भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 441

विष्णुपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४१९


महातेजस्वी बलराम भाँति-भाँतिके पैंतरे दिखाते हुए विचरने लगे ॥ ३३ ॥

रामादनन्तरं कृष्णः प्रगृह्यार्कसमप्रभम् ।
चक्रं चक्रभृतां श्रेष्ठः सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥ ३४ ॥

बलरामसे छोटे हैं श्रीकृष्ण, जो चक्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं। वे सूर्यके समान तेजस्वी चक्र हाथमें लेकर उसी तरह शत्रु-सैनिकोंपर टूट पड़े, जैसे सिंह क्षुद्र मृगोंपर आक्रमण करता है ॥ ३४ ॥

प्रविचाल्य महावीर्यः पादवेगेन तं गिरिम् ।
शत्रुसैन्ये पपातोच्चैैर्यदुवीरः प्रतापवान् ॥ ३५ ॥
प्रनृत्यन्निव शैलेन्द्रस्तोयधाराभिषेचितः ।
घूर्णमानो विवेशोर्वीं विनिर्वाप्य हुताशनम् ॥ ३६ ॥

महापराक्रमी प्रतापी यदुवीर श्रीकृष्ण अपने पैरोंके वेगसे उस पर्वतको हिलाकर जब ऊँचे शिखरसे शत्रुओंकी सेनामें कूदे थे, उस समय वह शैलराज नाचता-सा प्रतीत होता था। वह अपने ही अवयवोंसे निकली हुई जलधारासे नहा उठा और सारी आगको बुझाकर चक्कर काटता-सा कुछ दूरतक पृथ्वीमें घुस गया ॥ ३५-३६ ॥

आदीप्यमानशिखरादवप्लुत्य जनार्दनः ।
जघान वाहिनीं राजंश्चक्रव्यग्रेण पाणिना ॥ ३७ ॥

राजन् ! पर्वतके जलते हुए शिखरसे नीचे कूदकर श्रीकृष्णने चक्रयुक्त हाथसे राजाओंकी सेनाका संहार आरम्भ किया ॥ ३७ ॥

विक्षिप्य विपुलं चक्रं गदापातादनन्तरम् ।
नरनागाश्ववृन्दानि मुसलेन व्यचूर्णयत् ॥ ३८ ॥

विशाल चक्र फेंककर फिर गदाद्वारा आघात करते थे। तदनन्तर बलराम मुसलसे हाथी, घोड़े और मनुष्योंके समूहोंका कचूमर निकाल देते थे ॥ ३८ ॥

क्रोधानिलसमुद्धतचक्रलाङ्गलवह्निना ।
निर्दग्धा महती सेना नरेन्द्रार्काभिपालिता ॥ ३९ ॥

क्रोधरूपी वायुसे प्रज्वलित चक्र और हलरूपी आगसे नरेशरूपी सूर्यद्वारा पालित वह विशाल सेना जलकर भस्म हो गयी ॥ ३९ ॥

नरनागाश्वकलिलं पत्तिध्वजसमाकुलम् ।
रथानीकं पदाताभ्यां क्षणेन विदलीकृतम् ॥ ४० ॥

इन दो ही पैदल वीरोंने हाथी, घोड़ों और मनुष्योंसे परिपूर्ण एवं पैदलों और ध्वजोंसे व्याप्त रथसमूहका क्षणभरमें ही संहार कर डाला ॥ ४० ॥

सेनां प्रभग्नामालोक्य चक्रानलभयार्दिताम् ।
महता रथवृन्देन परिवार्य समन्ततः ॥ ४१ ॥
तत्राहं युद्धयमानस्तु भ्रातास्य बलवान् बली ।
स्थितो ममाग्रतः शूरो गदापाणिर्हलायुधः ॥ ४२ ॥

चक्राग्निके भयसे पीड़ित हुई अपनी सेनाको पलायन करती देख मैं विशाल रथसमूहके द्वारा उन दोनोंको सब ओरसे घेरकर युद्ध करने लगा। उस समय श्रीकृष्णके बलवान् भ्राता शूरवीर बलराम हाथमें गदा और हल लिये मेरे सामने खड़े हो गये ॥ ४१-४२ ॥

द्वादशाक्षौहिणीर्हत्वा प्रभिन्न इव केसरी ।
हलं सौनन्दमुत्सृज्य गदया मामताडयत् ॥ ४३ ॥

उन्होंने चोट खाये हुए सिंहके समान कुपित हो मेरी बारह अक्षौहिणी सेनाओंका संहार करके हल और मुसलको तो छोड़ दिया और गदासे ही मुझपर आघात किया ॥ ४३॥

वज्रपातनिभं वेगं पातयित्वा ममोपरि ।
भूयः प्रहर्तुकामो मां वैशाखेनास्थितो महीम् ॥ ४४ ॥

उसका वेग वज्रपातके समान था। मेरे ऊपर उस गदाका प्रहार करके वे पुनः मुझपर चोट करनेकी इच्छासे वैशाखी (शक्ति) लेकर पृथ्वीपर खड़े हो गये ॥ ४४ ॥

वैशाखं स्थानमास्थाय गुहः क्रौञ्चं यथा पुरा ।
तथा मां दीर्घनेत्राभ्यामीक्षते निर्दहन्निव ॥ ४५ ॥

जैसे पूर्वकालमें कार्तिकेयने क्रौञ्च पर्वतको विदीर्ण किया था, उसी प्रकार वे मेरे मर्मस्थानको लक्ष्य करके शक्ति छोड़नेकी इच्छासे अपने बड़े-बड़े नेत्रोंद्वारा मेरी ओर इस तरह देखने लगे, मानो मुझे जलाकर भस्म कर डालेंगे ॥ ४५ ॥

तादृग्रूपं समालोक्य बलदेवं रणाजिरे ।
जीवितार्थी नृलोकेऽस्मिन् कः पुमान् स्थातुमर्हति ॥ ४६॥

रणभूमिमें बलदेवके वैसे स्वरूपको देखकर अपने जीवनकी इच्छा रखनेवाला इस मनुष्यलोकका कौन पुरुष उनके सामने ठहर सकता है ॥ ४६ ॥

गृहीत्वा सगदां भीमां कालदण्डमिवोद्यताम् ।
कालाङ्कुशेन निर्धूतां स्थित एवाग्रतो मम ॥ ४७ ॥

फिर कालदण्डके समान उठी हुई भयानक गदाको हाथमें लेकर वे मेरे सामने खड़े हो गये। वह गदा कालकी प्रेरणासे घुमायी जा रही थी ॥ ४७ ॥

ततो जलदगम्भीरस्वरेणापूरयन् नभः ।
वागुवाचाशरीरेण स्वयं लोकपितामहः ॥ ४८ ॥
प्रहर्तव्यो न राजायमवध्योऽयं तवानघ ।
कल्पितोऽस्य वधोऽन्यस्माद् विरमस्व हलायुध॥ ४९ ॥

इसी बीचमें साक्षात् लोकपितामह ब्रह्माजी मेघके समान गम्भीर स्वरसे आकाशको पूर्ण करते हुए अदृश्यरूपसे बोले— 'अनघ ! इस राजापर प्रहार न करना। यह तुम्हारे लिये