भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 438

४१६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

अयं सौभपतिः श्रीमाननलाकेन्दुविक्रमः।
रथेनादित्यवर्णेन प्रयाति स्वपुरं बली ॥ ४२ ॥

ये श्रीमान् सौभपति बलवान् राजा शाल्व अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके समान पराक्रमी हैं। ये सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ (विमान) द्वारा अपने नगरको जाते हैं॥ ४२ ॥

यवनेन्द्रो यथाभ्येति नरेन्द्राणां समागमम्।
वचनं च तथास्माभिर्दूत्ये नः कृष्णविग्रहे ॥ ४३ ॥

ये दूतकर्म करते समय हमलोगोंकी ओरसे जैसी बात कहनी चाहिये, वैसी ही कहें, जिससे श्रीकृष्णके साथ हम लोगोंका युद्ध उपस्थित होनेपर वह यवनराज कालयवन हम नरेशोंकी मण्डलीसे आकर मिल जाय ॥ ४३ ॥

वैशम्पायन उवाच
पुनरेवाब्रवीद् राजा सौभस्य पतिमुर्जितम् ।
गच्छ सर्वनरेन्द्राणां साहाय्यं कुरु मानद ॥ ४४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! फिर राजा जरासंधने सौभविमानके स्वामी बलवान् राजा शाल्वसे कहा—'मानद ! जाओ, सम्पूर्ण नरेशोंकी सहायता करो ॥ ४४ ॥

यवनेन्द्रो यथा याति यथा कृष्णं विजेष्यति ।
यथा वयं च तुष्यामस्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ ४५ ॥

तुम ऐसी नीतिका प्रयोग करो, जिससे यवनराज चढ़ाई करे, श्रीकृष्णको जीते और हमलोगोंको संतोप हो' ॥ ४५ ॥

एवं संदिश्य सर्वांस्तान् भीष्मकं पूज्य धर्मतः ।
प्रययौ स्वपुरं राजा स्वेन सैन्येन संवृतः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार सबको संदेश देकर और धर्मानुसार भीष्मकका भी सम्मान करके राजा जरासंध अपनी सेनाके साथ अपने नगरको चला गया ॥ ४६ ॥

शाल्वोऽपि नृपतिश्रेष्ठस्तांश्च सम्पूज्य धर्मतः।
जगामाकाशमार्गेण रथेनानिलरंहसा ॥ ४७ ॥

राजाओंमें श्रेष्ठ शाल्व भी उन सबका धर्मपूर्वक आदर करके वायुके समान वेगशाली विमानद्वारा आकाशमार्गसे चला गया ॥ ४७ ॥

तेऽपि सर्वे महीपाला दक्षिणापथवासिनः ।
अनुव्रज्य जरासंधं गताः स्वनगरं प्रति ॥ ४८ ॥

दक्षिण भारतके रहनेवाले जो समस्त भूमिपाल वहाँ उपस्थित थे, वे भी कुछ दूरतक जरासंधके पीछे जाकर फिर अपने नगरको चले गये ॥ ४८ ॥

भीष्मकः सह पुत्रेण तावुभौ चिन्त्य दुर्नयम् ।
स्वे गृहे न्यवसद् दीनः कृष्णमेवानुचिन्तयन् ॥ ४९ ॥

राजा भीष्मक अपने पुत्र रुक्मीके साथ ही उन दोनों शाल्व और जरासंधका तथा उन सबकी दुर्नीतिका विचार करके श्रीकृष्णका ही चिन्तन करते हुए दीनभावसे अपने घरमें रहने लगे ॥ ४९ ॥

विदित्वा रुक्मिणी साध्वी स्वयंवरनिवर्तनम् ।
कृष्णस्यागमनाद्धेतोर्नृपाणां दोषदर्शनम् ॥ ५० ॥
गत्वा तु सा सखीमध्ये उवाच व्रीडितानना ।
न चान्येषां नरेन्द्राणां पत्नी भवितुमुत्सहे ।
कृष्णात् कमलपत्राक्षात् सत्यमेतद् वचो मम ॥ ५१ ॥

सती साध्वी रुक्मिणीको जब यह पता लग गया कि श्रीकृष्णका आगमन होनेसे स्वयंवर स्थगित हो गया तथा राजाओंकी जो दोषद्रष्टि थी उसका भी ज्ञान हो गया, तब वे अपनी सखियोंके बीचमें जाकर लज्जासे सिर झुकाये हुए बोलीं—'सखियो ! मैं कमलनयन श्रीकृष्णको छोड़कर दूसरे नरेशोंकी पत्नी नहीं हो सकती—यह मेरी सच्ची बात है ।५०-५१।

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिणीस्वयंवरे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीका स्वयंवरविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥


त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कालयवनकी विशेषता, राजा शाल्वका उसके यहाँ दूत बनकर आना और उसे जरासंधका संदेश सुनाना

वैशम्पायन उवाच
यवनानां बलोदग्रः स कालयवनो नृपः ।
बभूव राजा धर्मेण रक्षिता पुरवासिनाम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सबसे अधिक बलशाली कालयवन यवनोंका राजा था, जो धर्मके अनुसार पुरवासियोंकी रक्षा करता था ॥ १ ॥

त्रिवर्गविदितः प्राज्ञः षड्गुणानुपजीवकः ।
सप्तव्यसनसम्मूढो गुणेष्वभिरतः सदा ॥ २ ॥

वह त्रिवर्ग (पद, स्थान एवं वृद्धि अथवा धर्म, अर्थ और काम ) का ज्ञाता, बुद्धिमान्, राजनीतिके छः गुणों(संधि-विग्रह आदि ) का आश्रय लेनेवाला, सात प्रकारके व्यसनों- से अनभिज्ञ और सदा गुणोंमें तत्पर रहनेवाला था ॥ २॥

श्रुतिमान् धर्मशीलश्च सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
सांग्रामिकविधिज्ञश्च दुर्गलाभानुसारणः ॥ ३ ॥


१ सात व्यसन इस प्रकार हैं—मृगया, जुआ, दिनमें सोना, परायी निन्दा, स्त्रीविषयक आसक्ति, मद्यपान और व्यर्थ भाषण ।