय मुझे अपना सारा राज्य ही समर्पित कर दिया। उस दानके फलसे इनके दस पीढ़ी पहलेके पूर्वज स्वर्गलोकमें चले गये ॥

भविष्याश्चैव राजानः पुत्रपौत्रा दशावराः।
तेऽपि तत्रैव यास्यन्ति देवलोकं नराधिपाः ॥ ४६ ॥
भविष्यमें भी दस पीढ़ी तक जो पुत्र-पौत्र आदि राजा होंगे, वे सभी नरेश उक्त दानके फलसे उसी देवलोकमें जायँगे ॥

अनयोः सुचिरं कालं भुक्त्वा राज्यमकण्टकम् ।
यदाभिलाषो मोक्षस्य यास्येते निर्वृतिं सुखम् ॥ ४७ ॥
इन दोनोंको चिरकालतक अकण्टक राज्य भोग लेनेके पश्चात् जब मोक्षकी अभिलाषा होगी, तब ये सुखरूप परमानन्द-पदको प्राप्त कर लेंगे ॥ ४७ ॥

नरेन्द्राश्च महाभागा येऽभिषेचितुमागताः ।
कालेन तेऽपि यास्यन्ति देवलोकं त्रिविष्टपम् ॥ ४८ ॥
जो महाभाग नरेश मेरा अभिषेक करनेके लिये आये थे, वे भी समयानुसार देवताओंके निवासभूत स्वर्गलोकमें चले जायेंगे ॥ ४८ ॥

स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि वैनतेयसहायवान् ।
नगरीं मथुरां रम्यां भोजराजेन पालिताम् ॥ ४९ ॥
आपलोगोंका कल्याण हो, अब मैं गरुड़के साथ भोज-राज उग्रसेनद्वारा पालित रमणीय मथुरापुरीको जाऊँगा ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु राजानं भीष्मकं यदुनन्दनः।
राज्ञश्चैवमुपामन्त्र्य वैदर्भीभ्यां विशेषतः ॥ ५० ॥
सभान्निष्क्रम्य देवेशो जगाम रथमन्तिकम् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! राजा भीष्मक-से ऐसा कहकर विशेषतः वहाँ बैठे हुए राजाओंसे विदा ले यदुकुलनन्दन देवेश्वर श्रीकृष्ण विदर्भराज क्रथ और कैशिक-के साथ सभाभवनसे निकलकर रथके निकट गये ॥ ५०१/२ ॥

ततः प्रहृष्टो राजर्षिर्भीष्मकः किल केशवम् ॥ ५१ ॥
ते सर्वे च महीपालो विप्रणवदनाभवन् ।
तदनन्तर, भगवान् श्रीकृष्णको जाते देख राजर्षि भीष्मक बड़े प्रसन्न हुए और उन समस्त भूपालोंके मुखपर विषाद छा गया ॥ ५११/२ ॥

४१२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

आद्यं स्वायम्भुवं रूपं सुरासुरनमस्कृतम् ॥ ५२ ॥
सहस्रपात् सहस्राक्षं सहस्रभुजविग्रहम् ।
सहस्रशिरसं देवं सहस्रमुकुटोज्ज्वलम् ॥ ५३ ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
दिव्याभरणसंयुक्तं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ ५४ ॥
कृष्णं रक्तारविन्दाक्षं चन्द्रसूर्याग्निलोचनम् ।
दृष्ट्वा स राजा राजेन्द्रं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥ ५५ ॥
वाङ्मनःकायसंयुक्तं स्तोतुमारब्धवांस्तदा ।

जो सबके आदिकारण, स्वयम्भूरूप, देवताओं और असुरोंद्वारा वन्दित, सहस्रों चरणोंसे युक्त, सहस्रों नेत्रोंसे विभूषित, सहस्र भुजाओंसे सुशोभित शरीरवाले, सहस्रों मस्तकोंसे सम्पन्न तथा सहस्रों मुकुटोंसे प्रकाशमान हैं, जो दिव्य माला तथा दिव्य वस्त्र धारण करनेवाले, दिव्य गन्ध और दिव्य अनुलेपनसे अलंकृत हैं, जिनके श्रीअंगोंपर दिव्य आभूषण शोभा देते हैं, जो अनेक दिव्य आयुधोंसे सम्पन्न हैं तथा चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र हैं, उन अरुण कमलनयन राजेन्द्र श्रीकृष्णको देखकर राजा भीष्मक हाथ जोड़ उनके चरणोंमें गिर पड़े। इस प्रकार मन, वाणी और शरीरद्वारा प्रणाम करके उन्होंने उस समय उनकी स्तुति आरम्भ की ॥ ५२–५५½ ॥

भीष्मक उवाच

देवदेव नमस्तुभ्यमनादिनिधनाय वै ॥ ५६ ॥
शाश्वतायादिदेवाय नारायण परायण ।

भीष्मक बोले—देवदेव ! आपको नमस्कार है। आप आदि और अन्तसे रहित हैं, आपको नमस्कार है। नारायण ! आप सबके परम आश्रय हैं। आप सनातन आदिदेवको नमस्कार है ॥ ५६½ ॥

स्वयम्भुवे च विश्वाय स्थाणवे वेधसाय च ॥ ५७ ॥
पद्मनाभाय जटिने दण्डिने पिङ्गलाय च ।
हंसप्रभाय हंसाय चक्ररूपाय वै नमः ॥ ५८ ॥

आप ही स्वयम्भू (ब्रह्मा), विश्वरूप, स्थाणु (महादेव अथवा स्थावर प्राणी), वेधस् (विधाता), पद्मनाभ, जटाधारी, दण्डधारी, पिङ्गलवर्ण, हंसकान्ति, हंसरूप तथा चक्रस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है ॥ ५७-५८ ॥

वैकुण्ठाय नमस्तस्मै अजाय परमात्मने ।
सदसद्भावयुक्ताय पुराणपुरुषाय च ॥ ५९ ॥

आप वैकुण्ठ-धामके अधिपति, अजन्मा एवं परमात्मा हैं। आपको नमस्कार है। आप ही सद्भाव और असद्भावसे युक्त हैं, आप ही पुराणपुरुष हैं। आपको नमस्कार है ॥ ५९ ॥

पुरुषोत्तमाय युक्ताय निर्गुणाय नमोऽस्तु ते ।
वरदो भव मे नित्यं त्वद्भक्ताय सुरोत्तम ॥ ६० ॥
लोकनाथोऽसि नाथ त्वं विष्णुस्त्वं विदितात्मनाम् ।

आप योगयुक्त पुरुषोत्तम एवं निर्गुण परमात्मा हैं। आपको नमस्कार है। सुरश्रेष्ठ ! मैं आपका भक्त हूँ। आप मेरे लिये सदा वरदायक हों। नाथ ! आप ही सम्पूर्ण लोकोंके नाथ—संरक्षक हैं। आत्मज्ञानियोंके 'विष्णु' (सर्वव्यापी परमात्मा) भी आप ही हैं ॥ ६०½ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं स्तुत्वा महादेवं नृपाणामग्रतो नृपः ॥ ६१ ॥
महार्हमणिमुक्ताभिर्वस्त्रैर्वैदूर्यदन्तिभिः ।
शातकुम्भस्य निचयं कृष्णाय प्रददौ नृपः ॥ ६२ ॥
पुनश्चक्रे नमस्कारं वैनतेये महाबले ।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! राजा भीष्मकने समस्त नरेशोंके सामने बहुमूल्य मणियों तथा मुक्ताओंद्वारा वस्त्र और वैदूर्यमणिका भी उपहास करनेवाले महान् देवता श्रीकृष्णकी इस प्रकार स्तुति करके उन्हें सुवर्णकी राशि भेंट की। फिर महाबली विनतानन्दन गरुडको भी नमस्कार किया ॥

भीष्मक उवाच

नमस्तस्मै खगेन्द्राय नमो मारुतरंहसे ॥ ६३ ॥
कामरूपाय दिव्याय काश्यपाय च वै नमः ।

भीष्मक बोले—जिनका वेग वायुके समान है, जो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, दिव्यस्वरूप एवं कश्यपमुनिके पुत्र हैं, उन पक्षिराज गरुडको नमस्कार है, नमस्कार है ॥

वैशम्पायन उवाच

इति संक्षेपतः स्तुत्या सत्कृत्य वरभूषणैः ॥ ६४ ॥
ततो विसर्जयामास कृष्णं कमललोचनम् ।
अनुजग्मुर्नृपाश्चैव प्रस्थितं वासवानुजम् ॥ ६५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार संक्षेपसे ही गरुडकी स्तुति करके उत्तम आभूषणोंद्वारा सत्कार करनेके पश्चात् राजाने कमललोचन श्रीकृष्णको विदा किया। इन्द्रके छोटे भाई उपेन्द्रके प्रस्थान करनेपर बहुत-से राजा उनके पीछे-पीछे गये ॥ ६४-६५ ॥

प्रतिगृह्य च सत्कारं नृपानामन्त्र्य वीर्यवान् ।
जगाम मथुरां कृष्णो द्योतयन्तो दिशो दश ॥ ६६ ॥
वैनतेयं पुरस्कृत्य सौम्यरूपं खगोत्तमम् ।

पराक्रमी श्रीकृष्ण उन राजाओंका सत्कार ग्रहण करके उनसे विदा ले दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए सौम्यरूपधारी पक्षिप्रवर विनतानन्दन गरुडको आगे करके मथुरापुरीको गये ॥ ६६½ ॥

