भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 430
४०८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे
इसीलिए ये लोग आपके प्रति अपराध कर बैठे हैं। आप इन अपराधियोंको क्षमा कर दें॥ ८५॥<br><br>श्रीकृष्ण उवाच<br>न मे वैरं प्रवसति एकाहमपि कैशिक।<br>विशेषेण नरेन्द्राणां क्षत्रधर्मेऽवतिष्ठताम्॥ ८६॥<br>योद्धव्यमिति धर्मेण अधर्मे तु पराङ्मुखे।<br>तेषां किंहेतुना कोपः कर्तव्यस्त्ववनीश्वराः॥ ८७॥<br>यदृतं तदतिक्रान्तं ये मृतास्ते दिवं गताः।<br>एष धर्मो नृलोकेऽस्मिञ्जायन्ते च म्रियन्ति च॥ ८८॥<br><br>श्रीकृष्ण बोले—कैशिक! मेरे मनमें एक दिन भी वैर नहीं टिकता है। विशेषतः क्षत्रिय-धर्ममें स्थिर रहनेवाले नरेशोंपर, जो युद्धको धर्म समझकर उसमें प्रवृत्त होते और अधर्मसे मुँह मोड़े रहते हैं, किसलिये क्रोध किया जाय। भूमिपालो! जो बीत गया, वह गया; जो लोग मर गये, वे स्वर्गमें चले गये। इस मनुष्य-लोकका यह स्वाभाविक धर्म (नियम) है कि यहाँ प्राणी जन्म लेते और मरते रहते हैं॥तस्मादशोच्यं भवतां मृतार्थे च नराधिपाः।<br>क्षन्तव्यं रोचतेऽस्माकं वीतवैरा भवन्तु ते॥ ८९॥<br><br>अतः नरेश्वरो! जो लोग मर गये या मारे गये, उनके लिये आपलोगोंको शोक नहीं करना चाहिये। हमे तो क्षमा ही अच्छी लगती है। अतः वे सब राजा आजसे वैरभावका त्याग करके निर्वैर हो जायें॥ ८९॥<br><br>वैशम्पायन उवाच<br>एवमुक्त्वा नरेन्द्रांस्तानाश्वास्य मधुसूदनः।<br>कैशिकस्य मुखं वीक्ष्य विरराम महाद्युतिः॥ ९०॥<br><br>वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन नरेशोंसे ऐसा कहकर उन्हें आश्वासन दे महातेजस्वी भगवान् मधुसूदन कैशिकके मुँहकी ओर देखकर चुप हो गये॥ ९०॥<br><br>एतस्मिन्नेव काले तु भीष्मको नयकोविदः।<br>पूजयित्वा यथान्यायमुवाच वदतां वरः॥ ९१॥<br><br>इसी समय वक्ताओंमें श्रेष्ठ नीतिकुशल राजा भीष्मक भगवान्‌का यथोचित पूजन करके बोले—॥ ९१॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिणीस्वयंवरे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५०॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीका स्वयंवरनिरूपक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५०॥


एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण और भीष्मकका संवाद, भीष्मकद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णका मथुरागमन

भीष्मक उवाचश्रीकृष्ण उवाच
पुत्रो मे बालभावेन भगिनीं दातुमिच्छति।<br>स्वयंवरे नरेन्द्राणां न चाहं दातुमुत्सहे॥ १॥<br><br>भीष्मकने कहा—भगवन्! मेरा पुत्र रुक्मी अपने बालचापल्य या अविवेकके कारण अपनी बहिनको नरेन्द्रोंके समक्ष स्वयंवरमें देना चाहता है; परंतु मेरी इच्छा उसे स्वयंवरमें देनेकी नहीं है॥ १॥<br><br>अतीव बालभावत्वादु दातुमिच्छेन्मतिम॑म।<br>एका ह्येकं समालोक्य वरयिष्यति मे मतिः॥ २॥<br><br>अत्यन्त बचपन या मूर्खताके कारण ही वह अपनी बहिनको स्वयंवरमे देना चाहता है, ऐसा मेरा विश्वास है। मेरी राय तो यही है कि वह अकेली एकमात्र मनोनीत पति-का वरण करे॥ २॥<br><br>अतः प्रसादयिष्ये त्वां पुत्रदुर्नयहेतुना।<br>प्रसादं कुरु देवेश क्षन्तुमर्हसि मे प्रभो॥ ३॥<br><br>अतः प्रभो! मैं अपने पुत्रकी दुर्नीतिका कारण (अपने-को अपराधी मानकर) आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। देवेश्वर! आप मुझपर कृपा बनाये रखें और मेरे अपराधको क्षमा कर दें॥ ३॥बालभावेन पुत्रेण चालितं नृपमण्डलम्।<br>यदा भवति वै प्रौढः कीदृशोऽविनयो भवेत्॥ ४॥<br><br>श्रीकृष्ण बोले—राजन्! आपके पुत्रने बाल्यावस्थामें ही समस्त नरेश-मण्डलमे हलचल मचा दी है; फिर जब वह प्रौढ़ होगा, तब न जाने उसकी उद्दण्डता कैसी हो जायेगी?॥ ४॥<br><br>सूर्येन्दुसदृशाँल्लोकांस्तपसोपार्जितानभियः।<br>लोकेऽस्मिन् नरदेवानां महाकुलसमुद्भवान्॥ ५॥<br>एकस्यापि नृपस्याग्रे मोहाद् यो वितथं वदेत्।<br>न स तिष्ठति लोकेऽस्मिन् निर्दहेद् दण्डवह्निना॥ ६॥<br><br>जो एक राजाके सामने भी मोहवश झूठ बोलता है, वह राजाओंको मिलनेवाले सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशमान तथा तपस्यासे श्रीसम्पन्न हुए लोकोंको, जो उसे महान् कुलमें उत्पन्न होनेके कारण सुगमतापूर्वक किये गये बड़े-बड़े यज्ञों-द्वारा प्राप्त हुए हैं, यम-यातनाकी आगसे दग्ध कर देता है और उन लोकोंमेसे ही एक जो यह लोक है, इसमें भी वह रह नहीं पाता है॥ ५-६॥