विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 443, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२१
कालयवन उवाच
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि सफलं जीवितं मम ।
कृष्णनिग्रहहेतोर्यन्नियुक्तो बहुभिर्नृपैः ॥ २ ॥
कालयवन बोला—बहुत-से राजाओंने मिलकर जो मुझे श्रीकृष्णके निग्रहके लिये नियुक्त किया है, इससे मैं धन्य हो गया। यह उन सबका मुझपर महान् अनुग्रह है। आज मेरा जीवन सफल हो गया ॥ २ ॥
दुर्जयस्त्रिषु लोकेषु सुरासुरगणैरपि ।
तस्य निग्रहहेतोर्मामवधार्य जयाशिषम् ॥ ३ ॥
प्रहृष्टै राजसिंहैस्तैरवधार्यो जयो मम ।
तेषां वाचामृतवर्षेण विजयो मे भविष्यति ॥ ४ ॥
जो तीनों लोकोंमें देवताओं और असुरोंके लिये भी दुर्जय हैं, उन्हींके निग्रहके लिये मुझे भेजनेका निश्चय किया गया और मुझे विजयसूचक आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ। हर्षमे भरे हुए उन राजसिंहोंने यदि मेरी विजयका निश्चय किया है तो उनके वचनामृतकी वर्षासे मेरी जीत अवश्य होगी ॥ ३-४॥
करिष्ये वचनं तेषां नृपसत्तमचोदितम् ।
पराजयोऽपि राजेन्द्र जयेन सदृशो मम ॥ ५ ॥
राजेन्द्र ! मैं नृपश्रेष्ठ जरासंधके कथनानुसार उन राजाओंके वचनका पालन अवश्य करूँगा। इस युद्धमें यदि मेरी पराजय भी हुई तो वह मेरे लिये विजयके ही समान होगी ॥ ५ ॥
अद्यैव तिथिनक्षत्रं मुहूर्तं करणं शुभम् ।
यास्यामि मथुरां राजन् विजेतुं केशवं रणे ॥ ६ ॥
राजन् ! मैं आजकी तिथि, नक्षत्र, मुहूर्त और करणको शुभ मानकर श्रीकृष्णको युद्धमें जीतनेके लिये आज ही मथुराको प्रस्थान करूँगा ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमाभाष्य राजानं सौभस्य पतिमूर्जितम् ।
सत्कृत्य च यथान्यायं महार्हमणिभूषणैः ॥ ७ ॥
ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं सिद्धादेशाय वै नृपः ।
पुरोहिताय राजेन्द्र प्रददौ बहुशो धनम् ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सौभविमानके अधिपति बलवान् राजा शाल्वसे ऐसा कहकर कालयवनने बहुमूल्य मणिमय आभूषणोंद्वारा उसका यथोचित सत्कार किया। राजेन्द्र ! तत्पश्चात् उस राजाने सिद्धिसूचक आशीर्वाद प्राप्त करनेके लिये ब्राह्मणोंको धन दान दिया और पुरोहितको बहुत-सा धन अर्पित किया ॥ ७-८ ॥
हुत्वाग्निं विधिवद् राजा कृतकौतुकमङ्गलः ।
प्रस्थानं कृतवान् सम्यग् जेतुकामो जनार्दनम् ॥ ९ ॥
तदनन्तर, विधिपूर्वक अग्निमें आहुति करके यात्राकालिक मङ्गलाचार सम्पन्न करनेके पश्चात् राजा कालयवनने जनार्दन श्रीकृष्णपर भलीभाँति विजय पानेके लिये वहाँसे प्रस्थान किया ॥ ९ ॥
शाल्वोऽपि भरतश्रेष्ठ कृतार्थो हृष्टमानसः ।
यवनेन्द्रं परिष्वज्य जगाम स्वपुरं नृपः ॥ १० ॥
भरतश्रेष्ठ ! इधर राजा शाल्व भी कृतार्थ एवं प्रसन्नचित्त हो यवनराजको हृदयसे लगाकर अपने नगरको चला गया ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कालयवनवाक्ये चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कालयवनका वाक्यविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
गरुड़का श्रीकृष्णके निवासयोग्य भूमि देखनेके लिये जाना, मथुरामें राजेन्द्र श्रीकृष्णका स्वागत, श्रीकृष्णद्वारा राजा उग्रसेन तथा मथुरावासियोंका सत्कार एवं गरुड़का लौटकर कुशस्थलीके विषयमें बताना।
जनमेजय उवाच
विदर्भनगराद् याते शक्रतुल्यपराक्रमे ।
किमर्थं गरुडो नीतः किं च कर्म चकार सः ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—इन्द्रके तुल्य पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण जब विदर्भ नगरसे मथुराको गये, उस समय अपने साथ गरुड़को क्यों ले गये और गरुड़ने वहाँ जाकर कौन-सा कार्य सम्पन्न किया ? ॥ १ ॥
न चारुरोह भगवान् वैनतेयं महाबलम् ।
एतन्मे संशयं ब्रह्मन् ब्रूहि तत्त्वं महामुने ॥ २ ॥
महामुने ! ब्रह्मन् ! भगवान् श्रीकृष्ण महाबली गरुड़पर आरूढ़ क्यों नहीं हुए ? यह मेरा संशय है। आप इसका ठीक-ठीक समाधान करें ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु राजन् सुपर्णेन कृतं कर्मातिमानुषम् ।
विदर्भनगरों गत्वा वैनतेयो महाद्युतिः ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! महातेजस्वी विनता-नन्दन गरुड़ने विदर्भनगरमें जाकर ऐसा कार्य किया था, जो मानवीय शक्तिसे परेकी वस्तु है ॥ ३ ॥