भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 434, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 434
४१२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

आद्यं स्वायम्भुवं रूपं सुरासुरनमस्कृतम् ॥ ५२ ॥
सहस्रपात् सहस्राक्षं सहस्रभुजविग्रहम् ।
सहस्रशिरसं देवं सहस्रमुकुटोज्ज्वलम् ॥ ५३ ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
दिव्याभरणसंयुक्तं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ ५४ ॥
कृष्णं रक्तारविन्दाक्षं चन्द्रसूर्याग्निलोचनम् ।
दृष्ट्वा स राजा राजेन्द्रं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥ ५५ ॥
वाङ्मनःकायसंयुक्तं स्तोतुमारब्धवांस्तदा ।

जो सबके आदिकारण, स्वयम्भूरूप, देवताओं और असुरोंद्वारा वन्दित, सहस्रों चरणोंसे युक्त, सहस्रों नेत्रोंसे विभूषित, सहस्र भुजाओंसे सुशोभित शरीरवाले, सहस्रों मस्तकोंसे सम्पन्न तथा सहस्रों मुकुटोंसे प्रकाशमान हैं, जो दिव्य माला तथा दिव्य वस्त्र धारण करनेवाले, दिव्य गन्ध और दिव्य अनुलेपनसे अलंकृत हैं, जिनके श्रीअंगोंपर दिव्य आभूषण शोभा देते हैं, जो अनेक दिव्य आयुधोंसे सम्पन्न हैं तथा चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र हैं, उन अरुण कमलनयन राजेन्द्र श्रीकृष्णको देखकर राजा भीष्मक हाथ जोड़ उनके चरणोंमें गिर पड़े। इस प्रकार मन, वाणी और शरीरद्वारा प्रणाम करके उन्होंने उस समय उनकी स्तुति आरम्भ की ॥ ५२–५५½ ॥

भीष्मक उवाच

देवदेव नमस्तुभ्यमनादिनिधनाय वै ॥ ५६ ॥
शाश्वतायादिदेवाय नारायण परायण ।

भीष्मक बोले—देवदेव ! आपको नमस्कार है। आप आदि और अन्तसे रहित हैं, आपको नमस्कार है। नारायण ! आप सबके परम आश्रय हैं। आप सनातन आदिदेवको नमस्कार है ॥ ५६½ ॥

स्वयम्भुवे च विश्वाय स्थाणवे वेधसाय च ॥ ५७ ॥
पद्मनाभाय जटिने दण्डिने पिङ्गलाय च ।
हंसप्रभाय हंसाय चक्ररूपाय वै नमः ॥ ५८ ॥

आप ही स्वयम्भू (ब्रह्मा), विश्वरूप, स्थाणु (महादेव अथवा स्थावर प्राणी), वेधस् (विधाता), पद्मनाभ, जटाधारी, दण्डधारी, पिङ्गलवर्ण, हंसकान्ति, हंसरूप तथा चक्रस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है ॥ ५७-५८ ॥

वैकुण्ठाय नमस्तस्मै अजाय परमात्मने ।
सदसद्भावयुक्ताय पुराणपुरुषाय च ॥ ५९ ॥

आप वैकुण्ठ-धामके अधिपति, अजन्मा एवं परमात्मा हैं। आपको नमस्कार है। आप ही सद्भाव और असद्भावसे युक्त हैं, आप ही पुराणपुरुष हैं। आपको नमस्कार है ॥ ५९ ॥

पुरुषोत्तमाय युक्ताय निर्गुणाय नमोऽस्तु ते ।
वरदो भव मे नित्यं त्वद्भक्ताय सुरोत्तम ॥ ६० ॥
लोकनाथोऽसि नाथ त्वं विष्णुस्त्वं विदितात्मनाम् ।

आप योगयुक्त पुरुषोत्तम एवं निर्गुण परमात्मा हैं। आपको नमस्कार है। सुरश्रेष्ठ ! मैं आपका भक्त हूँ। आप मेरे लिये सदा वरदायक हों। नाथ ! आप ही सम्पूर्ण लोकोंके नाथ—संरक्षक हैं। आत्मज्ञानियोंके 'विष्णु' (सर्वव्यापी परमात्मा) भी आप ही हैं ॥ ६०½ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं स्तुत्वा महादेवं नृपाणामग्रतो नृपः ॥ ६१ ॥
महार्हमणिमुक्ताभिर्वस्त्रैर्वैदूर्यदन्तिभिः ।
शातकुम्भस्य निचयं कृष्णाय प्रददौ नृपः ॥ ६२ ॥
पुनश्चक्रे नमस्कारं वैनतेये महाबले ।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! राजा भीष्मकने समस्त नरेशोंके सामने बहुमूल्य मणियों तथा मुक्ताओंद्वारा वस्त्र और वैदूर्यमणिका भी उपहास करनेवाले महान् देवता श्रीकृष्णकी इस प्रकार स्तुति करके उन्हें सुवर्णकी राशि भेंट की। फिर महाबली विनतानन्दन गरुडको भी नमस्कार किया ॥

भीष्मक उवाच

नमस्तस्मै खगेन्द्राय नमो मारुतरंहसे ॥ ६३ ॥
कामरूपाय दिव्याय काश्यपाय च वै नमः ।

भीष्मक बोले—जिनका वेग वायुके समान है, जो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, दिव्यस्वरूप एवं कश्यपमुनिके पुत्र हैं, उन पक्षिराज गरुडको नमस्कार है, नमस्कार है ॥

वैशम्पायन उवाच

इति संक्षेपतः स्तुत्या सत्कृत्य वरभूषणैः ॥ ६४ ॥
ततो विसर्जयामास कृष्णं कमललोचनम् ।
अनुजग्मुर्नृपाश्चैव प्रस्थितं वासवानुजम् ॥ ६५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार संक्षेपसे ही गरुडकी स्तुति करके उत्तम आभूषणोंद्वारा सत्कार करनेके पश्चात् राजाने कमललोचन श्रीकृष्णको विदा किया। इन्द्रके छोटे भाई उपेन्द्रके प्रस्थान करनेपर बहुत-से राजा उनके पीछे-पीछे गये ॥ ६४-६५ ॥

प्रतिगृह्य च सत्कारं नृपानामन्त्र्य वीर्यवान् ।
जगाम मथुरां कृष्णो द्योतयन्तो दिशो दश ॥ ६६ ॥
वैनतेयं पुरस्कृत्य सौम्यरूपं खगोत्तमम् ।

पराक्रमी श्रीकृष्ण उन राजाओंका सत्कार ग्रहण करके उनसे विदा ले दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए सौम्यरूपधारी पक्षिप्रवर विनतानन्दन गरुडको आगे करके मथुरापुरीको गये ॥ ६६½ ॥

महता रथवृन्देन परिवार्य समन्ततः ॥ ६७ ॥
भेरीपटहनादेन शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः ।
बृंहितेन च नागानां हयानां हेषितेन च ॥ ६८ ॥
सिंहनादेन शूराणां रथनेमिस्वनेन च ।
तुमुलः सुमहानासीन्महामेघरवोपमः ॥ ६९ ॥