विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 429, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णु पर्व ] पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४०७
अष्टौ ये लोकपालास्ते स्वासु दिक्षु समास्थिताः ॥ ६९ ॥
उपगायन्ति नृत्यन्ति स्तुवन्ति च समन्ततः ।
· जो आठ लोकपाल थे, वे अपनी दिशाओंमे स्थित हो सब ओर भगवान्के यशका गान, नृत्य एवं स्तुति करते थे ॥ ६९ ½ ॥
श्रुत्वा सुतुमुलं नादं सर्व एव नराधिपाः ॥ ७० ॥
विस्मयोत्फुल्लनयना विविशुस्ते सभां शुभाम् ।
उनके नृत्य-गान आदिके सम्मिलित शब्दको सुनकर सभी नरेशोंके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे और उन्होंने उस मङ्गलमयी दिव्य सभामें प्रवेश किया ॥ ७० ½ ॥
कैशिकश्च महाबाहुरुपगम्य नराधिपान् ॥ ७१ ॥
प्रवेशयामास बली प्रतिपूज्य यथाविधि ।
उस समय बलवान् महाबाहु कैशिक समस्त नरेशोंके पास जाकर उनका विधिपूर्वक पूजन करके उन सबको भीतर ले आये ॥ ७१ ½ ॥
निवेदिते सुरश्रेष्ठे पार्थिवानां समागमे ॥ ७२ ॥
निर्जगाम हरिः श्रीमान् सर्वमङ्गलपूजितः ।
जब सुरश्रेष्ठ भगवान्को समस्त राजाओंके शुभागमनकी सूचना दी गयी, तब सम्पूर्ण मङ्गलमयी सामग्रियोंसे पूजित हुए वे श्रीमान् हरि भवनसे बाहर निकले ॥ ७२ ½ ॥
ततोऽम्बरस्थास्ते दिव्याः कलशाश्चैलकण्ठिनः ॥ ७३ ॥
सहकारसमायुक्ता ववर्षुर्जलं दा इव ।
तदनन्तर, आकाशमें स्थित हुए वे दिव्य कलश, जिनके कण्ठमे वस्त्र लपेटे गये थे तथा जो आम्रपल्लवोंसे सुशोभित थे, भगवान्के ऊपर बादलोंके समान जलकी वर्षा करने लगे ॥ ७३ ½ ॥
दिव्यकाञ्चनरत्नौघैर्दिव्यपुष्पसमन्वितैः ॥ ७४ ॥
गन्धचूर्णविमिश्रैश्च राजेन्द्रस्याभिषेचने ।
यथोक्तविधिपूर्वेण अभिषिच्य जनार्दनम् ॥ ७५ ॥
दर्शयित्वा नरेन्द्राणां दिव्यैराभरणैः शुभैः ।
उन दिव्य कलशोंने भगवान्का राजेन्द्रपदपर अभिषेक करते समय दिव्य सुवर्ण एवं रत्नोंके समुदायसे युक्त, दिव्य पुष्पोंसे सुवासित तथा सुगन्धचूर्णसे मिश्रित जलके द्वारा शास्त्रोक्त विधिके अनुसार श्रीकृष्णके अभिषेकका कार्य सम्पन्न करके उन्हें सुन्दर दिव्य वस्त्राभूषणोंद्वारा अलंकृत एवं नरेशोंके लिये दर्शनीय कर दिया ॥ ७४-७५ ½ ॥
दिव्याम्बरविचित्रैश्च दिव्यमाल्यानुलेपनैः ॥ ७६ ॥
सत्कृत्य विधिवद्राज्ञ उपविष्टो जनार्दनः ।
शुभे देवसभे रम्ये स्नानहेतोरिहागते ॥ ७७ ॥
तत्पश्चात् दिव्य वस्त्र, विचित्र दिव्य माला और दिव्य अनुलेपनसे यहाँ आये हुए राजाओंका विधिपूर्वक सत्कार करके उनकी अनुमति ले, भगवान् श्रीकृष्ण अपने स्नानके लिये इस भूतलपर उतरी हुई सुन्दर एवं रमणीय देवसभाके भीतर (एक उज्ज्वल दिव्य सिंहासनपर) विराजमान हुए ॥
उपास्यमानो यदुभिर्विदर्भैश्च नराधिपैः ।
वैनतेयश्च बलवान् कामरूपी नराकृतिः ॥ ७८ ॥
दक्षिणं पार्श्वमाश्रित्य आसनस्थो महाबलः ।
क्रथश्च कैशिको वीरो वामपार्श्वे तथासने ॥ ७९ ॥
उपविष्टौ महात्मानौ देवस्यानुमते नृपौ ।
तथैव वामपार्श्वे तु वृष्ण्यन्धकमहारथाः ॥ ८० ॥
सात्यकिप्रमुखा वीरा उपविष्टा महाबलाः ।
उस समय यादव तथा विदर्भदेशीय नरेश उनकी सेवामें पास ही खड़े थे । इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले बलवान् एवं महापराक्रमी गरुड़ मनुष्यका रूप धारण करके भगवान्के दाहिने बगलमें जाकर एक आसनपर बैठे । वीर क्रथ और कैशिक—ये दोनों महात्मा नरेश भगवान्की आज्ञा पाकर उनके वाम पार्श्वमें एक आसनपर बैठे । उसी प्रकार वाम भागमें ही वृष्णि और अन्धक वंशके महारथी सात्यकि आदि महाबली वीर भी विराजमान हुए ॥ ७८-८० ½ ॥
भास्करप्रतिमे दिव्ये दिव्यास्तरणविस्तृते ॥ ८१ ॥
सुखोपविष्टं श्रीमन्तं देवैरिव शचीपतिम् ।
सूर्यके समान तेजस्वी तथा दिव्य बिछौनोंसे सुसज्जित दिव्य सिंहासनपर सुखपूर्वक बैठे हुए श्रीमान् भगवान् श्रीकृष्ण देवताओंके साथ विराजमान शचीपति इन्द्रके समान शोभा पा रहे थे ॥ ८१ ½ ॥
सचिवैः श्राविताः सर्वे प्रविष्टास्ते नराधिपाः ॥ ८२ ॥
यथार्हेण च सम्पूज्य राजानः सर्व एव ते ।
सुखोपविष्टास्ते स्वेषु आसनेषु नराधिपाः ॥ ८३ ॥
तदनन्तर मन्त्रियोंसे राजाज्ञा पाकर सभी नरेश उस भवनमें प्रविष्ट हुए । उन समस्त नरेशोंने यथायोग्य भगवान्का पूजन किया; फिर वे अपने आसनोंपर सुखपूर्वक बैठ गये ॥ ८२-८३ ॥
कैशिकस्तु महाप्राज्ञः सर्वशास्त्रार्थवित्तमः ।
पूजयित्वा यथान्यायमुवाच वदतां वरः ॥ ८४ ॥
इसके बाद वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाज्ञानी कैशिक, जो समस्त शास्त्रोंके मर्मज्ञ थे, यथोचितरूपसे भगवान्का पूजन करके इस प्रकार बोले—॥ ८४ ॥
कैशिक उवाच
अविज्ञाता नृपाः सर्वे मानुषोऽयमिति प्रभो ।
भवन्तमुपरुद्धानां देव त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ ८५ ॥
कैशिकने कहा—प्रभो ! देव ! अबतक सब राजा अज्ञानवश आपके विषयमें यही जानते थे कि ये भी मनुष्यही हैं;