महता रथवृन्देन परिवार्य समन्ततः ॥ ६७ ॥
भेरीपटहनादेन शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः ।
बृंहितेन च नागानां हयानां हेषितेन च ॥ ६८ ॥
सिंहनादेन शूराणां रथनेमिस्वनेन च ।
तुमुलः सुमहानासीन्महामेघरवोपमः ॥ ६९ ॥

विष्णुपर्व ] द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ४१३

वे अपनेको चारों ओरसे विशाल रथसमूहद्वारा घेरकर भेरी, पटह, शङ्ख और दुन्दुभियोंकी ध्वनिके साथ प्रस्थित हुए। हाथियोंके चिग्घाडने, घोड़ोंके हिनहिनाने, शूरवीरोंके सिंहनाद करने तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटसे मिलकर उन वाद्योंका ऐसा महान् तुमुल नाद हुआ, जो महामेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान प्रतीत होता था॥ ६७–६९ ॥

महापराक्रमी श्रीकृष्णके चले जानेपर देवतालोग उस श्रेष्ठ सिंहासन तथा सभामंडपको साथ ले स्वर्गलोकको चले गये॥

गते कृष्णे महावीर्ये आदाय वरमासनम्।
सभामादाय देवाश्च प्रययुस्त्रिदशालयम् ॥ ७० ॥
महता चतुरङ्गेण बलेन परिवारिताः।
क्रोशमात्रमुपव्रज्य अनुज्ञाते जनार्दने ॥ ७१ ॥
प्रययुस्ते नृपाः सर्वे पुनरेव स्वयंवरम् ॥ ७२ ॥

विशाल चतुरङ्गिणी सेनासे घिरे हुए राजा लोग एक कोसतक पीछे-पीछे जाकर भगवान् जनार्दनकी आज्ञा मिलनेपर लौटे और सब-के-सब पुनः स्वयंवरमें चले गये ॥ ७१-७२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि श्रीकृष्णाभिषेको नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णका अभिषेकनामक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥


द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

शाल्वके कथनानुसार जरासंध आदि नरेशोंका शाल्वको ही कालयवनके पास दूत बनाकर भेजना

वैशम्पायन उवाच
ततः प्रयाते वसुदेवपुत्रे नराधिपा भूषणभूषिताङ्गाः।
सभां समाजग्मुः सुरेन्द्रकल्पाः प्रबोधनार्थं गमनोत्सवास्ते ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! वसुदेवपुत्र श्रीकृष्णके वहाँसे चले जानेपर सब राजा अपने अङ्गोंको आभूषणोंसे विभूषित करके देवेन्द्रके समान सज-धजकर राजा भीष्मककी सभामें उन्हें समझानेके लिये गये। श्रीकृष्णके चले जानेसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई थी ॥ १ ॥

सभागतान् सोमरविप्रकाशान् सुखोपविष्टान् रुचिरासनेषु।
समीक्ष्य राजा सुनयार्थवादी जगाद वाक्यं नरराजसिंहः ॥ २ ॥

सभामें आकर सुन्दर सिंहासनोंपर सुखपूर्वक बैठे हुए सोम और सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले राजाओंको देखकर उत्तम नीतिके अनुकूल युक्तियुक्त बात कहनेवाले नरेशोंमें सिंहके समान पराक्रमी राजा भीष्मक इस प्रकार बोले ॥ २ ॥

स्वयंवरकृतं दोषं विदित्वा वो नराधिपाः।
क्षन्तव्यो मम वृद्धस्य दुर्दग्धस्य फलोदयम् ॥ ३ ॥

‘नरेश्वरो ! स्वयंवरके द्वारा जो श्रीकृष्णविरोधरूपी दोष सम्पादित हो रहा था, उसे जानकर (मैंने इसे स्थगित कर दिया।) आपलोग मुझ वृद्धके अपराधको क्षमा करें। जिसे दैवरूपी दावानलने अच्छी तरह जला दिया हो, उस वृक्षसे फलकी प्राप्ति कैसे हो सकती है (जिस स्वयंवरमें भगवद्विरोधकी सम्भावना हो, वह सफल नहीं हो सकता) ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमाभाष्य तान् सर्वान् सत्कृत्य च यथाविधि।
ततो विसर्जयामास नृपांस्तान् मध्यदेशजान् ॥ ४ ॥
पूर्वपश्चिमजांश्चैव उत्तरापथिकानपि।

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! ऐसा कहकर भीष्मकने उन सब राजाओंका विधिपूर्वक सत्कार करके उन्हें विदा कर दिया। उनमेंसे कोई मध्य देशके थे, कोई पूर्व, पश्चिम और उत्तर भारतके। उन सबको उन्होंने सादर विदा किया ॥ ४½ ॥

येऽपि सर्वे महेष्वासाः प्रहृष्टमनसो नराः ॥ ५ ॥
यथार्हेण च सम्पूज्य जग्मुस्ते नरपुङ्गवाः।

वे सब महाधनुर्धर नरेश भी प्रसन्नचित्त होकर राजाका यथायोग्य सम्मान करके अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ ५½ ॥

जरासंधः सुनीथश्च दन्तवक्त्रश्च वीर्यवान् ॥ ६ ॥
शाल्वः सौभपतिश्चैव महाकूर्मश्च पार्थिवः।
क्रथकैशिकमुख्याश्च नृपाः प्रवरवंशजाः ॥ ७ ॥
वेणुदारिश्च राजर्षिः काश्मीराधिपतिस्तथा।
एते चान्ये च बहवो दक्षिणापथिका नृपाः ॥ ८ ॥
श्रोतुकामा रहो वाक्यं स्थिता वै भीष्मकान्तिके।

जरासंध, सुनीथ, पराक्रमी दन्तवक्त्र, सौभपति शाल्व, राजा महाकूर्म, क्रथ और कैशिक आदि श्रेष्ठ कुलके नरेश, राजर्षि वेणुदारि तथा कश्मीरनरेश—ये एवं दूसरे बहुत-से दाक्षिणात्य नरपाल राजा भीष्मककी एकान्त वार्ता सुननेकी इच्छासे उनके पास ही ठहर गये ॥ ६–८½ ॥

तान् वै समीक्ष्य राजेन्द्रः स राजा भीष्मको बली ॥ ९ ॥
स्नेहपूर्णेन मनसा स्थितांस्तानवनीश्वरान्।
त्रिवर्गसहितं श्लक्ष्णं षड्गुणालंकृतं शुभम् ॥ १० ॥
उवाच नयसम्पन्नं स्निग्धगम्भीरया गिरा।

उन सबको देखकर बलवान् राजाधिराज राजा भीष्मकने स्नेहपूर्ण हृदयसे वहाँ खड़े हुए उन भूपालोंके प्रति स्निग्ध एवं गम्भीर वाणीमें धर्म, अर्थ और कामसे युक्त, मधुर,

४१४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

सन्धि-विग्रह आदि छः गुणोंसे अलंकृत, शुभ एवं नीतिसम्पन्न बात कही ॥ ९-१० १/२ ॥

भीष्मक उवाच
भवतामवनीशानां समालोक्य नयान्वितम् ॥ ११ ॥
वचनं व्याहृतं श्रुत्वा कृतवान् कार्यमीदृशम्।
सद्भिर्भवद्भिः क्षन्तव्यं वयं नित्यापराधिनः ॥ १२ ॥

भीष्मक बोले—राजाओ ! आप सब पृथ्वीपतियोंकी ओर देखकर और आपके द्वारा कहे गये नीतियुक्त वचनको सुनकर मैंने ऐसा कार्य किया है। आप सब लोग सत्पुरुष हैं; अतः मेरे इस बर्तावको क्षमापूर्वक सह लेंगे। हम अपनेको सदा अपराधी मानते हैं ॥ ११-१२ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु राजा स भीष्मको नयकोविदः।
उवाच सुतमुद्दिश्य वचनं राजसंसदि ॥ १३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर नीति-निपुण विद्वान् राजा भीष्मक उस राजसभामें अपने पुत्रको लक्ष्य करके बोले ॥ १३ ॥

भीष्मक उवाच
पुत्रस्य चेष्टामालोक्य त्रासाकुलितलोचनः।
मन्ये बालानिमाँल्लोकान् स एष पुरुषः परः ॥ १४ ॥

भीष्मकने कहा—राजाओ ! अपने पुत्रकी चेष्टाको देखकर मेरे नेत्र भयसे व्याकुल हो उठे हैं। मैं इन लोगोंको (रुक्मी आदिको) बालक (विवेकशून्य) मानता हूँ। मेरी दृष्टिमें ये भगवान् श्रीकृष्ण परम पुरुष हैं ॥ १४ ॥

कीर्तिः कीर्तिमंतां श्रेष्ठो यशश्च विपुलं तथा।
स्थापितं भुवि मर्त्येऽस्मिन् स्वबाहुबलमूर्जितम् ॥ १५ ॥

ये कीर्तिमानोंमें श्रेष्ठ हैं। इन्होंने इस मर्त्यलोकमें भूतलपर अपनी उत्तम कीर्ति और सुयशकी स्थापना की है तथा अपने ओजस्वी बाहुबलका भी परिचय दिया है ॥ १५ ॥

धन्या खलु महाभागा देवकी योषितां वरा।
पुत्रं त्रिभुवनश्रेष्ठं कृत्वा गर्भेण केशवम् ॥ १६ ॥
कृष्णं कमलपत्राक्षं श्रीपुञ्जममराचितम् ।
नेत्राभ्यां स्नेहपूर्णाभ्यां वीक्षते मुखपङ्कजम् ॥ १७ ॥

