विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 440, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४१८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तेन त्वामर्चये राजन् विशेषेण महामते।
अर्घ्यपाद्यादिसत्कारैरासनेन यथाविधि ॥ २० ॥
भवत्यभ्यर्चिते राज्ञां सर्वेषामर्चितं भवेत्।
आस्यतामासने शुभ्रे मया सार्द्धं जनेश्वर ॥ २१ ॥
राजन् ! महामते ! इसलिये मैं तुम्हारी विशेषरूपसे पूजा करना चाहता हूँ। अर्घ्य, पाद्य आदि सत्कारोंसे तथा विधिपूर्वक आसन देनेसे यदि आपकी पूजा हो जायगी तो इसके द्वारा समस्त राजाओंका पूजन सम्पन्न हो जायगा। अतः जनेश्वर ! अब मेरे साथ उज्ज्वल सिंहासनपर विराजमान होइये ॥ २०-२१ ॥
वैशम्पायन उवाच
स हस्तालिङ्गनं कृत्वा पृष्ट्वा च कुशलमामयम् ।
सुखोपविष्टौ सहितौ शुभे सिंहासने स्थितौ ॥ २२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कालयवनने शाल्वसे हाथ मिलाकर उसका कुशलमंगल पूछा। फिर दोनों एक सुन्दर सिंहासनपर साथ-साथ सुखपूर्वक बैठे ॥ २२ ॥
कालयवन उवाच
यद्बाहुबलमाश्रित्य वयं सर्वे नराधिपाः।
वसामो विगतोद्विग्ना देवा इव शचीपतिम् ॥ २३ ॥
किमसाध्यं भवेदस्य येनासि प्रेषितो मयि।
उस समय कालयवनने कहा—राजन् ! जिनके बाहुबलका सहारा लेकर हम सब नरेश उसी प्रकार निर्भय रहते हैं, जैसे देवता शचीपति इन्द्रका सहारा लेकर भयसे मुक्त हो जाते हैं; उन्हीं महाराज जरासंधके लिये कौन-सा कार्य असाध्य हो गया है, जिससे उन्होंने मेरे पास आपको भेजा है ? ॥ २३ ॥
वद सत्यं वचस्तस्य किमाज्ञापयति प्रभुः।
करिष्ये वचनं तस्य अपि कर्म सुदुष्करम् ॥ २४ ॥
उन्होंने क्या कहा है, यह सच-सच बताइये। वे प्रभु मेरे लिये क्या आज्ञा देते हैं ? मैं उनकी आज्ञाका पालन करूँगा। उनके कहनेसे अत्यन्त दुष्कर कर्म भी कर सकता हूँ ॥ २४ ॥
शाल्व उवाच
यथा वदति राजेन्द्र मगधाधिपतिस्तव।
तथाहं सम्प्रवक्ष्यामि श्रूयतां यवनाधिप ॥ २५ ॥
शाल्व बोला—राजेन्द्र ! यवनेश्वर ! मगधराज जरासंधने आपसे जैसी बात कहनेको कहा है, वैसी ही बता रहा हूँ, सुनिये ॥ २५ ॥
जरासंध उवाच
जातोऽयं जगतां बाधी कृष्णः परमदुर्जयः।
विदित्वा तस्य दुर्वृत्तमहं हन्तुं समुद्यतः ॥ २६ ॥
जरासंधका कथन है कि—ये जो परम दुर्जय श्रीकृष्ण प्रकट हुए हैं, सम्पूर्ण जगत्को बड़ा कष्ट दे रहे हैं। उनके दुराचारको जानकर मैं उन्हें मार डालनेके लिये उद्यत हुआ था ॥ २६ ॥
पार्थिवैर्बहुभिः सार्द्धं समग्रबलवाहनैः ।
उपरुध्य महासैन्यैर्गोमन्तमचलोत्तमम् ॥ २७ ॥
चेदिराजस्य वचनं महार्थं श्रुतवानहम् ।
तदा तयोर्विनाशाय हुताशनमयोजयम् ॥ २८ ॥
बहुत-से राजा अपनी समूची सेना और सवारियाँ लेकर मेरे साथ हो गये थे। उन सबकी विशाल सेनाओंद्वारा मैंने गोमन्त नामक उत्तम पर्वतपर घेरा डाला (क्योंकि उस समय श्रीकृष्ण और बलराम गोमन्तपर ही विद्यमान थे)। घेरा डालनेके बाद मैंने चेदिराज दमघोषका वचन सुना, जो महान् अर्थसे भरा था। तब मैंने उन दोनोंके विनाशके लिये उस पर्वतपर आग लगा दी ॥ २७-२८ ॥
ज्वालाशतसहस्राढ्यं युगान्ताग्निसमप्रभम् ।
दृष्ट्वा रामो गिरेः कूटादाप्लुतो हेमतालधृक् ॥ २९ ॥
विनिष्पत्य महासेनां मध्ये सागरसंनिभाम् ।
आजघान दुराधर्षो नराश्वरथदन्तिनाम् ॥ ३० ॥
वह आग सैकड़ों और हजारों लपटोंसे प्रज्वलित हो उठी, जो प्रलयकालकी संवर्तक अग्निके समान प्रकाशित हो रही थी। उस आगको देखकर सुवर्णमय तालध्वज धारण करनेवाले बलराम पर्वतके शिखरसे कूद पड़े और समुद्र-जैसी प्रतीत होनेवाली उस विशाल सेनाके मध्यभागमें पहुँचकर हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंका संहार करने लगे। उस समय उन्हें पराजित करना अत्यन्त कठिन हो गया था॥२९-३०
सर्पन्तमिव सर्पेन्द्रं विकृष्याकृष्य लाङ्गलम् ।
नरनागाश्ववृन्दानि मुसलेन व्यपोथयत् ॥ ३१ ॥
उन्होंने सर्पराजके समान सरकते हुए हलका आकर्षण और विकर्षण करके अर्थात् उस हलद्वारा शत्रुसैनिकोंको ढकेलते और खींचते हुए बहुत-से मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंको मुसलसे मार डाला ॥ ३१ ॥
गजेन गजमास्फाल्य रथेन रथयोधिनम् ।
हयेन च हयारोहं पदातेन पदातिनम् ॥ ३२ ॥
वे हाथीसे हाथीको, रथसे रथी योद्धाको, घोड़ेसे घुड़सवारको तथा पैदलसे पैदल सिपाहीको मौतके घाट उतार देते थे ॥ ३२ ॥
समरे स महातेजा नृपार्कशतसंकुले ।
विचरन् विविधान् मार्गान् निदाघे भास्करो यथा ॥३३॥
जैसे ग्रीष्म ऋतुमें सूर्यदेव प्रचण्ड तेजसे सम्पन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार सैकड़ों राजारूपी सूर्यसे व्याप्त समराङ्गणमें वे