भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 442
४२०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

अवध्य है। इसका वध दूसरेके हाथसे निश्चित किया गया है, अतः हलधारी बलराम ! तुम प्रहारसे विरत हो जाओ' ४८-४९

श्रुत्वाहं तेन वाक्येन चिन्ताविष्टो निवर्तितः ।
सर्वप्राणहरं घोरं ब्रह्मणा स्वयमीरितम् ॥ ५० ॥
यह सुनकर उस आकाशवाणीके कारण मैं चिन्तामें निमग्न हो गया और युद्धसे लौट पड़ा; क्योंकि साक्षात् ब्रह्माजीने वह ऐसा घोर वचन सुनाया था, जो मेरी सम्पूर्ण प्राणशक्तिको हर लेनेवाला था ॥ ५० ॥

तेनाहं वः प्रवक्ष्यामि नृपाणां हितकाम्यया ।
श्रुत्वा त्वमेव राजेन्द्र कर्तुमर्हसि तद् वचः ॥ ५१ ॥
राजेन्द्र ! इसलिये मैं तुमसे समस्त नरेशोंके हितकी कामनासे कुछ कहना चाहता हूँ, उसे सुनकर तुम्हीं उसे पूर्ण कर सकते हो ॥ ५१ ॥

तपसोग्रेण महता पुत्रार्थी तोष्य शङ्करम् ।
प्राप्तवान् देवदेवं त्वामवध्यं माथुरैर्जनैः ॥ ५२ ॥
महामुनिश्चायसचूर्णमशन-
न्युपस्थितो द्वादशवार्षिकं व्रतम् ।
सुरासुरैः संस्तुतपादपङ्कजः
स लब्धवानीप्सितकामसम्पदम् ॥ ५३ ॥
महामुनि गार्ग्य, जिनके चरणारविन्दोंकी स्तुति देवता और असुर भी करते हैं; बारह वर्षोंतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेके पश्चात् लोहचूर्ण खाकर तपस्या करने लगे । मनमें पुत्रकी कामना रखकर उस उग्र एवं महान् तपके द्वारा भगवान् शङ्करको संतुष्ट करके उनसे उन्होंने अपनी अभीष्ट कामसम्पत्तिके रूपमें देवराज-तुल्य तुमको प्राप्त किया । तुम मथुरा मण्डलमें उत्पन्न होनेवाले लोगोंके लिये अवध्य हो ॥ ५२-५३ ॥

तपोबलाद् गार्ग्यमुनेर्महात्मनो
वरप्रभावाच्चकलेन्दुमौलिनः ।
भवन्तमासाद्य जनार्दनो हिमं
विलीयते भास्कररश्मिना यथा ॥ ५४ ॥
महामुनि गार्ग्यके तपोबल और चन्द्रार्धशेखर भगवान् शिवके वरदानसे तुम्हारा प्राकट्य हुआ है । तुमसे टक्कर लेने-पर श्रीकृष्ण उसी प्रकार नष्ट हो जायँगे, जैसे बर्फ सूर्यकी किरणोंसे गल जाता है ॥ ५४ ॥

यतस्व राज्ञां वचनप्रचोदितो
व्रजस्व यात्रां विजयाय केशवम् ।
प्रविश्य राष्ट्रं मथुरां च सेनया
निहत्य कृष्णं प्रथयन् स्वकं यशः ॥ ५५ ॥
राजन् ! तुम राजाओंके वचनोंसे प्रेरित हो श्रीकृष्णको जीतनेका प्रयत्न करो । उनपर विजय पानेके लिये मथुरापर चढ़ाई कर दो । अपनी सेनाद्वारा मथुराके राज्य और नगर-में प्रवेश करके श्रीकृष्णको मारकर अपने यशका विस्तार करो ॥ ५५ ॥

माथुरो वासुदेवोऽयं बलदेवः सबान्धवः ।
तौ विजेष्यसि संग्रामे गत्वा तां मथुरां पुरीम् ॥ ५६ ॥
वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण और बलदेव अपने बन्धु-बान्धवों-सहित माथुर ही हैं; तुम मथुरापुरीपर चढ़ाई करके उन दोनों भाइयोंको युद्धमें जीत लोगे ॥ ५६ ॥

शाल्व उवाच

इत्येवं नरपतिभास्करप्रगीतं
वाक्यं ते कथितमिदं हितं नृपाणाम् ।
तत्सर्वं सह सचिवैर्विमृश्य बुद्ध्या
यद्युक्तं कुरु मनुजेन्द्र चात्मनिष्ठम् ॥ ५७ ॥
शाल्व कहता है— नरेन्द्र ! राजाओंमें सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले जरासंधने इस प्रकार जो सम्पूर्ण नरेशोंके लिये हितकारक बात कही है, वह मैंने तुम्हें कह सुनायी । तुम अपने मन्त्रियोंके साथ बैठकर उन सारी बातोंपर बुद्धि-पूर्वक विचार करके जो अपने लिये लाभदायक और उचित जान पड़े, वह करो ॥ ५७ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शाल्ववाक्ये त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शाल्वका वाक्यविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥


चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कालयवनका राजाओंका अनुरोध स्वीकार करके श्रीकृष्णपर विजय पानेके लिये मथुराको प्रस्थान

वैशम्पायन उवाचवैशम्पायनजी कहते हैं—
एवं कथयमानं तं शाल्वराजं नृपाज्ञया ।<br>उवाच परमप्रीतो यवनाधिपतिर्नृपः ॥ १ ॥जनमेजय ! नरेशोंकी आज्ञाके अनुसार शाल्वराजने जब उपर्युक्त बात कही, तब यवनोंके अधिपति राजा कालयवनने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा ॥ १ ॥
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