धन्य हैं नारियोंमें श्रेष्ठ महाभागा देवकी, जो तीनों लोकोंमें सबसे श्रेष्ठ, शोभाके पुञ्ज, देवपूजित, कमलदललोचन केशव कृष्णको पुत्ररूपसे गर्भमें रखकर जन्म देनेके पश्चात् सदा स्नेहपूर्ण नेत्रोंसे उनके मुखारविन्दको निहारा करती हैं ॥ १६-१७ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवं लालप्यमानं तु राजानं राजसंसदि ।
उवाच श्लक्ष्णया वाचा शाल्वराजो महाद्युतिः ॥ १८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! राजसभामें राजा भीष्मकको इस प्रकार बारंबार बोलते देख महातेजस्वी शाल्वराजने सान्त्वनापूर्ण मधुर वाणीमें कहा ॥ १८ ॥

शाल्व उवाच
अलं खेदेन राजेन्द्र सुताय रिपुमर्दिने ।
क्षत्रियस्य रणे राजन् ध्रुवं जयपराजयौ ॥ १९ ॥

शाल्व बोला—राजेन्द्र ! (आप खेद क्यों प्रकट करते हैं) आपका पुत्र शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाला है। इसके लिये खेद करना व्यर्थ है (इसपर तो आपको गर्व होना चाहिये)। राजन् ! रणभूमिमें क्षत्रियको जय अथवा पराजय अवश्य प्राप्त होती है ॥ १९ ॥

नियता गति मर्त्यानामेष धर्मः सनातनः।<sup></sup>
बलकेशवयोरन्यस्तृतीयः कः पुमानिह ॥ २० ॥
रणे योधयितुं शक्तस्तव पुत्रं महाबलम् ।

यह मनुष्योंकी नियत गति है। यह सनातन धर्म है। बलराम और श्रीकृष्णके सिवा इस भूतलपर तीसरा कौन ऐसा पुरुष है, जो समराङ्गणमें आपके महाबली पुत्रका सामना कर सके ॥ २० १/२ ॥

रथातिरथवृन्दानामेक एव रणाजिरे ॥ २१ ॥
रिपून बाधयितुं शक्तो धनुर्गृह्य महाभुजः।

यह महाबाहु वीर हाथमें धनुष लेकर अकेला ही युद्ध-क्षेत्रमें रथियों और अतिरथियोंके समूहका सामना करने और शत्रुओंको बाधा पहुँचानेमें समर्थ है ॥ २१ १/२ ॥

भार्गवास्त्रं महारौद्रं देवैरपि दुरासदम् ॥ २२ ॥
सृजतो बाहुवीर्येण कः पुमान् प्रसहिष्यति ।

जिस समय यह अपने बाहुबलसे देवताओंके लिये भी दुर्जय महाभयंकर भार्गवास्त्रका प्रयोग करेगा, उस समय इस वीरका आक्रमण कौन पुरुष सह सकेगा ॥ २२ १/२ ॥

अयं तु पुरुषः कृष्णो ह्यनादिनिधनोऽव्ययः ॥ २३ ॥
तं विजेतानृलोकेऽस्मिन् नापिशूलधरः स्वयम्।

ये श्रीकृष्ण तो अनादि, अनन्त और अविनाशी पुरुष हैं। इस नरलोकमें साक्षात् त्रिशूलधारी भगवान् शङ्कर भी उन्हें जीत नहीं सकते ॥ २३ १/२ ॥

तव पुत्रो महाराज सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् ॥ २४ ॥
विदित्वा देवमीशानं न योधयति केशवम् ।

महाराज ! आपका पुत्र सम्पूर्ण शास्त्रोंका तत्त्ववेत्ता है। यह श्रीकृष्णको देवता और ईश्वर समझकर ही उनसे युद्ध नहीं करता है ॥ २४ १/२ ॥

अद्य तस्य रणे जेता यवनाधिपतिर्नृप ॥ २५ ॥
स कालयावनो नाम अवध्यः केशवस्य ह।

नरेश्वर ! आजकल युद्धमें श्रीकृष्णपर विजय पानेवाला


१. 'गति' के स्थानमें 'गतिः' समझना चाहिये। नीलकण्ठने यहाँ विभक्तिका लोप आर्ष माना है।

विष्णुपर्व ] द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ४१५


केवल कालयवन है, जो यवनोंका अधिपति है। वह श्रीकृष्णके लिये अवध्य है॥ २५¾ ॥

तप्त्वा सुदारुणं घोरं तपः परमदुश्चरम् ॥ २६ ॥
रुद्रमाराधयामास द्वादशाब्दानयोऽशनः।
पुत्रकामेन मुनिना तोष्य रुद्रात्सुतो वृतः ॥ २७ ॥
माथुराणामवध्योऽयं भवेदिति च शङ्करात् ।
एवमस्त्विति रुद्रोऽपि प्रददौ मुनये सुतम् ॥ २८ ॥

गार्ग्यमुनिने अत्यन्त दुष्कर, भयंकर एवं दारुण तपस्या करके बारह वर्षांतक पुत्रकी कामनासे रुद्रदेवकी आराधना की थी। वे उन दिनों केवल लोहका चूर्ण खाकर रहते थे। इस प्रकार रुद्रदेवको संतुष्ट करके उन्होंने उनसे एक पुत्र माँगा तथा भगवान् शङ्करसे यह भी प्रार्थना की कि मेरा वह पुत्र माथुरों (मथुरामें उत्पन्न हुए लोगों) के लिये अवध्य हो। तब रुद्रदेवने 'एवमस्तु' कहकर मुनिको वैसा पुत्र प्रदान कर दिया॥ २६—२८ ॥

एवं गार्ग्यस्य तनयः श्रीमान् रुद्रवरोद्भवः ।
माथुराणामवध्योऽयं मथुरायां विशेषतः ॥ २९ ॥

इस तरह गार्ग्यका वह तेजस्वी पुत्र रुद्रदेवके वरसे उत्पन्न हुआ है और विशेषतः माथुरों (मथुरामे पैदा हुए वीरों) के लिये अवध्य है ॥ २९॥

कृष्णोऽपि बलवानेष माथुरो जातवानयम् ।
स जेष्यति रणे कृष्णं मथुरायां समागतः ॥ ३० ॥

ये श्रीकृष्ण बलवान् होनेपर भी मथुरामें जन्म लेनेके कारण माथुर ही हैं। अतः मथुरामें आया हुआ कालयवन रणभूमिमें श्रीकृष्णको अवश्य जीत लेगा ॥ ३० ॥

मन्यध्वं यदि वा युक्तां नृपा वाचं मयेरिताम् ।
तत्र दूतं विसृजध्वं यवनेन्द्रपुरं प्रति ॥ ३१ ॥

नरपतियो ! यदि आपलोग मेरी कही हुई इस बातको उचित समझें तो यवनराजके नगरको दूत भेज दें॥ ३१ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा सौभपतेर्वाक्यं सर्वे ते नृपसत्तमाः।
कुर्म इत्यब्रुवन् हृष्टा जरासंधं महाबलम् ॥ ३२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सौभ विमानके अधिपति राजा शाल्वकी बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ नरेश हर्षमें भरकर महाबली जरासंधसे बोले—'हमलोग अवश्य ऐसा ही करें' ॥ ३२॥

स तेषां वचनं श्रुत्वा जरासंधो महीपतिः।
बभूव विमना राजन् ब्रह्मणो वचनं स्मरन् ॥ ३३ ॥

राजन् ! उन राजाओकी बात सुनकर आकाशवाणीकी बात याद करके पृथ्वीपति जरासंधका मन उदास हो गया॥ ३३ ॥

जरासंध उवाच

मां समाश्रित्य पूर्वस्मिन् नृपानृपभयार्दिताः ।
प्राप्नुवन्ति हतं राज्यं सभृत्यबलवाहनम् ॥ ३४ ॥

जरासंध बोला—आजसे पहले सब राजा दूसरे राजाओंके भयसे पीड़ित होनेपर मेरी शरणमें आते थे और भृत्य, सेना तथा वाहनोंसहित अपने खोये हुए राज्यको मेरे सहयोगसे पुनः प्राप्त कर लेते थे ॥ ३४ ॥

इह संचोद्यते भूपैः परसंश्रयहेतुना ।
कन्येव स्वपतिद्वेषादन्यं रतिपरायणा ॥ ३५ ॥

इस समय यहाँ सब राजा मुझे दूसरेका आश्रय लेनेके लिये प्रेरित कर रहे हैं। जैसे रतिलोलुप नारी अपने पतिके प्रति द्वेष होनेसे उसे छोड़कर दूसरे पुरुषका आश्रय लेती है, (उसी प्रकार मैं अपने बलका आश्रय न लेकर दूसरेका सहारा लेनेको उद्यत हुआ हूँ) ॥३५॥

अहो सुबलवद् दैवमशक्यं विनिवर्तितुम् ।
यदहं कृष्णभीतोऽन्यं संश्रयामि बलाधिकम् ॥ ३६ ॥

अहो ! दैव बड़ा प्रबल है। उसे लौटाया नहीं जा सकता; क्योंकि आज मैं श्रीकृष्णसे डरकर दूसरे अधिक बलशाली राजाका आश्रय ग्रहण कर रहा हूँ ॥ ३६ ॥

नूनं योगविहीनोऽहं कारयिष्ये पराश्रयम् ।
श्रेयो हि मरणं मह्यं न चान्यं संश्रये नृपाः ॥ ३७॥

