विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 432, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४१० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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अन्धकारसे घिरा हुआ हूँ, आप मुझे ज्ञानरूपी नेत्र प्रदान करें ॥ २० ॥
मानुष्ये मांसचक्षुष्ट्वादसम्यग्विदिता वयम् । न प्रसिद्धयन्ति कर्माणि क्रियतामविचारणात् ॥ २१ ॥
मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर मांसपिण्डपर ही दृष्टि रखनेके कारण अथवा केवल स्थूलदर्शी होनेके कारण हम सम्यग् ज्ञान-से वञ्चित हैं (हमारी बुद्धि उलटी हो गयी है)। अतः अवि-चारपूर्वक कर्म करनेके कारण हमारे कार्य सिद्ध नहीं हो पाते ॥ २१ ॥
भवन्तं शरणं प्राप्य देवानाम्पि दैवतम् । सम्यग् भवतु मे दृष्टिः सम्पद्यन्तु च मे क्रियाः॥ २२ ॥
आप देवताओंके भी देवता हैं। आपकी शरणमें आकर मेरी दृष्टि उत्तम हो जाय और मेरे सारे कर्म ठीक ढंगसे सम्पन्न हों ॥ २२ ॥
अनिष्पन्नामपि क्रियां नयोपेतां विचक्षणाः । फलदां हि प्रकुर्वन्ति महासेनापतिर्यथा ॥ २३ ॥
जैसे प्रधान-सेनापति अयोग्य सेनाका भी नीतिपूर्वक सञ्चालनकर उसे सफल बना देता है, उसी तरह विद्वान् पुरुष असम्पन्न कर्मको भी यदि वह न्याययुक्त है, तो फल-दायक बना देते हैं ॥ २३ ॥
भवन्तं शरणं प्राप्य नाति बाधति मे भयम् । यन्मया चिन्तितं कार्यं तद् भवाञ्छ्रोतुमर्हति ॥ २४ ॥
आपकी शरणमें आ जानेके कारण अब मुझे किसी प्रकारका भय नहीं सता रहा है। मैंने जो कार्य सोचा है, उसे आप सुननेकी कृपा करें ॥ २४ ॥
न दातुमिच्छे कन्यां वै पार्थिवेभ्यः स्वयंवरे । प्रसादं कुरु देवेश न कोपं कर्तुमर्हसि ॥ २५ ॥
देवेश्वर ! मैं स्वयंवरमें आये हुए राजाओंको अपनी कन्या देना नहीं चाहता। आप मुझपर कृपा करें, क्रोध न करें ॥
श्रीकृष्ण उवाच
वचनेन किमुक्तेन त्वया राजन् महामते । स्वकन्यां दास्यसे नेति कोऽत्र नेता तवानघ ॥ २६ ॥
श्रीकृष्ण बोले—महामते नरेश्वर ! आप केवल बातें बनाते हैं। इससे क्या होगा ? अनघ ! आप अपनी कन्या किसीको देंगे या नहीं—इस विषयमें आपको रोकनेवाला कौन है ? ॥ २६ ॥
मा देहीति न चाख्येयं ददस्वेति न मे वचः । रुक्मिण्या दिव्यमूर्तित्वं सम्बन्धे कारणं मम ॥ २७ ॥
'आप दूसरेको कन्या न दीजिये, मुझे ही दीजिये' यह दोनों प्रकारकी बातें मुझे नहीं कहनी चाहिये। रुक्मिणी दिव्य-रूपधारिणी देवी है, उसकी यह दिव्यता ही उसके साथ मेरे भावी सम्बन्धमें कारण है ॥ २७ ॥
मेरुकूटे पुरा देवैः कृतमंशावतारणम् । तदा निसृष्टा श्रीः पूर्वे गच्छ त्वं पतिना सह ॥ २८ ॥ मानुष्ये कुण्डिननगरे भीष्मकस्याङ्कनोदरे । जायस्व विपुलश्रोणि प्रत्यवेक्ष्य च वासवम् ॥ २९ ॥
पूर्वकालमें मेरुपर्वतके शिखरपर एकत्र हुए देवताओंने अपने-अपने अंशको भूतलपर उतारा था। उस समय ब्रह्माजी-ने लक्ष्मीसे कहा—'देवि ! तुम भी अपने पतिके साथ जाओ। और मनुष्यलोकमें कुण्डिनपुरके भीतर राजा भीष्मककी रानी-के गर्भसे जन्म लो। विपुलश्रोणि ! इन्द्रपर कृपा करके तुम्हें ऐसा करना चाहिये ॥ २८-२९ ॥
तेनाहं वः प्रवक्ष्यामि राजनकृत्तकं वचः । श्रुत्वा स्वयं विनिश्चित्य यद् युक्तं तत् करिष्यति ॥ ३० ॥ रुक्मिणी नाम ते कन्या न सा प्राकृतमानुषी । श्रीरेषा ब्रह्मवाक्येन जाता केनापि हेतुना ॥ ३१ ॥
राजन् ! इसीलिये मैं आपसे स्वाभाविक बात कह रहा हूँ, इसमें कहीं कृत्रिमता या बनावट नहीं है। इस बातको सुनकर आपकी कन्या रुक्मिणी स्वयं ही अपने कर्तव्यका निश्चय करके जो उचित समझेगी, वह करेगी; क्योंकि वह साधारण स्त्री नहीं है, यह साक्षात् लक्ष्मी है और किसी कारण-वश ब्रह्माजीके कहनेसे यहाँ प्रकट हुई है ॥ ३०-३१ ॥
न च सा मनुजेन्द्राणां स्वयंवरविधिक्षमा । एका त्वेकाय दातव्या इति धर्मो व्यवस्थितः ॥ ३२ ॥
वह नरेन्द्रोंके सामने स्वयंवरविधिक़ा पालन करने योग्य नहीं है। एक कन्याको एक ही वरके हाथमें देना चाहिये—यही सिद्धान्तभूत सुस्थिर धर्म है ॥ ३२ ॥
न च तां शक्यसे राजल्लक्ष्मीं दातुं स्वयंवरे । सदृशं वरमालोक्य दातुमर्हसि धर्मतः ॥ ३३ ॥
राजन् ! आप उस लक्ष्मीको स्वयंवरमे नहीं दे सकते। किसी योग्य वरको देखकर धर्मपूर्वक उसके हाथमें उसका दान कर देना ही आपके लिये उचित है ॥ ३३ ॥
अतोऽर्थे वैनतेयोऽयं विघ्नकारणहेतुना । आगतः कुण्डिननगरे देवराजेन चोदितः ॥ ३४ ॥
इसीलिये देवराज इन्द्रसे प्रेरित होकर यह विनतानन्दन गरुड़ इस स्वयंवरमें विघ्न डालनेके हेतु कुण्डिनपुरमें पधारे हैं ॥ ३४ ॥
अहं चैवागतो राज्ञां द्रष्टुकामो महोत्स्वम् । तां च कन्यां वरारोहां पद्मेन रहितां श्रियम् ॥ ३५ ॥
मैं राजाओंके इस महान् उत्सवको तथा बिना कमलकी लक्ष्मीरूपा इस परम सुन्दरी राजकन्याको देखनेकी इच्छासे यहाँ आया था ॥ ३५ ॥