विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 433, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४११
क्षन्तव्यमिति यत् प्रोक्तं त्वया राजन् ममाग्रतः।
युक्तिपूर्वमहं मन्ये कलुषाय न पार्थिव ॥ ३६ ॥
राजन् ! पृथ्वीनाथ ! आपने जो मेरे सामने यह बात कही कि मेरा अपराध क्षमा करना चाहिये, सो ठीक है। मैं इसे युक्तिसंगत मानता हूँ। इसमें दुर्भावका कोई कारण नहीं है ॥ ३६ ॥
पूर्वमेव मयाऽऽख्यातं येनास्मि विषये तव ।
आगतः सौम्यरूपेण तेनैव क्षान्तवान् विभो ॥ ३७ ॥
विभो ! इस विषयमें तो मैं पहले ही कह चुका हूँ कि आपके राज्यमें सौम्यरूपसे आया हूँ (विरोधीरूपसे नहीं)। इसीसे आपको समझ लेना चाहिये कि मैंने क्षमा कर दी है ॥ ३७ ॥
क्षान्तेषु गुणबाहुल्यं दोषापहरणं क्षमा ।
कथमस्मद्विधे राजन् कलुषो वसते हृदि ॥ ३८ ॥
राजन् ! क्षमाशील पुरुषोंमें बहुत-से गुण प्रकट होते हैं। क्षमा सब दोषोंको हर लेनेवाली है। मुझ-जैसे पुरुषके हृदयमें दुर्भाव कैसे रह सकता है ॥ ३८ ॥
कुलजे सत्त्वसम्पन्ने धर्मज्ञे सत्यवादिनि ।
भवादृशे कथं राजन् कलुषो भुवि वर्तते ॥ ३९ ॥
नरेश्वर ! आप भी कुलीन, सत्त्वगुण-सम्पन्न, धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं। इस भूतलपर आप-जैसे पुरुषके हृदयमें कलुष-भाव कैसे टिक सकता है ॥ ३९ ॥
क्षान्तोऽयमिति मन्तव्यं मम सेनासहागतम् ।
न चाहं सेनया सार्द्धं यास्यामि रिपुवाहिनीम् ॥ ४० ॥
मैं सेनाके साथ यहाँ आया हूँ, इसलिये आपको यही मानना चाहिये कि ये क्षमाशील हैं; क्योंकि मैं शत्रुओंकी सेनामें अपनी सेना साथ लेकर नहीं जाता हूँ ॥ ४० ॥
अक्षान्तश्चारिसेनायां यास्यामि द्विजवाहने ।
स्थितः सोमार्कसंकाशान्यायुधानि करैर्वहन् ॥ ४१ ॥
जब मैं असहिष्णु होकर शत्रु-सेनापर आक्रमण करता हूँ, तब गरुड़पर बैठता हूँ और अपने हाथोंमें चन्द्रमा तथा सूर्य-के समान चमकीले अस्त्र-शस्त्र धारण करता हूँ ॥ ४१ ॥
मान्योऽस्माकं त्वया राजन् वयसा च पिता समः।
पालयस्व पुरीं सम्यक्क्षत्रेषु पितृवद् वस ॥ ४२ ॥
राजन् ! मेरे लिये पिता सबसे अधिक आदरणीय हैं, जो अवस्थामें आपके ही तुल्य हैं ( अतः आप भी मेरे लिये पिताके ही तुल्य हैं )। आप अपनी पुरीका भलीभाँति पालन कीजिये और क्षत्रियोंमें पिताके समान आदरणीय बनकर रहिये ॥
कलुषो नाम राजेन्द्र वसेत् कापुरुषेषु वै ।
शूरेषु शुद्धभावेषु कलुषो वसते कथम् ॥ ४३ ॥
राजेन्द्र ! दुर्भाव तो कायरोंमें रहा करता है, विशुद्ध भाववाले शूरवीरोंमें कलुषित भाव कैसे रह सकता है ॥४३॥
जानीध्वमेषा मे वृत्तिः पुत्रेषु पितृवद् वयम् ।
इमावपि च राजानौ विदर्भनगराधिपौ ॥ ४४ ॥
मेरी यह वृत्ति सर्वथा कलुष भावसे रहित है, इस बात-को आपलोग अच्छी तरह जान लें। हम पुत्रोंपर पिताके तुल्य ही स्नेह रखते हैं। ये दोनों विदर्भनगरके अधिपति राजा क्रथ और कैशिक भी ऐसे ही स्वभावके हैं ॥ ४४ ॥
आतिथ्यकरणेऽस्माकं स्वराज्यं दत्ततावुभौ ।
तेन दानफलेनास्य दशपूर्वा दिवं गताः ॥ ४५ ॥
इन दोनोंने हमलोगोंका आतिथ्य-सत्कार करते समय मुझे अपना सारा राज्य ही समर्पित कर दिया। उस दानके फलसे इनके दस पीढ़ी पहलेके पूर्वज स्वर्गलोकमें चले गये ॥
भविष्याश्चैव राजानः पुत्रपौत्रा दशावराः।
तेऽपि तत्रैव यास्यन्ति देवलोकं नराधिपाः ॥ ४६ ॥
भविष्यमें भी दस पीढ़ी तक जो पुत्र-पौत्र आदि राजा होंगे, वे सभी नरेश उक्त दानके फलसे उसी देवलोकमें जायँगे ॥
अनयोः सुचिरं कालं भुक्त्वा राज्यमकण्टकम् ।
यदाभिलाषो मोक्षस्य यास्येते निर्वृतिं सुखम् ॥ ४७ ॥
इन दोनोंको चिरकालतक अकण्टक राज्य भोग लेनेके पश्चात् जब मोक्षकी अभिलाषा होगी, तब ये सुखरूप परमानन्द-पदको प्राप्त कर लेंगे ॥ ४७ ॥
नरेन्द्राश्च महाभागा येऽभिषेचितुमागताः ।
कालेन तेऽपि यास्यन्ति देवलोकं त्रिविष्टपम् ॥ ४८ ॥
जो महाभाग नरेश मेरा अभिषेक करनेके लिये आये थे, वे भी समयानुसार देवताओंके निवासभूत स्वर्गलोकमें चले जायेंगे ॥ ४८ ॥
स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि वैनतेयसहायवान् ।
नगरीं मथुरां रम्यां भोजराजेन पालिताम् ॥ ४९ ॥
आपलोगोंका कल्याण हो, अब मैं गरुड़के साथ भोज-राज उग्रसेनद्वारा पालित रमणीय मथुरापुरीको जाऊँगा ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु राजानं भीष्मकं यदुनन्दनः।
राज्ञश्चैवमुपामन्त्र्य वैदर्भीभ्यां विशेषतः ॥ ५० ॥
सभान्निष्क्रम्य देवेशो जगाम रथमन्तिकम् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! राजा भीष्मक-से ऐसा कहकर विशेषतः वहाँ बैठे हुए राजाओंसे विदा ले यदुकुलनन्दन देवेश्वर श्रीकृष्ण विदर्भराज क्रथ और कैशिक-के साथ सभाभवनसे निकलकर रथके निकट गये ॥ ५०१/२ ॥
ततः प्रहृष्टो राजर्षिर्भीष्मकः किल केशवम् ॥ ५१ ॥
ते सर्वे च महीपालो विप्रणवदनाभवन् ।
तदनन्तर, भगवान् श्रीकृष्णको जाते देख राजर्षि भीष्मक बड़े प्रसन्न हुए और उन समस्त भूपालोंके मुखपर विषाद छा गया ॥ ५११/२ ॥