निश्चय ही मैं निरुपाय हो गया हूँ, अतः मुझे दूसरेका आश्रय लेना पड़ेगा; परंतु ऐसे जीवनसे तो मेरा मर जाना ही अच्छा है। नरपतियो ! मैं दूसरेकी शरण नहीं लूँगा ॥ ३७॥

कृष्णो वा बलदेवो वा यो वाऽसौ वा नराधिपः ।
हन्तारं प्रतियोत्स्यामि यथा ब्राह्माप्रचोदितः ॥ ३८ ॥

श्रीकृष्ण हों, बलदेव हों अथवा जो कोई भी राजा क्यों न हो, जो मुझे मारेगा, उसका मैं डटकर सामना करूँगा। जैसा कि आकाशवाणीने कहा है कि मुझे कोई दूसरा मारनेवाला है ॥ ३८ ॥

एषा मे निश्चिता बुद्धिरेतत् सत् पुरुषव्रतम् ।
अतोऽन्यथा न शक्तोऽहं कर्तुं परसमाश्रयम् ॥ ३९ ॥

यही मेरी बुद्धिका निश्चय है, यही सत्पुरुषका व्रत है। इसके विपरीत मैं दूसरेका आश्रय लेनेमे असमर्थ हूँ ॥ ३९ ॥

भवतां साधुवृत्तानामाबाधं न करोति सः ।
तेन दूतं प्रदास्यामि नृपाणां रक्षणाय वै ॥ ४० ॥

आप सदाचारी नरेशोको श्रीकृष्ण बाधा न पहुँचायें, इस उद्देश्यसे राजाओंकी रक्षाके लिये मैं दूत दूँगा अर्थात् दूत भेजना स्वीकार करूँगा ॥ ४० ॥

व्योममार्गेण यातव्यं यथा कृष्णो न बाधते ।
गच्छन्तमनुचिन्त्यैवं प्रेषयध्वं नृपोत्तमाः ॥ ४१ ॥

श्रेष्ठ राजाओ ! इस दूतको आकाशमार्गसे जाना चाहिये, जिससे यहाँसे जाते समय उसे श्रीकृष्ण बाधा न दे सकें। इसकी भलीभाँति विचार करके ही तुमलोग दूत भेजो ॥ ४१॥

४१६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

अयं सौभपतिः श्रीमाननलाकेन्दुविक्रमः।
रथेनादित्यवर्णेन प्रयाति स्वपुरं बली ॥ ४२ ॥

ये श्रीमान् सौभपति बलवान् राजा शाल्व अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके समान पराक्रमी हैं। ये सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ (विमान) द्वारा अपने नगरको जाते हैं॥ ४२ ॥

यवनेन्द्रो यथाभ्येति नरेन्द्राणां समागमम्।
वचनं च तथास्माभिर्दूत्ये नः कृष्णविग्रहे ॥ ४३ ॥

ये दूतकर्म करते समय हमलोगोंकी ओरसे जैसी बात कहनी चाहिये, वैसी ही कहें, जिससे श्रीकृष्णके साथ हम लोगोंका युद्ध उपस्थित होनेपर वह यवनराज कालयवन हम नरेशोंकी मण्डलीसे आकर मिल जाय ॥ ४३ ॥

वैशम्पायन उवाच
पुनरेवाब्रवीद् राजा सौभस्य पतिमुर्जितम् ।
गच्छ सर्वनरेन्द्राणां साहाय्यं कुरु मानद ॥ ४४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! फिर राजा जरासंधने सौभविमानके स्वामी बलवान् राजा शाल्वसे कहा—'मानद ! जाओ, सम्पूर्ण नरेशोंकी सहायता करो ॥ ४४ ॥

यवनेन्द्रो यथा याति यथा कृष्णं विजेष्यति ।
यथा वयं च तुष्यामस्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ ४५ ॥

तुम ऐसी नीतिका प्रयोग करो, जिससे यवनराज चढ़ाई करे, श्रीकृष्णको जीते और हमलोगोंको संतोप हो' ॥ ४५ ॥

एवं संदिश्य सर्वांस्तान् भीष्मकं पूज्य धर्मतः ।
प्रययौ स्वपुरं राजा स्वेन सैन्येन संवृतः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार सबको संदेश देकर और धर्मानुसार भीष्मकका भी सम्मान करके राजा जरासंध अपनी सेनाके साथ अपने नगरको चला गया ॥ ४६ ॥

शाल्वोऽपि नृपतिश्रेष्ठस्तांश्च सम्पूज्य धर्मतः।
जगामाकाशमार्गेण रथेनानिलरंहसा ॥ ४७ ॥

राजाओंमें श्रेष्ठ शाल्व भी उन सबका धर्मपूर्वक आदर करके वायुके समान वेगशाली विमानद्वारा आकाशमार्गसे चला गया ॥ ४७ ॥

तेऽपि सर्वे महीपाला दक्षिणापथवासिनः ।
अनुव्रज्य जरासंधं गताः स्वनगरं प्रति ॥ ४८ ॥

दक्षिण भारतके रहनेवाले जो समस्त भूमिपाल वहाँ उपस्थित थे, वे भी कुछ दूरतक जरासंधके पीछे जाकर फिर अपने नगरको चले गये ॥ ४८ ॥

भीष्मकः सह पुत्रेण तावुभौ चिन्त्य दुर्नयम् ।
स्वे गृहे न्यवसद् दीनः कृष्णमेवानुचिन्तयन् ॥ ४९ ॥

राजा भीष्मक अपने पुत्र रुक्मीके साथ ही उन दोनों शाल्व और जरासंधका तथा उन सबकी दुर्नीतिका विचार करके श्रीकृष्णका ही चिन्तन करते हुए दीनभावसे अपने घरमें रहने लगे ॥ ४९ ॥

विदित्वा रुक्मिणी साध्वी स्वयंवरनिवर्तनम् ।
कृष्णस्यागमनाद्धेतोर्नृपाणां दोषदर्शनम् ॥ ५० ॥
गत्वा तु सा सखीमध्ये उवाच व्रीडितानना ।
न चान्येषां नरेन्द्राणां पत्नी भवितुमुत्सहे ।
कृष्णात् कमलपत्राक्षात् सत्यमेतद् वचो मम ॥ ५१ ॥

सती साध्वी रुक्मिणीको जब यह पता लग गया कि श्रीकृष्णका आगमन होनेसे स्वयंवर स्थगित हो गया तथा राजाओंकी जो दोषद्रष्टि थी उसका भी ज्ञान हो गया, तब वे अपनी सखियोंके बीचमें जाकर लज्जासे सिर झुकाये हुए बोलीं—'सखियो ! मैं कमलनयन श्रीकृष्णको छोड़कर दूसरे नरेशोंकी पत्नी नहीं हो सकती—यह मेरी सच्ची बात है ।५०-५१।

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिणीस्वयंवरे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीका स्वयंवरविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥


त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कालयवनकी विशेषता, राजा शाल्वका उसके यहाँ दूत बनकर आना और उसे जरासंधका संदेश सुनाना

वैशम्पायन उवाच
यवनानां बलोदग्रः स कालयवनो नृपः ।
बभूव राजा धर्मेण रक्षिता पुरवासिनाम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सबसे अधिक बलशाली कालयवन यवनोंका राजा था, जो धर्मके अनुसार पुरवासियोंकी रक्षा करता था ॥ १ ॥

त्रिवर्गविदितः प्राज्ञः षड्गुणानुपजीवकः ।
सप्तव्यसनसम्मूढो गुणेष्वभिरतः सदा ॥ २ ॥

वह त्रिवर्ग (पद, स्थान एवं वृद्धि अथवा धर्म, अर्थ और काम ) का ज्ञाता, बुद्धिमान्, राजनीतिके छः गुणों(संधि-विग्रह आदि ) का आश्रय लेनेवाला, सात प्रकारके व्यसनों- से अनभिज्ञ और सदा गुणोंमें तत्पर रहनेवाला था ॥ २॥

श्रुतिमान् धर्मशीलश्च सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
सांग्रामिकविधिज्ञश्च दुर्गलाभानुसारणः ॥ ३ ॥


१ सात व्यसन इस प्रकार हैं—मृगया, जुआ, दिनमें सोना, परायी निन्दा, स्त्रीविषयक आसक्ति, मद्यपान और व्यर्थ भाषण ।

विष्णुपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४१७


विद्यावान्, धर्मशील, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, युद्धविधि-का ज्ञाता तथा दुर्लभ लाभका अनुसरण करनेवाला था ॥ ३ ॥

शूरोऽप्रतिबलश्चैव मन्त्रिप्रवरसेवकः ।
सुखासीनः सभां रम्यां सचिवैः परिवारितः ॥ ४ ॥
उपास्यमानो यवनैरात्मविद्भिर्विपश्चितैः ।
विविधाश्च कथा दिव्याः कथ्यमानाः परस्परम् ॥ ५ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु दिव्यगन्धवहोऽनिलः ।
प्रववौ मदनावोधं चकार सुखशीतलः ॥ ६ ॥

उसके समान बलवान् दूसरा कोई नहीं था। वह शूरवीर और श्रेष्ठ मन्त्रियोंका सेवन करनेवाला था। एक दिन जब वह मन्त्रियोंसे घिरा हुआ अपनी रमणीय सभामें सुखपूर्वक बैठा था, आत्मज्ञ एवं विद्वान् यवन उसकी सेवामें उपस्थित थे और उनमें परस्पर नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ हो रही थीं। इसी समय दिव्य सुगन्ध लेकर मन्द-मन्द वायु बहने लगी। वह सुखद एवं शीतल वायु उन सबके कामभावको जाग्रत् करने लगी ॥ ४–६ ॥

