भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 439

विष्णुपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४१७


विद्यावान्, धर्मशील, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, युद्धविधि-का ज्ञाता तथा दुर्लभ लाभका अनुसरण करनेवाला था ॥ ३ ॥

शूरोऽप्रतिबलश्चैव मन्त्रिप्रवरसेवकः ।
सुखासीनः सभां रम्यां सचिवैः परिवारितः ॥ ४ ॥
उपास्यमानो यवनैरात्मविद्भिर्विपश्चितैः ।
विविधाश्च कथा दिव्याः कथ्यमानाः परस्परम् ॥ ५ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु दिव्यगन्धवहोऽनिलः ।
प्रववौ मदनावोधं चकार सुखशीतलः ॥ ६ ॥

उसके समान बलवान् दूसरा कोई नहीं था। वह शूरवीर और श्रेष्ठ मन्त्रियोंका सेवन करनेवाला था। एक दिन जब वह मन्त्रियोंसे घिरा हुआ अपनी रमणीय सभामें सुखपूर्वक बैठा था, आत्मज्ञ एवं विद्वान् यवन उसकी सेवामें उपस्थित थे और उनमें परस्पर नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ हो रही थीं। इसी समय दिव्य सुगन्ध लेकर मन्द-मन्द वायु बहने लगी। वह सुखद एवं शीतल वायु उन सबके कामभावको जाग्रत् करने लगी ॥ ४–६ ॥

किंस्विदित्युत्कमनसः सभायां ये समागताः ।
उत्फुल्लनयनाः सर्वे राजा चैवावलोक्य सः ॥ ७ ॥

उस समय सभामें जो लोग आये थे, वे सभी एकचित्त होकर यह जिज्ञासा करने लगे कि 'यह क्या है ?' सबके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे थे। राजा कालयवन भी यह अद्भुत बात देखकर प्रभावित हुए बिना न रह सका ॥ ७ ॥

अपश्यन्त रथं दिव्यमायान्तं भास्करोपमम् ।
शातकुम्भमयैः शुभ्रं रथाङ्गैरुपशोभितम् ॥ ८ ॥
दिव्यरत्नप्रभाकीर्णं दिव्यध्वजपताकिनम् ।
वाहितं दिव्यतुरगैर्र्मनोमारुतरंहसैः ॥ ९ ॥

उन सबने आकाशसे एक सूर्यके समान तेजस्वी दिव्य विमानको उतरते देखा, जो सुवर्णमय चमकीले पहियोंसे शोभा पाता था, वह रथ या विमान दिव्य रत्नोंकी प्रभासे व्याप्त था। उसमें दिव्य ध्वजा-पताकाएं फहरा रहीं थीं तथा मन एवं वायुके समान वेगशाली दिव्य अश्व उस रथको खींच रहे थे ॥ ८-९ ॥

चन्द्रभास्करविम्बानि कृत्वा जाम्बूनदेन तम् ।
रचितं वै विश्वकृता वैयाघ्रवरभूषितम् ॥ १० ॥

विश्वकर्माने चन्द्रमा और सूर्यके बिम्ब बनाकर जाम्बूनद नामक सुवर्णसे उस रथका निर्माण किया था। वह चारों ओरसे उत्तम व्याघ्रचर्मद्वारा मढ़ा हुआ था ॥ १० ॥

रिपूणां त्रासजननं मित्राणां हर्षवर्द्धनम् ।
दक्षिणादिगुपायान्तं रथं पररथारुजम् ॥ ११ ॥

वह रथ शत्रुओंके मनमें त्रास उत्पन्न करनेवाला और मित्रोंका हर्ष बढ़ानेवाला था। वह दक्षिण दिशाकी ओरसे आ रहा था और शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेमे समर्थ था ११

तत्रोपविष्टं श्रीमन्तं सौभस्य पतिमूर्जितम् ।
दृष्ट्वा परमसंहृष्टाश्चार्घ्यं पाद्येति चासकृत् ॥ १२ ॥
उवाच यवनेन्द्रस्य मन्त्री मन्त्रविशां वरः ।

उसमे बैठे हुए सौभपति तेजस्वी राजा श्रीमान् शाल्वको देखकर मन्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ यवनराजका मन्त्री बहुत प्रसन्न हुआ और बारंबार कहने लगा—'अरे ! अर्घ्य लाओ, पाद्य लाओ' ॥ १२३ ॥

तत्रोत्थाय महाबाहुः स्वयमेव नृपासनात् ॥ १३ ॥
प्रत्युद्गम्यार्घ्यमादाय रथावतरणे स्थितः ।

उस समय महाबाहु राजा कालयवन स्वयं ही राजसिंहासनसे उठा और अर्घ्य लिये आगे बढ़कर विमानसे उतरनेकी सीढ़ीके पास खड़ा हो गया ॥ १३३ ॥

शाल्वोऽपि च महातेजा दृष्ट्वा राजानमागतम् ॥ १४ ॥
मुदा परमया युक्तं शक्रप्रतिमतेजसम् ।
अवतीर्य सुविश्रब्ध एक एव रथोत्तमात् ॥ १५ ॥
विवेश परमं प्रीतो मित्रदर्शनलालसः ।

महातेजस्वी राजा शाल्व भी इन्द्रके समान तेजस्वी राजा कालयवनको बड़ी प्रसन्नताके साथ आया देख निर्भय हो अकेला ही उस उत्तम रथसे उतर पड़ा और मित्रके दर्शनकी लालसा मनमें रखकर अत्यन्त संतुष्ट हो उसके भवनमें प्रविष्ट हुआ ॥ १४-१५३ ॥

दृष्ट्वार्घ्यमुद्यतं राजा शाल्वो राजर्षिसत्तमः ॥ १६ ॥
उवाच श्लक्ष्णया वाचा नार्घोऽहंऽस्मि महाद्युते ।

अपने लिये अर्घ्य उपस्थित देख राजर्षियोंमें श्रेष्ठ राजा शाल्व मधुर वाणीमे बोला—'महाद्युते ! मैं अर्घ्य ग्रहण करनेके योग्य नहीं हूँ ॥ १६३ ॥'

दूतोऽहं मनुजेन्द्राणां सकाशाद् भवतोऽन्तिकम् ॥ १७ ॥
प्रेषितो बहुभिः सार्द्धं जरासंधेन धीमता ।
तेन मन्ये महाराज नार्घाहोऽस्मीति राजसु ॥ १८ ॥

'मैं नरेशोंका दूत बनकर उनकी ओरसे आपके पास आया हूँ। बुद्धिमान् जरासंध तथा बहुत-से नरेशोंने एक साथ मिलकर मुझे आपके पास भेजा है। महाराज ! इसीलिये मैं समझता हूँ कि इस समय मैं राजाओंका अर्घ्य लेने योग्य नहीं हूँ' ॥ १७-१८ ॥

कालयवन उवाच

जानाम्यहं महाबाहो दौत्येन त्वामिहागतम् ।
साहित्ये नरदेवानां प्रेषितो मागधेन वै ॥ १९ ॥

कालयवन बोला—महाबाहो ! मैं जानता हूँ कि तुम दूत बनकर यहाँ आये हो और नरपतियोंके साथ मगधराज जरासंधने तुम्हे यहाँ भेजा है ॥ १९ ॥


म० ह० १४ -