विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 437, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ४१५
केवल कालयवन है, जो यवनोंका अधिपति है। वह श्रीकृष्णके लिये अवध्य है॥ २५¾ ॥
तप्त्वा सुदारुणं घोरं तपः परमदुश्चरम् ॥ २६ ॥
रुद्रमाराधयामास द्वादशाब्दानयोऽशनः।
पुत्रकामेन मुनिना तोष्य रुद्रात्सुतो वृतः ॥ २७ ॥
माथुराणामवध्योऽयं भवेदिति च शङ्करात् ।
एवमस्त्विति रुद्रोऽपि प्रददौ मुनये सुतम् ॥ २८ ॥
गार्ग्यमुनिने अत्यन्त दुष्कर, भयंकर एवं दारुण तपस्या करके बारह वर्षांतक पुत्रकी कामनासे रुद्रदेवकी आराधना की थी। वे उन दिनों केवल लोहका चूर्ण खाकर रहते थे। इस प्रकार रुद्रदेवको संतुष्ट करके उन्होंने उनसे एक पुत्र माँगा तथा भगवान् शङ्करसे यह भी प्रार्थना की कि मेरा वह पुत्र माथुरों (मथुरामें उत्पन्न हुए लोगों) के लिये अवध्य हो। तब रुद्रदेवने 'एवमस्तु' कहकर मुनिको वैसा पुत्र प्रदान कर दिया॥ २६—२८ ॥
एवं गार्ग्यस्य तनयः श्रीमान् रुद्रवरोद्भवः ।
माथुराणामवध्योऽयं मथुरायां विशेषतः ॥ २९ ॥
इस तरह गार्ग्यका वह तेजस्वी पुत्र रुद्रदेवके वरसे उत्पन्न हुआ है और विशेषतः माथुरों (मथुरामे पैदा हुए वीरों) के लिये अवध्य है ॥ २९॥
कृष्णोऽपि बलवानेष माथुरो जातवानयम् ।
स जेष्यति रणे कृष्णं मथुरायां समागतः ॥ ३० ॥
ये श्रीकृष्ण बलवान् होनेपर भी मथुरामें जन्म लेनेके कारण माथुर ही हैं। अतः मथुरामें आया हुआ कालयवन रणभूमिमें श्रीकृष्णको अवश्य जीत लेगा ॥ ३० ॥
मन्यध्वं यदि वा युक्तां नृपा वाचं मयेरिताम् ।
तत्र दूतं विसृजध्वं यवनेन्द्रपुरं प्रति ॥ ३१ ॥
नरपतियो ! यदि आपलोग मेरी कही हुई इस बातको उचित समझें तो यवनराजके नगरको दूत भेज दें॥ ३१ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा सौभपतेर्वाक्यं सर्वे ते नृपसत्तमाः।
कुर्म इत्यब्रुवन् हृष्टा जरासंधं महाबलम् ॥ ३२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सौभ विमानके अधिपति राजा शाल्वकी बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ नरेश हर्षमें भरकर महाबली जरासंधसे बोले—'हमलोग अवश्य ऐसा ही करें' ॥ ३२॥
स तेषां वचनं श्रुत्वा जरासंधो महीपतिः।
बभूव विमना राजन् ब्रह्मणो वचनं स्मरन् ॥ ३३ ॥
राजन् ! उन राजाओकी बात सुनकर आकाशवाणीकी बात याद करके पृथ्वीपति जरासंधका मन उदास हो गया॥ ३३ ॥
जरासंध उवाच
मां समाश्रित्य पूर्वस्मिन् नृपानृपभयार्दिताः ।
प्राप्नुवन्ति हतं राज्यं सभृत्यबलवाहनम् ॥ ३४ ॥
जरासंध बोला—आजसे पहले सब राजा दूसरे राजाओंके भयसे पीड़ित होनेपर मेरी शरणमें आते थे और भृत्य, सेना तथा वाहनोंसहित अपने खोये हुए राज्यको मेरे सहयोगसे पुनः प्राप्त कर लेते थे ॥ ३४ ॥
इह संचोद्यते भूपैः परसंश्रयहेतुना ।
कन्येव स्वपतिद्वेषादन्यं रतिपरायणा ॥ ३५ ॥
इस समय यहाँ सब राजा मुझे दूसरेका आश्रय लेनेके लिये प्रेरित कर रहे हैं। जैसे रतिलोलुप नारी अपने पतिके प्रति द्वेष होनेसे उसे छोड़कर दूसरे पुरुषका आश्रय लेती है, (उसी प्रकार मैं अपने बलका आश्रय न लेकर दूसरेका सहारा लेनेको उद्यत हुआ हूँ) ॥३५॥
अहो सुबलवद् दैवमशक्यं विनिवर्तितुम् ।
यदहं कृष्णभीतोऽन्यं संश्रयामि बलाधिकम् ॥ ३६ ॥
अहो ! दैव बड़ा प्रबल है। उसे लौटाया नहीं जा सकता; क्योंकि आज मैं श्रीकृष्णसे डरकर दूसरे अधिक बलशाली राजाका आश्रय ग्रहण कर रहा हूँ ॥ ३६ ॥
नूनं योगविहीनोऽहं कारयिष्ये पराश्रयम् ।
श्रेयो हि मरणं मह्यं न चान्यं संश्रये नृपाः ॥ ३७॥
निश्चय ही मैं निरुपाय हो गया हूँ, अतः मुझे दूसरेका आश्रय लेना पड़ेगा; परंतु ऐसे जीवनसे तो मेरा मर जाना ही अच्छा है। नरपतियो ! मैं दूसरेकी शरण नहीं लूँगा ॥ ३७॥
कृष्णो वा बलदेवो वा यो वाऽसौ वा नराधिपः ।
हन्तारं प्रतियोत्स्यामि यथा ब्राह्माप्रचोदितः ॥ ३८ ॥
श्रीकृष्ण हों, बलदेव हों अथवा जो कोई भी राजा क्यों न हो, जो मुझे मारेगा, उसका मैं डटकर सामना करूँगा। जैसा कि आकाशवाणीने कहा है कि मुझे कोई दूसरा मारनेवाला है ॥ ३८ ॥
एषा मे निश्चिता बुद्धिरेतत् सत् पुरुषव्रतम् ।
अतोऽन्यथा न शक्तोऽहं कर्तुं परसमाश्रयम् ॥ ३९ ॥
यही मेरी बुद्धिका निश्चय है, यही सत्पुरुषका व्रत है। इसके विपरीत मैं दूसरेका आश्रय लेनेमे असमर्थ हूँ ॥ ३९ ॥
भवतां साधुवृत्तानामाबाधं न करोति सः ।
तेन दूतं प्रदास्यामि नृपाणां रक्षणाय वै ॥ ४० ॥
आप सदाचारी नरेशोको श्रीकृष्ण बाधा न पहुँचायें, इस उद्देश्यसे राजाओंकी रक्षाके लिये मैं दूत दूँगा अर्थात् दूत भेजना स्वीकार करूँगा ॥ ४० ॥
व्योममार्गेण यातव्यं यथा कृष्णो न बाधते ।
गच्छन्तमनुचिन्त्यैवं प्रेषयध्वं नृपोत्तमाः ॥ ४१ ॥
श्रेष्ठ राजाओ ! इस दूतको आकाशमार्गसे जाना चाहिये, जिससे यहाँसे जाते समय उसे श्रीकृष्ण बाधा न दे सकें। इसकी भलीभाँति विचार करके ही तुमलोग दूत भेजो ॥ ४१॥