किंस्विदित्युत्कमनसः सभायां ये समागताः ।
उत्फुल्लनयनाः सर्वे राजा चैवावलोक्य सः ॥ ७ ॥

उस समय सभामें जो लोग आये थे, वे सभी एकचित्त होकर यह जिज्ञासा करने लगे कि 'यह क्या है ?' सबके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे थे। राजा कालयवन भी यह अद्भुत बात देखकर प्रभावित हुए बिना न रह सका ॥ ७ ॥

अपश्यन्त रथं दिव्यमायान्तं भास्करोपमम् ।
शातकुम्भमयैः शुभ्रं रथाङ्गैरुपशोभितम् ॥ ८ ॥
दिव्यरत्नप्रभाकीर्णं दिव्यध्वजपताकिनम् ।
वाहितं दिव्यतुरगैर्र्मनोमारुतरंहसैः ॥ ९ ॥

उन सबने आकाशसे एक सूर्यके समान तेजस्वी दिव्य विमानको उतरते देखा, जो सुवर्णमय चमकीले पहियोंसे शोभा पाता था, वह रथ या विमान दिव्य रत्नोंकी प्रभासे व्याप्त था। उसमें दिव्य ध्वजा-पताकाएं फहरा रहीं थीं तथा मन एवं वायुके समान वेगशाली दिव्य अश्व उस रथको खींच रहे थे ॥ ८-९ ॥

चन्द्रभास्करविम्बानि कृत्वा जाम्बूनदेन तम् ।
रचितं वै विश्वकृता वैयाघ्रवरभूषितम् ॥ १० ॥

विश्वकर्माने चन्द्रमा और सूर्यके बिम्ब बनाकर जाम्बूनद नामक सुवर्णसे उस रथका निर्माण किया था। वह चारों ओरसे उत्तम व्याघ्रचर्मद्वारा मढ़ा हुआ था ॥ १० ॥

रिपूणां त्रासजननं मित्राणां हर्षवर्द्धनम् ।
दक्षिणादिगुपायान्तं रथं पररथारुजम् ॥ ११ ॥

वह रथ शत्रुओंके मनमें त्रास उत्पन्न करनेवाला और मित्रोंका हर्ष बढ़ानेवाला था। वह दक्षिण दिशाकी ओरसे आ रहा था और शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेमे समर्थ था ११

तत्रोपविष्टं श्रीमन्तं सौभस्य पतिमूर्जितम् ।
दृष्ट्वा परमसंहृष्टाश्चार्घ्यं पाद्येति चासकृत् ॥ १२ ॥
उवाच यवनेन्द्रस्य मन्त्री मन्त्रविशां वरः ।

उसमे बैठे हुए सौभपति तेजस्वी राजा श्रीमान् शाल्वको देखकर मन्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ यवनराजका मन्त्री बहुत प्रसन्न हुआ और बारंबार कहने लगा—'अरे ! अर्घ्य लाओ, पाद्य लाओ' ॥ १२३ ॥

तत्रोत्थाय महाबाहुः स्वयमेव नृपासनात् ॥ १३ ॥
प्रत्युद्गम्यार्घ्यमादाय रथावतरणे स्थितः ।

उस समय महाबाहु राजा कालयवन स्वयं ही राजसिंहासनसे उठा और अर्घ्य लिये आगे बढ़कर विमानसे उतरनेकी सीढ़ीके पास खड़ा हो गया ॥ १३३ ॥

शाल्वोऽपि च महातेजा दृष्ट्वा राजानमागतम् ॥ १४ ॥
मुदा परमया युक्तं शक्रप्रतिमतेजसम् ।
अवतीर्य सुविश्रब्ध एक एव रथोत्तमात् ॥ १५ ॥
विवेश परमं प्रीतो मित्रदर्शनलालसः ।

महातेजस्वी राजा शाल्व भी इन्द्रके समान तेजस्वी राजा कालयवनको बड़ी प्रसन्नताके साथ आया देख निर्भय हो अकेला ही उस उत्तम रथसे उतर पड़ा और मित्रके दर्शनकी लालसा मनमें रखकर अत्यन्त संतुष्ट हो उसके भवनमें प्रविष्ट हुआ ॥ १४-१५३ ॥

दृष्ट्वार्घ्यमुद्यतं राजा शाल्वो राजर्षिसत्तमः ॥ १६ ॥
उवाच श्लक्ष्णया वाचा नार्घोऽहंऽस्मि महाद्युते ।

अपने लिये अर्घ्य उपस्थित देख राजर्षियोंमें श्रेष्ठ राजा शाल्व मधुर वाणीमे बोला—'महाद्युते ! मैं अर्घ्य ग्रहण करनेके योग्य नहीं हूँ ॥ १६३ ॥'

दूतोऽहं मनुजेन्द्राणां सकाशाद् भवतोऽन्तिकम् ॥ १७ ॥
प्रेषितो बहुभिः सार्द्धं जरासंधेन धीमता ।
तेन मन्ये महाराज नार्घाहोऽस्मीति राजसु ॥ १८ ॥

'मैं नरेशोंका दूत बनकर उनकी ओरसे आपके पास आया हूँ। बुद्धिमान् जरासंध तथा बहुत-से नरेशोंने एक साथ मिलकर मुझे आपके पास भेजा है। महाराज ! इसीलिये मैं समझता हूँ कि इस समय मैं राजाओंका अर्घ्य लेने योग्य नहीं हूँ' ॥ १७-१८ ॥

कालयवन उवाच

जानाम्यहं महाबाहो दौत्येन त्वामिहागतम् ।
साहित्ये नरदेवानां प्रेषितो मागधेन वै ॥ १९ ॥

कालयवन बोला—महाबाहो ! मैं जानता हूँ कि तुम दूत बनकर यहाँ आये हो और नरपतियोंके साथ मगधराज जरासंधने तुम्हे यहाँ भेजा है ॥ १९ ॥


म० ह० १४ -

४१८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तेन त्वामर्चये राजन् विशेषेण महामते।
अर्घ्यपाद्यादिसत्कारैरासनेन यथाविधि ॥ २० ॥
भवत्यभ्यर्चिते राज्ञां सर्वेषामर्चितं भवेत्।
आस्यतामासने शुभ्रे मया सार्द्धं जनेश्वर ॥ २१ ॥

राजन् ! महामते ! इसलिये मैं तुम्हारी विशेषरूपसे पूजा करना चाहता हूँ। अर्घ्य, पाद्य आदि सत्कारोंसे तथा विधिपूर्वक आसन देनेसे यदि आपकी पूजा हो जायगी तो इसके द्वारा समस्त राजाओंका पूजन सम्पन्न हो जायगा। अतः जनेश्वर ! अब मेरे साथ उज्ज्वल सिंहासनपर विराजमान होइये ॥ २०-२१ ॥

वैशम्पायन उवाच
स हस्तालिङ्गनं कृत्वा पृष्ट्वा च कुशलमामयम् ।
सुखोपविष्टौ सहितौ शुभे सिंहासने स्थितौ ॥ २२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कालयवनने शाल्वसे हाथ मिलाकर उसका कुशलमंगल पूछा। फिर दोनों एक सुन्दर सिंहासनपर साथ-साथ सुखपूर्वक बैठे ॥ २२ ॥

कालयवन उवाच
यद्बाहुबलमाश्रित्य वयं सर्वे नराधिपाः।
वसामो विगतोद्विग्ना देवा इव शचीपतिम् ॥ २३ ॥
किमसाध्यं भवेदस्य येनासि प्रेषितो मयि।

उस समय कालयवनने कहा—राजन् ! जिनके बाहुबलका सहारा लेकर हम सब नरेश उसी प्रकार निर्भय रहते हैं, जैसे देवता शचीपति इन्द्रका सहारा लेकर भयसे मुक्त हो जाते हैं; उन्हीं महाराज जरासंधके लिये कौन-सा कार्य असाध्य हो गया है, जिससे उन्होंने मेरे पास आपको भेजा है ? ॥ २३ ॥

वद सत्यं वचस्तस्य किमाज्ञापयति प्रभुः।
करिष्ये वचनं तस्य अपि कर्म सुदुष्करम् ॥ २४ ॥

उन्होंने क्या कहा है, यह सच-सच बताइये। वे प्रभु मेरे लिये क्या आज्ञा देते हैं ? मैं उनकी आज्ञाका पालन करूँगा। उनके कहनेसे अत्यन्त दुष्कर कर्म भी कर सकता हूँ ॥ २४ ॥

शाल्व उवाच
यथा वदति राजेन्द्र मगधाधिपतिस्तव।
तथाहं सम्प्रवक्ष्यामि श्रूयतां यवनाधिप ॥ २५ ॥

शाल्व बोला—राजेन्द्र ! यवनेश्वर ! मगधराज जरासंधने आपसे जैसी बात कहनेको कहा है, वैसी ही बता रहा हूँ, सुनिये ॥ २५ ॥

जरासंध उवाच
जातोऽयं जगतां बाधी कृष्णः परमदुर्जयः।
विदित्वा तस्य दुर्वृत्तमहं हन्तुं समुद्यतः ॥ २६ ॥

जरासंधका कथन है कि—ये जो परम दुर्जय श्रीकृष्ण प्रकट हुए हैं, सम्पूर्ण जगत्‌को बड़ा कष्ट दे रहे हैं। उनके दुराचारको जानकर मैं उन्हें मार डालनेके लिये उद्यत हुआ था ॥ २६ ॥

