भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 436

४१४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

सन्धि-विग्रह आदि छः गुणोंसे अलंकृत, शुभ एवं नीतिसम्पन्न बात कही ॥ ९-१० १/२ ॥

भीष्मक उवाच
भवतामवनीशानां समालोक्य नयान्वितम् ॥ ११ ॥
वचनं व्याहृतं श्रुत्वा कृतवान् कार्यमीदृशम्।
सद्भिर्भवद्भिः क्षन्तव्यं वयं नित्यापराधिनः ॥ १२ ॥

भीष्मक बोले—राजाओ ! आप सब पृथ्वीपतियोंकी ओर देखकर और आपके द्वारा कहे गये नीतियुक्त वचनको सुनकर मैंने ऐसा कार्य किया है। आप सब लोग सत्पुरुष हैं; अतः मेरे इस बर्तावको क्षमापूर्वक सह लेंगे। हम अपनेको सदा अपराधी मानते हैं ॥ ११-१२ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु राजा स भीष्मको नयकोविदः।
उवाच सुतमुद्दिश्य वचनं राजसंसदि ॥ १३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर नीति-निपुण विद्वान् राजा भीष्मक उस राजसभामें अपने पुत्रको लक्ष्य करके बोले ॥ १३ ॥

भीष्मक उवाच
पुत्रस्य चेष्टामालोक्य त्रासाकुलितलोचनः।
मन्ये बालानिमाँल्लोकान् स एष पुरुषः परः ॥ १४ ॥

भीष्मकने कहा—राजाओ ! अपने पुत्रकी चेष्टाको देखकर मेरे नेत्र भयसे व्याकुल हो उठे हैं। मैं इन लोगोंको (रुक्मी आदिको) बालक (विवेकशून्य) मानता हूँ। मेरी दृष्टिमें ये भगवान् श्रीकृष्ण परम पुरुष हैं ॥ १४ ॥

कीर्तिः कीर्तिमंतां श्रेष्ठो यशश्च विपुलं तथा।
स्थापितं भुवि मर्त्येऽस्मिन् स्वबाहुबलमूर्जितम् ॥ १५ ॥

ये कीर्तिमानोंमें श्रेष्ठ हैं। इन्होंने इस मर्त्यलोकमें भूतलपर अपनी उत्तम कीर्ति और सुयशकी स्थापना की है तथा अपने ओजस्वी बाहुबलका भी परिचय दिया है ॥ १५ ॥

धन्या खलु महाभागा देवकी योषितां वरा।
पुत्रं त्रिभुवनश्रेष्ठं कृत्वा गर्भेण केशवम् ॥ १६ ॥
कृष्णं कमलपत्राक्षं श्रीपुञ्जममराचितम् ।
नेत्राभ्यां स्नेहपूर्णाभ्यां वीक्षते मुखपङ्कजम् ॥ १७ ॥

धन्य हैं नारियोंमें श्रेष्ठ महाभागा देवकी, जो तीनों लोकोंमें सबसे श्रेष्ठ, शोभाके पुञ्ज, देवपूजित, कमलदललोचन केशव कृष्णको पुत्ररूपसे गर्भमें रखकर जन्म देनेके पश्चात् सदा स्नेहपूर्ण नेत्रोंसे उनके मुखारविन्दको निहारा करती हैं ॥ १६-१७ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवं लालप्यमानं तु राजानं राजसंसदि ।
उवाच श्लक्ष्णया वाचा शाल्वराजो महाद्युतिः ॥ १८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! राजसभामें राजा भीष्मकको इस प्रकार बारंबार बोलते देख महातेजस्वी शाल्वराजने सान्त्वनापूर्ण मधुर वाणीमें कहा ॥ १८ ॥

शाल्व उवाच
अलं खेदेन राजेन्द्र सुताय रिपुमर्दिने ।
क्षत्रियस्य रणे राजन् ध्रुवं जयपराजयौ ॥ १९ ॥

शाल्व बोला—राजेन्द्र ! (आप खेद क्यों प्रकट करते हैं) आपका पुत्र शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाला है। इसके लिये खेद करना व्यर्थ है (इसपर तो आपको गर्व होना चाहिये)। राजन् ! रणभूमिमें क्षत्रियको जय अथवा पराजय अवश्य प्राप्त होती है ॥ १९ ॥

नियता गति मर्त्यानामेष धर्मः सनातनः।<sup></sup>
बलकेशवयोरन्यस्तृतीयः कः पुमानिह ॥ २० ॥
रणे योधयितुं शक्तस्तव पुत्रं महाबलम् ।

यह मनुष्योंकी नियत गति है। यह सनातन धर्म है। बलराम और श्रीकृष्णके सिवा इस भूतलपर तीसरा कौन ऐसा पुरुष है, जो समराङ्गणमें आपके महाबली पुत्रका सामना कर सके ॥ २० १/२ ॥

रथातिरथवृन्दानामेक एव रणाजिरे ॥ २१ ॥
रिपून बाधयितुं शक्तो धनुर्गृह्य महाभुजः।

यह महाबाहु वीर हाथमें धनुष लेकर अकेला ही युद्ध-क्षेत्रमें रथियों और अतिरथियोंके समूहका सामना करने और शत्रुओंको बाधा पहुँचानेमें समर्थ है ॥ २१ १/२ ॥

भार्गवास्त्रं महारौद्रं देवैरपि दुरासदम् ॥ २२ ॥
सृजतो बाहुवीर्येण कः पुमान् प्रसहिष्यति ।

जिस समय यह अपने बाहुबलसे देवताओंके लिये भी दुर्जय महाभयंकर भार्गवास्त्रका प्रयोग करेगा, उस समय इस वीरका आक्रमण कौन पुरुष सह सकेगा ॥ २२ १/२ ॥

अयं तु पुरुषः कृष्णो ह्यनादिनिधनोऽव्ययः ॥ २३ ॥
तं विजेतानृलोकेऽस्मिन् नापिशूलधरः स्वयम्।

ये श्रीकृष्ण तो अनादि, अनन्त और अविनाशी पुरुष हैं। इस नरलोकमें साक्षात् त्रिशूलधारी भगवान् शङ्कर भी उन्हें जीत नहीं सकते ॥ २३ १/२ ॥

तव पुत्रो महाराज सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् ॥ २४ ॥
विदित्वा देवमीशानं न योधयति केशवम् ।

महाराज ! आपका पुत्र सम्पूर्ण शास्त्रोंका तत्त्ववेत्ता है। यह श्रीकृष्णको देवता और ईश्वर समझकर ही उनसे युद्ध नहीं करता है ॥ २४ १/२ ॥

अद्य तस्य रणे जेता यवनाधिपतिर्नृप ॥ २५ ॥
स कालयावनो नाम अवध्यः केशवस्य ह।

नरेश्वर ! आजकल युद्धमें श्रीकृष्णपर विजय पानेवाला


१. 'गति' के स्थानमें 'गतिः' समझना चाहिये। नीलकण्ठने यहाँ विभक्तिका लोप आर्ष माना है।