विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 431, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४०१
एष धर्मो नरेन्द्राणामिति ते विदितं प्रभो।
लोकधर्मं पुरस्कृत्य पुरा गीतं स्वयम्भुवा ॥ ७ ॥
प्रभो ! यह (सत्यभाषण) नरेशोंका धर्म है। इस बात-को आप भी जानते ही होंगे। स्वयम्भू ब्रह्माजीने पूर्वकालमें लोकधर्मको सामने रखते हुए सत्यके ही महत्त्वका गान किया है॥ ७ ॥
कथं तव सुतस्तेषामग्रतो मनुजेश्वर।
वक्तुमर्हति राजेन्द्र वितथं राजसंसदि ॥ ८ ॥
मनुजेश्वर ! राजेन्द्र ! ऐसी दशामें आपका पुत्र राज-सभामें उन राजाओंके आगे झूठ कैसे बोल सकता है ? (जिसमें आपकी सम्मति नहीं होगी, उसकी घोषणा वह कैसे कर सकता है) ॥ ८ ॥
तादृशं रङ्गममुलं कारयंस्तनयस्तव।
कथं त्वया ह्यविज्ञात इति मे संशयो महान् ॥ ९ ॥
आपका पुत्र जब वैसा अनुपम रंगस्थल बनवा रहा था, तब आप उसकी उस चेष्टासे किस तरह अनजान रह गये ? यह मेरे मनमें महान् संशय है ॥ ९ ॥
आगतानां नरेन्द्राणामनलार्केन्दुवर्चसाम्।
यथार्हेण तु सम्पूज्य आतिथ्यं कृतवानसि ॥ १०॥
अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके समान कान्तिमान् नरेश यहाँ पधारे हैं और आपने उन सबका यथायोग्य पूजन करके आतिथ्यसत्कार किया है। (फिर आप इन सब बातोंसे अपने-को अपरिचित कैसे बता रहे हैं) ॥ १० ॥
रथाश्वनरनागानां विमर्दममुलं तथा।
कथं न ज्ञातवान् राजंस्तव पुत्रस्य चेष्टितम् ॥ ११ ॥
राजन् ! रथ, घोड़े, हाथी और पैदल सैनिकोंसे भरी हुई चतुरङ्गिणी सेनाका जो अनुपम संहार हुआ है, वह सब आपके पुत्रकी कुचेष्टाका ही फल है, इस बातकी जानकारी आपको कैसे नहीं हुई ? ॥ ११ ॥
विषादो न भवेद्यत्र चतुरङ्गबलागमे।
कथं न ज्ञायते राजन्निति मे बुद्धिसंशयः ॥ १२ ॥
राजन् ! जब यहाँ चतुरङ्गिणी सेनाका जमाव होगा, तब क्या कोई खेदजनक घटना नहीं घटित होगी—यह बात आप-की समझमें कैसे नहीं आ रही है। यह मेरी बुद्धिमें संशय उत्पन्न हो गया है ॥ १२ ॥
ममागमनमेवेह प्रायेण न हितं तव।
अतो न कृतमातिथ्यमपात्राय नरेश्वर ॥ १३ ॥
नरेश्वर ! मेरा यहाँ आगमन ही प्रायः आपके लिये हित-कर नहीं है—ऐसा समझकर ही आपने मुझ अपात्रका आतिथ्य-सत्कार नहीं किया ॥ १३ ॥
पात्रेभ्यो दीयतां कन्या मामपास्य नरेश्वर।
ममागमनदोषेण कथं कन्यां न दास्यसे ॥ १४ ॥
राजन् ! मुझे छोड़कर आप इन सुपात्र राजाओंको अपनी कन्या दीजिये। मेरे आ जानेके ही दोषसे आप अपनी कन्या-का दान कैसे नहीं करेंगे ॥ १४ ॥
कन्याविघ्नं च कुर्वाणो नरके परिपच्यते।
इति धर्मविदैर्गीतं मन्वादिभिर्नरोत्तमैः ॥ १५ ॥
कन्याके विवाहमें विघ्न डालनेवाला मनुष्य नरककी आगमें पकाया जाता है—ऐसा मनु आदि धर्मज्ञ नरेशोंने कहा है ॥ १५ ॥
अतोऽर्थं न प्रविष्टोऽहं रङ्गमध्ये विशाम्पते।
विदित्वा नकृतातिथ्यं नरदेव तवालयम् ॥ १६ ॥
प्रजानाथ ! इसीलिये मैं रङ्गभूमिमें नहीं आया हूँ, नरदेव ! मुझे पहले ही ज्ञात हो गया था कि आपका घर आतिथ्यहीन है ॥ १६ ॥
ह्रियाभिभूतो राजेन्द्रपार्थिवोऽहं नराधिप।
विदर्भनगरे राजन् बलविश्रामहेतुना ॥ १७ ॥
राजन् ! नरेश्वर ! मैंने विदर्भ नगरमें विश्रामके लिये जो अपनी सेनाको ठहरा दिया—इसके कारण राजेन्द्रोंका राजा होकर भी मैं लज्जासे गड़ गया हूँ (क्योंकि यदि मैंने यहाँ विश्राम न किया होता, तो मुझे आपके द्वारा सत्कृत न होने-का अपमान नहीं सहना पड़ता) ॥ १७ ॥
आवाभ्यां कृतमातिथ्यं कैशिकस्तु प्रियातिथिः।
उषितौ च यथा स्वर्गे पुरा गरुडकेशवौ ॥ १८ ॥
इतनेपर भी मैंने और गरुड़ने पूरा-पूरा आतिथ्य-सत्कार प्राप्त किया है; क्योंकि राजा कैशिकको अतिथि प्रिय है। हम दोनों यहाँ उसी तरह सुखसे रहे हैं, जैसे पहले वैकुण्ठधाममें रहा करते थे ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमेव ब्रुवाणं तु कृष्णं वाग्वज्रचोदितम्।
श्लक्ष्णवाचाम्बुनाऽऽसिच्य शमितोऽग्निरिव ज्वलन् १९
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसी ही बातें कहकर जिन्होंने वाग्वज्रका प्रहार किया था, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णको, जो अग्निके समान प्रज्वलित हो रहे थे, राजा भीष्मकने अपनी मधुर-वाणीरूप जलसे सींचकर शान्त किया ॥ १९ ॥
भीष्मक उवाच
प्रसीद देवलोकेश पाहि मां लोकशासन।
अज्ञानतमसाविष्टं ज्ञानचक्षुःप्रदो भव ॥ २० ॥
भीष्मक बोले—'देवलोकेश्वर ! आप मुझपर प्रसन्न हों, लोकशासक परमेश्वर ! मेरी रक्षा कीजिये। मैं अज्ञानरूपी