पार्थिवैर्बहुभिः सार्द्धं समग्रबलवाहनैः ।
उपरुध्य महासैन्यैर्गोमन्तमचलोत्तमम् ॥ २७ ॥
चेदिराजस्य वचनं महार्थं श्रुतवानहम् ।
तदा तयोर्विनाशाय हुताशनमयोजयम् ॥ २८ ॥

बहुत-से राजा अपनी समूची सेना और सवारियाँ लेकर मेरे साथ हो गये थे। उन सबकी विशाल सेनाओंद्वारा मैंने गोमन्त नामक उत्तम पर्वतपर घेरा डाला (क्योंकि उस समय श्रीकृष्ण और बलराम गोमन्तपर ही विद्यमान थे)। घेरा डालनेके बाद मैंने चेदिराज दमघोषका वचन सुना, जो महान् अर्थसे भरा था। तब मैंने उन दोनोंके विनाशके लिये उस पर्वतपर आग लगा दी ॥ २७-२८ ॥

ज्वालाशतसहस्राढ्यं युगान्ताग्निसमप्रभम् ।
दृष्ट्वा रामो गिरेः कूटादाप्लुतो हेमतालधृक् ॥ २९ ॥
विनिष्पत्य महासेनां मध्ये सागरसंनिभाम् ।
आजघान दुराधर्षो नराश्वरथदन्तिनाम् ॥ ३० ॥

वह आग सैकड़ों और हजारों लपटोंसे प्रज्वलित हो उठी, जो प्रलयकालकी संवर्तक अग्निके समान प्रकाशित हो रही थी। उस आगको देखकर सुवर्णमय तालध्वज धारण करनेवाले बलराम पर्वतके शिखरसे कूद पड़े और समुद्र-जैसी प्रतीत होनेवाली उस विशाल सेनाके मध्यभागमें पहुँचकर हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंका संहार करने लगे। उस समय उन्हें पराजित करना अत्यन्त कठिन हो गया था॥२९-३०

सर्पन्तमिव सर्पेन्द्रं विकृष्याकृष्य लाङ्गलम् ।
नरनागाश्ववृन्दानि मुसलेन व्यपोथयत् ॥ ३१ ॥

उन्होंने सर्पराजके समान सरकते हुए हलका आकर्षण और विकर्षण करके अर्थात् उस हलद्वारा शत्रुसैनिकोंको ढकेलते और खींचते हुए बहुत-से मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंको मुसलसे मार डाला ॥ ३१ ॥

गजेन गजमास्फाल्य रथेन रथयोधिनम् ।
हयेन च हयारोहं पदातेन पदातिनम् ॥ ३२ ॥

वे हाथीसे हाथीको, रथसे रथी योद्धाको, घोड़ेसे घुड़सवारको तथा पैदलसे पैदल सिपाहीको मौतके घाट उतार देते थे ॥ ३२ ॥

समरे स महातेजा नृपार्कशतसंकुले ।
विचरन् विविधान् मार्गान् निदाघे भास्करो यथा ॥३३॥

जैसे ग्रीष्म ऋतुमें सूर्यदेव प्रचण्ड तेजसे सम्पन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार सैकड़ों राजारूपी सूर्यसे व्याप्त समराङ्गणमें वे

विष्णुपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४१९


महातेजस्वी बलराम भाँति-भाँतिके पैंतरे दिखाते हुए विचरने लगे ॥ ३३ ॥

रामादनन्तरं कृष्णः प्रगृह्यार्कसमप्रभम् ।
चक्रं चक्रभृतां श्रेष्ठः सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥ ३४ ॥

बलरामसे छोटे हैं श्रीकृष्ण, जो चक्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं। वे सूर्यके समान तेजस्वी चक्र हाथमें लेकर उसी तरह शत्रु-सैनिकोंपर टूट पड़े, जैसे सिंह क्षुद्र मृगोंपर आक्रमण करता है ॥ ३४ ॥

प्रविचाल्य महावीर्यः पादवेगेन तं गिरिम् ।
शत्रुसैन्ये पपातोच्चैैर्यदुवीरः प्रतापवान् ॥ ३५ ॥
प्रनृत्यन्निव शैलेन्द्रस्तोयधाराभिषेचितः ।
घूर्णमानो विवेशोर्वीं विनिर्वाप्य हुताशनम् ॥ ३६ ॥

महापराक्रमी प्रतापी यदुवीर श्रीकृष्ण अपने पैरोंके वेगसे उस पर्वतको हिलाकर जब ऊँचे शिखरसे शत्रुओंकी सेनामें कूदे थे, उस समय वह शैलराज नाचता-सा प्रतीत होता था। वह अपने ही अवयवोंसे निकली हुई जलधारासे नहा उठा और सारी आगको बुझाकर चक्कर काटता-सा कुछ दूरतक पृथ्वीमें घुस गया ॥ ३५-३६ ॥

आदीप्यमानशिखरादवप्लुत्य जनार्दनः ।
जघान वाहिनीं राजंश्चक्रव्यग्रेण पाणिना ॥ ३७ ॥

राजन् ! पर्वतके जलते हुए शिखरसे नीचे कूदकर श्रीकृष्णने चक्रयुक्त हाथसे राजाओंकी सेनाका संहार आरम्भ किया ॥ ३७ ॥

विक्षिप्य विपुलं चक्रं गदापातादनन्तरम् ।
नरनागाश्ववृन्दानि मुसलेन व्यचूर्णयत् ॥ ३८ ॥

विशाल चक्र फेंककर फिर गदाद्वारा आघात करते थे। तदनन्तर बलराम मुसलसे हाथी, घोड़े और मनुष्योंके समूहोंका कचूमर निकाल देते थे ॥ ३८ ॥

क्रोधानिलसमुद्धतचक्रलाङ्गलवह्निना ।
निर्दग्धा महती सेना नरेन्द्रार्काभिपालिता ॥ ३९ ॥

क्रोधरूपी वायुसे प्रज्वलित चक्र और हलरूपी आगसे नरेशरूपी सूर्यद्वारा पालित वह विशाल सेना जलकर भस्म हो गयी ॥ ३९ ॥

नरनागाश्वकलिलं पत्तिध्वजसमाकुलम् ।
रथानीकं पदाताभ्यां क्षणेन विदलीकृतम् ॥ ४० ॥

इन दो ही पैदल वीरोंने हाथी, घोड़ों और मनुष्योंसे परिपूर्ण एवं पैदलों और ध्वजोंसे व्याप्त रथसमूहका क्षणभरमें ही संहार कर डाला ॥ ४० ॥

सेनां प्रभग्नामालोक्य चक्रानलभयार्दिताम् ।
महता रथवृन्देन परिवार्य समन्ततः ॥ ४१ ॥
तत्राहं युद्धयमानस्तु भ्रातास्य बलवान् बली ।
स्थितो ममाग्रतः शूरो गदापाणिर्हलायुधः ॥ ४२ ॥

चक्राग्निके भयसे पीड़ित हुई अपनी सेनाको पलायन करती देख मैं विशाल रथसमूहके द्वारा उन दोनोंको सब ओरसे घेरकर युद्ध करने लगा। उस समय श्रीकृष्णके बलवान् भ्राता शूरवीर बलराम हाथमें गदा और हल लिये मेरे सामने खड़े हो गये ॥ ४१-४२ ॥

द्वादशाक्षौहिणीर्हत्वा प्रभिन्न इव केसरी ।
हलं सौनन्दमुत्सृज्य गदया मामताडयत् ॥ ४३ ॥

उन्होंने चोट खाये हुए सिंहके समान कुपित हो मेरी बारह अक्षौहिणी सेनाओंका संहार करके हल और मुसलको तो छोड़ दिया और गदासे ही मुझपर आघात किया ॥ ४३॥

वज्रपातनिभं वेगं पातयित्वा ममोपरि ।
भूयः प्रहर्तुकामो मां वैशाखेनास्थितो महीम् ॥ ४४ ॥

उसका वेग वज्रपातके समान था। मेरे ऊपर उस गदाका प्रहार करके वे पुनः मुझपर चोट करनेकी इच्छासे वैशाखी (शक्ति) लेकर पृथ्वीपर खड़े हो गये ॥ ४४ ॥

वैशाखं स्थानमास्थाय गुहः क्रौञ्चं यथा पुरा ।
तथा मां दीर्घनेत्राभ्यामीक्षते निर्दहन्निव ॥ ४५ ॥

जैसे पूर्वकालमें कार्तिकेयने क्रौञ्च पर्वतको विदीर्ण किया था, उसी प्रकार वे मेरे मर्मस्थानको लक्ष्य करके शक्ति छोड़नेकी इच्छासे अपने बड़े-बड़े नेत्रोंद्वारा मेरी ओर इस तरह देखने लगे, मानो मुझे जलाकर भस्म कर डालेंगे ॥ ४५ ॥

तादृग्रूपं समालोक्य बलदेवं रणाजिरे ।
जीवितार्थी नृलोकेऽस्मिन् कः पुमान् स्थातुमर्हति ॥ ४६॥

रणभूमिमें बलदेवके वैसे स्वरूपको देखकर अपने जीवनकी इच्छा रखनेवाला इस मनुष्यलोकका कौन पुरुष उनके सामने ठहर सकता है ॥ ४६ ॥

गृहीत्वा सगदां भीमां कालदण्डमिवोद्यताम् ।
कालाङ्कुशेन निर्धूतां स्थित एवाग्रतो मम ॥ ४७ ॥

