भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 435, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 435

विष्णुपर्व ] द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ४१३

वे अपनेको चारों ओरसे विशाल रथसमूहद्वारा घेरकर भेरी, पटह, शङ्ख और दुन्दुभियोंकी ध्वनिके साथ प्रस्थित हुए। हाथियोंके चिग्घाडने, घोड़ोंके हिनहिनाने, शूरवीरोंके सिंहनाद करने तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटसे मिलकर उन वाद्योंका ऐसा महान् तुमुल नाद हुआ, जो महामेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान प्रतीत होता था॥ ६७–६९ ॥

महापराक्रमी श्रीकृष्णके चले जानेपर देवतालोग उस श्रेष्ठ सिंहासन तथा सभामंडपको साथ ले स्वर्गलोकको चले गये॥

गते कृष्णे महावीर्ये आदाय वरमासनम्।
सभामादाय देवाश्च प्रययुस्त्रिदशालयम् ॥ ७० ॥
महता चतुरङ्गेण बलेन परिवारिताः।
क्रोशमात्रमुपव्रज्य अनुज्ञाते जनार्दने ॥ ७१ ॥
प्रययुस्ते नृपाः सर्वे पुनरेव स्वयंवरम् ॥ ७२ ॥

विशाल चतुरङ्गिणी सेनासे घिरे हुए राजा लोग एक कोसतक पीछे-पीछे जाकर भगवान् जनार्दनकी आज्ञा मिलनेपर लौटे और सब-के-सब पुनः स्वयंवरमें चले गये ॥ ७१-७२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि श्रीकृष्णाभिषेको नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णका अभिषेकनामक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥


द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

शाल्वके कथनानुसार जरासंध आदि नरेशोंका शाल्वको ही कालयवनके पास दूत बनाकर भेजना

वैशम्पायन उवाच
ततः प्रयाते वसुदेवपुत्रे नराधिपा भूषणभूषिताङ्गाः।
सभां समाजग्मुः सुरेन्द्रकल्पाः प्रबोधनार्थं गमनोत्सवास्ते ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! वसुदेवपुत्र श्रीकृष्णके वहाँसे चले जानेपर सब राजा अपने अङ्गोंको आभूषणोंसे विभूषित करके देवेन्द्रके समान सज-धजकर राजा भीष्मककी सभामें उन्हें समझानेके लिये गये। श्रीकृष्णके चले जानेसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई थी ॥ १ ॥

सभागतान् सोमरविप्रकाशान् सुखोपविष्टान् रुचिरासनेषु।
समीक्ष्य राजा सुनयार्थवादी जगाद वाक्यं नरराजसिंहः ॥ २ ॥

सभामें आकर सुन्दर सिंहासनोंपर सुखपूर्वक बैठे हुए सोम और सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले राजाओंको देखकर उत्तम नीतिके अनुकूल युक्तियुक्त बात कहनेवाले नरेशोंमें सिंहके समान पराक्रमी राजा भीष्मक इस प्रकार बोले ॥ २ ॥

स्वयंवरकृतं दोषं विदित्वा वो नराधिपाः।
क्षन्तव्यो मम वृद्धस्य दुर्दग्धस्य फलोदयम् ॥ ३ ॥

‘नरेश्वरो ! स्वयंवरके द्वारा जो श्रीकृष्णविरोधरूपी दोष सम्पादित हो रहा था, उसे जानकर (मैंने इसे स्थगित कर दिया।) आपलोग मुझ वृद्धके अपराधको क्षमा करें। जिसे दैवरूपी दावानलने अच्छी तरह जला दिया हो, उस वृक्षसे फलकी प्राप्ति कैसे हो सकती है (जिस स्वयंवरमें भगवद्विरोधकी सम्भावना हो, वह सफल नहीं हो सकता) ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमाभाष्य तान् सर्वान् सत्कृत्य च यथाविधि।
ततो विसर्जयामास नृपांस्तान् मध्यदेशजान् ॥ ४ ॥
पूर्वपश्चिमजांश्चैव उत्तरापथिकानपि।

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! ऐसा कहकर भीष्मकने उन सब राजाओंका विधिपूर्वक सत्कार करके उन्हें विदा कर दिया। उनमेंसे कोई मध्य देशके थे, कोई पूर्व, पश्चिम और उत्तर भारतके। उन सबको उन्होंने सादर विदा किया ॥ ४½ ॥

येऽपि सर्वे महेष्वासाः प्रहृष्टमनसो नराः ॥ ५ ॥
यथार्हेण च सम्पूज्य जग्मुस्ते नरपुङ्गवाः।

वे सब महाधनुर्धर नरेश भी प्रसन्नचित्त होकर राजाका यथायोग्य सम्मान करके अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ ५½ ॥

जरासंधः सुनीथश्च दन्तवक्त्रश्च वीर्यवान् ॥ ६ ॥
शाल्वः सौभपतिश्चैव महाकूर्मश्च पार्थिवः।
क्रथकैशिकमुख्याश्च नृपाः प्रवरवंशजाः ॥ ७ ॥
वेणुदारिश्च राजर्षिः काश्मीराधिपतिस्तथा।
एते चान्ये च बहवो दक्षिणापथिका नृपाः ॥ ८ ॥
श्रोतुकामा रहो वाक्यं स्थिता वै भीष्मकान्तिके।

जरासंध, सुनीथ, पराक्रमी दन्तवक्त्र, सौभपति शाल्व, राजा महाकूर्म, क्रथ और कैशिक आदि श्रेष्ठ कुलके नरेश, राजर्षि वेणुदारि तथा कश्मीरनरेश—ये एवं दूसरे बहुत-से दाक्षिणात्य नरपाल राजा भीष्मककी एकान्त वार्ता सुननेकी इच्छासे उनके पास ही ठहर गये ॥ ६–८½ ॥

तान् वै समीक्ष्य राजेन्द्रः स राजा भीष्मको बली ॥ ९ ॥
स्नेहपूर्णेन मनसा स्थितांस्तानवनीश्वरान्।
त्रिवर्गसहितं श्लक्ष्णं षड्गुणालंकृतं शुभम् ॥ १० ॥
उवाच नयसम्पन्नं स्निग्धगम्भीरया गिरा।

उन सबको देखकर बलवान् राजाधिराज राजा भीष्मकने स्नेहपूर्ण हृदयसे वहाँ खड़े हुए उन भूपालोंके प्रति स्निग्ध एवं गम्भीर वाणीमें धर्म, अर्थ और कामसे युक्त, मधुर,

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित) · पृष्ठ 435, कुल 1169 में से · BharatKosha