फिर कालदण्डके समान उठी हुई भयानक गदाको हाथमें लेकर वे मेरे सामने खड़े हो गये। वह गदा कालकी प्रेरणासे घुमायी जा रही थी ॥ ४७ ॥

ततो जलदगम्भीरस्वरेणापूरयन् नभः ।
वागुवाचाशरीरेण स्वयं लोकपितामहः ॥ ४८ ॥
प्रहर्तव्यो न राजायमवध्योऽयं तवानघ ।
कल्पितोऽस्य वधोऽन्यस्माद् विरमस्व हलायुध॥ ४९ ॥

इसी बीचमें साक्षात् लोकपितामह ब्रह्माजी मेघके समान गम्भीर स्वरसे आकाशको पूर्ण करते हुए अदृश्यरूपसे बोले— 'अनघ ! इस राजापर प्रहार न करना। यह तुम्हारे लिये

४२०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

अवध्य है। इसका वध दूसरेके हाथसे निश्चित किया गया है, अतः हलधारी बलराम ! तुम प्रहारसे विरत हो जाओ' ४८-४९

श्रुत्वाहं तेन वाक्येन चिन्ताविष्टो निवर्तितः ।
सर्वप्राणहरं घोरं ब्रह्मणा स्वयमीरितम् ॥ ५० ॥
यह सुनकर उस आकाशवाणीके कारण मैं चिन्तामें निमग्न हो गया और युद्धसे लौट पड़ा; क्योंकि साक्षात् ब्रह्माजीने वह ऐसा घोर वचन सुनाया था, जो मेरी सम्पूर्ण प्राणशक्तिको हर लेनेवाला था ॥ ५० ॥

तेनाहं वः प्रवक्ष्यामि नृपाणां हितकाम्यया ।
श्रुत्वा त्वमेव राजेन्द्र कर्तुमर्हसि तद् वचः ॥ ५१ ॥
राजेन्द्र ! इसलिये मैं तुमसे समस्त नरेशोंके हितकी कामनासे कुछ कहना चाहता हूँ, उसे सुनकर तुम्हीं उसे पूर्ण कर सकते हो ॥ ५१ ॥

तपसोग्रेण महता पुत्रार्थी तोष्य शङ्करम् ।
प्राप्तवान् देवदेवं त्वामवध्यं माथुरैर्जनैः ॥ ५२ ॥
महामुनिश्चायसचूर्णमशन-
न्युपस्थितो द्वादशवार्षिकं व्रतम् ।
सुरासुरैः संस्तुतपादपङ्कजः
स लब्धवानीप्सितकामसम्पदम् ॥ ५३ ॥
महामुनि गार्ग्य, जिनके चरणारविन्दोंकी स्तुति देवता और असुर भी करते हैं; बारह वर्षोंतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेके पश्चात् लोहचूर्ण खाकर तपस्या करने लगे । मनमें पुत्रकी कामना रखकर उस उग्र एवं महान् तपके द्वारा भगवान् शङ्करको संतुष्ट करके उनसे उन्होंने अपनी अभीष्ट कामसम्पत्तिके रूपमें देवराज-तुल्य तुमको प्राप्त किया । तुम मथुरा मण्डलमें उत्पन्न होनेवाले लोगोंके लिये अवध्य हो ॥ ५२-५३ ॥

तपोबलाद् गार्ग्यमुनेर्महात्मनो
वरप्रभावाच्चकलेन्दुमौलिनः ।
भवन्तमासाद्य जनार्दनो हिमं
विलीयते भास्कररश्मिना यथा ॥ ५४ ॥
महामुनि गार्ग्यके तपोबल और चन्द्रार्धशेखर भगवान् शिवके वरदानसे तुम्हारा प्राकट्य हुआ है । तुमसे टक्कर लेने-पर श्रीकृष्ण उसी प्रकार नष्ट हो जायँगे, जैसे बर्फ सूर्यकी किरणोंसे गल जाता है ॥ ५४ ॥

यतस्व राज्ञां वचनप्रचोदितो
व्रजस्व यात्रां विजयाय केशवम् ।
प्रविश्य राष्ट्रं मथुरां च सेनया
निहत्य कृष्णं प्रथयन् स्वकं यशः ॥ ५५ ॥
राजन् ! तुम राजाओंके वचनोंसे प्रेरित हो श्रीकृष्णको जीतनेका प्रयत्न करो । उनपर विजय पानेके लिये मथुरापर चढ़ाई कर दो । अपनी सेनाद्वारा मथुराके राज्य और नगर-में प्रवेश करके श्रीकृष्णको मारकर अपने यशका विस्तार करो ॥ ५५ ॥

माथुरो वासुदेवोऽयं बलदेवः सबान्धवः ।
तौ विजेष्यसि संग्रामे गत्वा तां मथुरां पुरीम् ॥ ५६ ॥
वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण और बलदेव अपने बन्धु-बान्धवों-सहित माथुर ही हैं; तुम मथुरापुरीपर चढ़ाई करके उन दोनों भाइयोंको युद्धमें जीत लोगे ॥ ५६ ॥

शाल्व उवाच

इत्येवं नरपतिभास्करप्रगीतं
वाक्यं ते कथितमिदं हितं नृपाणाम् ।
तत्सर्वं सह सचिवैर्विमृश्य बुद्ध्या
यद्युक्तं कुरु मनुजेन्द्र चात्मनिष्ठम् ॥ ५७ ॥
शाल्व कहता है— नरेन्द्र ! राजाओंमें सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले जरासंधने इस प्रकार जो सम्पूर्ण नरेशोंके लिये हितकारक बात कही है, वह मैंने तुम्हें कह सुनायी । तुम अपने मन्त्रियोंके साथ बैठकर उन सारी बातोंपर बुद्धि-पूर्वक विचार करके जो अपने लिये लाभदायक और उचित जान पड़े, वह करो ॥ ५७ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शाल्ववाक्ये त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शाल्वका वाक्यविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥


चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कालयवनका राजाओंका अनुरोध स्वीकार करके श्रीकृष्णपर विजय पानेके लिये मथुराको प्रस्थान

वैशम्पायन उवाचवैशम्पायनजी कहते हैं—
एवं कथयमानं तं शाल्वराजं नृपाज्ञया ।<br>उवाच परमप्रीतो यवनाधिपतिर्नृपः ॥ १ ॥जनमेजय ! नरेशोंकी आज्ञाके अनुसार शाल्वराजने जब उपर्युक्त बात कही, तब यवनोंके अधिपति राजा कालयवनने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा ॥ १ ॥

विष्णुपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२१

कालयवन उवाच

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि सफलं जीवितं मम ।
कृष्णनिग्रहहेतोर्यन्नियुक्तो बहुभिर्नृपैः ॥ २ ॥

कालयवन बोला—बहुत-से राजाओंने मिलकर जो मुझे श्रीकृष्णके निग्रहके लिये नियुक्त किया है, इससे मैं धन्य हो गया। यह उन सबका मुझपर महान् अनुग्रह है। आज मेरा जीवन सफल हो गया ॥ २ ॥

दुर्जयस्त्रिषु लोकेषु सुरासुरगणैरपि ।
तस्य निग्रहहेतोर्मामवधार्य जयाशिषम् ॥ ३ ॥
प्रहृष्टै राजसिंहैस्तैरवधार्यो जयो मम ।
तेषां वाचामृतवर्षेण विजयो मे भविष्यति ॥ ४ ॥

जो तीनों लोकोंमें देवताओं और असुरोंके लिये भी दुर्जय हैं, उन्हींके निग्रहके लिये मुझे भेजनेका निश्चय किया गया और मुझे विजयसूचक आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ। हर्षमे भरे हुए उन राजसिंहोंने यदि मेरी विजयका निश्चय किया है तो उनके वचनामृतकी वर्षासे मेरी जीत अवश्य होगी ॥ ३-४॥

करिष्ये वचनं तेषां नृपसत्तमचोदितम् ।
पराजयोऽपि राजेन्द्र जयेन सदृशो मम ॥ ५ ॥

राजेन्द्र ! मैं नृपश्रेष्ठ जरासंधके कथनानुसार उन राजाओंके वचनका पालन अवश्य करूँगा। इस युद्धमें यदि मेरी पराजय भी हुई तो वह मेरे लिये विजयके ही समान होगी ॥ ५ ॥

अद्यैव तिथिनक्षत्रं मुहूर्तं करणं शुभम् ।
यास्यामि मथुरां राजन् विजेतुं केशवं रणे ॥ ६ ॥

राजन् ! मैं आजकी तिथि, नक्षत्र, मुहूर्त और करणको शुभ मानकर श्रीकृष्णको युद्धमें जीतनेके लिये आज ही मथुराको प्रस्थान करूँगा ॥ ६ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमाभाष्य राजानं सौभस्य पतिमूर्जितम् ।
सत्कृत्य च यथान्यायं महार्हमणिभूषणैः ॥ ७ ॥
ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं सिद्धादेशाय वै नृपः ।
पुरोहिताय राजेन्द्र प्रददौ बहुशो धनम् ॥ ८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सौभविमानके अधिपति बलवान् राजा शाल्वसे ऐसा कहकर कालयवनने बहुमूल्य मणिमय आभूषणोंद्वारा उसका यथोचित सत्कार किया। राजेन्द्र ! तत्पश्चात् उस राजाने सिद्धिसूचक आशीर्वाद प्राप्त करनेके लिये ब्राह्मणोंको धन दान दिया और पुरोहितको बहुत-सा धन अर्पित किया ॥ ७-८ ॥

हुत्वाग्निं विधिवद् राजा कृतकौतुकमङ्गलः ।
प्रस्थानं कृतवान् सम्यग् जेतुकामो जनार्दनम् ॥ ९ ॥

तदनन्तर, विधिपूर्वक अग्निमें आहुति करके यात्राकालिक मङ्गलाचार सम्पन्न करनेके पश्चात् राजा कालयवनने जनार्दन श्रीकृष्णपर भलीभाँति विजय पानेके लिये वहाँसे प्रस्थान किया ॥ ९ ॥

शाल्वोऽपि भरतश्रेष्ठ कृतार्थो हृष्टमानसः ।
यवनेन्द्रं परिष्वज्य जगाम स्वपुरं नृपः ॥ १० ॥

भरतश्रेष्ठ ! इधर राजा शाल्व भी कृतार्थ एवं प्रसन्नचित्त हो यवनराजको हृदयसे लगाकर अपने नगरको चला गया ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कालयवनवाक्ये चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कालयवनका वाक्यविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥


पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

गरुड़का श्रीकृष्णके निवासयोग्य भूमि देखनेके लिये जाना, मथुरामें राजेन्द्र श्रीकृष्णका स्वागत, श्रीकृष्णद्वारा राजा उग्रसेन तथा मथुरावासियोंका सत्कार एवं गरुड़का लौटकर कुशस्थलीके विषयमें बताना।

जनमेजय उवाच

विदर्भनगराद् याते शक्रतुल्यपराक्रमे ।
किमर्थं गरुडो नीतः किं च कर्म चकार सः ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा—इन्द्रके तुल्य पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण जब विदर्भ नगरसे मथुराको गये, उस समय अपने साथ गरुड़को क्यों ले गये और गरुड़ने वहाँ जाकर कौन-सा कार्य सम्पन्न किया ? ॥ १ ॥

न चारुरोह भगवान् वैनतेयं महाबलम् ।
एतन्मे संशयं ब्रह्मन् ब्रूहि तत्त्वं महामुने ॥ २ ॥

महामुने ! ब्रह्मन् ! भगवान् श्रीकृष्ण महाबली गरुड़पर आरूढ़ क्यों नहीं हुए ? यह मेरा संशय है। आप इसका ठीक-ठीक समाधान करें ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

शृणु राजन् सुपर्णेन कृतं कर्मातिमानुषम् ।
विदर्भनगरों गत्वा वैनतेयो महाद्युतिः ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! महातेजस्वी विनता-नन्दन गरुड़ने विदर्भनगरमें जाकर ऐसा कार्य किया था, जो मानवीय शक्तिसे परेकी वस्तु है ॥ ३ ॥

४२२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

असम्प्राप्ते च नगरीं मधुरां मधुसूदने।
मनसा चिन्तयामास वैनतेयो महाद्युतिः॥ ४ ॥
यदुक्तं देवदेवेन नृपाणामग्रतः प्रभो।
यास्यामि मधुरां रम्यां भोजराजेन पालिताम्॥ ५॥
इति तद्वचनस्यान्ते गमिष्येति विचिन्तयन्।
कृताञ्जलिपुटः धीमान् प्रणिपत्याब्रवीदिदम्॥ ६ ॥

प्रभो ! मधुसूदन श्रीकृष्ण विदर्भनगरसे चलकर अभी मार्गमें ही थे, मथुरापुरी नहीं पहुँचे थे। तभी महातेजस्वी गरुड़ने मन-ही-मन विचार किया कि देवाधिदेव श्रीहरिने सब राजाओंके सामने जो कहा था कि 'मैं भोजराज उग्रसेनके द्वारा पालित रमणीय नगरी मथुराको जाऊँगा' उनके उस कथनके अन्तमें 'चलूँगा' यह कहकर मैंने भी चलना स्वीकार कर लिया था। यही सोचते हुए गरुड़को एक कार्य सूझ गया और उन तेजस्वी पक्षिराजने दोनों हाथ जोड़ भगवान्‌को प्रणाम करके इस प्रकार कहा—॥ ४-६॥

गरुड उवाच

देव यास्यामि नगरीं रैवतस्य कुशस्थलीम्।
रैवतं च गिरिं रम्यं नन्दनप्रतिमं वनम्॥ ७ ॥

गरुड़ बोले—देव ! मैं राजा रैवतकी कुशस्थली नगरीको जाऊँगा। वहाँ रमणीय रैवत गिरि है, जहाँ नन्दनके समान मनोहर वन है॥ ७॥

रुक्मिणोद्वासितां रम्यां शैलोदधितटाश्रयाम्।
वृक्षगुल्मलताकीर्णां पुष्परेणुविभूषिताम्॥ ८ ॥

रुक्मीने पर्वत और समुद्रतटका आश्रय लेकर बसी हुई उस रमणीय नगरीको उजाड़ दिया है। वहाँ हरे-भरे वृक्ष, गुल्म और लताएँ फैली हुई हैं। फूलोंके पराग उसकी शोभा बढ़ाते हैं॥ ८॥

गजेन्द्रभुजगाकीर्णामृक्षवानरसेविताम् ।
वराहमहिषाक्रान्तां मृगयूथैरनेककः॥ ९ ॥

वहाँ हाथी और सर्प भरे हुए हैं। रीछ तथा वानर उसका सेवन करते हैं। वाराह, भैंसे तथा मृगोंके अनेकानेक झुंड वहाँ वास करते हैं॥ ९ ॥

तां समन्तात् समालोक्य वासार्थं ते क्षमां क्षमा।
यदि स्याद् भवतो रम्या प्रशस्ता नगरीति च॥ १०॥
कण्टकोद्धरणं कृत्वा आगमिष्ये तवान्तिकम्।

उस भूमिको सब ओरसे निरीक्षण करके मैं यह देखूँगा कि वह आपके निवासके लिये उपयुक्त है या नहीं। यदि वह आपके योग्य रमणीय या उत्तम नगरी हो सकेगी तो वहाँके कण्टकोंको (आपके मार्गका अवरोध करनेवाले शत्रुओंको) उखाड़ फेंकूँगा और आपके पास लौट आऊँगा॥ १०१/२॥


वैशम्पायन उवाच

एवं विज्ञाप्य देवेशं प्रणिपत्य जनार्दनम्॥ ११ ॥
जगाम पतगेन्द्रोऽपि पश्चिमाभिमुखो बली।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार अपना अभिप्राय निवेदन करके देवेश्वर जनार्दनको प्रणाम करनेके अनन्तर बलवान् पक्षिराज गरुड़ पश्चिम दिशाकी ओर चल दिये ॥ १११/२ ॥

कृष्णोऽपियदुभिः सार्द्धं विवेश मधुरां पुरीम्॥ १२ ॥
स्वैरिण्य उग्रसेनश्च नागराश्चैव सर्वशः।
प्रत्युद्गम्यार्चयन् कृष्णं प्रहृष्टजनसंकुलम्॥ १३ ॥

इधर श्रीकृष्ण भी यदुवंशियोंके साथ मथुरापुरीमें जा पहुँचे। उस समय राजा उग्रसेन, नर्तकियों तथा मथुराके नागरिक सबने आगे बढ़कर हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंके साथ आये हुए श्रीकृष्णका स्वागत सत्कार किया ॥ १२-१३ ॥

जनमेजय उवाच

श्रुत्वाभिषिक्तं राजेन्द्रं बहुभिर्वसुधाधिपैः।
किं चकार महाबाहुरुग्रसेनो महीपतिः॥ १४ ॥

जनमेजयने पूछा—बहुत-से राजाओंने मिलकर श्रीकृष्णका राजेन्द्रपदपर अभिषेक किया है—यह समाचार सुनकर महाबाहु राजा उग्रसेनने क्या किया ? ॥ १४ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वाभिषिक्तं राजेन्द्रं बहुभिः पार्थिवोत्तमैः।
इन्द्रेण कृतसंधानं दूतं चित्राङ्गदं कृतम्॥ १५ ॥
एकैकं नृपतेर्भागं शतसाहस्रसम्मितम्।
राजेन्द्रे त्वर्बुदं दत्तं मानवेषु च वै दश॥ १६ ॥
ये तत्र समनुप्राप्ता न रिक्तास्ते गृहं गताः।
शङ्खो यादवरूपेण प्रददौ हरिचिन्तितम्॥ १७ ॥
एवं निधिपतिः श्रीमान् दैवतैरनुमोदितः।

वैशम्पायनजीने कहा—बहुत-से श्रेष्ठ नरेशोंने मिलकर श्रीकृष्णका राजेन्द्रके पदपर अभिषेक किया है। इन्द्रका अभिप्राय निवेदन करनेके लिये चित्राङ्गद दूत बनकर आये थे। एक-एक राजाको एक-एक लाख मुद्राएँ पुरस्कारमें दी गयीं। जो राजेन्द्र था, उसे एक अर्बुद (दस करोड) दिया गया तथा साधारण मनुष्योंको भी दस दस हजार रुपये दिये गये। जो वहाँ पहुँच गये थे, वे खाली हाथ घर नहीं लौटे। श्रीमान् निधिपति शङ्ख ही यादवरूपसे उपस्थित हो भगवान् श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार धन देता था और सम्पूर्ण देवता इसका अनुमोदन करते थे ॥ १५-१७१/२ ॥

इति श्रुत्वात्मिकजनाल्लोकप्रवृत्तिकात्नरात्॥ १८ ॥